भीषण समस्या है कुपोषण

Submitted by Hindi on Thu, 12/07/2017 - 10:31
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स्केलेटल फ्लोरोसिस से पीड़ित बच्चास्केलेटल फ्लोरोसिस से पीड़ित बच्चाकुपोषण की समस्या से दुनिया के अधिकांश देश जूझ रहे हैं। यूनिसेफ की मानें तो दुनिया में कुपोषण के शिकार कुल बच्चों की तादाद तकरीबन 14.6 करोड़ से भी अधिक है। इनमें से 5.7 करोड़ से ज्यादा तो अकेले भारत में ही हैं। यह तादाद दुनिया के कुल कुपोषित बच्चों की एक तिहाई से अधिक है। देश में तकरीबन 19 करोड़ लोग कुपोषित हैं। यह आंकड़ा कुल आबादी का 14 फीसदी के करीब है। कुपोषण के मामले में सबसे ज्यादा खराब स्थिति महिलाओं की है। भारत में 18 साल तक के बच्चों की तादाद 43 करोड़ है। इसमें यदि महिलाओं की तादाद मिला दी जाये तो यह आंकड़ा कुल आबादी का 70 फीसदी के आस-पास पहुँच जाता है। दुनिया में हर पाँचवाँ बच्चा भारतीय है। जहाँ तक भुखमरी का सवाल है, दुनिया में यह तेजी से बढ़ रही है।

यदि दुनिया में भूखे लोगों की आबादी में भारत की हिस्सेदारी देखें तो यह कुल 23 फीसदी के करीब बैठती है। इस बारे में दुनिया के विशेषज्ञों की चिंता जायज है। उनके अनुसार आने वाले बरसों में मौसम में आ रहे परिवर्तन का सबसे ज्यादा कहर गरीबों पर बरपेगा। इससे दुनिया में बाढ़, तूफान, सूखा, प्राकृतिक जलस्रोतों के सूखने के संकट के साथ महामारी फैलेगी, प्राकृतिक आपदाएँ आयेंगी। जहाँ आपदा प्रबन्धन, शुद्ध पेयजल, स्वास्थ्य सेवाओं की समुचित और मजबूत व्यवस्था नहीं होगी, वहाँ इन आपदाओं और महामारियों के चलते बहुत बड़ी तादाद में लोग अनचाहे मौत के शिकार होंगे। उनमें 85 फीसदी तादाद मासूम बच्चों की होगी। हमारी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली जगजाहिर है। फिर हमारे यहाँ कुपोषण की समस्या वैसे भी भयावह है, उसे देखते हुए यहाँ की स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि पोषण की अपर्याप्तता के कारण साल 2050 तक भारत की तकरीबन 5.30 करोड़ से अधिक आबादी प्रोटीन की कमी से जूझेगी। उस हालत में जबकि आज भी हमारा देश कुपोषण, भुखमरी, गरीबी, निरक्षरता, लिंगभेद, पर्यावरण विनाश और जानलेवा बीमारियों पर विजय पाने व देश की अधिकांश आबादी को पीने का साफ पानी मुहैया कराने में नाकाम है। सच कहा जाये तो शुद्ध पेयजल आज भी एक सपना है। इस मामले में लाख दावों के बावजूद लगातार हम पिछड़ते ही जा रहे हैं। जबकि यहाँ हरसाल होने वाली 21 लाख बच्चों की मौत का कारण कुपोषण ही है।

हमारे यहाँ तीन वर्ष से कम आयु के 47 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। 45 फीसदी अपनी आयु के हिसाब से कद में काफी छोटे हैं। इस मामले में 2015-16 के दौरान किये गए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 की मानें तो कुपोषण के कारण देश भर के 38.5 फीसदी पाँच साल तक के बच्चों की लम्बाई उम्र से काफी कम थी। इनमें से 21 फीसदी में यह समस्या काफी गंभीर है। छोटे कद वाले बच्चों की तादाद शहरों में 31 और गाँवों में 41 फीसदी है। कद छोटा होने वाले अत्यधिक प्रभावित बच्चों की तादाद 21 फीसदी है। ऐसे बच्चों का शहरों और गाँवों में प्रतिशत समान ही है। दरअसल समस्या इतनी भयावह हो चुकी है कि हमारी भावी नस्लें तक प्रभावित हुए बिना नहीं बचीं। बाल कुपोषण की शुरुआत गर्भवती होने के दौरान तथा बच्चे के जीवन के शुरुआती पहले साल में ही हो जाती है।

