भारत में सिंचाई परियोजनाओं का आकलन

Submitted by Hindi on Mon, 12/04/2017 - 16:24
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कुरुक्षेत्र, नवम्बर 2017

देश में सिंचाई परियोजनाओं और नहरों से कुल सिंचित क्षेत्र का 40 प्रतिशत सींचा जाता है। शेष 60 प्रतिशत क्षेत्र अन्य साधनों से सींचा जाता है। यानी देश में अभी तक उपलब्ध परियोजनागत सम्भाव्य सिंचाई क्षमता का उपयोग नहीं किया जा सका है और देश में कृषि माँग के अनुरूप सिंचाई सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसलिये इस दिशा में बड़े निवेश और सम्भाव्य सिंचाई क्षमता के अधिकतम उपयोग की आवश्यकता है।

कृषि आज भी हमारी अधिकांश आबादी की आय और आजीविका का प्रमुख स्रोत है और कृषि प्रणाली के उन्नयन से देश की अधिकांश आबादी का आर्थिक उत्थान सम्भव है। कृषि उत्थान की पहली आवश्यकता व आधारभूत आगत सिंचाई है, जिसकी पर्याप्त सुलभता कृषि में इंद्रधनुषी क्रान्ति ला सकती है और पर्याप्त सिंचाई के लिये जल का विशाल भंडार होना आवश्यक है क्योंकि दुनिया की कुल जल खपत का अकेले 69 प्रतिशत कृषि में, शेष 23 प्रतिशत औद्योगिक और 8 प्रतिशत घरेलू कार्यों में प्रयुक्त होता है। इससे स्पष्ट है कि किसी देश में कृषि के सर्वकालिक संवर्धन के लिये उसके पास जल का विशाल भंडार होना आवश्यक है और इस विशाल जल भंडारण के लिये देश में नहरों व बाँधों का परियोजनागत विकास अपरिहार्य हो जाता है।

बाँध जल के प्रवाह को अवरोधित करने की व्यवस्था है जिन्हें बड़े जलाशय में तब्दील करके इनसे सिंचाई का प्रबन्धन, विद्युत उत्पादन, जलीय कृषि, अन्तःस्थलीय नौ परिवहन, मत्स्यपालन जैसी आर्थिक गतिविधियों का संचालन किया जाता है। देश के आर्थिक विकास में इनकी महती भूमिका और सार्थकता की वजह से ही हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने बहुद्देशीय नदी परियोजनाओं को ‘आधुनिक भारत के मन्दिर’ की संज्ञा से अभिहित किया। नदियों की घाटियों पर बड़े-बड़े बाँध बनाकर बहुआयामी सामाजिक-आर्थिक सुविधाएँ प्राप्त करने की आयोजना को बहुद्देशीय परियोजना कहते हैं। इनका प्राथमिक उद्देश्य नदी घाटी के अधीन जल और थल का मानव हित में अधिकतम सम्भव उपयोग करना होता है। इस समय देश में कुल 5176 बाँध, 261 बैराज और निर्माणाधीन वृहद बाँधों की संख्या 314 है।

बाँधों की संख्या के हिसाब से महाराष्ट्र 1694 बाँधों के साथ पहले स्थान पर और 898 बाँधों के साथ मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर है जिनके पास देश के कुल वृहद बाँधों का क्रमशः 34.86 और 18.49 प्रतिशत हिस्सा है और इनमें निर्माणाधीन बाँधों की संख्या क्रमशः 152 और 8 है। निर्मित, निर्माणाधीन और प्रस्तावित नदी घाटी परियोजनाओं में गंगा बेसिन की उपयोगी संचयन क्षमता सर्वाधिक है, जो इसकी सहायक नदियों पर निर्मित बाँधों से प्राप्त होती है, इसके बाद संचयन क्षमता में कृष्णा नदी दूसरे स्थान पर है। राज्यों के हिसाब से देश में जनित कुल संचयन क्षमता का करीब 16 प्रतिशत मध्य प्रदेश में, 14 प्रतिशत आन्ध्र प्रदेश में और 12.7 प्रतिशत महाराष्ट्र में है। भारत में निर्मित बाँधों में से 92 प्रतिशत का उपयोग सिंचाई में, 2.3 प्रतिशत का विद्युत में और एक प्रतिशत का उपयोग शहरी माँग व घरेलू जलापूर्ति के लिये किया जाता है।

सरदार सरोवर परियोजना :


