किसान असन्तोष की जड़ में पूँजीवादी व्यवस्था

Submitted by editorial on Tue, 12/11/2018 - 13:12
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 08 दिसम्बर, 2018


संकट में किसानसंकट में किसानमोदी सरकार के नुमाइन्दे बार-बार अहसास कराने का प्रयास कर रहे हैं कि किसान उनकी प्राथमिकता में हैं। सही है कि मोदी सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के लक्ष्य को लेकर चल रही है, इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये बनाई गई रणनीति के क्रियान्वयन में सक्रियता भी दिखाई पड़ रही है। कृषि मंत्रालय का बजटीय आवंटन बढ़ाया गया है। मनमोहन सरकार की तुलना में यह ज्यादा है। सरकार ने मनमोहन सरकार के समय से ठंडे बस्ते में पड़ी बहुप्रतीक्षित स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू कर दिया है। यूरिया की उपलब्धता बढ़ी है, सिंचाई क्षमता के विस्तार, पशु पालन एवं मछली पालन जैसे सहायक क्षेत्रों पर जोर है। यही नहीं, सड़क-बिजली की बढ़ती उपलब्धता भी गाँव-किसान के विकास में सहायक होगी।

इसके बावजूद कृषि की वृद्धि दर कोई उत्साहजनक तस्वीर पेश नहीं कर रही है। सरकार की तमाम सदाशयता के बावजूद कोई गारंटी नहीं है कि किसानों की आय 2022 तक दोगुनी हो जाएगी। वर्तमान का यथार्थ तो यही है कि किसान खुश नहीं हैं। लेकिन किसानों की आय कुछ बढ़ भी जाए तो क्या उनकी आत्महत्या रुक जाएगी? क्या आय और खुशहाली का कोई अनिवार्य सम्बन्ध है?

मसला किसान की खुशहाली का है

सही है कि विरासत में मिली समस्या का समाधान महज पाँच वर्ष में करना किसी भी सरकार के लिये लगभग असम्भव है, लेकिन इसके लिये इतिहास की आड़ लेना भी उचित नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लगता है कि सरदार वल्लभभाई पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो किसान तबाह नहीं होते। लेकिन इतिहास परिकल्पनाओं से नहीं चलता यानी ऐसा होता, तो वैसा नहीं होता, इस आधार पर ऐतिहासिक घटनाओं का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। क्या गारंटी है कि पटेल होते तो किसानों के प्रति सरकार की नीतियाँ कुछ और होतीं? इसी तरह का सवाल मोदी सरकार की नीतियों पर है।

यहाँ सवाल कृषि के विकास या कृषि उत्पादन के बढ़ने का उतना नहीं है, जितना किसानों की खुशहाली का है। कृषि उत्पादन बढ़ना किसानों की खुशहाली का अनिवार्य प्रतीक नहीं हो सकता। कृषि उत्पादन बढ़ने के बावजूद अगर किसान, किसान नहीं रह सके और अपने ही खेत में या किसी उद्योगपति के कारखाने में मजदूर बन जाए तो क्या वह खुश रह पाएगा? इसलिये सवाल है कि विकास के जिस पूँजीवादी मॉडल के तहत मोदी सरकार काम कर रही है, क्या उसमें किसान खुश रह पाएँगे?

सत्तर के दशक में बताया जाता था कि किसान कर्ज में पैदा होता था, उसी में जीता था, और उसी में मर जाता था। लेकिन उस समय नहीं बताया जाता था कि वह आत्महत्या कर लेता था। कारण था कि मृत्यु दर ज्यादा होने के बावजूद वे आत्महत्या बहुत कम करते थे। अस्सी के दशक के खत्म होते-होते कहानी कुछ बदलने लगी थी। किसानों की आत्महत्या की बात सार्वजनिक तौर पर सामने आने लगी। वर्ष 1991 में नई आर्थिक नीति आने के बाद इसमें तेज वृद्धि हुई, फिर भी यही कहा जाता रहा कि किसानों की आत्महत्या का कारण गरीबी है। तो फिर कभी कर्ज में जीने वाला किसान इसी तरह आत्महत्या क्यों नहीं करता था? गरीबी ही प्रमुख कारण था तो इस तर्कशास्त्र के अनुसार पहले भी आत्महत्या इसी पैमाने पर होनी चाहिए थी यानी इस बीच कुछ तो नया हुआ होगा, जिसके चलते किसान आत्महत्या करने लगे? आखिर, इस बीच क्या बदलाव हुआ?

