बूँद दर बूँद नीला सोना

Submitted by Hindi on Sun, 04/01/2018 - 17:17
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स्रोत, अप्रैल 2003


आजकल पानी का आकलन नीले सोने के रूप में हो रहा है। खास तौर से पानी को लेकर प्रयुक्त शब्दावली के आर्थिक निहितार्थ यही है। लिहाजा इस कीमती संसाधन के प्रबंधन हेतु अन्तरराष्ट्रीय जल नीति की तलाश के प्रयासों को नीले हाथी की संज्ञा दी गई है। यह शब्दावली बढ़ते क्रम में स्टॉक होम जल सम्मेलनों में प्रयुक्त होने लगी है। ये सम्मेलन वर्ष 1990 से प्रति वर्ष आयोजित हो रहे हैं। इन सम्मेलनों के साथ-साथ ढेरों कार्यशालाएँ व अन्य आयोजन होते हैं आज वैश्विक जल नीति के संदर्भ में यह सबसे प्रतिष्ठित और सम्भवत: सबसे प्रभावशाली मंच है। पिछले वर्ष अगस्त में हुए जल सम्मेलन (स्टॉकहोम, स्वीडन) में तकरीबन 500 पेशेवरों ने भाग लिया था।

जलइस सम्मेलन को कई शक्तिशाली 'जल सम्राटों' और नीतिगत संस्थाओं का समर्थन प्राप्त है। यह विचार दरअसल स्वीडन की मैलिन फाल्कनमार्क का था। उनका मत है कि पानी सामाजिक-आर्थिक विकास और जीवन की गुणवत्ता की कुंजी है। उन्होंने ही 'नीले सोने' (ब्लू गोल्ड) का विचार सामने रखा था।

इस तरह का कोई भी आयोजन या सम्मेलन अपनी एक शब्दावली निर्मित करता है - जैसे 'क्रॉप पर ड्रॉप' (फसल प्रति बूँद पानी), 'जॉब पर ड्रॉप' (रोजगार प्रति बूँद) या 'ड्रॉप पर डॉप' (बूँद प्रति बूँद)। ऐसा लग सकता है कि ये मात्र तुकबंदियां हैं मगर इस तरह के मुहावरों का नीतिगत आशय भी होता है। मुहावरे बनने से पहले नीतिगत दिशाएँ निर्धारित होती हैं। उत्तरी विश्व से उभरते इस तरह के नीतिगत औजारों की वजह से दक्षिणी विश्व में जल संसाधनों के प्रबंधन की दिशाओं में व्यापक परिवर्तन होने लगते हैं। उत्तर दक्षिण विभाजन के संदर्भ में इस तरह के नीतिगत औजार न सिर्फ सशक्त रणनीतियों व निवेश सम्बन्धी परिवर्तनों को जन्म देते हैं, मगर कई बार भारत जैसे कृषि प्रधान देशों के संदर्भ में अत्यंत कमजोर रूप में भी सामने आते हैं। बहरहाल, इस तरह के सम्मेलन वैश्विक नीति निर्माण प्रक्रिया को एक वैधता जरूर प्रदान करते हैं।

उक्त सम्मेलन की रणनीति यह थी कि एक कारगर, दूरगामी, जल संसाधन प्रबंधन के लिहाज से वास्तविक कामकाज, विज्ञान, नीति निर्माण और निर्णय प्रक्रिया की परस्पर कड़ियों को उभारा जाए। निम्नलिखित मुद्दों पर चर्चा हुई - (1) विकास के उत्प्रेरक के तौर पर पानी; (2) औद्योगिक क्षेत्र में भूजल प्रदूषण की रोकथाम ; (3) पानी, गरीबी उन्मूलन और सामाजिक कार्यक्रम; (4) किसी भी जल ग्रहण क्षेत्र में पानी के विभिन्न उपयोगों की प्राथमिकताएँ; (5) निर्णय प्रक्रिया में हितग्राहियों की भागीदारी के संस्थागत रूप; (6) पानी की कीमत का निर्धारण; (7) पानी व ऊर्जा क्षेत्रों का एकीकरण; (8) शहरी परिवेश और पानी।