17 सितम्बर, 2017 को प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्र को समर्पित यह बहुद्देशीय सिंचाई और हाइड्रोलिक परियोजनाओं की श्रृंखला में सबसे लम्बी हाइड्रोलिक अभियांत्रिकी परियोजना है और इस परियोजना के सम्पूर्ण नियोजन में 21 सिंचाई, 5 विद्युत और 4 बहुद्देशीय सहित कुल 30 परियोजनाएँ शामिल हैं। सरदार सरोवर बाँध अमेरिका के ग्रांड कोली डैम के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गुरुत्वीय बाँध है जिसमें 30 द्वार हैं और प्रत्येक द्वार का वजन 450 टन है। पानी बहाव की क्षमता के लिहाज से यह विश्व में तीसरा सबसे बड़ा स्पिलवे डिस्चार्जिंग क्षमता (एसडीसी) से युक्त बाँध है, इसकी एसडीसी 85 हजार क्यूमेक्स है, इससे अधिक एसडीसी केवल चीन के गजनेबा बाँध की 1.13 लाख क्यूमेक्स और ब्राजील के टुकुरी बाँध की एक लाख क्यूमेक्स है।

भारत के कंक्रीट बाँधों में यह हिमाचल प्रदेश के 226 मीटर ऊँचे भाखड़ा बाँध और उत्तराखण्ड के 204 मीटर ऊँचे लखवार बाँध के बाद देश का तीसरा सबसे ऊँचा कंक्रीट बाँध है, इसकी ऊँचाई 163 मीटर है। गुजरात के नर्मदा जिले के केवाडिया में नर्मदा नदी पर निर्मित इस बहुद्देशीय बाँध के फायदों में 4 राज्य-गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान शामिल हैं जिसमें सर्वाधिक फायदा गुजरात को होना है। इससे गुजरात के कच्छ और सौराष्ट्र के अधिकांश सूखाग्रस्त क्षेत्रों के 15 जिलों के 135 शहर और 3137 गाँवों को जलापूर्ति और 18.45 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जा सकेगी जबकि इस परियोजना के सम्पूर्ण कवरेज पर सिंचाई से 10 लाख किसान और गाँवों व कस्बों में पेयजलापूर्ति से करीब 4 करोड़ लोगों के लाभान्वित होने की सम्भावना है।

1210 मीटर लम्बे इस बाँध का पूर्ण जलाशय-स्तर 138.68 मीटर तय किया गया है जिस पर पानी का अधिकतम-स्तर 140.21 मीटर और इसकी जल संचयन क्षमता 47.3 लाख क्यूसेक है। जबकि इस परियोजना से जुड़ी 40 हजार क्यूसेक जल क्षमता की 532 किमी लम्बी मुख्य नर्मदा नहर विश्व की सबसे लम्बी सिंचाई नहरों में से एक है। भारत की सबसे बड़ी इस जल संसाधन परियोजना से उत्पादित बिजली का 57 प्रतिशत हिस्सा मध्य प्रदेश को और इसके बाद क्रमशः महाराष्ट्र और गुजरात को मिलेगा। राजस्थान को इस परियोजना से केवल पानी प्राप्त होगा।

गुजरात की जीवन-रेखा नर्मदा नदी मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के अमरकंटक शिखर से उद्गमित होकर 230 से 210 उत्तरी अक्षांश के मध्य बहते हुए गुजरात के भरुच जिले में खम्भात की खाड़ी पर एश्चुअरी बनाती है। 1310 किमी लम्बी इस नदी का बेसिन 93180 वर्ग किमी है और इसके बाएँ तट पर बरनार, बंजर, शेर, शक्कर, दूधी, तवा, गंजाल, कुंदी, देव, गोई जबकि दाएँ तट पर हिरन, तिदोली, बरना, चंद्रकेशर, कानर, मान, ऊंटी, हथनी नदियाँ मिलती हैं जो पश्चिमी भारत पर इसकी सार्थकता को सिद्ध करता है। यह भारत की पाँचवीं बड़ी नदी और भारत की महान नदी घाटी परियोजनाओं में से एक है जिसमें सरदार सरोवर के अलावा अवंती सागर, इंदिरा सागर, महेश्वर, ओंकारेश्वर सहित 29 बड़ी, 135 मध्यम और 3000 छोटे बाँधों का विकास किया गया है।

भाखड़ा नांगल परियोजना :


