बाढ़ चेतावनी से भी नहीं चेते

Submitted by UrbanWater on Fri, 09/15/2017 - 10:26
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डाउन टू अर्थ, सितम्बर 2017

सीएजी ऑडिट के मुताबिक, बाढ़ की सम्भावना वाले राज्य बाढ़ प्रबन्धन योजनाओं को लागू कर पाने में विफल रहे हैं।

भारत के 4,862 बाँधों में से 93 फीसदी के पास आपातकालीन एक्शन प्लान नहीं है। आपातकालीन स्थिति में ये मानव जीवन और सम्पत्ति नुकसान को कम करने का काम नहीं हो सकता है। राजस्थान के 200 और ओड़िशा के 199 बाँध में से किसी में भी ये आपातकालीन एक्शन प्लान नहीं है। गुजरात और पश्चिम बंगाल के केवल एक बाँध में आपातकालीन एक्शन प्लान है। अगस्त 2010 में लोकसभा में पेश किये गए द डैम सेफ्टी बिल को अभी तक अधिनियमित नहीं किया गया है। भारत में अभी कम-से-कम सात राज्य बाढ़ की विभीषिका का सामना कर रहे हैं। यह लगातार तीसरा साल है जब अर्ध-शुष्क और रेगिस्तानी राज्य गुजरात और राजस्थान भी इस सूची में शामिल हैं। पारम्परिक रूप से बाढ़ से तबाह होने वाले राज्यों के मुकाबले अब यह अन्य राज्यों को भी चपेट में ले रही है। इसका पैमाना, गम्भीरता और दायरा असामान्य होता जा रहा है। इस वर्ष बाढ़ के कारण कम-से-कम 1100 लोग मारे गए हैं। पिछले साल 475 से अधिक लोग मारे गए थे। इस साल बिहार में 482, गुजरात में 224 और राजस्थान में 66 लोगों की जान गई है। इन तीन राज्यों से 700 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।

वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट, वाशिंगटन डीसी स्थित शोध संगठन की 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सबसे ज्यादा नदी के बाढ़ के खतरे से पीड़ित होने वाला देश है। ऐसी परिस्थितियों में भारत की बाढ़ प्रबन्धन प्रणाली मजबूत होनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा है नहीं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा भारत की बाढ़ प्रबन्धन योजनाओं के ऑडिट से यह तथ्य सामने आया है।

संसद में 21 जुलाई को ये ऑडिट रिपोर्ट पेश की गई। रिपोर्ट में 2007 से 2016 के दौरान 17 राज्यों और संघ प्रशासित क्षेत्रों की बाढ़ प्रबन्धन योजनाओं को कवर किया गया है। इस रिपोर्ट में फ्लड मैनेजमेंट प्रोग्राम (एफएमपी) के तहत 206 परियोजनाओं को देखा गया, जिन्हें 2007 में बाढ़ प्रबन्धन के लिये राज्यों को केन्द्रीय सहायता के लिये शुरू किया गया था। इसमें 38 बाढ़ पूर्वानुमान केन्द्र (एफएफएस), जो प्रमुख नदियों में जलस्तर को मापती है, 68 बड़े बाँध और नदी प्रबन्धन कार्यों के तहत 49 नदी प्रबन्धन कार्य, सीमा क्षेत्रों (आरएमएबीए) से सम्बन्धित कार्य और अन्य योजनाएँ शामिल हैं। रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत का बाढ़ प्रबन्धन पूर्वानुमान तंत्र, पूर्व सुरक्षा उपायों और पोस्ट फ्लड मैनेजमेंट के क्षेत्र में कमजोर है। रिपोर्ट बताती है कि राज्यों को दी गई केन्द्रीय निधि कम थी।

