भोजवेटलैंड : इतिहास एवं निर्माण

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भोजवेटलैंड : भोपाल ताल, आईसेक्ट विश्वविद्यालय द्वारा अनुसृजन परियोजना के अन्तर्गत निर्मित, 2015

भारत के मध्यप्रदेश के भोपाल नगर में स्थित बड़ी और छोटी झील को अन्तरराष्ट्रीय रामसर साइट क्रमांक 1206 के अन्तर्गत भोजवेटलैंड के नाम से अन्तरराष्ट्रीय वेटलैंड के रूप में मान्यता प्रदान की गई है।

भोजवेटलैंड का अर्थ है- भोज द्वारा निर्मित पाल। यहाँ पाल का अर्थ है- बांध। वर्तमान कमला पार्क एक बांध है जिसे राजा भोज ने बंधवाया या बनवाया था। भोजपाल नाम का यह बांध तब इंजीनियरिंग की बड़ी भारी देन या करीगरी मानी जाती थी। राजा भोज ने भोपाल क्षेत्र में कला एवं तकनीकी के निम्नलिखित बड़े कार्य किये।

1. भोजपुर के भोजेश्वर मंदिर का निर्माण।
2. वेत्रवती (बेतवा एवं कल्याण स्रोत या कालियासोत के विशाल भीमा जलाशय का निर्माण।
3. कालियासोत पर बांध।
4. बांध निर्माण के द्वारा भोपाल के बड़े तालाब का निर्माण।
5. भोपाल (भोजपाल) नगर में किला (दुर्ग) एवं मंदिर का निर्माण तथा विद्यापीठ की स्थापना।

भोपाल के बड़े तालाब का विकास क्रमः सन 1010 से आजतकइन निर्माण कार्यों के जनक राजा भोज के बारे में यहाँ जानकारी देना प्रासंगिक और उचित प्रतीत होता है।

राजा भोज :


राजा भोज (सन 1010-1053) मालवा के राजा सिंधुराज के पुत्र थे। राजा भोज ने वास्तुशिल्प पर तथा नगर योजना विषय पर समरांगण सूत्रधार, जहाज निर्माण तथा नाविकी पर युक्तिकल्पतरू, धातु तथा कच्चा माल खनन पर रसमृगांग, आयुर्वेद तथा प्राकृतिक चिकित्सा पर आयुर्वेदसर्वस्व, आध्यात्म पर तत्वप्रकाश, ज्योतिष पर ज्योतिष मृगांक, संस्कृत कविता संग्रह-सरस्वती कंठाभरण सहित लगभग चौरासी ग्रंथ लिखे। वे प्रकृति और पर्यावरण के प्रति बड़ी जागरुक थे। वनों के लिये उन्होंने बहुत कार्य किया। उन्होंने ही सर्वप्रथम कागज बनाने का उद्योग शुरू किया था। कागज बनाने के लिये उन्होंने सैकड़ों एकड़ की जमीन पर कमल की कृषि शुरू की, जिससे कि कमलों से कागज बनाने की लुगदी तैयार की जा सके। धार-मांडू रोड पर स्थित नाचला ग्राम कमल की खेती के लिये किसी समय प्रसिद्ध था। इस ग्राम का पुराना नाम नालकाक्षपुर था। जिस ग्राम में कागज के लिये लुगदी बनाई जाती थी, उस जगह को कागजीपुरा नाम से जाना जाता है। यह अभी भी नालचा ग्राम के पास स्थित है। इस कागज की गुणता मिश-उल-फजल तथा नियामत-नामा नाम की मैगज़ीन में देखी जा सकती है जो ब्रिटिश म्यूजियम लंदन में रखी है।

राजा भोज ने धार में भोजशाला, मांडू तथा दिल्ली में मीनार बनवाई थी जिसे आजकल देहली का कुतुबमीनर कहा जाता है।

राजा भोज के भीमा जलाशय से खेतों की सिंचाई होती थी। इस भीमा जलाशय या भीमताल के अवशेष आज भी भोपाल से 20 किमी दूर भोपाल से भोजपुर के बीच की रोड के पास देखे जा सकते हैं।