भाखड़ा नांगल बाँधहिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले के भाखड़ा गाँव के समीप सतलुज नदी पर निर्मित यह दुनिया में अपनी किस्म के सीधे ऋतु गुरुत्व बाँधों में सबसे बड़ा और देश का कंक्रीट निर्मित सबसे ऊँचा अथवा टिहरी बाँध के बाद भारत का सबसे ऊँचा बाँध है जिसकी ऊँचाई 226 मीटर और लम्बाई 520 मीटर है। भूकम्पीय क्षेत्र में स्थित विश्व के सबसे ऊँचे इस गुरुत्वीय बाँध से 12 किमी नीचे पंजाब के रूपनगर जिले के नांगल में सतलुज पर एक अवरोध बाँध बनाया गया है जो भाखड़ा के लिये सहायक का कार्य करता है। भाखड़ा पर 10वें सिख गुरु के नाम पर निर्मित गोविंद सागर जलाशय की जलधारण क्षमता 9.34 बीसीएम है जो नागार्जुन सागर के बाद तीसरा सर्वाधिक जलधारण क्षमता वाला जलाशय है।

पंजाब, हरियाणा और राजस्थान की इस संयुक्त परियोजना के लाभ दिल्ली और हिमाचल प्रदेश को भी प्राप्त होते हैं। इसमें राजस्थान की हिस्सेदारी 15.2 प्रतिशत है। देश की इस सबसे बड़ी बहु-उद्देशीय परियोजना ने पंजाब और हरियाणा में हरितक्रान्ति को गति प्रदानकर इनको देश के सर्वाधिक खाद्यान्न उत्पादक राज्यों की श्रेणी में खड़ा किया है। इस बाँध से बिस्त दोआब, सरहिंद और नरवाना शाखा जैसी नहरें बड़े पैमाने पर निकाली गई हैं जिनसे हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के 40 हजार वर्ग किमी क्षेत्र में फैले करीब 40 लाख हेक्टेयर खेतों की सिंचाई की जाती है।

हीराकुंड बाँध परियोजना :


छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य से उद्गमित 858 किमी लम्बी महानदी का औसत पानी प्रवाह 2119 घनमीटर प्रति सेकेंड और इसका बेसिन क्षेत्र 1,41,600 वर्ग किमी है। इसी नदी पर ओडिशा के संबलपुर जिले से 15 किमी दूर संसार का सबसे लम्बा बाँध हीराकुंड निर्मित है जिसके मुख्य खंड की लम्बाई 4.8 किमी और तटबन्ध सहित बाँध की लम्बाई 25.8 किमी तथा ऊँचाई 60.96 मीटर है। इस परियोजना के दो अन्य बाँध नाराज और टीकापारा हैं। यह परियोजना बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, विद्युत उत्पादन के साथ औद्योगिक विकास को भी व्यापक आधार प्रदान करती है। हीराकुंड बाँध के पीछे 55 किमी लम्बा एक विस्तृत हीराकुंड जलाशय है जिसका जलग्रहण क्षेत्र 83400 वर्ग किमी और कुल क्षमता 58960 लाख घनमीटर है, यह 133090 वर्ग किमी का क्षेत्र अपवाहित करता है जो श्रीलंका के क्षेत्र के दोगुना से अधिक है और इससे 75 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। इस सिंचाई सुविधा की सुलभता के कारण संबलपुर को ओडिशा का ‘चावल का कटोरा’ कहा जाता है। इस परियोजना से खरीफ में 1.56 लाख हेक्टेयर और रबी में 1.08 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। इसके अलावा, बाँध के विद्युत प्लांटों से निर्गत पानी से 4.36 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई होती है।

रिहंद बाँध परियोजना :


सोनभद्र जिले के पिपरी पहाड़ों के मध्य निर्मित यह उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी बहूद्देशीय परियोजना और भारत की प्रमुख नदी घाटी परियोजनाओं में से एक है। सोन की सहायक नदी रिहंद पर निर्मित यह 91.44 मीटर ऊँचा और 934.21 मीटर लम्बा ठोस गुरुत्वीय बाँध है जिसमें 61 स्वतंत्र ब्लॉक है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थापित यह भारत के सबसे बड़े जल भंडारण क्षमता वाले जलाशयों में से एक है जिसकी सकल भंडारण क्षमता 10.60 बीसीएम है और यह अपने 5148 वर्ग किमी जलग्रहण क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तक फैला है।