प्रतिदिन शुरुआत में विभिन्न कार्यशालाएँ होती थीं तथा उसके बाद चर्चा व बहस का आयोजन होता था। जैसा कि इस तरह के विश्वस्तरीय मंचों पर होता है, मुख्य क्षेत्रों में मूलत: उत्तरी देशों का ही बोलबाला रहा।

पिछले कुछ वर्षों में मुहावरों का काफी महत्त्व रहा है। ये एक ओर तो निहित संदेश को प्रसारित करने में मदद करते हैं, वहीं दूसरी ओर नीतिगत प्रक्रिया को कारगर ढंग से प्रभावित भी करते हैं। इस लिहाज से जल संसाधन प्रबंधन का अखाड़ा भी अलग नहीं है। वर्ष 1999 में जलीय तंत्र की हत्या को 'जल संहार' की उपमा दी गई थी। वर्ष 2000 में नीति में हित ग्राही विभिन्न लोगों को साथ लाने के लिये 'जल एकजुटता' का नारा दिया गया था। इसी तर्ज पर वर्ष 2002 में 'हायड्रॉनॉमिक' नजरिए की वकालत की गई। इसी प्रकार से 'क्राप पर ड्रॉप' (यानी 'फसल प्रति बूँद') मुहावरे का आशय सिंचाई की कुशलता पर ध्यान केंद्रित करना रहा, तो 'जॉब पर ड्रॉप' (रोजगार प्रति बूँद) पानी के आर्थिक मूल्य का द्योतक है।

मुहावरे 'ड्रॉप पर ड्रॉप' (यानी बूँद दर बूँद) से आशय नदी घाटी विकास के इकोसिस्टम नजरिए से है। यहाँ ग्रीन वॉटर और ब्लू वॉटर (हरे पानी/नीले पानी) की भी चर्चा हुई। इनसे आशय पानी के खर्चीले उपयोग और उत्पादक उपयोग से है। यह लगता तो काफी भ्रामक है मगर इसमें यह सरोकार छिपा है कि फिलहाल ग्रामीण/कृषि क्षेत्र में मीठे पानी का अत्यधिक उपयोग हो रहा है। दूसरा सरोकार यह है कि भविष्य में शहरी क्षेत्रों के लिये रणनीति क्या हो। अलग-अलग मंचों पर प्रस्तुत इन मुहावरों में से 'एकीकृत जल संसाधन विकास' की अवधारणा उभरी है।

बात यह हो रही है कि छोटे-बड़े पैमाने पर नदी घाटियों का विकास हो, उसमें इकोलॉजी, तकनीकी, आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक व जल वैज्ञानिक पहलुओं का ध्यान रखा जाए। ये सब मिलकर ही एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन का नजरिया बनता है। अर्थात हम बाढ़, प्रदूषण वगैरह से बचेंगे और सबके लिये जल की उपलब्धि व पहुँच सुरक्षित कर पाएँगे। और इस प्रक्रिया में टकराव की कोई गुंजाइश न होगी।

'जल एकजुटता' का अर्थ है- डाउनस्ट्रीम-अपस्ट्रीम, गरीब-अमीर, उद्योग-कृषि, मनुष्य-प्रकृति और उत्तर-दक्षिण सबके बीच कड़ियों को उभारा जाए। निहितार्थ यह है कि टकराव की कोई गुंजाइश नहीं है। 'जल संहार' का मतलब है कि प्रकृति के संसाधनों में जहर घोलना- यानी यह सहभागियों से धरती के इकोलॉजिकल आधार को बचाने का आह्वान करता है। 'जल-अर्थव्यवस्था' के जरिए पानी व अर्थव्यवस्था की कड़ियाँ तो रेखांकित होती ही हैं, जीविका और पर्यावरण सुरक्षा के बीच संतुलन की जरूरत भी उभरती है।