भोपाल का बड़ा तालाब भी राजा भोज की ही देन है।

भोज के नाम पर कई नगरों के नाम रखे गए हैं। जैसे- भोजकटक (होशंगाबाद के पास) भोजपुर (पटना के पास) भोजपुर (रायसेन जिला), भोजपाल (भूपाल अथवा भोपाल)।

पटना के पास का भोजपुर, मालवा के परमार राजा भोज के नाम पर पड़ा- ऐसा कौशिक पद्धति के लेखक केशव का उल्लेख है जो राजा भोज के समय उक्त भोजपुर में रहता था। इसके अनुसार राजा भोज, धर्म संरक्षण हेतु राजगृह गए थे।

पृथ्व्यिां श्री भोजदेवो धर्म संरक्षणाय च।
देशमालवकोत्पन्नः श्री राजगृहमेत्य च।।
श्रीमद् भोजपुरे विद्वानासीत्सोमेश्वरो द्विजः।
तत्पुत्र केशवेनैषा कृता कौशिकपद्धतिः।।


उस समय कन्नौज, पटना, भोजपुर से तुंगभद्रा नदी तक तथा पश्चिम में द्वारिका से पूर्व में मगध, गौड़ (बंगाल) तक राजा भोज का साम्राज्य था।

राजा भोज को परवर्ती धर्मशास्त्र ग्रन्थकार केवल भूपाल नाम से भी उद्धृत करते रहे। कृत्यरत्नाकर में भोज के भूपालकृत्य समुच्चय ग्रन्थ को उद्धृत किया गया है।

राजा भोज द्वारा भोजपाल (भोपाल) नगर में किला एवं मंदिर का निर्माण तथा विद्यापीठ की स्थापना :


उत्तर पूर्व की ओर किलेबंदी करने के लिये राजा भोज ने बड़े तालाब के महत्त्वपूर्ण स्थान पर एक किला निर्मित करवाया था जिसे बाद में किला भोपल के नाम से जाना जाता था। किले के पास ही मंदिर का निर्माण कराया था। किलेवाला मोहल्ला भोजपुरा कहलाता था। किले के भाग को बाद में जेल (बंदीगृह) के रूप में काम में लाया जाने लगा। यह किला बड़े तालाब के पूर्व तट से होते हुए गौहर महल कमला पार्क से होते हुए तलैया गिन्नौरी भोईपुरा तक जाता था। वर्तमान हाथी खाना लखेरापुरा इतवारा से शाहजहानाबाद तक जाता था। बाद में दोस्त मोहम्मदखान (सन 1722) ने फतहगढ़ अथवा फतहपुर का किला बनवाया। उसने दीवाल के द्वारा इसे राजा भोज के किले से जोड़ दिया; इससे शहर का एक बड़ा भाग घिरकर सुरक्षित हो गया; इस घिरे हुए सुरक्षित क्षेत्र को शहर ए खास अथवा खास शहर अभी तक कहा जाता था।

राजा भोज वर्ष में दो बार बड़े भोज आयोजित करते थे। इस भोज में देशभर के संगीतकार नर्तक, नाटककार एवं अन्य कलाकार एकत्रित होते थे। भोज के बाद अतिथियों को सम्मान पत्र, वस्त्राभूषण तथा दस मिस्कल दिए जाते थे।

