जलग्रहण विकास - दक्षता, वृद्धि, प्रशिक्षण एवं सामुदायिक संगठन

Submitted by editorial on Sun, 09/02/2018 - 18:02
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वर्धमान महावीर ओपन विश्वविद्यालय, कोटा, अप्रैल 2010

पारंपरिक जल संग्रहण संरचना8.1 प्रस्तावना (Introduction) पूर्व के अध्याय में यह विस्तार से बताया गया है कि जलग्रहण परियोजना की स्वीकृति पश्चात विभिन्न स्तरों पर किस-किस प्रकार की संस्थागत व्यवस्थाएँ की जाती है, जिसमें जलग्रहण विकास दल का गठन, विभिन्न समितियों का गठन, पंजीकरण, उपभोक्ता एवं स्वयं सहायता समूहों का गठन कार्यकर्ताओं की पहचान इत्यादि शामिल होता है। संस्थागत व्यवस्थाओं की प्रक्रिया पूर्ण होने के उपरांत यह आवश्यक होता है कि विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन राष्ट्रीय स्तर से लेकर जलग्रहण स्तर तक किया जाए तथा विभिन्न कार्यक्रम क्रियान्वयन कर्ताओं/लाभार्थियों का ज्ञानवर्द्धन, आमुखीकरण के साथ-साथ कार्यक्रम क्रियान्वयन के संबंध में वास्तविक दक्षता वृद्धि की जाए जिससे कि जलग्रहण कार्यक्रम में प्रवेश से लेकर अंतिम निकास तक समस्त गतिविधियाँ सुचारू रूप से तकनीकी मापदण्डों के अनुरूप तथा स्थानीय जन सहभागिता के सहयोग से सम्पन्न की जा सके। इससे बेहतर परिणाम हासिल हो सकेंगे।


जलग्रहण पद्धति पर आधारित विकास अब कोई नया विषय नहीं रह गया है। देशभर में जनजाग्रति विकसित हो चुकी है एवं विभिन्न प्रकार के राजकीय/गैर राजकीय संस्थानों के माध्यम से व्यवस्थित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कराए जाते हैं। इसके अतिरिक्त जलग्रहण क्षेत्र के क्रियान्वयनकर्ताओं एवं लाभार्थियों का राज्य के बाहर एवं भीतर अन्य उत्कृष्ट जलग्रहण क्षेत्रों में शैक्षणिक भ्रमण भी वहाँ किए गए कार्यों से लाभ लेने, उसे अपने क्षेत्र में अपनाने के उद्देश्य से महत्त्वपूर्ण होता है। ऐसे शैक्षणिक भ्रमण कार्यक्रम प्रत्येक वर्ष जलग्रहण क्षेत्र में आयोजित कराए जाते हैं।

भारत सरकार द्वारा जारी नई काॅमन मार्गदर्शिका में संस्थागत व्यवस्था निर्माण एवं क्षमता वृद्धि पर विशेष जोर दिया गया है। इस हेतु 5 प्रतिशत धनराशि आरक्षित की गई है तथा उत्कृष्ट स्वयंसेवी संस्था एवं गैर सरकारी संस्थाओं के सहयोग से विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण एवं क्षमता वृद्धि कार्यक्रम आयोजित करने पर बल दिया है।

प्रशिक्षण कार्यक्रमों हेतु समयावधि निर्धारित करने, शैक्षणिक सामग्री तैयार करने, विभिन्न विधाओं को अपनाने में गम्भीर प्रयास किए जाने जरूरी हैं। इसके अतिरिक्त प्रशिक्षणार्थियों से नियमित फीडबैक एवं पुनर्रावलोकन के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि प्रशिक्षण कार्यक्रमों से वास्तव में दक्षता वृद्धि हुई है एवं पर्याप्त वांछित संदर्भ सामग्री, सरल भाषा में प्रशिक्षणार्थियों को उपलब्ध है। इस अध्याय में हम विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों के संबंध में अध्ययन करेंगे।

8.2 क्षमता निर्माण (केपेसिटी बिल्डिंग Capacity Building)
कर्मियों की श्रेणियाँ


जलग्रहण कार्यक्रम से संबंध कर्मियों को श्रेणियाँ तीन प्रकार की हैं अर्थात (i) प्रशासन एवं प्रबंधक (ii) क्रियान्वयन कर्ता तथा (iii) प्रशिक्षण

ये कर्मी विभिन्न स्तरों जैसे राष्ट्रीय, राज्य, जिला और माइक्रो वाटरशेड पर पदस्थापित होते हैं और कार्य करते हैं।

(I) प्रशासक एवं प्रबंधक वर्ग में विभिन्न संगठनों के अधिकारी जैसे राष्ट्रीय स्तर पर कृषि मंत्रालय/ग्रामीण विकास मंत्रालय, राज्य स्तर पर कृषि विभाग मृदा एवं जल संरक्षण विभाग आदि और जिलास्तर पर जिला नोडल एजेंसी के प्रमुख परियोजना क्रियान्वयन संस्था के रूप में पंचायत समिति के प्रमुख तथा जलग्रहण स्तर पर पंजीकृत जलग्रहण संस्थाओं/ग्राम पंचायत के प्रमुख सम्मिलित होते हैं।

(ii) क्रियान्वयनकर्ता में संबंधित परियोजना क्रियान्वयन संस्था के स्तर पर उपलब्ध जलग्रहण विकास दल के चारों सदस्य पंजीकृत समितियों के पदाधिकारी तथा जलग्रहण स्तर पर पैरा प्रोफेशनल्स क्या माइक्रो वाटरशेड के भू-मालिक और भूमिहीन परिवारों के अन्य सहभागी सदस्य भी सम्मिलित होते हैं।

(iii) प्रशिक्षण इसमें सार्वजनिक एवं एनजीओ-सेक्टर के चयनित प्रशिक्षण संगठन के विद्यमान संकाय सदस्य क्या बाह्य स्रोतों से आए पार्ट टाइम व्यक्ति जिन्हें कि उपर्युक्त संगठनों की सहायता के लिये प्रदक्षिणा के रूप में (आवश्यकतानुसार) चयनित किया गया है सम्मिलित होते हैं।

8.2.1 विभिन्न कर्मियों के लिये पाठ्यक्रमः
पृथक-पृथक कार्यों को निष्पादित करने तथा उत्तरदायित्व के निर्वहन के लिये विभिन्न श्रेणियों के कर्मियों की आवश्यकता होगी ये कार्य प्रथम चरण की जलग्रहण परियोजना में उनकी भूमिका से पृथक हो सकते हैं। कुछ कार्यकर्ताओं को प्रौद्योगिकी मुद्दों पर क्या कुछ को प्रबंधन और सामाजिक पहलुओं पर प्रशिक्षण को आवश्यकता होगी। फिर भी अन्य को केवल लघु अवधि के आमुखीकरण (ओरिएनटेशन) पाठ्क्रमों द्वारा प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा सकता है जबकि अन्य को माध्यम से दीर्घ कालीन प्रशिक्षण द्वारा अपनी योग्यता बढ़ाने की आवश्यकता होगी। विभिन्न श्रेणियों के कर्मियों की क्षमता निर्माण में सम्मिलित किए गए मदों की एक उदाहरणार्थ सूची में देखी जा सकती है।

लघु एवं दीर्घावधि हेतु प्रशिक्षण हेतु योजना की तैयारी लागत प्रभावी (कोस्ट इफेक्टिव) प्रशिक्षण योजना तैयार करने हेतु विस्तृत कार्यक्रम में निम्नलिखित तीन चरणों में यात्रा समय सहभागिता के स्तर, सक्षम प्रशिक्षण संगठनों की उपलब्धता आदि की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विभाजित किया जाएगा।