इस परियोजना से मिर्जापुर, सोनभद्र, इलाहाबाद और वाराणसी जिलों में करीब 16 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है जबकि इस बाँध के नीचे की ओर बिहार में सिंचाई के लिये पानी उपलब्ध होता है जिससे यहाँ करीब 2.5 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। रिहंद बाँध के पीछे भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक गोविंद वल्लभ पंत सागर है, इस 30 किमी लम्बे और 15 किमी चौड़े जलाशय के जल को सोन नहर पर मिलाने से सोन नहर की सिंचाई क्षमता बढ़ गई है।

दामोदर घाटी परियोजना :


दामोदर नदी अब खत्म होने के कगार परदामोदर नदी अब खत्म होने के कगार परस्वतंत्र भारत की यह पहली बहुद्देशीय परियोजना है। अमेरिका की टेनेसी परियोजना के प्रतिमान पर आधारित इस परियोजना के प्रणेता डब्ल्यू.एल.बुर्दुइन हैं। छोटा नागपुर पठार से उद्गमित 592 किमी लम्बी दामोदर नदी का औसत जलप्रवाह 296 घनमीटर प्रति सेकेंड है। जो कभी वर्धमान का बुखार और बंगाल का शोक से अभिहित थी, वह अब इस परियोजना की वजह से अपने प्रमुख कार्य बाढ़ नियंत्रण के अलावा झारखंड और बंगाल के एक बड़े हिस्से के औद्योगिक आधार और कृषि आजीविका का सूत्रधार बन गई है। इस नदी का बेसिन क्षेत्र 58480 वर्ग किमी है। इस नदी पर बाएँ से बराक, कोनार, जमुनिया और दाएँ से सालीबाती नदियाँ मिलकर इसका विशाल बेसिन निर्मित करती हैं। इस परियोजना में 9 अन्य बाँध तिलैया, मेथान, पंचेत, अय्यर, बर्मों, बाल पहाड़ी, बोकारो, कोनार बाँध तथा दुर्गापुर बैराज भी बनाए गए हैं। इनमें दुर्गापुर बंगाल में और शेष झारखंड में हैं।

इनमें से चार मैथान, पंचेत, कोनार और तिलैया बाँध कुल 419 एमसीएम जल धारित करते हैं जिससे 680 क्यूसेक जलापूर्ति द्वारा झारखंड और बंगाल के उद्योगों, शहरी निकायों और घरेलू माँगों को पूरा किया जाता है। झारखंड और बंगाल की इस संयुक्त परियोजना का सकल सिंचाई कमांड क्षेत्र 5.69 लाख हेक्टेयर है जिसमें 5.10 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षेत्र बंगाल में है और इससे खरीफ में 3.93 लाख, रबी में 22 हजार तथा 69.7 हजार हेक्टेयर बोरो खेती की सिंचाई की जाती है। इस परियोजना के तहत 2494 किमी नहरें निकाली गई हैं, इनमें बाएँ तट की नहरों में 9146 और दाएँ तट की नहरों में 2260 क्यूसेक पानी प्रवाहित होता है। इसके अलावा परियोजना की अपर घाटी में 30 हजार हेक्टेयर जमीन लिफ्ट सिंचाई द्वारा हर साल सिंचित की जाती है।

नागार्जुन सागर परियोजना :


तेलंगाना के नालगोंडा जिले में नदीकोड़ा गाँव के निकट कृष्णा नदी पर निर्मित यह भारत की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजना है। बौद्ध विद्वान नागार्जुन के नाम पर निर्मित इस बाँध की जलधारण क्षमता 11472 एमसीएम और जलग्रहण क्षेत्र 214185 वर्ग किमी है, 1.6 किमी लम्बे इस बाँध में 26 फाटक हैं। देश के कृषि इतिहास में हरितक्रान्ति लाने के लिये शुरू की गई यह पहली बहुद्देशीय परियोजना है। इस बाँध से निर्मित नागार्जुन सागर झील दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मानव-निर्मित झील है जिसका पूर्ण जलाशय-स्तर 179.83 मीटर और जल फैलाव क्षेत्र 285 वर्ग किमी है, जिसकी सकल भंडारण क्षमता 11.472 बीसीएम है। यह भारत में दूसरा सबसे बड़ा जल भंडार है।