राजा भोज वास्तुशास्त्र, खगोलशास्त्र, व्याकरण शास्त्र आदि विद्याओं के विद्वान तो थे ही वे योग विद्या के भी जानकार थे। यद्यपि यह शोध का विषय है फिर भी कहा जाता है कि भोजपुर मंदिर से 3-4 कि.मी. दूर वर्तमान आशापुरी के पास टूटी-फूटी हालत में उनका बनाया हुआ एक छोटा सा पत्थरों का मंदिर या गुरूसमाधि आज भी है। मंदिर या गुरू समाधि, सुन्दर तराशे हुए पत्थरों की है। मंदिर के बाहर शिला पर चरण-युगल चिन्ह (दो चरण) बने हुए हैं। वहीं कंकाली या अन्य देवी की भयानक दिखने वाली मूर्तियाँ भी पड़ी हुई हैं। ये चरण चिन्ह गुरू पूजन, गुरू समाधि के प्रतीक कहे जाते हैं। यह शोध करने का विषय है कि किस योगगुरू की यह तपस्थली है। इसी स्थान के आस-पास तराशे हुए सुन्दर कला के प्रतीक, बड़े-बड़े पत्थर भारी संख्या में पड़े हुए हैं। इन पत्थरों पर उकेरे हुए बेलबूटे देखते ही बनते हैं।

यहाँ पर गणेश, शिव, विष्ण, नंदी, कंकाली तीर्थंकर आदि की मूर्तियां भी थीं जिन्हें उठाकर आशापुरी ग्राम के पास रख दिया गया है।

आशापुरी के अवशेष

उदयादित्य की रानी श्यामली अथवा शाल्मली द्वारा संस्कृत विद्यापीठ एवं सभा मंडल की स्थापना :


भोज (1010-1053) के बाद उनके चचेरे भाई उदयादित्य (1059-1086) की रानी श्यामली ने भोपाल में (भोजपाल में) एक और मंदिर बनवाया। उसे उस समय सभा मंडल कहा जाता था। यह एक विद्यापीठ था जिसमें हजारों छात्र संस्कृत भाषा के व्याकरण, वेद शास्त्र, पिंगल शास्त्र आदि का अध्ययन करते थे। इस मंदिर एवं सभा मंडल को इल्तुतमिश ने सन 1236 में नष्ट किया था। उदयादित्य ने कुछ ही वर्ष तक शासन किया। उसने विदिशा में एक प्रसिद्ध मंदिर बनवाया जिसके शिलालेख में परमारों के इतिहास की महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। उदयादित्य द्वारा विदिशा के पास, गंजबासौदा से 6 कि.मी. दूर नीलकंठेश्वर मंदिर बनवाया गया था। कहा जाता है कि उसमें चार अप्सराओं के मध्य जो राजा की मूर्ति दिखाई गई है वह राजाभोज की मूर्ति है। राजा भोज की चार रानियां थीं। कला की दृष्टि से यह मंदिर अत्यन्त उत्कृष्ट है।

गजेटियर सीहोर एवं भोपाल 1999 के अनुसार भोपाल :


स्थिति- 23.10 उत्तर अक्षांश तथा 77.580 पूर्व देशांश में भोपाल बसा हुआ है।

नामकरण- भोपाल शब्द की व्युत्पत्ति राजा भोज द्वारा निर्मित और शहर की सीमाओं के भीतर स्थित भोजताल नामक श्ब्द से हुई है।

भोपाल शब्द की व्युत्पत्ति भोजपाल शब्द से भी बताई गई है। पाल का अर्थ बांध होता है। भोज के उस वृहद बांध (पाल) से भोजपाल शब्द बना है। भोजपाल से भूपाल और अब भोपाल शब्द प्रचलित हुए। इस प्रकार भोपाल नाम भोजपाल का बिगड़ा हुआ रूप है जिसका अर्थ होता है- भोज का बांध जिसका निहितार्थ बड़े तालाब के ऊपर बने बांध से है।

भीमा जलशय (भोजपुर) तथा भोपाल के बड़े तालाब का निर्माण :


भोपाल से लगभग 20 किमी की दूरी पर भोपाल भोजपुर के बीच राजा भोज द्वारा भीमा जलाशय का निर्माण किया गया था इसके लिये बेतवा का पानी रोकने के लिये बड़ा भारी बांध बनाया गया था। इस जलाशय को भीमताल के नाम से भी जाना जाता है। पास में ही भोजपुर नाम का ग्राम (23006 अक्षांश उत्तर तथा 700 35 देशांश पूर्व) स्थित है।