चरण-1 (राष्ट्र एवं राज्य स्तरीय सहभागियों का आमुखीकरण एवं प्रशिक्षण)
इस चरण के अंतर्गत दो प्रकार के पाठ्यक्रमों की व्यवस्था की जाती है। (i) राष्ट्र एवं राज्य स्तर के नोडल अधिकारियों के लिये लघु अवधि के आमुखीकरण पाठ्यक्रम और (ii) आंतरिक और बाहरी प्रशिक्षकों की कुशलता को बढ़ाने हेतु दीर्घावधि का पाठ्यक्रम। इस चरण के अंतर्गत प्रशिक्षण पाठ्यक्रम क्षेत्रीय एवं राज्य स्तर की अनुभवी प्रशिक्षण संस्थाओं द्वारा विकेन्द्रीकृत आधार पर चलाए जाते हैं जबकि उपर्युक्त प्रशिक्षण संस्थाओं की पहचान करने में प्राथमिकता उन्हें दी जाती है जिन्हें ऐसे प्रशिक्षण चलाने का अपेक्षित अनुभव हो। ये संगठन सरकारी क्षेत्र अथवा गैर सरकारी क्षेत्र से संबंधित हो सकते हैं।

चरण-2 (जिला स्तर के सहभागियों का आमुखीकरण और प्रशिक्षण):
इस चरण के अंतर्गत लघु अवधि के आमुखीकरण पाठ्यक्रमों में भाग लेने वाले निम्न में हो सकते हैंः जिला स्तर के कृषि विभाग मृदा एवं जल संरक्षण विभाग के नोडल प्राधिकारी संबंधित माइक्रो वाटरशेड के चयनित परियोजना क्रियान्वयन संस्था के प्रमुख। कुशलता बढ़ाने वाले पाठ्यक्रमों में भाग लेने वाले सहभागी प्रत्येक परियोजना क्रियान्वयन संस्था के जलग्रहण विकास दल के सदस्यों में से लिये जाते हैं। परियोजना के अंतर्गत लाए गए राज्य स्तर क्षेत्रीय स्तर के प्रशिक्षण संस्थान अथवा स्वायत्तशासी संगठनों द्वारा ये पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं। जहाँ कहीं आवश्यकता हो ये संगठन इस प्रयोजन हेतु बाह्य व्यक्तियों (रिसोर्स पर्सन) की सहायता भी प्राप्त कर सकते।

चरण-3 (जलग्रहण स्तर के सहभागियों का आमुखीकरण तथा प्रशिक्षण):
इस चरण में माइक्रो वाटरशेड स्तर पर परियोजना के अंतर्गत लाई गई पंजीकृत समितियों के मानक पदाधिकारियों के लिये लघु अवधि के आमुखीकरण पाठ्यक्रम आयोजित किए जाएँगे। व्यवसाय संबंधी कुशलता को बढ़ावा देने के लिये दीर्घावधि पाठ्यक्रमों का आयोजन उपर्युक्त समितियों के वैतनिक सदस्यों (पेड मेम्बर्स) के लिये व उसी ग्राम या समीप के गाँव के पैरा प्रोफेशनल्स के लिये किया जा सकता है। (जलग्रहण समिति के सचिव तथा कार्यकर्ता (जलग्रहण समिति) स्वयं सहायता समूहों (एस.एच.जी.) के बुक कीपर उपभोक्ता समूह (यू.जी.) इत्यादि वैतनिक। जलग्रहण समिति के सदस्यों के प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रबंधन पहलुओं पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए जिसमें लेखों का संधारण इत्यादि पर प्रशिक्षण भी सम्मिलित होता है जबकि पैरा प्रोफेशनल्स के प्रशिक्षण कार्यक्रम में तकनीकी पहलुओं पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

समय व संसाधनों की बचत करने के उद्देश्य से ऐसे व्यक्तियों हेतु प्रशिक्षणों का संचालन डब्ल्यू.डी.टी. द्वारा माइक्रो वाटरशेड स्तर पर किया जा सकता है। तात्कालिक आवश्यकता को देखते हुए ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम एक बार में एक अथवा दो दिन के लिये आयोजित किए जाएँगे। डब्ल्यू .डी.टी. के मार्गदर्शन में जहाँ प्रशिक्षणार्थी व्यवसाय विशिष्ट में नई कुशलताओं का प्रयोग करते हैं। उन्हें उस अवधि में अधिक ज्ञान प्राप्त हो सकेगा इस चरण के अंतर्गत डब्ल्यू डी.टी. की आवश्यकता आधारित सहायता से यथासम्भव पैरा प्रोफेशनल्स द्वारा सामान्य समुदाय के सदस्यों के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।

विभिन्न श्रेणियों के कर्मियों की कार्य क्षमता बढ़ाने के लिये विस्तृत समयबद्ध कार्य योजना, गतिविधियों के क्रम और प्रशिक्षण संगठनों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए तैयार की जाएगी। ऐसी योजनाएँ प्रत्येक जिला नोडल एजेंसी द्वारा दीर्घावधि तथा वार्षिक आधार पर तैयार की जाएगी। इसके पश्चात राज्य नोडल एजेंसी द्वारा इन योजनाओं को इकजाई (इकट्ठा) किया जाना चाहिए ताकि चयनित प्रशिक्षण संस्थाओं से परामर्श में समन्वय व सरलीकरण स्थापित किया जा सके।

8.2.2 मुख्य क्रियान्वयन चरण से क्षमता निर्माण (केपेसिटी बिल्डिंग) चरण का पृथक्करणः (Separation of Capacity Building stage from main implementation stage)
यह गंभीरता से महसूस किया जा रहा है कि परियोजनाओं के प्रारंभिक स्तर - पर कुछ सप्ताहों का प्रशिक्षण निवेश पी.आई.ए. की क्षमता निर्माण के लिये और समुदाय को जलग्रहण कार्यक्रम में सहभागी प्रबंधन के लिये तैयार करने हेतु पर्याप्त नहीं है। क्षेत्र आधारित अनुभवों से प्रदर्शित होता है कि विशेषतः डब्ल्यू.डी.टी. जलग्रहण सचिव, कार्यकर्ता, समुदाय संगठनकर्ता आदि के प्रशिक्षण निवेश में ना केवल संरचनात्मक पाठ्यक्रमों के माध्यम से कुशलता प्राप्त करना ही सीखना चाहिए बल्कि कुशलता को दर्शाने के लिये नियमित ध्यान देना चाहिये। इसके लिये प्रशिक्षकों व प्रशिक्षणार्थियों का लम्बे समय तक साथ रहना आवश्यक है।

इस अवधि के दौरान भौतिक एवं वित्तीय प्रगति पारंपरिक दृष्टि से धीमी हो सकती है, जिससे क्रियान्वयन संस्थाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। अतः मुख्य क्रियान्वयन चरण को क्षमता निर्माण (केपेसिटी बिल्डिंग) चरण से पृथक किया जाना आवश्यक है ताकि उनकी प्रगति का मूल्यांकन विशिष्ट मानदण्डों के आधार पर किया जा सके। प्रायोगिक दृष्टि से यह आवश्यक है कि प्रत्येक जलग्रहण क्षेत्र हेतु पूर्णकालिक परियोजना अवधि हेतु अनुमानित प्रशिक्षण कलेंडर तथा प्रत्येक वर्ष हेतु वास्तविक वार्षिक कलेंडर विभिन्न प्रशिक्षण संस्थानों से परामर्श उपरांत जलग्रहण विकास दल द्वारा स्थानीय जनता की मांग, आवश्यकता के हिसाब से तैयार किया जाना चाहिए। वास्तविक रूप से प्रशिक्षण कलेंडर तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि विभिन्न वर्षों में इस मद में कितनी-कितनी राशि अपलब्ध हो सकती है।