सप्ताह भर चलने वाले इस सम्मेलन के साथ एक नोबलनुमा पुरस्कार भी प्रदान किया जाता है। विश्व के कीमती जल संसाधन की सुरक्षा में उल्लेखनीय योगदान के लिये एक वॉटर प्राइज अवार्ड दिया जाता है। दूसरा पुरस्कार युवा पेशेवरों और शोधकर्ताओं के लिये है- इसे स्टॉकहोम जूनियर प्राइज अवार्ड कहा जाता है। इनके अलावा सम्मेलन के दौरान सर्वश्रेष्ठ पोस्टर के लिये वेस्ट पोस्टर अवार्ड भी दिया जाता है। स्टॉकहोम वॉटर प्राइज को स्वीडन के नोबल 'जल पुरस्कार' की संज्ञा दी गई है। सबसे पहले यह पुरस्कार 1991 में दिया गया था। यह पुरस्कार किसी ऐसी संस्था, संगठन, व्यक्ति अथवा कंपनी को दिया जाता है जिसने एप्लाइड शोध या प्रत्यक्ष कार्यवाही के जरिए जल संरक्षण या संवर्धन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया हो। यह पुरस्कार 1,50,000 अमेरिकी डॉलर का है। आम तौर पर उत्तरी विश्व के पानी विशेषज्ञों को ही यह पुरस्कार मिला है। एकमात्र अपवाद 1993 में भारत के माधवराव आत्माराम चितले रहे। उन्हें यह पुरस्कार जल संसाधनों के संरक्षण व शिक्षा सम्बन्धी कार्यों के लिये दिया गया था।

 

वर्ष 2002 का स्टॉकहोम वॉटर प्राइज प्रिंसटन विश्वविद्यालय के विख्यात जल वैज्ञानिक इग्नेसियो रॉड्रिग्ज-इतुर्बे को दिया गया।

 

रॉड्रिग्ज-इतुर्बे ने सतही जल विज्ञान को लेकर जो वैज्ञानिक कार्य किया उससे जलवायु, मिट्टी और वनस्पति संरचना के परस्पर सम्बन्धों को समझने में बहुत मदद मिली है। उनके द्वारा किए गए शोध से सतही पानी, बाढ़ और सूखे के सम्बन्ध में समझ काफी आगे बढ़ी है।

 

वर्ष 2000 का यह बारहवां स्टॉकहोम सम्मेलन एक वक्तव्य के साथ समाप्त हुआ। इस वक्तव्य में जल प्रबंधन के विभिन्न हितधारकों, उनके संगठनों और विभिन्न हितग्राही समूहों द्वारा अनुमोदित सिद्धांत शामिल किए गए हैं। यह वक्तव्य आने वाले जोहान्सबर्ग सम्मेलन के लिये प्रमुख दस्तावेज होगा। सम्मेलन में ग्लोबल वॉटर पार्टनरशिप, इन्टरनेशनल वॉटर एसोसिएशन, इन्टरनेशनल वॉटर रीसोर्सेस एसोसिएशन, स्टेकहोल्डर फोरम, स्टॉकहोम इंटरनेशनल वॉटर इंस्टीट्यूट, वॉटर एन्वायरमेंट फेडरेशन, वर्ल्ड बिजनेस काउंसिल फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट और वर्ल्ड वॉटर काउंसिल जैसे विविध संगठनों ने भाग लिया। जोहान्सबर्ग सम्मेलन में प्रस्तुत करने के लिये चार प्रमुख सिद्धांत निरूपित किए गए-