सिंचाई के वृहद उद्देश्य को पूरा करने हेतु बाँध से दो नहरें निकाली गई हैं जिनके द्वारा आन्ध्र प्रदेश और तेलंगाना क्षेत्र की 8.95 लाख हेक्टेयर भूमि सींची जाती है। इसके दायीं तरफ 203 किमी लम्बी जवाहर नहर द्वारा 4.75 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है जबकि बायीं तरफ 179 किमी लम्बी लाल बहादुर शास्त्री नहर द्वारा 4.19 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। इसी नहर से लिफ्ट पम्प हाउस योजना द्वारा हैदराबाद शहर की पेयजलापूर्ति के लिये 20 टीएमसी पानी उपलब्ध कराया जाता है। इसके अलावा नागार्जुन जलाशय से संचालित अलीमिनेती माधव रेड्डी लिफ्ट नहर द्वारा नालगोंडा जिले में 52.6 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। यह जलाशय कृष्णा डेल्टा क्षेत्र की जल माँग को भी पूरा करता है, इससे नदी प्रवाह में 80 टीएमसी पानी प्रवाहित कर डेल्टा की नहरों द्वारा 5.26 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है।

इन्दिरा गाँधी परियोजना :

.राजस्थान के थार को नखलिस्तान करने वाली इन्दिरा गाँधी नहर पंजाब के अमृतसर में सतलुज और व्यास नदी के संगम पर बने हरिके बैराज से निकलती है और इस परियोजना में पानी के नियमित बहाव के लिये व्यास नदी पर पौंग बाँध तथा रावी-व्यास नदियों के संगम पर माधोपुर में लिंक नहर का निर्माण भी किया गया है। इस मरू गंगा के प्रणेता अभियन्ता कवरसेन की साकार परिकल्पना ने सदियों से बूँद-बूँद पानी को तरसते रेगिस्तान को जीवन-रेखा और राजस्थान के बहुमुखी विकास को भाग्यश्री प्रदान किया है। विश्व की सबसे लम्बी इस नहर परियोजना ने राजस्थान की कृषि आजीविका में हरित-क्रान्ति ला दी है जिससे 7.10 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि की सिंचाई हो रही है। मरुस्थलीय क्षेत्र में चमत्कारिक बदलाव करने वाली इस परियोजना का जलप्रवाह 18,500 घन फीट प्रति सेकेंड है जिसका 1200 क्यूसेक पानी पेयजल, औद्योगिक उपयोग, सेना और ऊर्जा योजनाओं के लिये आरक्षित है।

राष्ट्रीय हित की इस वृहद सिंचाई परियोजना से राजस्थान में सरस्वती का पुनः अवतरण हुआ जिससे 1500 से अधिक गाँवों को पेयजल की सुलभता और 1.46 लाख हेक्टेयर भूमि का वनीकरण सम्भव हुआ है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान की इस परियोजना का पहला भाग राजस्थान फीडर जो पंजाब और हरियाणा में 167 और राजस्थान में 37 किमी सहित 204 किमी लम्बा है और दूसरा भाग 445 किमी लम्बी मुख्य नहर है। इस 649 किमी मुख्य लम्बाई के अलावा 8187 किमी लम्बी शाखाएँ और उपशाखाएँ हैं जिसमें अभी 9 शाखाएँ और 4 उपशाखाएँ हैं। इसके अलावा जल वितरिकाओं और 7 जलोत्थान नहरों के निर्माण से मरु क्षेत्र में 15.37 लाख हेक्टेयर भूमि में सिंचाई सुविधा एवं पेयजल उपलब्ध कराने की प्रणाली कार्याधीन है और भविष्य में इस नहर को कांडला बन्दरगाह से जोड़ने की योजना है जिससे यह भारत की राइन नदी बन जाएगी।

गंडक सिंचाई परियोजना :


गंडक, सालिग्रामि और नारायणी नाम से अभिहित यह नदी औसतन 1760 घनमीटर पानी प्रति सेकेंड प्रवाहित करती है और इसका बेसिन क्षेत्र 46300 वर्ग किमी है। इस पर निर्मित परियोजना भारत और नेपाल के समझौते का परिणाम है और इसके जलग्रहण क्षेत्र 37410 वर्ग किमी का 90 प्रतिशत हिस्सा नेपाल में है जिससे पश्चिमी मुख्य गंडक नहर और बाल्मिकी बैराज का निर्माण किया गया है। उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल की भागीदारी वाली इस परियोजना के कमान क्षेत्र में 8.79 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र है जिस पर 9.71 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई हेतु निर्मित क्षमता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के 5 जिले अपनी कृषि आजीविका के लिये इसी परियोजना पर आश्रित हैं।

चम्बल सिंचाई परियोजना :


