रैंकिंग का बाजारवाद
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नई आर्थिक तरक्की वाले देशों में पर्यावरणीय क्षेत्र में काफी कुछ खोया है। खराब नीति और प्रदर्शन के लिये आँकड़ेबाजी और माप क्षमता में कमज़ोरी नीति, प्रदर्शन और प्रकृति पर खराब असर डाल सकती है। यह भी सही है कि हवा, जैव विविधता और मानव सेहत के लिये जरूरी इन्तजाम किए बगैर शहरीकरण बढ़ाते जाना खतरनाक है; बावजूद इसके क्या यह सच नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के विकास कार्यक्रमों की पूरी शृंखला दुनिया को शहरीकरण की तरफ ही धकेल रही है? सांगठनिक स्तर पर देखें तो पर्यावरण की चिन्ता करना पर्यावरणीय संगठनों का काम है और शिक्षा की चिन्ता करना शैक्षिक संगठनों का। किन्तु क्या आपको यह देखकर ताज्जुब नहीं होता कि भारत में शैक्षिक संस्थानों की रैंकिंग का काम राजनीतिक पत्रिकाओं ने सम्भाल लिया है।

औद्योगिक रैंकिंग करते ऐसे संगठन देखे गए हैं, जिन्होंने खुद कभी उद्योग नहीं चलाए। देश और मुख्यमन्त्री से लेकर बिजली, दवा, रियल एस्टेट, मीडिया, शिक्षण संस्थाान तक; रैंकिंग का यह खेल कई स्तर पर है। यही खेल, रैंकिंग और पदक से लेकर पुरस्कार लेने-देने में भी चलता है।

पुरस्कार पाने वाले को खुद पुरस्कार पाने के लिए आवेदन करना पड़ता है - ‘मुझे पुरस्कार दो।’ अपने काम के गुणगान के दस्तावेज़ खुद जुटाने पड़ते हैं। यह उलटबाँसी नहीं तो और क्या है? इसी तरह की उलटबाँसी पर्यावरण के क्षेत्र में भी दिखाई दे रही है। पिछले दो दशक से कई अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक संगठन, दुनिया भर की पर्यावरण रेटिंग करने में बड़ी शिद्दत से जुटे दिखाई दे रहे हैं। हम भी हकीक़त से रुबरु हुए बिना, रैंकिंग के आधार पर अपने भविष्य के निर्णय करने लगे हैं।

निरर्थक नहीं उलटबाँसियाँ


क्या ये सब उलटबाँसियाँ निरर्थक हैं? नहीं! गौर करें तो पता चलेगा कि इनका मकसद येन-केन-प्रकारेण सिर्फ और सिर्फ कमाना है। रैंकिंग देने वाले भारतीय संगठनों के खेल किसी से छिपे नहीं है। सीधे-सीधे कहूँ तो ये संगठन ऐसी बाजारु ताकते हैं, जो अपना माल बेचने के लिये दुनिया भर में अफवाहों का विज्ञापन करती हैं। मौजूदा को नकारने-बिगाड़ने और नए को सर्वश्रेष्ठ समाधान बताना ही इनकी मार्केटिंग का आधार है।

रैंकिंग के आधार पर गौर करें


गौर करने की बात है कि यह आधार हाल ही दावोस में जारी पर्यावरणीय प्रदर्शन सूचकांक का आधार इस खेल से बहुत मेल खाता है। हम सब जानते हैं कि असल चिन्ता तो पर्यावरणीय क्षति की होनी चाहिए। मूल कारक तो वही है। जिन कारणों से पर्यावरणीय क्षति होती है, उन्हें रोकने के प्रयासों को आधार बनाना चाहिए था। लेकिन सूचकांक का आधार इसे न बनाकर पर्यावरणीय क्षति से मानव सेहत तथा पारिस्थितिकीय क्षति को रोकने के प्रयासों को बनाया गया है।

हमने तो हमेशा यही पढ़ा था- ‘इलाज से बेहतर है रोग की रोकथाम।’ उक्त आधार रोकथाम को पीछे और इलाज को आगे रखता है। क्या यह सही है? इस आधार पर जारी पर्यावरणीय प्रदर्शन सूचकांक में शामिल कुल 178 देशों की सूची में भारत को 155वें पायदान पर रखकर फिसड्डी करार दिया गया हैै; पड़ोसी पाकिस्तान (148) और नेपाल (139) से भी पीछे। यह सूचकांक वर्ल्ड इकोनॉमी फोरम की पहल पर येल और कोलम्बिया विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने तैयार किया है। सैमुअल फैमिली फ़ाउंडेशन और कॉल मैकबेन फ़ाउंडेशन ने इसमें मदद की हैं।