निष्प्रभावी बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली


ऑडिट के अनुसार, देश के 15 राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में अगस्त, 2016 तक बाढ़ पूर्वानुमान लगाने के लिये कोई प्रणाली नहीं थी। इसमें राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, केरल और मणिपुर जैसे बाढ़ ग्रस्त राज्य शामिल हैं। 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) के दौरान 219 टेलीमेट्री स्टेशन, 310 बेस स्टेशन और 100 एफएफएएस स्थापित किये जाने का लक्ष्य था। इस लक्ष्य के मुकाबले सिर्फ 56 टेलीमेट्री स्टेशन स्थापित किये गए और शेष “कार्य प्रगति पर है” के मोड में हैं। जबकि जम्मू और कश्मीर में सिन्धु, तावी, नीरू, चिनाब और झेलम नदियों में हमेशा बाढ़ की सम्भावना रहती है। सिर्फ 2015 में झेलम पर केवल एक एफएफएस स्थापित किया गया था, वह भी सितम्बर 2014 के विनाशकारी बाढ़ के बाद। स्थिति तब और भी अधिक अनिश्चित बन जाती है, जब अधिकांश टेलीमेट्री स्टेशन गैर-कार्यात्मक हैं। देशभर में स्थापित 375 टेलीमेट्री स्टेशनों, जो नदियों और वर्षाजल स्तर के लिये रियल टाइम डेटा प्राप्त करती है, में से 222 (59 प्रतिशत) काम नहीं कर रहे थे। हिमालयी गंगा डिवीजन में, 2013 से अगस्त 2016 के बीच 9 में से 7 टेलीमेट्री स्टेशन गैर-कार्यात्मक थे। वास्तव में, एक स्टेशन ने 2013 और 2014 में बाढ़ के दौरान गलत डेटा दिया था। दामोदर डिवीजन में, जो एक बाढ़ सम्भावित क्षेत्र है, जुन 2007 से अक्टूबर 2013 के बीच 24 में से 12 टेलीमेट्री स्टेशन गैर-कार्यात्मक थे। मध्य ब्रह्मपुत्र डिवीजन में, मार्च 2012 से जुलाई 2015 के बीच 6 में से 2 टेलीमेट्री स्टेशन गैर-कार्यात्मक थे।

ऑडिट में यह भी पाया गया कि जल संसाधन के क्षेत्र में देश का प्रमुख तकनीकी संगठन, केन्द्रीय जल आयोग टेलीमेट्री डेटा पर निर्भर नहीं था, बल्कि यह मैन्युअल डेटा पर निर्भर था। ये हाल तब है जब 20 साल तक टेलीमेट्री स्टेशन के आधुनिकीकरण में काफी पैसा निवेश किया गया था। जाहिर है, इससे रियल टाइम डेटा संग्रह, इसके ट्रांसमिशन और बाढ़ पूर्वानुमान तैयार करने जैसे लक्ष्य के लिये टेलीमेट्री उपकरणों की स्थापना का उद्देश्य विफल हो गया।

कोई आपातकालीन एक्शन प्लान नहीं


रिपोर्ट यह बताती है कि भारत के 4,862 बाँधों में से 93 फीसदी के पास आपातकालीन एक्शन प्लान नहीं है। आपातकालीन स्थिति में ये मानव जीवन और सम्पत्ति नुकसान को कम करने का काम नहीं हो सकता है। राजस्थान के 200 और ओड़िशा के 199 बाँध में से किसी में भी ये आपातकालीन एक्शन प्लान नहीं है। गुजरात और पश्चिम बंगाल के केवल एक बाँध (गुजरात में 619 बाँध हैं और पश्चिम बंगाल में 29 बाँध हैं) में आपातकालीन एक्शन प्लान है। अगस्त 2010 में लोकसभा में पेश किये गए द डैम सेफ्टी बिल को अभी तक अधिनियमित नहीं किया गया है। संसद के हाल ही में सम्पन्न मानसून सत्र में इस विधेयक पर चर्चा की जानी थी। अधिकांश राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में प्री और पोस्ट मानसून निरीक्षण का कार्य नहीं किया गया था। बिहार में एक विशेषज्ञ समिति ने दिसम्बर 2015 में दो बाँध की सुरक्षा समीक्षा की थी और इसके दोष और कमियों से निपटने के लिये उपाय सुझाए गए थे। हालांकि कोई भी उपाय लागू नहीं किया गया। कुछ महीने बाद, राज्य में 25 लाख लोगों की बाढ़ की विभीषिका झेलनी पड़ी।