इस भीमाताल के निर्माण तथा साथ ही भोपाल के बड़े तालाब (भोज वेटलैंड) के निर्माण के पीछे राजा भोज से सम्बन्धित कहानी है। श्री पी.टी. आयंगार द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘राजा भोज’ (पृष्ठ 105 से 109) के अनुसार यह कहानी इस प्रकार है-

राजा भोज कुष्ठ रोग से ग्रस्त थे। भोज के दरबार के डॉक्टर या वैद्य इस रोग को ठीक नहीं कर सके। उस समय आज की तरह मेडिकल चिकित्सा का विकास नहीं हुआ था। रोगों के उपचार के लिये वैद्यों के अलावा ज्योतिषियों से भी रोग शांति का उपाय पूछा जाता था। एक ज्योतिषी सन्यासी साधु ने रोग का उपचार बताया कि यदि महाराज 365 जलधाराओं को 365 दिनों (एक वर्ष) में जोड़कर एक पवित्र जलाशय बनायें और उस जल में एक विशेष मुहूर्त में स्नान करें तथा नित्य शिव पूजन करें तो रोग से छुटकारा मिल सकता है।

 

बेतवा नदी के जल से प्राचीन काल में कुष्ठ रोग ठीक होने के उदाहरण पुराणों में मिलते हैं-


पद्म पुराणकार ने चम्पक नगर के विदारूण नामक राजा के कुष्ठरोगी होने और शिकार करते समय प्यास लगने पर बेतवा का पानी पीने और उससे हाथ पैर धोने से उसके कुष्ठ रोग में लाभ होना बताया है।


चंदेरी नामक स्थान में यह बात प्रसिद्ध है कि वहाँ के एक कूर्म नामक शासक भी कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। उन्हें भी शिकार खेलते समय प्यास लगने पर बेतवा नदी के एक कुंड का पानी पीने से उनका कुष्ठ रोग जाता रहा।)


अतः कोई आश्चर्य की बात नहीं यदि उस समय के शास्त्रकारों ने राजाभोज को बेतवा के जल में नित्य स्नान करने तथा शिव पूजन करने की सलाह दी हो जिससे कि वे कुष्ठ रोग से मुक्त हो सकें।

 

राज दरबार के सभी मंत्री और इंजीनियर ऐसे स्थान की खोज में जुट गए। उन्होंने भोपाल से 20 मील की दूरी पर बेतवा नदी का इस प्रकार का स्थान देखा। इस स्थान पर पहाड़ियाँ इस तरीके से स्थित थीं कि एक बांध बनाकर ऐसे पवित्र जलाशय का निर्माण किया जा सकता था। चालीस फीट ऊँचा और एक सौ फुट चौड़ा बांध पत्थरों के द्वारा बनाया गया। (आज कल इसी बांध के ऊपर से भोपाल से भोजपुर जाने का रोड बना हुआ है।) किन्तु जब इस जलाशय में मिलने वाली सभी जलधाराओं की गिनती की गई तो वे 359 ही निकलीं। जबकि 365 जलधाराओं को मिलाने का साधु का आदेश था।

राजा भोज के कालिया (कल्याण सिंह) नामक मंत्री ने 5 जलधाराओं को खोजकर बताया किन्तु तब भी कुल 364 जलधाराएं ही हो रहीं थीं। कालिया या कल्याण सिंह एक और जलधारा की खोज करने लगा वह पुराने किले (वर्तमान कमला पार्क का महल) के पास पहुँचा जहाँ उसने दो पहाड़ियों के बीच में से पानी बहते हुए देखा। उसने बांध बनाकर पानी की धारा को रोक दिया। इस प्रकार बड़ा तालाब बन गया। इस तालाब से वह एक जल धारा निकाल कर भदभदा की तरफ से बेतवा नदी में मिलाने ले गया। यह जल धारा उसके नाम पर कल्याण सौध या कलियासोत कहलाने लगी। इस धारा ने नदी का रूप ले लिया जो अब कलियासोत नदी के नाम से जानी जाती है। इस प्रकार कुल 365 जल धाराओं के संगम से भीमा जलाशय पूर्ण हुआ।