क्षमता निर्माण चरण, जिसे कि लगभग एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, इस अवधि के दौरान पी.आई.ए/डब्ल्यू.डी.टी. निम्नलिखित गतिविधियों के ग्राम स्तर पर क्रियान्वयन हेतु सहयोग प्रदान करें। जलग्रहण समुदाय का प्रस्तावित रणनीति और एप्रोच जलग्रहण समिति के पदाधिकारी की कुशलता बढ़ाने तथा अन्य संबंधित व्यक्तियों द्वारा बचत एवं मितव्ययी समूहों में समुदाय संगठन, पी.आर.ए. ए.टूल्स का प्रयोग कर कार्य योजना बनाने, अभिलेख रखने तथा क्रियान्वयन दौरान कार्यों की गुणवत्ता के पर्यवेक्षण आदि हेतु आमुखीकरण दिया जाना। डब्ल्यू.डी.टी., कार्य पदाधिकारी और समुदाय संगठनकर्ता द्वारा उपर्युक्त कौशल का उपयोग कर कम से कम एस.एच.जी. /यू.जी. समूहों को संचालित करने, परियोजना अवधि के लिये जलग्रहण क्षेत्र का रणनीतिक (स्टेटिजिक) प्लान तैयार करने, क्षमता निर्माण चरण के दौरान क्रियान्वित किए जाने वाले जलग्रहण क्षेत्र के भाग हेतु विस्तृत कार्य योजना तैयार करने (जिसमें एक निकास नाली एवं निकास नाली से संबद्ध निजी भूमि में लगभग 25 से 30 हेक्टेयर क्षेत्र, एक या दो वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर्स, सामुदायिक भूमि में सोशल फैन्सिंग द्वारा वनस्पतियों की प्राकृतिक रूप में पुनर्उत्पत्ति आदि सम्मिलित हो सकती है। उपर्युक्त कार्य योजना का क्रियान्वयन, कार्यक्रम का सहभागिता आधारित मूल्यांकन का कार्य किया जाना चाहिए।

उपर्युक्त चरण की समाप्ति के बाद पी.आई.ए./डब्ल्यू.डी.टी. की क्षमता, जलग्रहण समुदाय की तैयारी का सूक्ष्म आकलन, डी डल्ब्यू.सी. द्वारा चयनित अन्तः समवर्गी दल द्वारा किया जाएगा। पी.आई.ए./जलग्रहण समुदाय का निष्पादन संतोषजनक न होने की स्थिति में डी. डब्ल्यू. सी. द्वारा पी/आई.ए. जलग्रहण समुदाय का निष्पादन संतोषजनक नहीं होने की स्थिति में डी डब्ल्यू.सी. द्वारा पी. आई.ए. अथवा जलग्रहण समुदाय को अयोग्य घोषित किया जा सकता है अथवा एक और अवसर देने का निर्णय लिया जा सकता है।

8.2.3 प्रशिक्षण संस्थाओं की पहचान
एक राज्य से दूसरे राज्य में कार्यक्रम के आकार में अंतर होता है। लगभग 9 से 10 राज्यों, जिनका अधिकांश भाग बारानी है, उन्हें उन राज्यों में बारानी क्षेत्र कम है, की तुलना में अधिक मात्रा में कार्यक्रम निधि प्राप्त होती है। अतः राज्य स्तर पर ही नोडल विभाग द्वारा विभिन्न राज्य स्तरीय प्रशिक्षण संस्थानों की पहचान की फिर जाकर उनके अधिकारियों का आमुखीकरण एवं दक्षता वृद्धि राष्ट्रीय स्तर पर की जाएँ। इसके उपरांत राज्य स्तर, जिलास्तर एवं ब्लाॅक स्तर पर आयोजित होने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों के रूपरेखा तैयार की जाएँ। प्रशिक्षण संस्थानों का चयन करते समय उनके पूर्व के अनुभवों का ज्ञान एवं विश्लेषण आवश्यकता होता है। प्रत्येक राज्य अथवा राज्यों के समूह अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये स्वयं प्रशिक्षण संगठनों की पहचान कर सकते हैं। इसमें राष्ट्रीय संस्थान जैसे राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रबंधन संस्थान (मैनेज), राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान (एन.आई.आर.डी.) केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी), केन्द्रीय मृदा एवं जल संरक्षण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (सी.एस डब्ल्यू.सी.आरटी.आई.) एवं इसके क्षेत्रीय केंद्र, केंद्रीय शुष्क क्षेत्र (ड्राइलेंड) अनुसंधान संस्थान (सी.आर.आईडी.ए.) इंदिरा गांधी ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान आदि सम्मिलित हैं।

प्रशिक्षण संस्थानों को राज्यों, जिनमें कि वृहद आकार के कार्यक्रम चल रहे हैं, उनमें उन राज्यों जिनमें कि कार्यक्रम का आकार छोटा है तथा विभिन्न समूहों को एक साथ समूह बनाकर (उनकी निकटता पर निर्भर रहते हुए) चलाए जाना है, की तुलना में अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है, ताकि प्रत्येक पाठ्यक्रम में पर्याप्त संख्या में सहभागी उपलब्ध हो सके। प्रत्येक राज्य/राज्यों के समूह को तीन प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी। जैसे (i) तकनीकी प्रशिक्षण, (ii) सहभागिता प्रबंधन प्रशिक्षण, (iii) लेखा संबंधी पहलुओं जैसे अभिलेखों, लेखों, अंकेक्षण प्रकरणों आदि का संधारण।

प्रत्येक वर्ष के दौरान प्रशिक्षण घटकों के अंतर्गत पूर्व की वरसा जन सहभागिता एवं हरियाली मार्गदर्शिका के अनुसार जारी की जाने वाली राशि का विस्तृत विवरण क्रमशः राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजना एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय की जलग्रहण परियोजनाओं हेतु निम्नानुसार है-

 

 

तालिका 8.1

क्रं.सं.

मार्गदर्शिका का प्रकार

प्रथम वर्ष

द्वितीय वर्ष

तृतीय वर्ष

चतुर्थ वर्ष

पंचम वर्ष

कुल

(I)

कृषि मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजना की वरसा जन सहभागिता मार्गदर्शिका के अनुसार

()

रु. 4500/- प्रति हेक्टेयर के हिसाब से

(i)

राज्य/जिला स्तर पर

2% (45000)

0.5% (11250)

0.5% (11250)

0%

0%

3% (67500)

(ii)

परियोजना क्रियान्वयन संस्था के स्तर पर

1% (22500)

0.5% (11250)

0.3% (6750)

0.2% (4500)

0%

2% (45000)

(iii)

जलग्रहण समिति के स्तर पर

0%

0%

0%

0%

0%

0%

 

उपयोग

3% (67500)

1% (22500)

0.8% (18000)

0.2% (4500)

0%

5% (112500)

()

रु. 6000/- प्रति हेक्टेयर के हिसाब से

(i)

राज्य/जिला स्तर पर

2% (60000)

0.5% (15000)

0.5% (15000)

0%

0%

3% (90000)

(ii)

परियोजना क्रियान्वयन संस्था के स्तर पर

1% (30000)

0.5% (15000)

0.3% (9000)

0.2% (6000)