सुधरती हुई आर्थिकी वाले देशों पर निगाह


गौर करने की बात है कि सुधरती आर्थिकी वाले चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, रूस और भारत जैसे किसी भी देश को रैंकिंग में आगे नहीं रखा गया। ऐसे देशों में भी भारत को सभी से पीछे रखा गया है। दक्षिण अफ्रीका को 72, रूस को 73, ब्राजील को 78 और चीन को 118वें पायदान पर रखा गया है। भारत को मात्र 31.23 अंक दिए गए हैं। स्विटज़रलैंड, लक्समबर्ग, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर और चेक रिपब्लिक के नाम प्रथम पाँच के रूप में दर्ज किए गए हैं।

उल्लेखनीय है कि उभरती आर्थिकी वाले देशों को खासतौर पर इंगित करते हुए सूचकांक रिपोर्ट कहती है कि ये वे देश हैं, 2009 से 2012 के बीच जिनकी आर्थिकी में 55 प्रतिशत तक तरक्की हुई। सावधान करता तथ्य यह भी है कि दावोस में पेश रिपोर्ट हैती, सोमालिया, माली, लियोथो और अफगानिस्तान को ऐसे देशों के रूप में चिन्हित करती है, जहाँ अशान्ति और राजनीतिक उथल-पुथल है। भारतीय राजनीति में दावोस की दिलचस्पी का एक मतलब, उथल-पुथल करना भी हो सकता है।

यह बात ठीक है कि नई आर्थिक तरक्की वाले देशों में पर्यावरणीय क्षेत्र में काफी कुछ खोया है। खराब नीति और प्रदर्शन के लिये आँकड़ेबाजी और माप क्षमता में कमज़ोरी नीति, प्रदर्शन और प्रकृति पर खराब असर डाल सकती है। यह भी सही है कि हवा, जैव विविधता और मानव सेहत के लिये जरूरी इन्तजाम किए बगैर शहरीकरण बढ़ाते जाना खतरनाक है; बावजूद इसके क्या यह सच नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के विकास कार्यक्रमों की पूरी शृंखला दुनिया को शहरीकरण की तरफ ही धकेल रही है? गाँव को गाँव बना रहने देने का संयुक्त राष्ट्र संघ का एक कार्यक्रम हो तो बताइए।

खुद की खोज पर करें भरोसा


उक्त रिपोर्ट की सुनें तो यदि भारत इस सूचकांक में ऊपर स्थान चाहता है, तो उसे दुनिया भर की शोधन संयन्त्रों, सूचना प्रणालियों और दवाओं को अपने यहाँ खपाने को तैयार रहना चाहिए। क्या हम ऐसा करें? नहीं। ऐसी रिपोर्टों को सावधानी से पढ़ें और गुनने से पहले हजार बार सोचें। जुलाई में अगला सत्र शुरू होगा। विद्यार्थियों के बीच डिग्री कॉलेजों में प्रवेश को लेकर तैयारियाँ तेज हो गईं हैं।

खासकर प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों में सरकारी कॉलेजों की कमी है। हर निजी कॉलेज स्वयं को श्रेष्ठ बताने में नहीं चुकता। ऐसे में विद्यार्थी को दिखाई जा रही रैंकिंग और भिन्न वेबसाइटों पर दर्ज टिप्पणियों का सहारा लेते हैं। इस लेख की सलाह यही है कि प्रवेश के लिये स्कूल/कॉलेज खोजते वक्त, ख़रीददारी के वक्त, उत्पाद खोजते वक्त और यात्रा के दौरान होटल खोजते वक्त हमें भी चाहिए कि हम रैंकिंग से ज्यादा, खुद की खोज पर भरोसा करें। ध्यान रहे कि खुद की खोज सिर्फ इंटरनेट आधारित नहीं हो सकती; आमने-सामने ही हो सकती है। यह व्यावहारिक कैसे हो? आइए, इस सोच को व्यवहार बनाएँ।

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