एक किसान 52 बोरिंग

Submitted by editorial on Sun, 09/30/2018 - 18:23
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लोगों को पीने का पानी ढोकर लाना पड़ता हैलोगों को पीने का पानी ढोकर लाना पड़ता हैयह कहानी एक ऐसे गाँव की है, जहाँ पाँच हजार की आबादी में एक हजार से ज्यादा बोरवेल हैं। अब समय के साथ ये सब सूख चुके हैं। यह उस गाँव के एक किसान की कहानी भी है, जिसने अपने खेतों को पानी देने के लिये सब कुछ दाँव पर लगा दिया लेकिन जितनी ही कोशिश की गई, जमीन का पानी उतना ही गहरा धँस गया।

सारा जमा पूँजी, पत्नी के गहने और तमाम सम्पत्ति बेचकर भी जब खेतों को पानी नहीं मिला तो उसने इस कुचक्र के खिलाफ बोरिंग से ही तौबा कर ली। बड़ी बात यह है कि अब यह किसान पानी बचाने के परम्परागत तरीकों को अपनाकर खेतों को पानीदार बनाने की कोशिश में जुट गया है। यह एक किसान की कहानी है लेकिन अधिकांश किसानों की कहानी भी कमोबेश यही है। वे भी अब लगातार बोरिंग करवाते रहने से कंगाल हो चुके हैं। इस साल इलाके में बहुत कम बोरिंग हुए लेकिन तालाबों की तादाद उतनी ही बढ़ी है।

मध्य प्रदेश के मालवा में देवास जिले के हाटपीपल्या तहसील में एक छोटा-सा गाँव है- नानूखेड़ा। इस गाँव में ही पाँच हजार की आबादी पर एक हजार बोरवेल हैं यानी हर पाँच लोगों पर एक बोरवेल लेकिन फिर भी बूँद-बूँद को मोहताज हैं यहाँ के लोग...एक हजार में से बमुश्किल चार-पाँच बोरवेल ही जिन्दा होंगे और उनकी भी साँसे उखड़ने लगी हैं। जमीन का पानी गहरे और गहरे पाताल में उतर रहा है। खेत-खलिहान सूखे पड़े हैं।

गाँव के कुछ हैण्डपम्प को छोड़ दिया जाये तो बाकी के सैकड़ों बोरवेल किसानों ने अपने खेतों में इस आस में खुदवाए थे कि शायद उनकी किस्मत चेत जाये। हर साल किसान अपनी खेती के मुनाफे या फिर कर्जा लेकर खेतों में बोरवेल कर धरती की छाती को छलनी किये जा रहा है लेकिन 7-7 सौ फीट की गहराई तक भी सिवा धूल के कुछ हासिल नहीं हो रहा है। किसान जुए की तरह साल-दर-साल लाखों रुपए खर्च कर बोरवेल खुदवाए जा रहे हैं और कर्ज तले दबते ही जा रहे हैं।

आनन्दीलाल अपने सूखे बोरिंग दिखाते हुएआनन्दीलाल अपने सूखे बोरिंग दिखाते हुए भूजल भण्डार के नजरिए से यह गाँव डार्क जोन में आता है यानी यहाँ बीते कुछ सालों में बड़ी तेजी से भूजल स्तर गहरा होता गया है। फिलहाल यहाँ का जलस्तर 700 फीट है। कभी यह गाँव दूर-दूर तक फैली हरियाली और लहलहाते खेतों की वजह से पहचाना जाता था। खेत सोना उगलते थे। उपज ऐसी होती थी कि दीवाली से पहले अनाज के कोठार भर जाते थे।

नानूखेडा में करीब 500 किसान परिवार हैं और 50 किसान बड़े आसामी हैं, जिनके पास पचास बीघा तक खेती के लिये जमीनें हैं।

शुरुआत में आर्थिक रूप से सक्षम माने जाने वाले किसानों ने यहाँ ज्यादा-से-ज्यादा पानी उलीचने की होड़ में आज हालात यहाँ तक पहुँचा दिये हैं लेकिन लाखों रुपए का घाटा होने के बाद अब इनकी हालत बहुत पतली हो गई है। ये कर्ज की दलदल में बुरी तरह फँस चुके हैं। बड़े काश्तकार ही नहीं, छोटे और मझौले किसान परिवारों के सामने तो रोजी-रोटी का ही संकट मुँह बाए खड़ा है।