0%

2% (60000)

(iii)

जलग्रहण समिति के स्तर पर

0%

0%

0%

0%

0%

0%

 

उपयोग

3% (90000)

1% (30000)

0.8% (24000)

0.2% (6000)

0%

5% (115000)

(II)

ग्रामीण विकास मंत्रालय भारत द्वारा डी.डी.पी, डी.पी..पी. आई.डब्ल्यू.डी.पी. योजना हेतु जारी हरियाली मार्गदर्शिका

 

परियोजना क्रियान्वयन संस्था के स्तर पर

3% (90000)

1% (30000)

1% (30000)

0%

0%

5% (150000)


8.2.4 नई काॅमन मार्गदर्शिका के अनुसार संस्थापन एवं क्षमता निर्माण कार्यनीति
गौरतलब है कि भारत सरकार द्वारा जारी नई काॅमन मार्गदर्शिका के अंतर्गत क्षमता निर्माण संबंधी कार्य नीति का उल्लेख किया गया है। संस्थापन तथा क्षमता निर्माण घटक अंतर्गत कुल 5 प्रतिशत राशि का प्रावधान काॅमन मार्गदर्शिका में किया है परंतु इसके विपरीत वर्षवार विवरण उल्लेखित नहीं है अर्थात जलग्रहण विकास कार्यक्रम के क्रियान्वयन से जुड़े जलग्रहण विकास दल के सदस्यों को मांग के आधार पर वर्षवार प्रावधान विभाजित करने होंगे। जलग्रहण विकास परियोजनाओं से वांछित परिणाम प्राप्त करने हेतु क्षमता निर्माण सहायता एक महत्त्वपूर्ण संघटक है। राष्ट्रीय स्तर के प्राधिकरण तथा राज्य नोडल एजेंसी अन्य संसाधन संगठनों के साथ परामर्श से प्रत्येक राज्य में क्षमता निर्माण के लिये प्रचलनात्मक कार्यनीति तैयार करने में सहायता करेगा। इस कार्यनीति के मुख्य घटक निम्न प्रकार है।

i. समर्पित तथा विकेन्द्रित संस्थागत सहायता और सुपुर्दगी तंत्र
ii. क्षमता निर्माण के लिये वार्षिक योजना
iii. साधन सम्पन्न व्यक्तियों को इकट्ठा करना
iv. उचित रूप से तैयार किए प्रशिक्षण मापदण्ड (माॅडयूल) तथा पाठ्य सामग्री
v. कारगर निगरानी तंत्र तथा अनुवर्ती कार्यवाही

सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्र के अन्य राज्य स्तरीय प्रशिक्षण संस्थानों की पहचान उनकी क्षमता, अनुभव, विकसित आधारभूत ढाँचे, सम्बद्धता, संगठन की इच्छा आदि को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए। यदि किसी स्थिति विशेष में प्रशिक्षण संगठन तकनीकी और सहभागिता प्रबंधन घटकों, दोनों, पहलुओं का समावेश नहीं कर पाता है तो प्रत्येक पहलू के लिये तदानुसार अलग-अलग संगठनों की पहचान की जा सकती है। प्रत्येक सहभागी जिला पाठ्यक्रम के तृतीय चरण के अंतर्गत सहभागियों (पार्टीसीपेन्टस) के कुछ भाग के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रमों की मेजबानी/संचालन हेतु अनुभवी कृषि विज्ञान केन्द्र की पहचान कर सकेगा।

8.2.5 स्वायतशासी समर्थ संगठनों को समर्थन
जहाँ विभिन्न एनजीओ तथा पी.आई.ए. कार्य कर रहे हैं, वहाँ समर्थ संगठनों की स्थापना/पहचान प्रायोगिक आधार पर की जानी चाहिए। इन समर्थ संगठनों की संरचना पी.आई.ए. की संख्या पर निर्भर करते हुए प्रत्येक जिले या जिलों के समूह या राज्य स्तर पर भी की जा सकती है। प्रत्येक समर्थ संगठन लगभग 10 पी.आई.ए. के लिये कार्य हाथ में ले सकता है। इन संगठनों को सहायता देने पर आने वाली लागत को प्रशिक्षण घटक के तहत राज्य/जिला स्तर पर रोकी गई तीन प्रतिशत राशि में से पूरा किया जा सकता है। प्रारम्भ में इन्हें प्रायोगिक आधार पर परखा जाए और यदि ये उपयोगी पाए गए तो इन्हें वृहद पैमाने पर लिया जाए।

8.2.6 क्षमता निर्माण हेतु प्रशिक्षण संगठनों का सामंजस्य
सामान्यतः वृहद प्रशिक्षण संगठनों द्वारा तकनीकी अथवा प्रबंधन पहलुओं पर पाठ्यक्रम संचालित किए जा सकते हैं। ऐसे संगठन को खोजना दुर्लभ होगा जो कि तकनीकी एवं प्रबंधन घटकों, दोनों पहलुओं को प्रभावी रूप से सम्मिलित कर सके। रिसोर्स पर्संस एवं विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों का आदान-प्रदान, प्रशिक्षण कार्यक्रम के विभिन्न भागों को विभिन्न संगठनों द्वारा आयोजित किया तब जाकर सामंजस्य बिठाना उपयोगी होगा। राज्य/जिला एजेंसी अपनी आवश्यकताओं के अनुसार अपने लिये सबसे अधिक उपयोगी प्रशिक्षण संस्थाओं का चयन कर सकते हैं।

8.3 दल निर्माण एवं संचालन (Team Building)
जलग्रहण विकास कार्यक्रम किसी एक व्यक्ति का कार्यक्रम न होकर एक टीम का कार्यक्रम होता है। यह टीम ही इसकी सफलता/असफलता हेतु जिम्मेदार होती है। अनुभव दर्शाते हैं कि जिन जलग्रहण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर कार्यक्रम क्रियान्वयनकर्ताओं एवं लाभार्थियों की सशक्त टीम बन चुकी है एवं उनमें आपस में सामंजस्य एवं समन्वय है तो जलग्रहण से अर्जित होने वाले लाभ निसंदेह प्रभावकारी एवं अनुकरणीय होते हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है अतः उसे नित्यप्रति बहुत सारे मानव समूहों, संगठनों या दलों के साथ कार्य करना पड़ता है। वैसे किसी भी मनुष्य का परिवार या मित्रमण्डली अथवा जहाँ वह कार्य करता हैं, वहाँ के साथियों के समूह भी अनौपचारिक संगठन है। यहाँ प्रस्तुत विवरण में समूह या दल को ऐसे व्यक्तियों (10-20)ए के संगठन के रूप में वर्णित किया जा रहा है, जिन्हें हम प्रायः स्वयं सहायता समूह कहते हैं।

कुछ व्यक्तियों का ऐसा समूह जो किसी निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति हेतु सामूहिक एवं संगठित प्रयास करता है, संगठन या टीम या ग्रुप कहलाता है।

समूह (Groups)

दल (Team)

सशक्त, स्पष्ट नेता

सामूहिक नेतृत्व

व्यक्तिगत जवाबदेयता

परस्पर जवाबदेयता

सामान्य उद्देश्य

विशिष्ट उद्देश्य

व्यक्तिगत कार्य पर बल

सामूहिक कार्य पर बल


 अर्थात समूह को दल की ओर अग्रसर करना महत्त्वपूर्ण है क्योंकि दल समूह का भावनात्मक स्वरूप है। मनोविज्ञानी कुर्त लेविन ने Groups Dynamics Theory के अंतर्गत दल निर्माण तथा संचालन की चर्चा की है।