राजा भोज प्रतिदिन नाव के द्वारा भीमा जलाशय की सैर करते थे तथा भोजपुर के भोजेश्वर (शिव) मंदिर में जाकर शिवाभिषेक करते थे। गजेटियर (अंग्रेजी)- (भोपाल स्टेट प्रथम संस्करण 1908, पुनर्मुद्रण 1995, प्रकाशक डायरेक्टरेट ऑफ राजभाषा एवं संस्कृति मध्य प्रदेश) के अनुसार भोजपुर मंदिर के शिवलिंग की ऊँचाई साढ़े सात फुट तथा परिधि 17 फुट 8 इंच है। यह साढ़े इक्कीस फुट के वर्गाकार चबूतरे (जिलहरी) पर स्थापित है।

भोपाल के बड़े तालाब और भोजपुर के भीमा जलाशय दोनों का निर्माण समय सन 1010-1055 के लगभग माना जाता है। भोजपुर के भीमा जलाशय का क्षेत्रफल 250 वर्गमील से भी अधिक था। इस जलाशय का पानी लगभग 65000 हेक्टेयर भूमि में फैला हुआ था। गजेटियर भोपाल स्टेट 1908 के अनुसार होशंगाबाद के शासक होशंगशाह (1405-1434) ने इसे सन 1431 में तोड़ा था। इसे तोड़ने में उसे 3 माह लगे थे तथा तीन वर्ष में इस भीमा जलाशय का पानी निकल पाया था।

भीमा ताल आज के भोपाल के बड़े तालाब से चालीस गुना बड़ा था। ताल में अनेक झरने तथा नौ नदियां मिलती थीं-

बेतवा, कलियासोत, केरवा, बनसी, घेरवा, जामनी, गोदर, सेगुरू, बांगना, इन नदियों के अलावा कई झरने इस स्थान पर मिलते थे। जलाशय में तीन स्थानों पर बांध बनाए गए थे- कीरत नगर में 91.4 मीटर लंबा, बंगरसिया में आधा किमी लंबा और मेंदुआ में डेढ़ किमी लंबा बांध बनाया गया था।

‘‘यदि भीमताल को पुराने आकार में लौटा दिया जाये तो भोपाल की पानी की समस्या कई वर्षों तक के लिये हल हो सकती है।’’ यह निष्कर्ष, ‘वाल्मी’ के डायरेक्टर सचिन सिन्हा, डॉ. ए.के. विश्वकर्मा, डॉ. आर. ठाकुर, डॉ. व्ही.के. श्रीवास्तव व अजय शर्मा द्वारा दिए गए अध्ययन एवं शोध पर आधारित है।

म.प्र. जल एवं भूमि प्रबंध संस्थान (वाल्मी) द्वारा ओम घाटी, बेतवा बेसिन में दबे भोजताल (भीमाताल) एवं उसकी सहायक नदियों की उत्पत्ति पर खोज करने के लिये, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग नई दिल्ली ने, तीन वर्ष के लिये यह परियोजना स्वीकृत की थी।

राजा भोज द्वारा निर्मित बांध के अवशेषअध्ययन में यह तथ्य उभरकर आया है कि भोजपुर के चारों ओर स्थित पहाड़ियां ओम का आकार बनाती हैं। इसी (ओम) में भोज का भीमाताल स्थित था। भीम का अर्थ है विशाल। एशिया का सबसे बड़ा शिवलिंग भी इसी ओम में भोजपुर में स्थित है।

आदिवासी लोककला एवं तुलसी अकादमी, म.प्र. संस्कृति परिषद भोपाल द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘चौमासा’ में इस भीमा जलाशय की विशेषता पर इस प्रकार प्रकाश डाला गया है :-