जलनीति का पालन न करने और मौसम पूर्वानुमान की उपेक्षा भी बाढ़ के प्रभावी प्रबन्धन की राह में बड़ी बाधा है, विशेष रूप से ओड़िशा में। ऑडिट ने बाँध के जलस्तर की जाँच न करने और 2011 व 2014 में निचले क्षेत्रों में बाढ़ को रोकने में असमर्थ रहे ओड़िशा के हीराकुंड बाँध प्राधिकरण की आलोचना की है। यह ओड़िशा राज्य जलनीति 2007 के बावजूद हुआ। ये नीति स्पष्ट रूप से बताती है कि अत्यधिक बाढ़ वाले क्षेत्रों में बाढ़ नियंत्रण को प्राथमिकता देनी है, भले ही इससे सिंचाई और बिजली जैसे लाभों का त्याग करना पड़े। लेकिन, ओड़िशा में बाढ़ प्रबन्धन की राह में यही अकेली बाधा नहीं थी। ऑडिट ने कम-से-कम 10 बाँधों में दरारें और चेतावनी उपकरणों की कमी का भी उल्लेख किया।

देश की सबसे ज्यादा बाढ़ सम्भावित राज्यों ने बाढ़ के लिये विशिष्ट क्षेत्रों का सीमांकन नहीं किया है। 1981 में, राष्ट्रीय बाढ़ आयोग (आरबीए) ने राज्यों और संघ शासित प्रदेशों को विशिष्ट बाढ़ सम्भावित जोन की पुष्टि करने की सिफारिश की थी। ऑडिट के मुताबिक जुलाई 2016 तक 17 राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में से, सिर्फ असम और उत्तर प्रदेश ने आरबीए मूल्यांकन का सत्यापन किया था।

धन की कमी


इस साल, असम के 32 जिलों में से 24 जिले में बाढ़ ने तबाही मचाई। 150 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। 15 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हुए। 0.2 मिलियन हेक्टेयर फसल क्षेत्र बर्बाद हो गया। राज्य ने केन्द्र से 2393 करोड़ रुपए की सहायता माँगी है। 11वीं और 12वीं पंचवर्षीय योजनाओं (2007-2017) के दौरान राज्य को 2043.19 करोड़ रुपए देने का वादा किया गया था। असम को इसका 40 प्रतिशत ही प्राप्त हुआ। 16 अन्य राज्य और संघ शासित क्षेत्रों के लिये भी अपर्याप्त बजट है या उन्हें वादा की गई राशि नहीं मिली है।

2007 से 2016 के दौरान, जल संसाधन मंत्रालय, नदी विकास और गंगा कायाकल्प ने एफएमपी के तहत 25 राज्यों और संघ शासित क्षेत्रों के लिये 12243 करोड़ की 517 परियोजनाओं को मंजूरी दी। राशि का केवल 39 प्रतिशत जारी किया गया और स्वीकृत परियोजनाओं में केवल 57 प्रतिशत ही पूरे किये गए। धन की कमी ही बाढ़ नियंत्रण योजनाओं के कार्यान्वयन को प्रभावित करने की वजह नहीं है। एफएमपी गाइडलाइन के क्लॉज 4.10.1 के अनुसार, केन्द्रीय सहायता की पहली किस्त अधिकार प्राप्त समिति द्वारा योजना को अनुमोदन दिये जाने के तुरन्त बाद राज्य को जारी की जानी है। ऑडिट चार राज्यों में 48 परियोजनाओं का हवाला देते हुए बताता है कि इन मामलों में केन्द्र द्वारा पहली किस्त जारी करने में एक महीने से डेढ़ साल तक की देरी हुई। इससे राज्यों का प्रदर्शन बेहतर नहीं हुआ। ऑडिट में ऐसे मामले सामने आये हैं, जहाँ धन का उपयोग नहीं किया गया। बिहार, हिमाचल, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में छह परियोजनाओं के लिये 171.28 करोड़ की राशि का उपयोग नहीं किया गया था। असम, हिमाचल और तमिलनाडु के लिये जारी 36.5 करोड़ रुपए इम्प्लीमेंटिंग एजेंसीज द्वारा इसलिये डायवर्ट कर दिये गए क्योंकि विस्तृत परियोजना रिपोर्ट में कार्य अनुमोदित नहीं हुए।