8.3.1 दल (समूह) क्यों बनते है?
1. सम्बद्धता के कारण
2. अन्तःक्रियाएँ करने के कारण
3. संतुलन (समान रूचि) की चाह में
4. विनिमय के कारण

अन्य व्यवहारिक कारण
1. कई बार स्वेच्छा से समूह (दल) बनते हैं जैसे-समान रूचि समूह या स्वयं सहायता समूह
2. कई बार दबाव में आकर भी समूह या दल बनाए जाते हैं।
3. कभी-कभी परिस्थितिवश (आपदा) भी समूह या दल बन जाते हैं जो कि अल्पकालिक सिद्ध होते हैं।

8.3.2 दल (समूह) निर्माण के सैद्धान्तिक चरण इस प्रकार हैं (Theoritical state for construction of a team as per below)

Forming

इस चरण में समूह का निर्माण होता है।

Storming

दूसरे चरण में एक दूसरे की अच्छाइयाँ तथा बुराइयाँ पता चलती है अतः आपसी मनमुटाव या संघर्ष हो सकते हैं।

Norming

इस चरण में सभी सदस्य समान मुद्दों पर सहमति या किसी साझा विषय पर सहमति बना लेते हैं।

Performing

चौथे चरण में समूह या दल मिलजुलकर अपने लक्ष्य प्राप्ति हेतु कार्य निष्पादित करता है।

Adjorning

चरण में समूह/दल का बिखराव हो जाता है क्योंकि सृष्टि में हर वस्तु अंतः निश्चित है।

8.3.3 दल (समूह) में संघर्ष क्यों होते हैं?
1. व्यक्तिगत व्यवहारजन्य कारणों (संस्कार, देश, काल, परिस्थिति) से भी लोगों के मध्य संघर्ष होते हैं। किसी भी व्यक्ति का व्यवहार उसके संस्कारों, पर्यावरण, कार्य (व्यवसाय) तथा व्यक्ति की मानसिकता में प्रभावित होता है।
2. किसी समूह के सदस्यों में भारी असमानताएँ हों तो संघर्ष अधिक होते हैं अर्थात लिंग, धर्म, आयु, जाति, वर्ग तथा अन्य कई कारक प्रभाव दिखाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि कोई भी समूह हो, वह एकरूपता या समानता पर आधारित हो।
3. असहयोग की भावना यदि सदस्यों में हो तो भी मनमुटाव बढ़ते हैं।
4. अविश्वास एवं अफवाहें भी मनमुटाव बढ़ाती है।
5. समूह के सदस्यों के मध्य संचार की कमी हो तो भी परस्पर विश्वास में कमी आती है तथा मतभेद बढ़ते रहते हैं।
6. कतिपय लोग मानते हैं कि भारतीय मानसिकता भी समूह अवधारणा के विपरीत है, क्योंकि अकेला भारतीय जितना अच्छा निष्पादन करता है उतना वह समूह में नहीं कर पाता है जबकि जापान में समूह आधारित कार्य अधिक होते हैं।
7. संकट की स्थिति में प्रायः व्यक्ति का धैर्य, साहस टूट जाता है अतः समूह में बिखराव हो जाता है।
8. प्रायः गुस्से एवं मजाक में कही गई बातें व्यक्ति को चुभ जाती हैं।

8.3.4 समूह संसक्तता (Groups Cohesiveness)

समूह संसक्तता बढ़ाने में सहायक कारक समूह संसक्तता घटाने में सहायक कारण-

समूह लक्ष्यों पर सहमति

असहमति   

अंतःक्रियाओं की अधिकता

समूह का बड़ा आकार  

व्यक्तिगत आकर्षण

कटु अनुभव

अन्तःसमूह प्रतियोगिता        

अन्तःसमूह प्रतियोगिता

सकारात्मक मूल्यांकन

एक या कुछ सदस्यों की प्रभुता


8.3.5 अच्छी टीम कैसे बने?
1. समूह में "One man show" नहीं होना चाहिए अर्थात कोई भी टीम किसी एक या दो सदस्यों के सहारे नहीं चलती है बल्कि सभी का योगदान होना चाहिए।
2. टीम के पास उच्च आकांक्षाएँ या बूते से बाहर के लक्ष्य नहीं होने चाहिए।
3. पंचतंत्र के अनुसार चार प्रकार के मनुष्यों (सुपारी, अंगूर, बेर, अखरोट) के अनुरूप चिंतन कीजिए अर्थात कुछ व्यक्ति दिल से तथा बाहर से दोनों तरह कठोर (सुपारी) प्रतीत होते हैं तो कुछ दोनों तरह नरम स्वभाव (अंगूर) के होते हैं कुछ इसके विपरीत होते हैं अतः हमें व्यक्ति के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए।
4. समूह में हमेशा न्याय का पालन होना चाहिए।
5. याद रखिए कि लोग सहायता चाहते हैं सलाह नहीं, अतः लोगों की सहायता कीजिए।
6. व्यक्ति को पूर्णतः स्वीकार कीजिए अर्थात व्यक्ति के गुणों के साथ अवगुणों को भी स्वीकार कीजिए। कोई भी व्यक्ति सर्वगुण सम्पन्न नहीं होता है।
7. सहयोग को समन्वय में बदलिए अर्थात सहयोग ऐसा हो जो कि समय पर हो तथा जिसका सुपरिणाम सामने आ सके।
8. याद रखिए खुद को बदलने से जमाना बदलता है। सुधार हमेशा सर्वप्रथम स्वयं के स्तर पर होना चाहिए ताकि दूसरे भी उसका अनुसरण कर सकें।
9. कई बार संघर्ष को सृजनात्मक बना कर समूह की कार्यक्षमता बढ़ाई जा सकती है। संघर्ष हमेशा बुरे नहीं होते हैं बल्कि वे व्यक्तियों की ऊर्जा तथा भिन्न विचारों को दर्शाते हैं। उन्हें सही राह दीजिए।
10. निरंतर सम्पर्क संचार के द्वारा भी समूह भावना प्रबल होती है।
11. प्रोत्साहन/अभिप्रेरणा के द्वारा भी टीम भावना में वृद्धि होती है। समूह या टीम का लीडर सभी साथियों में ऊर्जा का प्रवाह करें।
12. उपचार से बचाव बेहतर है। इस उक्ति को ध्यान में रखते हुए टीम को यह प्रयास करना चाहिए कि समस्या आने से पूर्व ही उसका समाधान सोच लिया जाए या फिर ऐसे प्रयास हो कि समस्या आए ही नहीं।

कोई भी टीम या समूह हो उसे यह याद रखना चाहिए-

लक्ष्य न ओझल होने पाए
कदम मिला के चल।
मंजिल तेरे पग चूमेगी
आज नहीं तो कल।।


8.4 जलग्रहण परियोजनाओं से संबंधित प्रशिक्षण कलेंडर का नमूना (Sample Training Calendar Related with Watershed Development Projects)
जलग्रहण विकास परियोजनान्तर्गत आयोजित हो सकने वाले विभिन्न स्तरों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों का संक्षिप्त विवरण

