बातों से नहीं बनेगी बात

Submitted by UrbanWater on Tue, 05/07/2019 - 13:37
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कादम्बिनी, मई 2019

सौराष्ट्र के एक कसबे में महिला पानी के लिए जाती हुई सौराष्ट्र के एक कसबे में महिला पानी के लिए जाती हुई

दो दशक पहले तक भारत में गर्मी का मौसम 3 महीने के लिए आता था। पानी की किल्लत दूसरे गर्म महीने में दस्तक देती थी। इस साल सर्दियां थोड़ी लंबी ज़रूर खिंच गई हैं, किंतु अब गर्मियां, मार्च से जून तक 4 महीने के लिए आती हैं। पानी की कमी का संकट जनवरी से ही शुरू हो जाता है। इस वर्ष मध्य और पूर्वी भारत में मानसून के कमजोर रहने का अनुमान आया है। स्पष्ट है कि पानी कुछ और तरसाएगा।

भारत में  पानी का संकट इस कदर गहरा गया है जिसकी कल्पना मुश्किल है। इस संकट से हम तभी उबर सकते हैं जब सरकार सही नीति बनाए और जन-सहभागिता बढ़े। जब तक लोग जागरूक नहीं होंगे यह संकट गहराता ही जाएगा

इस ताजे जलसंकट का विरोधाभास यह है कि जिस कर्नाटक ने अगस्त 2018 में बाढ़ देखी, उसी कर्नाटक के 176 में से 156 ताल्लुके जनवरी, 2019 में सूखा-ग्रस्त घोषित करने पड़े। महाराष्ट्र में सूखे की प्रेस विज्ञप्ति, बारिश के तुरंत बाद अक्टूबर में ही आ गई थी। जनवरी 2019 में महाराष्ट्र के कुल 44,000 गांवों में से 12609 सूखाग्रस्त गांवों की सूची भी आ गई। ‘पानी-पानी’ पुकारते यवतमाल के 10 गांवों की बेबसी, लोकसभा चुनाव के बहिष्कार की घोषणा के रूप में अब सामने आई है। गुजरात-पाकिस्तान सीमा पर बसे लोग युद्ध से ज्यादा सूखे से डरने लगे हैं। तेलंगाना को ₹35000 करोड़ का सिंचाई घोटाला डरा रहा है। पूर्वोत्तर भारत डर रहा है कि पर्याप्त वर्षा औसत के बावजूद, उपयोग करने लायक पानी घट रहा है। नदियों वाले राज्य बिहार को भी भूजलस्तर में लगातार गिरावट की चिंता सता रही है। ‘उत्तर प्रदेश नम भूमि प्राधिकरण’  अधिक दोहन व अतिक्रमण के कारण नमभूमि क्षेत्रों के सिकुड़ने का चित्र पेश कर रहा है। पहाड़ी राज्य इस आकलन से चिंतित हैं कि वर्ष 2100 तक हिमालय के दो-तिहाई ग्लेशियर पिघल चुके होंगे।

नीति आयोग, भूजल के मामले में भारत के 21 नगरों के वर्ष 2020 तक कंगाल होने की रिपोर्ट पेश कर रहा है। ‘राष्ट्रीय भू-भौतिकीय अनुसंधान संस्थान’ हैदराबाद का अध्ययन है कि दिल्ली अपना 30 से 32 किलोमीटर भूजल हर वर्ष खो रहा है। यह धरती पर इस तरह के भूगोल वाले किसी भी इलाके की तुलना में भू-जल खोने की सबसे तेज वार्षिक रफ्तार है। वाटर-एड स्टडी के आंकड़े कह रहे हैं कि भारत पूरी दुनिया में हर वर्ष उपयोग किए जाने वाले भूजल का 24 प्रतिशत इस्तेमाल करके दुनिया का सबसे बड़ा भूजल-उपभोक्ता बन गया है। किसी एक देश में पीने के पानी से महरूम सबसे अधिक आबादी वाला देश भी अब भारत ही है। भारत में ऐसी आबादी 16 करोड़ से ज्यादा है। नीति-आयोग की रिपोर्ट कहती है कि भारत में हर वर्ष करीब 2 लाख मौतें तो सिर्फ प्रदूषित पानी की वजह से हो रही हैं। भारत में कुल बीमारों में से 20% सिर्फ प्रदूषित अथवा कम पानी के कारण हैं।