त्रुटिपूर्ण शुरुआत


ऑडिट ने डीपीआरएस निर्माण में प्रक्रियात्मक चूक की भी पहचान की है। हिमाचल प्रदेश, जिसने पिछले कुछ सालों में बाढ़ में वृद्धि देखी है, वहाँ पाँच में से तीन परियोजनाएँ बिना अनुमोदन के ले ली गई। असम में भी एफएमपी दिशा-निर्देशों का उल्लंघन हुआ है, जो न केवल सभी परियोजनाओं के लिये अनिवार्य डीपीआर की बात करती है, बल्कि यह भी कहती है कि परियोजना रिपोर्ट में मौसम सम्बन्धी आँकड़ों, मिट्टी का सर्वेक्षण, सामाजिक आर्थिक मानक शामिल होना चाहिए।

केरल के मामले में एफएमपी के तहत किये गए कार्य के लिये प्रारम्भिक परियोजना रिपोर्ट तैयार नहीं की गई थीं। निष्पादन लेखापरीक्षा से पता चला है कि विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट के अनुमोदन में देरी हुई थी जिससे वास्तविक वित्त पोषण के समय डिजाइन अप्रासंगिक हो जाते हैं। बारिश और कठिन मौसम की घटनाएँ लगातार घट रही हैं। ऐसे में एक बेहतर एक्शन प्लान और समयबद्ध कार्यान्वयन ही एकमात्र आशा है। जब तक बाढ़ प्रबन्धन परियोजनाओं को देरी का सामना करना पड़ेगा, समस्या में केवल बढ़ोत्तरी ही होगी।

 

चूक पर चूक


सीएजी ने उन राज्यों के बारे में क्या कहा जो इस साल बाढ़ का सामना कर रहे हैं

गुजरात

1. 2007 में शुरू बाढ़ प्रबन्धन कार्यक्रम के तहत अनुमोदित राशि (19.79 करोड़ रुपए में से सिर्फ 2 करोड़ रुपए) में से गुजरात को सिर्फ 10 प्रतिशत ही मिला।

2. राज्य के 619 बाँधों में से एक के पास ही सिर्फ आपातकालीन एक्शन प्लान है।

राजस्थान

राजस्थान के 200 में से किसी भी बाँध में आपातकालीन एक्शन प्लान नहीं है।

असम

1. 11वीं और 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान केन्द्र से असम को बाढ़ प्रबन्धन के लिये जितनी राशि (2043.19 करोड़) का वादा किया गया था, उसका सिर्फ 60 फीसदी ही मिला।

2. करीमगंज बाढ़ पूर्वानुमान स्टेशन पर जलस्तर और वर्षा के बारे में जानकारी टेलीमेट्री मशीन से एकत्र नहीं किया गया था।

ओड़िशा

1. 30 में से 26 प्रोजेक्ट का काम एक महीने से लेकर दो साल की देरी से पूरा हुआ।

2. ओड़िशा के 199 बाँध में से किसी में भी आपातकालीन एक्शन प्लान नहीं।

3. कम-से-कम 10 बाँधों में दरारें और चेतावनी डिवाइस की कमी।

पश्चिम बंगाल

1. नौ परियोजनाओं में से पाँच का काम सात महीने से लेकर 5 साल की देरी से हुई।

2. दामोदर डिवीजन में 24 में से 12 टेलीमेट्री स्टेशन अप्रभावी है।

बिहार

1. उत्तर बिहार के सीमावर्ती इलाकों में नदी प्रबन्धन परियोजनाओं में बहुत देरी हुई।

2. सीएजी ने महानन्दा नदी के तटबन्धों की सुरक्षा में खामी पाई।

 



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