(अ) विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षणार्थियों का विवरण
1. राज्य स्तर पर विभिन्न विभागों के अधिकारी/कर्मचारियों का प्रशिक्षण।
2. जिला प्रमुखों का प्रशिक्षण।
3. मुख्य कार्यकारी अधिकारी, जिला परिषद का प्रशिक्षण।
4. संयुक्त निदेशक, जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग का प्रशिक्षण।
5. अधिशासी अभियंता (भू-संसाधन)/परियोजना अधिकारी (भू-संसाधन) जिला परिषद का प्रशिक्षण।
6. उपनिदेशक, जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग का प्रशिक्षण।
7. सहायक परियोजना अधिकारी (भू-संसाधन) जिला परिषद का प्रशिक्षण।
8. विकास अधिकारी, पंचायत समिति का प्रशिक्षण।
9. सहायक अभियंता, पंचायत समिति का प्रशिक्षण।
10. कनिष्ठ अभियंता, पंचायत समिति का प्रशिक्षण।
11. जलग्रहण विकास दल में सदस्यों का प्रशिक्षण।
12. जलग्रहण संस्था अध्यक्षों का प्रशिक्षण।
13. जलग्रहण समिति अध्यक्षों का प्रशिक्षण।
14. जलग्रहण समिति सचिवों का प्रशिक्षण।
15. जलग्रहण समिति के सदस्यों का प्रशिक्षण।
16. जलग्रहण से जुड़े स्थानीय कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण।
17. जलग्रहण से जुड़े वन रक्षकों का प्रशिक्षण।
18. उपभोक्ता समूहों/स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों का प्रशिक्षण।
19. सरपंचों का प्रशिक्षण।
20. ग्राम सेवकों का प्रशिक्षण।
21. जिला परिषद, पंचायत समिति एवं ग्राम पंचायत की स्थायी समिति के सदस्यों का प्रशिक्षण।
22. राज्य स्तरीय अधिकारियों कर्मचारियों का प्रशिक्षण।
23. राज्य/जिला/पंचायत समिति के स्तर के लेखा कर्मियों का प्रशिक्षण।
24. अन्य सम्बद्ध विभागों के साथ समेकित क्रियान्वयन हेतु कार्यशाला/प्रशिक्षण।
25. गैर सरकारी संगठनों के साथ सहभागिता आधारित क्रियान्वयन हेतु कार्यशाला/प्रशिक्षण।

(ब) प्रस्तावित प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विषय विवरण/प्रशिक्षण अवधि/प्रशिक्षण आयोजित किए जा सकने वाली संस्था/उपयुक्त माह का विवरण

 

क्र. सं.

प्रशिक्षणार्थी का प्रकार

प्रशिक्षण का विषय

प्रशिक्षण संस्था

अवधि

प्रशिक्षण का माह

I

राष्ट्रीय स्तर पर

1.

1. राज्य स्तर के अधिकारी

2. वृत्त स्तर के संयुक्त निदेशक

3. जिला स्तर के वरिष्ठ परिवर्तन दिसम्बर अधिकारी (मुख्य कार्यकारी अधिकारी तैयारी अथवा अधिशाषी अभियंता (भू संसाधन)

1. मार्गदर्शिका का आमुखीकरण

2. नीतिगत सहायता एवं परिवर्तन

3. प्रस्तावित आयोजना की तैयारी

1. एन.आई.आर.डी, हैदराबाद

2. मेनेज, हैदराबाद

3. ग्रामीण विकास मंत्रालय, नई दिल्ली

4. कृषि मंत्रालय, नई दिल्ली

2-6 दिवस

अप्रैल-जून अक्टूबर-दिसम्बर

II

राज्य स्तर पर

 

1. मुख्य कार्यकारी अधिकारी, जिला परिषद का परीक्षण

2. संयुक्त निदेशक, जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग का प्रशिक्षण

3. अधिशाषी अभियंता (भू-संसाधन)/परियोजना (भू संसाधन) जिला परिषद का परीक्षण

4. उपनिदेशक, जलग्रहण विकास एवं भू संरक्षण विभाग का प्रशिक्षण

5. सहायक परियोजना अधिकारी (भू संसाधन) जिला परिषद का प्रशिक्षण

6. विकास अधिकारी पंचायत समिति का प्रशिक्षण

7. सहायक अभियंता, पंचायत समिति का प्रशिक्षण

8. वरिष्ठ सदस्य, जिला परिषद/पंचायत समिति

9. लेखा कर्मियों का प्रशिक्षण

1. मार्गदर्शिका का अमुखीकरण

2. सहभागिता आधारित जलग्रहण प्रबंधन

3. परिवर्तन प्रबंधन

4. वैचारिक सोच में परिवर्तन, स्थानीय लोगों के साथ स्थानीय लोगों के लिये कार्य करने की सीख

5. जलग्रहण क्षेत्र विकास में संस्थागत व्यवस्थाओं जैसे उपभोक्ता समूह/स्वयं सहायता का गठन एवं वित्त पोषण संस्थाओं उनका सशक्तिकरण, विकास एवं वित्त पोषण संस्थाओं से संबंधीकरण

6.पी.आर.. के अनुसार सामुदायिक संगठन 7. सी.पी.आर./डी.पी.आर/डिजाइन प्लान तैयार करना

8. पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका

9. महिलाओं की भूमिका

10. गैर सरकारी संगठनों की भूमिका

11. जलग्रहण आयोजना एवं प्रबोधन में सूचना प्रौद्योगिकी की भूमिका

12. परिसम्पत्तियों का प्रबंधन

13. प्रवेश/निकास प्रोटोकॉल 14. समूहगत विकास के आयाम

15. सफलता दर्शाते मापदंड

6. लेखा एवं रिकॉर्ड संधारण

17. सूचना का अधिकार

18. साझा परिसम्पत्ति संसाधन प्रबंधन

19. जलग्रहण+गतिविधियाँ

20. अन्य विभागों से समेकन

21. जलग्रहण गतविधियों हेतु कलेंडर तैयार करना 22. उत्पाद का समानुपातिक वितरण

1. इंदिरा गांधी पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास संस्थान, जयपुर

2. राज्य कृषि प्रबंध संस्थान जयपुर

3. एच.सी.एम.रीपा,जयपुर

4. आई.एम.टी.आई, कोटा

5. वन विभाग के प्रशिक्षण संस्थान, जयपुर

6. जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग का मुख्यालय

1-6 दिवस कोर्स का पुनरावलोकन नियमित फीड बैक

अप्रैल-जून सितम्बर-दिसम्बर फरवरी-मार्च

III

जिला स्तर पर

 

1. कनिष्ठ अभियंता, पंचायत समिति

2. जलग्रहण विकास दल के सदस्य

3. जलग्रहण संस्था अध्यक्ष

4. जलग्रहण समिति अध्यक्ष

5. जलग्रहण समिति सचिव

6. ग्राम सेवक

7. जिला परिषद, पंचायत समिति एवं ग्राम पंचायत की स्थायी समिति के सदस्य

8. लेखा संवर्ग के कर्मी

1. मार्गदर्शिका का आमुखीकरण

2. सहभागिता आधारित जलग्रहण प्रबंधन

3. वैचारिक सोच में परिवर्तन, स्थानीय लोगों के साथ स्थानीय लोगों के लिये कार्य करने की सीख

4. जलग्रहण क्षेत्र विकास में संस्थागत व्यवस्थाओं जैसे उपभोक्ता समूह/स्वयं सहायता समूह का गठन उनका सशक्तिकरण विकास एवं वित्त पोषण संस्थाओं से संबंधिकरण  

5. पी.आर.. पर प्रशिक्षण

6. सामुदायिक संगठन पर प्रशिक्षण

7. सी.पी.आर/डी.पी.आर/डिजाइन प्लान तैयार करना

8. पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका

9. महिलाओं की भूमिका

10. गैर सरकारी संगठनों की भूमिका

11. जलग्रहण आयोजना एवं प्रबोधन में सूचना प्रौद्योगिकी की भूमिका

12. परिसम्पत्तियों का प्रबंधन

13. प्रवेश/निकास प्रोटोकॉल

14. समूहगत विकास के आयाम

15. सफलता दर्शाते मापदंड

16. लेखा एवं रिकॉर्ड संधारण

17. सूचना का अधिकार

18. साझा परिसम्पत्ति, संसाधन प्रबंधन

19. जलग्रहण+गतिविधियाँ

20. अन्य विभागों जैसे कृषि, पशुपालन उद्यान महिला एवं बाल विकास इत्यादि की गतिविधियों से समेकन

21. फार्म उत्पादन गतिविधियाँ एवं लाभार्थी परिवार कार्य योजना बनाना

22. चारागाह विकास एवं उद्यानिकी/वानिकी पौधारोपन

23. जैविक खेती (केंचुए की खाद)

24. नकदी फसलों/औषधीय फसलों की खेती

25. जलग्रहण गतिविधियों हेतु कलेंडर तैयार करना उत्पाद का समानुपातिक वितरण

1. इंदिरा गांधी पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास संस्थान, जयपुर के पी.टी.सी.