(1) जल संसाधनों के प्रबंधन में पानी उपयोगकर्ताओं को शामिल किया जाना चाहिए; (2) हमें आर्थिक विकास और पानी के ह्रास के बीच की कड़ी को तोड़ना चाहिए; (3) शहरों के स्थायित्व और सुरक्षा के लिये शहरी पानी सेवाएँ निहायत महत्त्वपूर्ण है; और (4) नीति, नियोजन और क्रियान्वयन को एकीकृत समाधानों की ओर बढ़ना चाहिए। आने वाले दिनों में पानी गहन चर्चा व बहस का मुद्दा रहेगा। अधिकांश विकासशील देशों, खासकर दक्षिण के देशों में पानी की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। राष्ट्र संघ महासचिव कोफी अन्ना ने कहा कि जोहान्सवर्ग शिखर वार्ता में पानी एक प्रमुख मुद्दा होगा। बताया जा रहा है कि पानी व ऊर्जा राष्ट्रपति बुश के अजेंडा में भी काफी ऊपर है। जोहान्सबर्ग में विश्व टिकाऊ विकास शिखर सम्मेलन में जल नीति विशेषज्ञों ने भी जोर दिया था कि पानी 'टिकाऊ विकास की कुंजी है।'

उपरोक्त चार सिद्धांत चार निर्णायक वक्तव्यों पर टिके हैं। ये चार वक्तव्य जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन के लिये प्रमुख संदेश हैं :

1) मीठे पानी की सुरक्षा लगभग उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितना जलवायु परिवर्तन से निपटना। इस वक्तव्य में माना गया है कि मानव जीवन व खुशहाली की कुंजी वर्षा में है। लिहाजा नदी के जलागम क्षेत्र में मीठे पानी के संरक्षण में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। 'ग्रीनवॉटर' उस पानी को कहा गया है जो खाद्यान्न उत्पादन तथा इकोसिस्टम की जरूरतें पूरी करने में खर्च होता है। दूसरी ओर, जल चक्र में शामिल पानी को 'ब्लू वॉटर' की संज्ञा दी गई है। इसमें भूजल व नदी में बहता पानी शामिल है। इन धारणाओं से एकीकृत नदी घाटी विकास को समर्थन मिलता है।

2) कदम उठाने का वक्त आ गया है- इस वक्तव्य में स्पष्ट संदेश है कि पानी का मसला मात्र विशेषज्ञों पर नहीं छोड़ा जा सकता; इसे सबका सरोकार बनाने की जरूरत है। अलबत्ता इस बारे में विचार करने की जरूरत है कि सब लोग इसमें कैसे शामिल होंगे।

3) इस तरह के मामलों में हमेशा संसाधनों की जरूरत होती है ताकि सोच में परिवर्तन आए।

द्वितीय विश्व पानी मंच 2000 के अंतर्गत हुए मंत्री स्तरीय सम्मेलन में विश्व पानी आयोग ने अनुमान लगाया था कि इस प्रक्रिया में शामिल 1.2 अरब लोगों को स्वच्छ पेयजल तथा 2.5 अरब लोगों को शौचालय व्यवस्था उपलब्ध कराने का खर्च 170 अरब डॉलर आएगा। फिलहाल पानी व स्वच्छता पर सालाना 70 अरब डॉलर खर्च किए जाते हैं। अनुमान लगाया गया है कि पानी व स्वच्छ शौचालय सम्बन्धी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये 25 अरब डॉलर का अतिरिक्त निवेश करना होगा। इन संख्याओं का मतलब यह निकलता है कि विभिन्न द्विपक्षीय सहायता संस्थाएं व अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं विकासशील देशों की सरकारों को वित्तीय मदद उपलब्ध कराएँ।