भारत में 17 लाख बच्चे एक साल की उम्र पूरा करने से पहले और 1.08 लाख बच्चे एक महीने की उम्र भी पूरा नहीं कर पाते और मौत के मुँह में चले जाते हैं। जबकि पाँच साल से कम उम्र के 21 लाख बच्चे मौत के शिकार होते हैं। इस हालत में जबकि समूची दुनिया में पाँच साल से कम उम्र के 97 लाख बच्चे पर्याप्त आहार न मिल पाने, बुनियादी साफ-सफाई की और स्वास्थ्य रक्षा में कमी के चलते मौत के मुँह में चले जाते हैं। हालात की भयावहता का सबूत यह है कि जीवन के शुरुआती छह महीनों में कम वजन के बच्चों का प्रतिशत 16 से बढ़कर 30 तक जा पहुँचा है। पर्याप्त स्तनपान न हो पाने से भूख, डायरिया, निमोनिया और नवजात बच्चों में संक्रमण जन्म के बाद के दो सालों में होने वाली मौतों का मुख्य कारण है।

जबकि इन तीन साल में सबसे जरूरी पर्याप्त स्तनपान है लेकिन खेद है कि यह जानते-समझते हुए कि बच्चे के जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान कराने से नवजात को संक्रमण का खतरा छः फीसदी कम हो जाता है, हर साल 75 फीसदी महिलाएँ बच्चे के जन्म के एक घंटे के भीतर और 72 फीसदी छः महीनों तक स्तनपान नहीं कराती हैं। जबकि 44 फीसदी 6 से 9 महीनों के बीच पूरक आहार तक नहीं दे पातीं ताकि बच्चे की पोषण सम्बन्धी जरूरतें पूरी हो सकें।

एम्स के आहार विज्ञान विभाग व राष्ट्रीय पोषण संस्थान द्वारा पाँच साल तक आयु वाले बच्चों पर किया अध्ययन स्थिति की भयावहता को दर्शाता है। उसके अनुसार 63 फीसदी बच्चों का कद उनकी उम्र के मुकाबले कम है, 34 फीसदी ज्यादा कमजोर हैं, 51 फीसदी का वजन कम है और 73 फीसदी का बॉडी मॉस इंडेक्स असामान्य है। तात्पर्य वह जन्म से ही किसी न किसी बीमारी के चंगुल में हैं। हालिया जन्मे बच्चों में कुपोषण, रक्त अल्पता, नेत्र कमजोरी या अंधता, कम वजन के मामलों में इस अध्ययन में कोलकाता पहले, दिल्ली दूसरे, चेन्नई तीसरे और बंगलुरु चौथे स्थान पर है। यह साबित करता है कि महानगरों में जहाँ स्वास्थ्य सुविधाएँ अन्य नगरों से बेहतर है, यह हालत है, उस दशा में छोटे नगरों, कस्बों और गाँव-देहात की स्थिति की भयावहता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। यह रिपोर्ट प्रमाण है कि देश में 5 साल तक के बच्चों में रक्ताल्पता, एनीमिया, अंधता और कुपोषण का ग्राफ कम होने के बजाय दिनों-दिन तेजी से बढ़ता जा रहा है। आँकड़े सबूत हैं कि ग्रामीण बच्चे ही नहीं, शहरी बच्चे भी कुपोषणता के चंगुल में हैं।