नानूखेड़ा गाँव के ही किसान आनन्दीलाल पाटीदार से मिलिए। ये तीन भाई हैं। तीनों के पास कुल मिलाकर 60 बीघा जमीन है। खेत खाली है, फसलें बर्बाद हो रही हैं क्योंकि खेतों में पानी नहीं है। पानी की कोशिश के लिये 60 बीघा जमीन में बीते कुछ सालों में अब तक 52 बोरवेल खोदे जा चुके हैं।

गाँव की बदनसीबी देखिए कि एक में भी पानी नहीं निकला। एक-एक कर सारे बोर सूखे ही निकले। किसी में पानी निकला भी तो कुछ ही दिनों में बोरवेल सूख गया। पहली फसल से मिलने वाला मुनाफा बोरवेल पर खर्च किया फिर कर्ज लेकर बोरवेल लगाना शुरू किया। अपनी सारी पूँजी, महिलाओं के गहने और बाकी सम्पत्ति बेचने के बावजूद वे अब भी कर्जे में हैं।

52 बोरवेल के अलावा इनके खेत में 6 कुएँ भी हैं लेकिन उनमें भी पानी का दूर-दूर तक नामों निशान नहीं है। एक बोरवेल पर एक-सवा लाख का खर्च होता है जबकि कुएँ पर 4 से 5 लाख रुपए। बीते साल तक खेती में बुरी तरह नुकसान झेलने के बाद आनन्दीलाल पर 15 लाख से ज्यादा का कर्ज है।

आनन्दीलाल ने अब एक संकल्प ले लिया है कि वे किसी भी कीमत पर अपने खेतों में बोरिंग नहीं करवाएँगे। तीस सालों से पानी के लिये सब जतन कर देख लेने के बाद अब उन्होंने तय कर लिया है कि वे परम्परागत रूप से खेती करेंगे और पानी के लिये भी परम्परागत तरीकों पर ही जोर देंगे। वे अपने खेत पर तालाब बनवा रहे हैं। वे बताते हैं कि कुएँ पर उनके बाप-दादा बैलों की चड़स से सिंचाई करते थे और अच्छा उत्पादन होता था।

बिजली के तारों के साथ पानी की पाइप लाइनबिजली के तारों के साथ पानी की पाइप लाइनहमने नादानियाँ की और धन के साथ-साथ भूजल का भी नुकसान कर बैठे। वे गाँव के अन्य ग्रामीणों को भी यह समझाने में सफल रहे हैं कि खेत तालाब और प्राकृतिक संसाधनों से जैविक खेती अब हमारे लिये बहुत जरूरी है। वे खेत के आसपास मेड़बन्दी भी करवा रहे हैं। वे मानते हैं कि एक दो साल मुनाफा कम होगा लेकिन इस तरह हम अगली पीढ़ी के लिये पानी और खेतों की जमीन दोनों बचा सकेंगे।

आनन्दीलाल की तरह अन्य किसानों को भी अब यह बात अच्छे से समझ आने लगी है। कई किसानों ने खेत तालाब बनवाए हैं तो कुछ ने इजरायली तरीके से तालाब बनवा लिये हैं ताकि बारिश के पानी को सहेजा जा सके। लोग अब यहाँ पानी बचाने और सहेजने की हर सम्भव तकनीकों का इस्तेमाल करने लगे हैं। गाँव के पास बहने वाले नाले को भी पाल बाँधकर रोकने की तैयारी चल रही है।