यमुना की सहायक 996 किमी लम्बी चम्बल नदी का बेसिन क्षेत्र 143219 वर्ग किमी है और इस पर निर्मित परियोजना मध्य प्रदेश और राजस्थान का संयुक्त उपक्रम है। जिस पर कोटा बैराज के अलावा तीन बड़े बाँध गाँधी सागर, राणा प्रताप सागर और जवाहर सागर हैं जिनके विद्युत के लिये समर्पित होने की वजह से सिंचाई की आंशिक आपूर्ति ही हो पाती है जिसके कारण जवाहर सागर से जलप्रवाह मोड़कर कोटा बैराज बनाया गया है जिससे राजस्थान और मध्य प्रदेश में सिंचाई क्षेत्र बढ़कर 4.45 लाख हेक्टेयर हो गया है। कोटा बैराज का कुल जलग्रहण क्षेत्र 27332 वर्ग किमी और भंडारण 99 एमसीएम है जिसे 19 फाटकों द्वारा नियंत्रित किया जाता है, सिंचाई क्षेत्र के विस्तार हेतु इसके दाएँ और बाएँ नहरें निकाली गई हैं जिनकी लम्बाई शाखाओं सहित 2342 किमी है जिनके द्वारा 2.29 लाख हेक्टेयर फसली क्षेत्र की सिंचाई की जाती है। इसके अलावा चम्बल सिंचाई परियोजना के तहत मध्य प्रदेश में मध्यम-स्तर के सिंचाई बाँध कोतवाल, पगारा, पिलोवा भी निर्मित किए गए हैं जिनकी सिंचाई क्षमता 2.73 लाख हेक्टेयर क्षेत्र है।

टिहरी बाँध परियोजना :


भागीरथी और भिलांगना नदियों के संगम के दक्षिण में टिहरी गढ़वाल क्षेत्र में निर्मित यह विश्व की सबसे ऊँची चट्टान आपूरित और भारत का सबसे ऊँचा बाँध है जिसकी ऊँचाई 260.5 मीटर और लम्बाई 20 मीटर है। भूकम्प के झटकों को झेलने में सक्षमता हेतु इसे एस आकार की आकृति में निर्मित किया गया है। इस बाँध के साथ दो अन्य इकाइयाँ कोटेश्वर बाँध और टिहरी पम्प स्टोरेज परियोजना है। इस बाँध पर निर्मित जलाशय की कुल क्षमता 4 बीसीएम और सतही क्षेत्र 52 वर्ग किमी है। रूस के सहयोग से निर्मित उत्तराखण्ड की इस परियोजना से उत्तर प्रदेश और दिल्ली को भी लाभ प्राप्त होता है। इससे दिल्ली के 40 लाख लोगों को और उत्तर प्रदेश के करीब 30 लाख लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध होता है। इससे उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली क्षेत्र की 2.70 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई की जाती है। इस परियोजना के सम्पूर्ण सिंचाई भाग को उत्तर प्रदेश द्वारा वित्तपोषित किया जाता है।

भारत में 154 प्रमुख नदियाँ और करीब 22 नदी बेसिन क्षेत्र हैं। भारत सरकार की जल संसाधन सूचना प्रणाली के अनुसार देश की प्रमुख नदी बेसिनों में स्थापित प्रमुख (2 से 10 हजार हेक्टेयर तक खेती योग्य कमा क्षेत्र (सीसीए) की सिंचाई वाली प्रत्येक परियोजना को मध्यम और 10 हजार हेक्टेयर से अधिक सीसीए की सिंचाई परियोजना को प्रमुख सिंचाई परियोजना कहते हैं) सिंचाई परियोजनाओं की संख्या गंगा बेसिन में 480, गोदावरी में 286, कृष्णा में 211, लूनी सहित कच्छ और सौराष्ट्र के प्रवाह क्षेत्र में 108, तापी में 81, महानदी में 76, भारत की सीमा तक सिन्धु में 69, कावेरी में 57, महानदी और पेन्नार के मध्य नदियों के प्रवाह में 55, नर्मदा में 44, ब्राम्हणी और वैतरणी में 44, माही में 39, स्वर्ण रेखा में 38, ब्रह्मपुत्र में 22 और साबरमती में 20 प्रमुख सिंचाई परियोजनाएँ संचालित हैं। यदि राज्यों पर गौर करें तो महाराष्ट्र में 389, मध्य प्रदेश में 150, गुजरात में 139, राजस्थान में 136, झारखंड में 127, उत्तर प्रदेश में 106, कर्नाटक में 101, आन्ध्रप्रदेश में 95, ओडिशा में 83, तेलंगाना में 61, बिहार में 58, छत्तीसगढ़ में 49 प्रमुख सिंचाई परियोजनाएँ हैं और शेष राज्यों में किसी में भी 40 से अधिक प्रमुख सिंचाई परियोजनाएँ नहीं हैं।