दुर्योग है कि पानी के मामले में भारत का यह संकट इस सबके बावजूद उपजा है कि भारत के पास कम पानी की फसलें, कम पानी में जीवन जीने की शैली तथा पानी संजोने व अमृत को विष से अलग रखने का परंपरागत ज्ञान अभी भी मौजूद है। बारिश की बूंदे, वनक्षेत्र, हिमनद, लाखों तालाब-झीलें, नम-भूमि क्षेत्र, स्पंजनुमा शानदार गहरे एक्वीफर, हजारों नदियों का नाड़ीतंत्र और समुद्र भी भारत के हिस्से में कम नहीं।

पीने के साफ़ पानी से महरूम सर्वाधिक आबादी वाला देश भारत ही है पीने के साफ़ पानी से महरूम सर्वाधिक आबादी वाला देश भारत ही है

कारण, शायद नए भारत की नई मानसिकता है। अधिकांश लोग अब यही सोचते हैं कि पानी संजोना, पिलाना और बाढ़ में डूबने से बचाना, सरकार की जिम्मेदारी है, वही करे। एक कारण, हमारा स्मृति रोग भी है इसी स्मृति रोग के कारण ऐसे अध्ययन. रिपोर्ताज व समाचारों की चर्चा सिर्फ गर्मियों तक ही गर्म रहती है। बारिश की फुहारें पाकर हम सूखा भूल जाते हैं। बाढ़ का पानी उतर जाने पर उसके उसके दुष्प्रभाव के मूल कारणों के निवारण के नाम पर हम में से ज्यादातर सिर्फ बातें करते हैं, ज्ञान बांटते हैं। सरकारें भी सिर्फ राहत बांटने में रुचि रखती हैं। ज्यादातर लोग भूल जाते हैं कि पानी सभी पीते हैं, अतः पानी का इंतजाम करना भी सभी की जिम्मेदारी है। हमें याद ही नहीं रहता कि वर्तमान जल-संकट सिर्फ कम बारिश की वजह से नहीं प्रकृति से ज्यादा लेने और उसे कम लौटाने के असंतुलन की वजह से भी पैदा हुआ है ।मेरे जैसे भी कलम लेकर पानी पिलाने निकल पड़ते हैं जबकि जरूरत जुबान से ज्यादा जमीन पर पानी लिखने की है।

कहना ना होगा की जरूरत आईपीएस अधिकारी महेंद्र मोदी की तरह गांवों को गोद लेकर जल-संरक्षण की प्रेरणा को जमीन पर उतारने की है। नाना पाटेकर की तरह पानी के खो गए स्रोतों को खोज निकालने की है, उन्हें जिंदा करने की है। आमिर खान ने इस पर फाउंडेशन बनाया है। 'वाटर-कप' आयोजन के जरिए ‘पानी संजोने में कौन आगे’ का प्रतियोगी भाव जगाया है। दत्ता पाटिल कैलिफ़ोर्निया में रहते हैं, उनकी जड़ें लातूर के हलगारा गांव में हैं, जलसंकट की खबर पढ़कर, वो अपनी जड़ों में पानी डालने में जुट गए हैं। क्योंझार, उड़ीसा के 70 वर्षीय धैतारी नायक ने खेत तक पानी पहुंचाने के लिए नहर से 3 किलोमीटर लंबी जगह खोद डाली है। मांड्या, कर्नाटक के सिकंदर मीरानायक ने अपनी झील खुद बनाकर पानीदार होने के साथ-साथ ‘लेकमैन’ का दर्जा भी पाया है। आगा खाँ ट्रस्ट ने कुतुबशाह मकबरे में मौजूद बावड़ियों और हमामों को पहले की भांति पुनः पानीदार बनाया है। सिक्किम ने पहाड़ी नौलों-धारों को जिंदा किया है। पानी माफ़िया की निगरानी के लिए केरल के अभिनेता बन्ना चेन्नामंगलुर अपने साथियों संग बोट पर निकलते हैं। जरूरत ऐसे प्रयासों की पीठ थप-थपाने की है, इनसे प्रेरित होने की है।