आनन्दीलाल बताते हैं- "ऐसी संरचनाएँ तेजी से कम होती जा रही हैं, जो बारिश के पानी को जमीन में रिसा सके। जब तक पानी भीतर जमीन की रगों तक नहीं पहुँचेगा तब तक लगातार पानी कैसे मिलता रहेगा। यह बैंक खाते से एकतरफा निकासी की तरह है। कुएँ-कुण्डियों और तालाबों से सिंचाई की ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। बारिश का पानी भूजल भण्डार को बढ़ाता है। धीमी बारिश का पानी धरती में रिसता है और नीचे जाकर भूजल स्तर में बढ़ोत्तरी करता है। ऐसा हजारों साल से होता आया है, हम इसी पानी को उलीच रहे हैं। तेज बारिश का पानी व्यर्थ बहता हुआ नदी-नालों में चला जाता है और धरती को उसका कोई लाभ नहीं मिलता। इसलिये पानी को अपने गाँव-खेत के आसपास ठहराने वाली संरचनाएँ विकसित करने की सबसे बड़ी जरूरत है ताकि पानी दौड़कर न चला जाये।"

हाटपीपल्या और उसके आसपास बसे 75 गाँवों की भी कमोबेश यही स्थिति है। हर गाँव में पहले से ही दो-तीन सौ बोरवेल हैं और बीते पाँच सालों में इनकी तादाद तेजी से बढ़ी है। पहले यहाँ गेहूँ-चना की फसलें हुआ करती थीं, जिनमें पानी की आवश्यकता भी कम हुआ करती थी लेकिन कुछ सालों से यहाँ के किसान महंगे दामों के लालच में लहसुन-प्याज और आलू के उत्पादन पर जोर देने लगे।

इन फसलों के लिये बहुत अधिक पानी की जरूरत होती है और इसी वजह से यह हालात बने। धड़ाधड़ बोरिंग हुए और पानी नीचे उतरता चला गया। इस इलाके में कई गाँवों का भूजल भण्डार इसी तरह पाताल में धँसता जा रहा है। ये गाँव बीते पाँच सालों से पानी के संकट से रूबरू हो रहे हैं। भूजल स्तर लगातार कम होते जाने से नलकूपों में पानी खत्म होता जा रहा है और किसान एक के बाद एक बोरिंग कराते हुए तंग हुए जा रहे हैं। बीते तीन साल में ही इन गाँवों में साढ़े चार हजार से ज्यादा बोरवेल सूख चुके हैं।

साल-दर-साल जिले में बारिश लगातार कम होने से हालात और भी भयावह हो गए हैं। बीते पाँच सालों में यहाँ कभी पर्याप्त बारिश नहीं हुई। इस साल भी सितम्बर 2018 तक बारिश अपने औसत आँकड़े 40 इंच के मुकाबले 22 इंच को भी नहीं छू सकी है। इस पूरे साल में तालाब, कुएँ-कुण्डियाँ, नदियाँ और नाले छलके नहीं हैं।

बारिश के मौसम में भी तापमान का पारा गर्मियों की तरह तपा रहा है। पानी की कमी से फसलें नष्ट हो गई हैं। लेकिन भूजल भण्डार के कम होने का कारण महज बारिश का कम होना नहीं है। बड़ा कारण तो यह है कि यहाँ खेती के लिये बोरवेल को ही एकमात्र साधन मान लिया गया है। परम्परागत कुएँ-कुण्डियों, तालाबों और नदी-नालों को खत्म कर धरती के पानी की लूट मच गई और यही बड़ी वजह है कि धरती का पानी भी अब यहाँ खत्म होने की कगार तक पहुँच गया है।

अब आपको मिलाते हैं नानूखेड़ा के एक और किसान मुकेश पाटीदार से। मुकेश के पास 12 बीघा जमीन है। बारिश के दो महीने बाद से ही पानी की समस्या खड़ी हो जाती है। 12 बीघा जमीन में बीते कुछ सालों में ही चार बोरवेल कराए लेकिन एक भी सक्सेस नहीं हुआ। खेती से मुनाफा तो दूर अब तो उल्टे कर्ज में डूबते जा रहे हैं। मुकेश पर करीब 4 लाख रुपए का कर्ज है। चिन्ता इस बात की है कि खेती से कैसे मुनाफा कमाएँ और कैसे अब यह कर्ज चुकाएँगे।