2. एच.सी.एम. ऋण के विभिन्न केंद्र

3. जिला परिषद

4. उत्कृष्ट गैर सरकारी संस्थाएँ

5. सीएसडब्ल्यू सी एंड आरटीआई, कोटा

6. आईएमआई, कोटा

7. कृषि विश्वविद्यालय एवं उसके उपकेंद्र अनुसंधान केंद्र

8. कृषि विज्ञान केंद्र

2-6 दिवस नियमित फीड बैक पुनरावलोकन कोर्स

अप्रैल-जून, सितंबर-दिसंबर फरवरी-मार्च

IV

पंचायती समिति /ग्राम पंचायत स्तर

 

1. जलग्रहण विकास समिति सदस्य

2. जल संस्था अध्यक्ष

3. जलग्रहण समिति अध्यक्ष/सचिव

4. जलग्रहण कमेटी सदस्य

5. जलग्रहण कार्यकर्ता /वन रक्षक

6. उपभोक्ता समूह एवं स्वयं सहायता समूह के सदस्य 7. ग्राम सेवक

8. पंचायत समिति एवं ग्राम पंचायत की स्थायी समिति के सदस्य

1. मार्गदर्शिका का आमुखीकरण

2. सहभागिता आधारित जलग्रहण प्रबंधन

3. जलग्रहण क्षेत्र विकास में संस्थागत व्यवस्थाओं जैसे उपभोक्ता समूह/स्वयं सहायता समूह का गठन उनका सशक्तिकरण विकास एवं वित्त पोषण संस्थाओं से संबंधिकरण  

4. पी.आर.. पर प्रशिक्षण

5. सामुदायिक संगठन पर प्रशिक्षण

6. पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका

7. महिलाओं की भूमिका

8. गैर सरकारी संगठनों की भूमिका

9. जलग्रहण आयोजना एवं प्रबोधन में सूचना प्रौद्योगिकी की भूमिका

10. परिसम्पत्तियों का प्रबंधन

11. प्रवेश/निकास प्रोटोकॉल

12. समूहगत विकास के आयाम

13. सफलता दर्शाते मापदंड

14. लेखा एवं रिकॉर्ड संधारण

15. सूचना का अधिकार

16. साझा परिसम्पत्ति, संसाधन प्रबंधन

17. अन्य विभागों जैसे कृषि, पशुपालन उद्यान महिला एवं बाल विकास इत्यादि की गतिविधियों से समेकन

18. फार्म उत्पादन एवं लाभार्थी परिवार

19. चारागाह विकास एवं उद्यानिकी/वानिकी पौधारोपन

20. जैविक खेती (केंचुए की खाद)

21. नकदी फसलों/औषधीय फसलों की खेती

22. उत्पाद का समानुपातिक वितरण

23. दक्षता वृद्धि प्रशिक्षण

24. मानसून पूर्व एवं पश्चात प्रशिक्षण

1. पंचायत समिति मुख्यालय  2. ग्राम पंचायत मुख्यालय 3. पटवार प्रशिक्षण केंद्र

4. कृषि विज्ञान केंद्र

5. गैर सरकारी संस्थाएँ

6. कृषि अनुसंधान केंद्र

1-6 दिवस नियमित फीड प्रशिक्षणों का पुनरावलोकन

अप्रैल-जून, सितंबर-दिसंबर फरवरी-मार्च


 

 

8.5 राज्य में प्रशिक्षण कार्यक्रमों से संबंधित अपनाई दरें (Rates adopted for training programme in the state)
डी.पी.ए.पी., डी.डी.पी, आई डब्ल्यू, डी.पी तथा एन डब्ल्यू डी.पी.आर.ए. के तहत क्रियान्वित जलग्रहण परियोजनाओं के अंतर्गत विभिन्न प्रशिक्षणों के लिये प्रशिक्षण शुल्क? निर्धारण को अंतिम रूप दिए जाने हेतु निदेशक, इंदिरा गांधी पंचायत राज एवं ग्रामीण विकास संस्थान, जयपुर की अध्यक्षता में दिनांक 6 अक्टूबर 2003 को आयोजित बैठक में लिये गए निर्णयानुसार राज्य स्तरीय प्रशिक्षणों (यथा डब्ल्यू यू डी.टी.डी.टी.टी इत्यादि) के लिये निर्देशानुसार प्रशिक्षण शुल्क का निर्धारण निम्नानुसार किया जाता है।

(अ) प्रशिक्षण संस्था जिनके पास स्वयं का सभागार हो-रुपये 450/- प्रति दिवस प्रति प्रशिक्षु
(ब) प्रशिक्षण संस्था जिनके पास सभागार सुविधा स्वयं की न हो- रुपये 500 दिवस प्रति प्रशिक्षु

उक्त दरों में समय के साथ बदलाव हुआ है तथा आज रु. 600 प्रति दिवस प्रति प्रशिक्षु की दर निर्धारित हैं।
राज्य स्तर पर आयोजित होने वाले विभिन्न प्रशिक्षण पूर्व रूप से आवासीय प्रशिक्षण होगा अर्थात आवास एवं भोजन की व्यवस्था चिन्हित प्रशिक्षण संस्थानों द्वारा वहन किया जाएगा।
उक्त निर्धारित शुल्क में प्रशिक्षण के दौरान उपलब्ध कराए जाने वाले पठन सामग्री व्यय सम्मिलित होेगी।

राष्ट्र/राज्य में जलग्रहण प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिये प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान निम्न हैं-
i. राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान, (एन.आई.आरडी) हैदराबाद
ii. राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रबंधन संस्थान, (एम.ए.एन.ए.जी.ई.) हैदराबाद
iii. केन्द्रीय रूक्ष क्षेत्र शोध संस्थान, (सी.ए.जेड.आर.आई) जोधपुर
iv. केन्द्रीय मृदा एवं जल संरक्षण शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान, (सी.एस.डब्ल्यू.सी.आर.टी.आई), देहरादून एवं इसके क्षेत्रीय केन्द्र।
v. केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र शोध संस्थान, (सी.आर.आईडी.ए हैदराबाद)
vi. वाटर टेक्नोलॉजी सेंटर, (डब्ल्यू.टी.सी.)
vii. भारतीय दूरसंवेदी संस्थान, देहरादून
viii. ग्रामीण प्रबंधन संस्थान, (आई.आर.एम.ए) आनंद
ix. भारतीय वन प्रबंधन संस्थान, (आई.आई.एफ.एम) भोपाल
x. राष्ट्रीय दूरसंवेदी अभिकरण, (एन.आर.एस.ए) हैदराबाद
xi. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, (आई.एस.आर.ओ) बंगलुरु
xii. भारतीय मृदा एवं भूमि उपयोग सर्वेक्षण, (एस.एल.यू.एस.आई.) नई दिल्ली