4) और इन तीनों के लिये जरूरी है कि निर्णयकर्ता तत्काल कार्यवाही करें।

जल संकटपानी के अभाव का सामना कर रही आबादी की तादाद सचमुच भयावह है। दुनिया की एक तिहाई आबादी ऐसे देशों में निवास करती है जो पानी संकट का सामना कर रहे हैं और आशंका है कि वर्ष 2025 तक दुनिया की दो तिहाई आबादी इस हाल में होगी। इसका अर्थ यह है कि लगभग 6 अरब लोग पानी के संकट से ग्रस्त होंगे। यदि नीतियां व कार्यक्रम इन 6 अरब शहरी लोगों के हिसाब से बनाए जाते हैं तो 2 अरब ग्रामीण लोगों को इनमें जोड़ना एक प्रमुख मुद्दा होगा। और जब हम 'स्वच्छ पेयजल व शौचालय तक पहुँच के अभाव' की बात करते हैं तो पहुँच को परिभाषित करना एक मुश्किल काम है। खास तौर से दक्षिण व उत्तर के संदर्भों में यह पेचीदा मुद्दा रहेगा। इसी प्रकार से यदि 'पानी उपयोगकर्ता' जल संसाधनों के प्रमुख प्रबंधक होंगे तो सिंचाई व कृषि परिभाषा के कई मुद्दे प्रस्तुत करेंगे।

उत्तर के देशों में टेक्नोलॉजी भी सुविकसित है और 'पानी सम्राट' भी भलीभांति संस्थागत रूप से सुगठित हैं। संरक्षण की प्रणालियाँ तो हैं ही, साथ में स्टॉकहोम जैसे शहर अपनी ऊर्जा का 30-40 प्रतिशत अंश अपशिष्ट पानी से प्राप्त करते हैं। उत्तरी देशों में यह चिंता का विषय हो सकता है कि 80 प्रतिशत मीठा पानी सिंचाई क्षेत्र में खप जाता है। यह खास तौर से इसलिये भी चिंता का विषय है क्योंकि इन देशों में कई जगह खेती बहुत सब्सिडी पर चलती है। दरअसल उत्तरी विश्व एक अलग सामाजिक सांस्कृतिक, राजनैतिक व आर्थिक संदर्भ में रहता है। उत्तर का एक आम शहरी प्रतिदिन 120-130 लीटर पानी का उपयोग करता है।

दक्षिणी देश आज भी विभिन्न टेक्नोलॉजी और जल प्रबंधन व्यवस्थाओं के साथ तर्जुबा कर रहे हैं। आज भी दक्षिण के अधिकांश लोगों के लिये पानी व बिजली दोनों मिल पाना एक सपना ही है। संरक्षण भी चन्द लोगों का ही सरोकार है। एक आम शहरी रोजाना 5-70 लीटर पानी खर्च करता है। दक्षिण देश आज भी उत्तर की खेती पर निर्भर हैं और रुझान ऐसे हैं कि शायद वे सिंचाई के लिये भी उन पर निर्भर हो जाएँगे। जल संसाधन प्रबंधन में नीतिगत परिवर्तन का अर्थ यह भी हो सकता है कि एकीकृत गतिविधियों के मामले में भी दक्षिण देश उत्तर पर निर्भर हो जाएँ।

कुल मिलाकर, यह एक खुला प्रश्न है कि क्या ऐसे सम्मेलन व मंच वर्तमान उत्तर दक्षिण विभाजन को घटाते हैं या खाई को और चौड़ा कर देते हैं। इस लिहाज से देखें तो पानी के उपयोग व प्रबंधन में मत भिन्नता और पारदर्शी होगी तथा स्टॉकहोम पानी सम्मेलन व जोहान्सबर्ग सम्मेलन बढ़ते क्रम में एक वैश्विक प्रक्रिया को वैधता प्रदान करने का काम करेंगे। अभी स्थिति यह है कि उत्तर व दक्षिण में पानी कामकाज दो सर्वथा अलग-अलग दायरों में होता है, फाल्कन मार्क के शब्दों में - 'उत्तर अपनी' 'चाहतों' के लिये योजना बनाता है जबकि दक्षिण अपनी 'जरूरतों पर जोर देता है।' यानी 'शब्दावली' मात्र एक तंत्र है जो एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन के मंत्र को स्थापित करने का काम करेगा। और निजीकरण का जो मॉडल है, उसमें 'सबकी जीत' का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा।
 

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