देश में 70 फीसदी पाँच साल से कम आयु के तकरीबन 146 लाख बच्चों का वजन सामान्य से कम है। इनकी दक्षिण एशियाई देशों में तादाद बहुत ज्यादा है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार देश में पाँच साल से कम उम्र के 50 फीसदी बच्चे और 30 फीसदी गर्भवती महिलाएँ कुपोषित हैं। इसमें ज्यादातर वह गरीब परिवार हैं जो अपने भोजन में पौष्टिकता को शामिल नहीं कर पाते। इसका अहम कारण महिलाओं का निम्न जीवन स्तर, उचित स्तनपान न कराया जाना, पूरक आहार का अभाव व उनमें पोषण सम्बन्धी जानकारी का न होना है। यूनिसेफ की प्रोग्रेस फॉर चिल्ड्रेन रिपोर्ट में चेतावनी देते हुए कहा गया है कि यदि नवजात शिशु को आहार देने के उचित तरीके के साथ स्वास्थ्य के प्रति कुछ साधारण सी सावधानियाँ बरत ली जायें तो भारत में हर वर्ष होने वाली पाँच वर्ष से कम आयु के छह लाख से ज्यादा बच्चों की मौत को टाला जा सकता है।

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन का कहना है कि भारत में कुपोषित लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है। यह उस समय और भयावह नजर आती है जबकि समूची दुनिया के सामने यह तथ्य उभर कर आता है कि भारत में दक्षिण अफ्रीका के मुकाबले दोगुने कुपोषित हैं। हमारा देश कहने को कुछ भी दावा करे और इस खुदख्याती में डूबा रहे कि हम अब शक्तिसम्पन्न हैं लेकिन असल में अपनी भारी-भरकम आबादी के साथ वह समूचे विश्व में कुपोषण में सबसे अव्वल है। यह स्थिति दिन-ब-दिन और खराब होती जा रही है। सच तो यह है कि हम भूख और कुपोषण पर काबू पाने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं। इसके लिये राजनैतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक चुस्ती का अभाव जिम्मेदार है।

इसके चलते ही देश को व्यापक मात्रा में शारीरिक-मानसिक और सामाजिक के साथ हर वर्ष 10 अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान हो रहा है। हमारे प्रधानमंत्री 2022 तक कुपोषण का खात्मा चाहते हैं। वे कहते हैं कि कुपोषण से निपटने के लिये केन्द्र और राज्यों के बीच सभी योजनाओं में समन्वय बहुत जरूरी है। अब कहीं जाकर राष्ट्रीय पोषण मिशन बनाने की तैयारी की रही है। मिशन के जरिये केन्द्रीय स्तर पर निगरानी की व्यवस्था होगी। इस पर अंकुश तभी संभव है जबकि सबसे पहले सभी को शुद्ध पेयजल मिले। अक्सर कुपोषण के मामलों में दूषित पेयजल की अहम भूमिका होती है। देखा गया है कि आज भी देश के ग्रामीण अंचलों में लोग गड्ढों, तालाबों, पोखरों का प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं। उन्हें पोषण युक्त आहार मिले। सरकारी योजनायें सख्ती से लागू हों। मशीनरी पारदर्शी हो। गैरयोजनागत खर्चों में कटौती की जाये। अंधाधुंध निर्माण और शहरीकरण पर अंकुश हो। बीमारों को समय पर उचित और मुफ्त इलाज मिले।

यह तभी संभव है जबकि स्वास्थ्य सेवायें उच्चस्तरीय व निःशुल्क हों क्योंकि अधिकांश मौतें आर्थिक अभाव के चलते होती हैं। गरीबों, किसानों को सब्सिडी जारी रहे, उनको सस्ते व टिकाऊ संसाधन मुहैया कराये जायें। बहरहाल अब उम्मीद की जाती है कि अब देश में एक ईमानदार सरकार है जो पोषाहार, गर्भवती महिलाओं व दूध पिलाने वाली माँ को दी जाने वाली बढ़ी राशि जरूरतमंदों को पहुँचायेगी। कुपोषण के खात्मे और बच्चों के कद में बढ़ोतरी के मामले में यह मिशन कहाँ तक सफल होगा, यह भविष्य के गर्भ में है।
 

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एक परिचय:


. 21 जनवरी 1952 को एटा, उ.प्र. में शिक्षक माता-पिता के यहाँ जन्म।

राजकीय इंटर कॉलेज, एटा से 12वीं परीक्षा उत्तीर्ण, सागर विश्वविद्यालय से स्नातक, छात्र जीवन में अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन, समाजवादी युवजन सभा और छात्र संघ से जुड़ाव रहा। राजनैतिक गतिविधियों में संलिप्तता के कारण विधि स्नातक और परास्नातक की शिक्षा अपूर्ण।

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