राजा भोज ने बेतवा (वेत्रवती) व उसकी सहायक नदी कालियासोत पर एक बांध व सरोवर का निर्माण कराया था। यह सरोवर एक विस्तृत पहाड़ी घाटी में था। इसकी पर्वतीय दीवार में दो दर्रे हैं। एक, एक सौ फीट और दूसरा पाँच सौ फीट। ये दोनों दर्रे अनोखे बांधों द्वारा जोड़ दिये गये थे। मिट्टी से बने इस केन्द्रीय बांध के भीतरी और बाहरी दोनों ओर विशालकाय प्रस्तर खण्ड लगे हुए हैं, जो बिना चूने के, एक दूसरे पर इस तरह रखे हुए हैं कि उनमें जल प्रवेश नहीं कर सकता। अधोभाग से इसके शेष दोनों पक्षों की ढाल, भीतर की ओर थी। कम चौड़ाई वाले दर्रे का बांध ऊँचाई में 78 फीट और अधो भाग पर उसकी चौड़ाई 300 फीट थी। अधिक चौड़े दर्रे का बांध 40 फीट ऊँचा और ऊपरी तल लगभग 100 फीट चौड़ा था। इनमें से पहला वाला पूरी ध्वंसावस्था में है किन्तु दूसरा ठीक अवस्था में है। आज भी कालियासोत नदी का पुराना तल पहचाना जा सकता है। राजनैतिक कारणों से बेतवा के इस बांध को, मालवा के सुल्तान हुशंगशाह गोरी ने तुड़वा दिया था, जिसके अवशेष आज भी वहाँ देखे जा सकते हैं।

वेत्रवती नदी :


विंध्यगिरि की पारियात्र पर्वतमाला में मंडीदीप से कुछ दूर बहेड़ा गाँव (कोलार बांध से 6 किमी दूर जिसे बोदाखोह भी कहते हैं) के समीप 2 कि.मी. दक्षिण में वृत्तासुर का बनाया महागंभीरा नाम का बहुत गहरा कुआँ था। बेतवा अथवा वेत्रवती नदी का उद्गम यहीं से हुआ है। इसी नदी पर राजा भोज ने भोपाल भोजपुर के बीच एक बड़ा जलाशय बनवाया था जिसमें कल्याणसोत नदी मिलती थी। भोपाल के बड़े तालाब पर बड़ा बांध (वर्तमान कमला पार्क) बनाकर बड़े तालाब का पानी भदभदा की तरफ से निकाला गया था। इस पानी की धार को कल्याणसोत कहते थे जो अब कलिया सौत के नाम से जानी जाती है।

वेत्रवती नदी बड़े ही महत्त्व की पवित्र नदी है। यह नदी उत्तर की तरफ बहकर यमुना से मिलती है। विदिशा में वेत्रवती के किनारे अनेक तीर्थ हैं। चरणतीर्थ के पास बेतवा के संगम को त्रिवेणी तीर्थ भी कहा जाता है। यहाँ त्रिवेणी के तट के पास एक मंदिर है। एक शिलालेख लगा है जिसमें लिखा है ‘‘द्वापर में यहाँ राम लखन सीता सहित राजा मेघ सेवा करौ।’’ मंदिर के प्रांगण में एक स्तंभ है। दूसरे मंदिर में नीचे दो सतियों के प्रस्तर लगे हुए हैं। एक देवी की मूर्ति भी है जिसे लोग वेत्रवती नदी की मूर्ति समझते हैं।

नदी के बीच में मंदिर है जिसमें शिव, नन्दी, कच्छप की स्थापना है। पितरों की पूजा करने में कच्छप (कछुए) का बड़ा महत्त्व था। सूर्यवंश और सोमवंश के राजा वेत्रवती में स्नान करके पुण्य लाभ प्राप्त करते थे। यह मान्यता थी कि कन्या राशि में सूर्य के होने पर आश्विन कृष्ण पक्ष (पितृ पक्ष) में पितृगण मछली और कच्छप का रूप धारण कर वेत्रवती के पास आते हैं। अतः उन्हें तिलांजलि देनी चाहिए और वेत्रवती में पिंडदान करना चाहिए।