इस तरह देश में सिंचाई परियोजनाओं और नहरों से कुल सिंचित क्षेत्र का 40 प्रतिशत सींचा जाता है। शेष 60 प्रतिशत क्षेत्र अन्य साधनों से सींचा जाता है। यानी देश में अभी तक उपलब्ध परियोजनागत सम्भाव्य सिंचाई क्षमता का उपयोग नहीं किया जा सका है और देश में कृषि माँग के अनुरूप सिंचाई सुविधा उपलब्ध नहीं हैं। देश के मौजूदा शुद्ध बुवाई क्षेत्र 1410 लाख हेक्टेयर में से सभी स्रोतों से शुद्ध सिंचित क्षेत्र केवल 661 लाख हेक्टेयर है जो देश के शुद्ध बुवाई क्षेत्र का आधे से भी कम है जबकि सिंचाई ही कृषि उत्पादकता और संवर्धन का प्रमुख आधार है। इसलिये इस दिशा में बड़े निवेश और सम्भाव्य सिंचाई क्षमता के अधिकतम उपयोग की आवश्यकता है।

यदि बाँधों की क्षमता के उपयोग पर गौर करें तो केन्द्रीय जल आयोग के आँकड़ों के अनुसार देश में वर्ष 1950-51 में 370 बाँध थे, जो बढ़कर वर्ष 1970 में 1200, वर्ष 1990 में 3650 और वर्ष 2017 में 5176 हो गए। स्पष्ट है कि उदारीकरण से पहले जिस गति से बाँधों का निर्माण हुआ है, उदारीकरण के बाद उस गति से नहीं हुआ है। उदारीकरण से पहले 20 वर्षों में जहाँ 2450 बाँधों का निर्माण किया गया, वहीं उदारीकरण के बाद के 27 वर्षों में केवल 1526 बाँधों का निर्माण किया गया है। देश में करीब 20 बाँधों की ऊँचाई 100 मीटर या इससे अधिक है और देश के 35 जलाशयों की उपयोगी क्षमता एक बीसीएम (बिलियन क्यूबिक मीटर) से अधिक है, लेकिन देश के 35 प्रतिशत से कम जलाशयों का उपयोग बहुद्देशीय प्रयोजनों के लिये होता है। देश के अधिकांश बाँधों की आयु 20 से 35 वर्ष है, करीब 50 बाँधों की आयु 100 वर्ष से अधिक है। यानी समय के साथ देश के बाँधों की पुनर्निर्माण की आवश्यकता भी बढ़ रही है। दूसरे देशों की तुलना में भारत के बाँधों में जल संचयन स्थलों (जलाशयों) की संख्या भी बहुत कम है। देश में निर्मित और निर्माणाधीन परियोजनाओं के तहत कुल संचयन स्थल, सम्भावित स्थलों का करीब 50 प्रतिशत है।

कुल मिलाकर, देश में जल माँग की आपूर्ति व जलप्रणाली के बेहतर व्यवस्थापन और सिंचाई परियोजनाओं के उन्नयन हेतु देश को बड़े निवेश और व्यापक सरकारी प्रयासों की आवश्यकता है, क्योंकि देश में एक तरफ जल की माँग बढ़ रही है वहीं आपूर्ति की आवश्यक उपलब्धता लगातार घट रही है। वर्ष 2001 में देश में सतही जल की मात्रा 1902 घनमीटर थी, जो घटकर वर्ष 2010 में 1588 घनमीटर रह गई और इसके घटकर वर्ष 2025 में 1401 घनमीटर व 2050 में 1191 घनमीटर रहने का अनुमान है। जबकि देश में वर्षा का वार्षिक औसत 116 सेमी है जिसका 75 प्रतिशत हिस्सा मानसूनी है। ऐसे में नदी घाटी परियोजनाएँ ही देश में सर्वकालिक सिंचाई की सुलभता और आवश्यक जलापूर्ति उपलब्ध करा सकती हैं। लेकिन इसका एक और बेहतर विकल्प देश की प्रमुख नदियों को आपस में जोड़ने की परियोजना हो सकती है।