जलोपयोग का अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 200 फीट से गहरे बोरवेलों पर पाबंदी लगा दी है। चंडीगढ़ प्रशासन ने पानी बर्बाद करने वाले नागरिकों पर ₹2000 का जुर्माना लगाने का निर्णय लिया है। पंजाब राज्य विद्युत निगम ने एक यूनिट पानी बचाने पर नलकूप किसानों को ₹4 देने वाली ‘पानी बचाओ पैसे कमाओ’ योजना शुरू की है। कई उद्योगों ने अपने संयंत्रों में पानी के बजाय हवा से ठंडा करने की तकनीक अपनानी शुरू की है। कई आवास समितियों ने अपने परिसरों को उपयोग किए गए पानी के पुनरुपयोग की जैविक प्रणालियों से लैस कर लिया है। फ्लश दबाने पर शौचालय के सिस्टर्न से आकार के अनुसार एक ही बार में 6 से 10 लीटर पानी बह जाता है। पानी की बर्बादी कैसे रुके? इस प्रश्न के उत्तर में उत्तराखंड शासन ने शौचालय के सिस्टर्न में डालने के लिए रेत भरी एक लाख बोतलें बाँटी।परिवारों ने गिलास में  जरूरत भर का पानी डालने की आदत बनाई। जल संचय, जल शिवार, जल ग्राम जैसी कई सरकारी पहल देश में चल रही हैं। ग्राम पंचायत विकास योजना गाँवों को अपने सपनों का गाँव बनाने का एक अवसर देती है। कई पानी कार्यकर्ता पार्टी घोषणा पत्रों में पानी संकट के समाधानों को शामिल कराने का प्रयास करते रहे हैं, बावजूद ऐसे प्रयासों के भारत में जलसंकट लगातार बढ़ ही रहा है। जाहिर है कि जरूरत इससे भी कहीं आगे जाकर कुछ बुनियादी सक्रियता, सतत और क्रांति बदलाव की है।

भारत में पानी की सबसे ज्यादा खपत खेती, ताप विद्युत, चीनी, शराब और शीतल पेय व बोतलबंद पानी के उद्योगों में है। मजबूत मेड़बंदियां, कम पानी की फसलें, प्राकृतिक खेती, परंपरागत भोज्य पदार्थ, बागवानी, स्थानीय संसाधन आधारित ग्राम्य हस्तशिल्प आय वृद्धि की सुनिश्चितता, पानी- बिजली के अनुशासित उपयोग की प्रेरणा व तकनीकें, पवन सौर- ऊर्जा को एक समय तक बढ़ावा देने तथा किसानों व उद्योगों को जितना धरती से ले, उतना लौटाने के लिए बाध्य करने के कदम इस खपत को घटा सकते हैं, किंतु सिर्फ सरकारी, स्वयंसेवी अथवा व्यक्तिगत प्रयासों के बूते हम जलसंकट से उबर जाएंगे; ऐसा मुश्किल ही दिखता है।

यदि भारतीय जलसंकट का समग्र समाधान सुनिश्चित करना है तो अब सोचने, योजना बनाने और उसे क्रियान्वित करने वाले हाथ बदलने चाहिए। कारण कि आज हमारे विकास की तमाम योजनाएं, इस बुनियाद पर खड़ी है कि लोगों को राशन- पानी, छत्त, शिक्षा, इलाज, रोजगार, आर्थिक- सामाजिक- सुरक्षा जो कुछ भी चाहिए, वे सभी कुछ सरकार मुहैया कराएगी। इस बुनियाद ने लोगों को उनकी सामुदायिक जरूरतों की पूर्ति के लिए परले दर्जे का परावलंबी बना दिया है। जरूरत इस बुनियाद को उलट देने की है; समुदाय को पहल और शासन- प्रशासन को सिर्फ और सिर्फ आवश्यकता पड़ने पर एक विश्वसनीय सहयोगी की भूमिका में लाने की है। टीकमगढ़ के गांवों छरी और टौरी के 200 ग्रामीणों ने सरकार की प्रतीक्षा नहीं की। दिलों को जोड़ कर पहले समाज की पाल बनाई, फिर श्रम जोड़कर नदी पर पाल बांध डाली। ऐसी ही जुगलबंदी से घुवारा तहसील, जिला छतरपुर के बम्हौरीकला गांव वालों ने पहाड़ पर 1 फीट गहरी, 1.5 किलोमीटर लंबी 10 नालियां बना डाली। बारिश हुई, तो बारिश का सब पानी चांदिया तालाब में समा गया। परिणाम यह है कि कहीं और सूखा हो तो हो बम्हौरीकला के हर नल, हर बोरवेल में पानी है। जरूरत इसी की है। इसी से जलसंकट का भी हल निकलेगा और लोकतंत्र के उलट गए पिरामिड का भी। चुनाव सामने है। क्या हम तैयार हैं?

(लेखक 'पानी आंदोलन' से जुड़े हैं)

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