बाण भट्ट ने विदिशा के रामघाट पर बैठकर ही कादंबरी लिखी थी। कालपी नगर में बेतवा के किनारे की तरफ पाराशर ऋषि का आश्रम था। इसी क्षेत्र में तुंगकारण्य भी था जहाँ सारस्वत ऋषि (अंगिरा ऋषि के पुत्र) का आश्रम था।

विदिशा नगरी पहले अयोध्या के राजा दशरथ के सबसे छोटे पुत्र शत्रुघ्न के छोटे पुत्र शत्रुघाती की राजधानी थी। बाद में यह चेदि राज्य की भद्रावती नाम से भी प्रसिद्ध हुई। एक समय में महाराजा शूद्रक की राजधानी विदिशा ही थी।

भोपाल के छोटे तालाब का निर्माण :


भोपाल गजेटियर भाग-3 के अनुसार शहर के सौन्दर्य की वृद्धि के उद्देश्य से छोटे ताल का निर्माण नवाब हयात मोहम्मद खान के मंत्री नवाब छोटे खान ने सन 1794 में करवाया था। जल को रोकने के लिये एक बांध बनवाया गया जिसे पातरा पुल के नाम से जानते हैं। इस छोटे तालाब के जल निकास से हलाली नदी का उद्गम होता है। जो आगे जाकर बेतवा में मिलती है।

पहले बड़े तालाब से इंजन के जरिये शहर को पानी पंप किया जाता था और छोटे तालाब के पातरा पुल से बहने वाला पानी जल चक्र से भेजा जाता था।

ऊपरी झील को पुख्तापुल तालाब या बड़ा तालाब कहते थे। छोटे तालाब का बांध बाद में सन 1794 में बना जिसे पातरा पुल कहते हैं।

राजाभोज की प्रतिमा की स्थापना :


मध्य प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2011 को राजा भोज राज्यारोहण सहस्राब्दि समारोह वर्ष के रूप में मनाया गया।

भोपाल के बड़े तालाब के पुराने फतेहगढ़ किले के बुर्ज पर परमार राजा भोज की प्रतिमा का अनावरण अंतिम फरवरी 2011 को धूमधाम से किया गया। भोपाल का नाम भोजपाल करने का प्रस्ताव भी केन्द्र के पास भेजने की बात थी किन्तु केन्द्र सरकार से इस विषय में कोई अनुकूल सूचना नहीं मिली।

दिल्ली के शासक फर्रूखसियर ने सन 1718 में भोपाल के तत्कालीन शासक को दिलेर-ए-जंग का खिताब देते हुए कहा था कि वो देवल भोजनगरी और देवल शान्ति के बादशाह को यह खिताब देते हुए बहुत प्रसन्न हैं। इससे सिद्ध होता है कि भोपाल शहर राजा भोज की नगरी था।

भोपाल का यह बड़ा तालाब दूर-दूर तक विख्यात हो गया था। इसकी विशालता के कारण लोक में ये पंक्तियां तब भी प्रसिद्ध थीं और आज भी प्रसिद्ध हैं-

ताल तो भोपाल ताल और सब तलैयाँ।
रानी तो कमला पति और सब रनैयाँ।।
गढ़ तो छत्तीसगढ़ और सब गढ़ैयाँ।
राजा तो रामचन्द्र और सब रजैयाँ।।


 

भोजवेटलैंड : भोपाल ताल, 2015


(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जल और जल-संकट (Water and Water Crisis)

2

वेटलैंड (आर्द्रभूमि) (Wetland)

3

भोजवेटलैंड : इतिहास एवं निर्माण

4

भोजवेटलैंड (भोपाल ताल) की विशेषताएँ

5

भोजवेटलैंड : प्रदूषण एवं समस्याएँ

6

भोजवेटलैंड : संरक्षण, प्रबंधन एवं सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल प्लानिंग एण्ड टेक्नोलॉजी (CEPT) का मास्टर प्लान

7    

जल संरक्षण एवं पर्यावरण विधि

8

जन भागीदारी एवं सुझाव

 

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