इससे नदियों के अपवाह और वर्षा से प्राप्त जल के व्यर्थ प्रवाह को देश के अन्दर वितरित और संचयित किया जा सकता है, क्योंकि इन दो स्रोतों (देश में बर्फबारी सहित वर्षा से प्राप्त कुल वार्षिक जल 4000 बीसीएम और देश की नदियों के औसत वार्षिक सम्भाव्य जलप्रवाह 1869 बीसीएम) से देश को हर साल 5869 बीसीएम पानी प्राप्त होता है, जो देश की मौजूदा जल माँग 945.4 बीसीएम से 6.2 गुना अधिक है। वर्ष 2000 में देश की कुल जल माँग और सिंचाई के लिये क्रमशः 634 और 541 बीसीएम थी जो आबादी में तीव्र वृद्धि और उच्च आर्थिक विकास के चलते वर्ष 2025 तक क्रमशः 1093 और 910 बीसीएम तथा वर्ष 2050 तक क्रमशः 1450 और 1072 बीसीएम का अनुमान है, जिसे मौजूदा जलापूर्ति व्यवस्था से पूरा कर पाना सम्भव नहीं है क्योंकि वार्षिक वर्षा का अल्पभाग ही उपयोग हो पाता है और बहुत बड़ी मात्रा नदियों के माध्यम से समुद्र में चली जाती है। ऐसे में यदि नदी इंटर-लिंक परियोजना के तहत हिमालयी भाग की 14, प्रायद्वीपीय भाग की 16 और 37 राज्यांतरिक नदियों को जोड़ दिया जाए तो इससे देश के करीब 870 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई की जा सकती है, लेकिन यदि देश की केवल 30 बड़ी नदियों को ही आपस में अन्तःसम्बन्धित कर दिया जाए तो भी देश में जलापूर्ति की पर्याप्त सुलभता सुनिश्चित की जा सकती है।

अभी देश में करीब 327 बीसीएम जल की कमी है जिसमें से 200 बीसीएम जल नदियों को आपस में जोड़कर प्राप्त किया जा सकता है। इनको जोड़ने से भारत में 157 लाख हेक्टेयर और नेपाल में 7.25 लाख हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र में वृद्धि होगी। घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग हेतु करीब 120 बीसीएम अतिरिक्त पानी प्राप्त होगा, जो 16 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई हेतु पर्याप्त है। हिमालयी और पठारी संघटकों को आपस में जोड़ने से 30 लाख हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र सृजित होगा, इस परियोजना से निर्मित सम्पर्क नहरों, बाँधों और जलाशयों से भूमिगत जलस्रोत पुनःभारित होंगे जिससे 100 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचित क्षेत्र सृजित होगा, यानी नदियों को आपस में जोड़ने से देश में 300 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता सृजित होगी। इस सिंचाई क्षमता से खाद्यान्न उत्पादन बढ़कर 3938.8 लाख टन तक पहुँच सकता है, जो देश के मौजूदा वर्ष 2016-17 के रिकॉर्ड उत्पादन 2733.8 लाख टन से बहुत अधिक है।

यदि ‘नदी जोड़ो परियोजना’ लक्ष्यों के अनुरूप क्रियान्वित होती है तो इसका सर्वाधिक लाभ गाँवों और कृषि पर निर्भर परिवारों को मिलेगा, इससे प्रति व्यक्ति ग्रामीण परिवारों की आय में 7.49 प्रतिशत, पूर्णतः कृषि पर निर्भर परिवारों की आय में 13.2 प्रतिशत और गैर-कृषि कार्यों पर निर्भर परिवारों की आय में 5.1 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है जिससे ग्रामीण निर्धनता और कृषि की मानसूनी विवशता दोनों का एक साथ समाधान हो सकता है। कुल मिलाकर देश की मौजूदा सिंचाई व्यवस्था और जलापूर्ति प्रणाली पर्याप्त नहीं है और नदियाँ जोड़ने का समग्र कार्यक्रम अनेक विडम्बनाओं व व्यावहारिक कठिनाइयों से भरा है, जिसके लिये सर्वमान्य समाधान समावेशी आयोजन, समेकित नीति और व्यापक निवेश की आवश्यकता है।

लेखक परिचय
लेखक कृषि सहकारिता एवं किसान कल्याण मंत्रालय में वरिष्ठ तकनीकी सहायक के पद पर कार्यरत हैं।ई-मेल : gajendra10.1.88@gmail.com

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