दरअसल, इस समय सामन्तवाद से पूँजीवाद में संक्रमण तेज हो चुका था। ध्यान देने की बात है कि महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे अपेक्षाकृत सम्पन्न राज्यों में ही आत्महत्या की घटनाएँ ज्यादा हुईं। बिहार जैसे पिछड़े राज्य इस लिहाज से पीछे ही रहे। प्रतीत होता है कि इसका सम्बन्ध पूँजीवादी व्यवस्था से है, जिसने न केवल उत्पादन के तरीकों और सम्बन्धों को बदला, बल्कि पूरे सामाजिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित किया। इस व्यवस्था में किसानों का बाजार से जुड़ाव बढ़ा तो जमीनी धरातल पर कई तरह के बदलाव हुए। हल-बैल की जगह ट्रैक्टर आ गया, मालिक-मजदूर का रिश्ता पहले की तरह नहीं रहा, छोटे किसानों की तरह बड़े किसान भी बँटाईदारी करने लगे। इस व्यवस्था ने भौतिक अपेक्षाएँ बढ़ाईं। अगर इनकी पूर्ति न हो तो कुंठा बढ़ना स्वाभाविक है। दूसरी ओर, इस पूरी प्रक्रिया में सामाजिक मेल-मिलाप और भाईचारा के लिये जगह घटती गई।

सामन्ती समाज में भेदभाव और दमन होता था, लेकिन उसमें भाईचारा दिखता था, वह विपदा में मरहम-पट्टी भी करता था। सामाजिक मनोविज्ञान की दृष्टि से गाँवों पर पूँजीवाद के प्रभाव का समुचित मूल्यांकन होना अभी बाकी है, लेकिन अब तक के अनुभव से यही प्रतीत होता है कि यह सामन्तवाद से भी ज्यादा क्रूर है। अन्तर इतना होता है कि एक सामन्त मूर्त रूप में दिखाई पड़ता है, लेकिन पूँजीवाद किसी मूर्त रूप में नहीं दिखाई पड़ता। इसलिये गाँव और किसान पर इसके दुष्प्रभाव का ठीक तरह से आकलन नहीं किया जा सका है।

असन्तोष का समाधान कब?

आर्थिक विकास के आँकड़े ही किसानों की खुशहाली के परिचायक हैं, तो साम्यवाद को तिलांजलि देकर पूँजीवाद को अपना चुके चीन में किसानों को आत्महत्या नहीं करनी चाहिए। इसलिये भारत में किसानों के असन्तोष का समाधान तभी हो सकता है, जब बेलगाम पूँजीवाद पर नकेल कसी जाए। इसका कारण मोदी सरकार नहीं है, अतीत की देन है। ऐसे में मोदी सरकार के लिये सम्भव नहीं है कि विकास की इस राह को पलट दे, वह इसके दायरे में रहकर ही कृषक समस्या का समाधान खोज रही है। इसकी कुछ विसंगतियाँ सामने आ भी रही हैं। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में किसानों को कम, निजी बीमा कम्पनियों को ज्यादा फायदा हो रहा है। हालांकि मोदी सरकार ने इसमें कुछ सकारात्मक बदलाव किए हैं, लेकिन बुनियादी समस्या पूर्व की मनमोहन सरकार की भाँति अब भी बरकरार है। इसी प्रकार किसानों को व्यापक पैमाने पर बाजार से जोड़ने की रणनीति तभी उनके लिये फायदेमन्द हो सकती है, जब उसकी अनिश्चितताओं से उनकी रक्षा की व्यवस्था हो।

कांट्रैक्ट फार्मिंंग तभी किसानों के लिये सुरक्षित होगी जब कम्पनियों से टकराव की हालत में उनके पक्ष में उपयुक्त कानूनी प्रावधान हों। विकास का यह मॉडल ठीक तरीके से काम करता है, तो किसानों का ही नहीं, सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था का भला होगा। इससे सरकार कृषि पर आश्रित आबादी को घटाने की अपनी रणनीति में भी सफल हो जाएगी। लेकिन वह तभी सफल मानी जाएगी, जब विनिर्माण या सेवा क्षेत्र में प्रवेश करने पर वे समुचित कमाई कर सकें। ऐसा नहीं होगा तो यह किसानों के साथ दोहरा अन्याय होगा। एक तरफ वे गरीबी में जीने के लिये अभिशप्त रहेंगे तो दूसरी तरफ कम संख्या हो जाने के कारण सरकारें आसानी से उनकी आवाज अनसुनी कर देंगी। तब यह कॉर्पोरेट जगत के लिये फायदेमन्द माना जाएगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

 

 

 

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