गाँव के गणेश पाटीदार बताते हैं- "10 साल पहले गाँव में 45 से 100 फीट की गहराई में अच्छा पानी निकल आता था लेकिन अब यहाँ 700 फीट की गहराई तक भी पानी का पता नहीं है। पाँच हजार की आबादी वाले इस गाँव में कम-से-कम एक हजार बोरवेल हैं और चार-पाँच को छोड दो तो सब सूखे पड़े हैं। गाँव में पीने तक का पानी नहीं बचा है।"

पत्रकार नाथूसिंह सैन्धव बताते हैं- "यह किसानों के खिलाफ एक बड़ा कुचक्र है, जिसमें उन्हें पानी का सपना दिखाकर कंगाल बनाया जा रहा है। बाहर से बोरिंग करने आने वाले व्यापारियों ने गाँव-गाँव में अपने दलाल बना लिये हैं। वे किसानों को पानी का झूठा सपना दिखाकर खेत पर बोरिंग कराने के लिये उकसाते हैं और धरती तथा किसान दोनों का ही सीना छलनी कर देते हैं। अमूमन 70 से 80 रुपए प्रति फीट के मान से एक बोरिंग करीब तीस से पैंतीस हजार का पड़ता है और किसान कई बार एक जगह पानी नहीं आने पर दो से तीन जगह करवाता है यानी एक बार में एक लाख का फटका। कई किसानों को तो कर्ज की दलदल में फँसकर जमीन से ही हाथ धोना पड़ गया। बोरिंग का कर्ज उतारने के लिये अन्ततः जमीन बेच देनी पड़ती है। कहीं-कहीं तो एक हजार फीट तक बोरिंग कराया जा रहा है।"

स्थानीय निवासी हरिसिंह बताते हैं- "नानूखेड़ा गाँव के कुएँ-कुंडी, हैण्डपम्प सब कुछ सूख चुके हैं। अभी तो गर्मी का मौसम शुरू ही नहीं हुआ है। गाँव में कोसों दूर से लोगों को पीने के पानी का जुगाड़ करना पड़ रहा है। गाँव में रसूखदार लोगों ने बिजली के खम्भों पर बिजली लाइन की तरह समानान्तर पानी के लिये मोटी-मोटी पाइप की लाइन कई-कई हजार फीट दूर से डाल ली है लेकिन बाकी लोगों को साइकिल, बैलगाड़ी, मोटर साइकिल और पैदल चलकर पीने का पानी जुटाना पड़ता है। हालत यह है कि बाहर से आने वाले लोगों को पिलाने के लिये पानी तक नहीं है।”

खेत तालाब से नानूखेड़ा पानीदार हो रहा हैखेत तालाब से नानूखेड़ा पानीदार हो रहा है इधर के सालों में हम भूजल का दोहन इतनी तेजी से करने लगे हैं कि भूजल भण्डार कई जगह खत्म होने की कगार पर आ चुके हैं। केन्द्रीय भूजल बोर्ड की ताजा रिपोर्ट में भी इस पर चिन्ता जताई गई है। सत्तर के दशक के बाद सिंचाई के लिये हमने दुर्भाग्य से भूजल के इस्तेमाल को ही एकमात्र संसाधन मान लिया है।

हमारे यहाँ 90 फीसदी तक सिंचाई भूजल से ही की जा रही है। हम इस मामले में दुनिया के कई देशों से आगे निकल चुके हैं। हम हर साल भूजल भण्डार से 231 बीसीएम पानी उलीचते हैं। पानी की यह मात्रा बहुत ज्यादा है। हम बड़ी तादाद में हजारों साल से इकट्ठा पानी को निकाल तो रहे हैं लेकिन कभी भी पुनर्भण्डारण के बारे में नहीं सोचते।

मध्य प्रदेश का मालवा कभी पग-पग रोटी, डग-डग नीर के लिये मशहूर था लेकिन आज पानी की बूँद-बूँद से लोग यहाँ मोहताज हो रहे हैं। भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। नदी-नाले, तालाब खत्म होते जा रहे हैं। जल्द ही पानी के प्रबन्धन पर गम्भीरता से नहीं सोचा गया तो यहाँ हालात विकराल हो सकते हैं।

 

 

 

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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