8.6 क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण (Capacity Building and Training)
(क) प्रशासकों एवं प्रबंधकों के लिये आमुखीकरण पाठ्यक्रम

प्रशासकों एवं प्रबंधकों के लिये तीन चार दिन के लघु अवधि के आमुखीकरण पाठ्यक्रम की आवश्यकता हो सकती है। इन पाठ्यक्रमों में सम्मिलित किए जाने वाले मदों/विषयों की संभावित सूची निम्नानुसार है-

(i) बारानी कृषि हेतु सतत विकास के लिए जलग्रहण दृष्टिकोण का औचित्य।
(ii) जलग्रहण कार्यक्रम के अंतर्गत सहभागिता दृष्टिकोण का औचित्य।
(iii) संशोधित जलग्रहण की सामान्य मार्गदर्शिका का आमुखीकरण।
(iv) सफल जलग्रहण क्षेत्रों का फोक्सड एक्सपोजर विजिट।
(v) गरीबों एवं महिलाओं को सशक्त बनाने से संबंधित पहलुओं की संवेदनशीलता।
(vi) सहभागिता दृष्टिकोण/कार्य सरलीकरण हेतु प्रकृति तथा व्यवहार संबंधी पहलू।
(vii) प्रशासकों एवं परियोजना प्रबंधकों द्वारा निष्पादित की जाने वाली नव भूमिकाओं और उत्तरदायित्वों के प्रक्रियात्मक पहलू-

i. संबंधित जिलों में परियोजना क्रियान्वयन संस्थाओं और जलग्रहण क्षेत्रों का समय पर चयन।
ii. राज्य/जिलों के लिए विस्तृत प्रशिक्षण योजना तैयार करना और उसका समन्वय तथा सरलीकरण।
iii. निधि के समय पर प्रवाह का सरलीकरण।
iv. सामुदायिक संगठन, विभिन्न कर्ताओं की क्षमता का निर्माण, कार्य योजना की तैयारी, क्रियान्वयन चरण के दौरान विभिन्न कार्यों की प्रगति, कार्यक्रमों के समवर्ती और आवधिक मूल्यांकन आदि संबंधी भौतिक प्रगति की मासिक समीक्षा और अनुवीक्षण।
v. मासिक समीक्षा एवं वित्तीय प्रगति की माॅनीटरिंग, पी.आई.ए. और समुदाय के समय पर निधि जारी होना वित्तीय और भौतिक अभिलेखों का रख-रखाव विशेष रूप से पी.आई.ए. और जलग्रहण संस्था के स्तरों पर इसमें तिमाही आधार पर लेखों की आंतरिक अंकेक्षण और वार्षिक आधार पर लेखों की बाह्य अंकेक्षण, पंजीकृत समिति द्वारा अंकेक्षण अनुच्छेदों के संबंध में उठाए गए कदम, पी.आई.ए. जलग्रहण स्तर पर निधि के किसी दुर्विनियोजन पर सतर्कता कार्यवाही का मासिक पुनरावलोकन और अनुवीक्षण।

(ख) जलग्रहण विकास दल के लिये कुशलता वृद्धि पाठ्यक्रम
क्रियान्वयनकर्ताओं हेतु उपर्युक्त मदों से संबंधित लघु अवधि के पाठ्यक्रमों और कुशलता वृद्धि दीर्घावधि पाठ्यक्रमों में समन्वय स्थापित करना अपेक्षित होगा। कुशलता वृद्धि पाठ्यक्रमों की विषय वस्तु में हेर फेर इस बात निर्भर करेगा कि निम्न विस्तृत विवरणानुसार पाठ्यक्रम डब्ल्यू.डी.टी. के लिये तैयार किया गया है या जलग्रहण समुदाय के लिये तैयार किया गया है-

1. डब्ल्यू. डी.टी. के लिये
(i) उपर्युक्त सूचीकृत मदों के बारे में उपर्युक्त सहभागियों का आमुखीकरण।
(ii) सहभागियों द्वारा सफल जलग्रहण क्षेत्रों का फोक्सड एक्सपोजर विजिट।
(iii) निम्न पहलुओं पर उपर्युक्त सहभागियों की कुशलता वृद्धि।

- नई संस्थानिक व्यवस्था के अनुसार ग्राम स्तर पर समुदाय का संगठन, जिसमें साख (क्रेडिट) और मितव्ययी समूह (स्वयं सहायता समूह और उपभोक्ता समूह), डब्ल्यू.सी. आदि सम्मिलित होंगे।
- पी.आर.ए. उपकरण और तकनीकी।
- टीम बिल्डिंग, ए.एस.ए, फेसिलिटेशन स्किल्स, समूह कार्यवाही और विवादों का निराकरण।
- समुदाय के सदस्यों को जागरूक बनाने हेतु जन संचार की देशी पद्धतियाँ।
- प्रबंध सूचना पद्धति और कम्प्यूटर की प्रायोजनशीलता।
- सफलता की कहानियों (सक्सेस स्टोरीज) के स्थलों पर एक्सपोजर विजिट के आयोजन हेतु फेसिलिटेशन स्किल्स।
- प्राकृतिक संसाधनों के विकास, उत्पादन वृद्धि गतिविधियों और जीविका समर्थन गतिविधियों संबंधी प्रौद्योगिक पहलू।
- सहभागिता योजना, डिजाइन तैयार करना और अनुमान लगाना, कार्यों की गुणवत्ता का पर्यवेक्षण सहित।
- सहभागिता कार्यान्वयन।
- सहभागिता अनुवीक्षण और मूल्यांकन।

2. जलग्रहण समुदाय
(i) समुदाय का सहभागिता दृष्टिकोण (एप्रोच) तथा प्रचलित मार्गदर्शिका के मुख्य लक्षणों के बारे में आमुखीकरण (जनसंचार की देशी पद्धतियों के माध्यम से)।
(ii) सफल स्थलों (सक्सेस स्टोरीज) के फोक्सड विजिट के माध्यम से कार्यालय पदाधिकारियों तथा समुदाय के चयनित सदस्यों का अभिप्रेरण।
(iii) डब्ल्यू सी., डब्ल्यू ए., यूजी, एस.एच.जी. के कार्यालय पदाधिकारियों का कार्यक्रम के अंतर्गत उनकी भूमिका एवं जिम्मेदारियों के बारे में आमुखीकरण।
(iv) जलग्रहण सचिवों, कार्यकर्ताओं, समुदाय संगठनकर्ताओं की अभिलेख रखने तथा प्रबंधन से संबंधित अन्य कार्यों में कुशलता को बढ़ाना।
(v) प्रौद्योगिक पहलुओं के देशी विशेषज्ञों के ज्ञान और कुशलता को बढ़ाना।
(vi) संबंधों की पुनरावृत्ति के परिप्रेक्ष्य में कुशलता आमुखीकरण पाठ्यक्रमों की अवधि को बढ़ाया जा सकता है, ताकि सहभागी सीखने के साथ-साथ क्रमिक रूप से कुशलता का अभ्यास भी कर सके।

(ग) प्रशिक्षकों की कुशलता वृद्धि पाठ्यक्रम
प्रशिक्षकों को उपर्युक्त मदों/विषयों संबंधी आमुखीकरण पाठ्यक्रम तथा कुशलता वृद्धि पाठ्यक्रम के अलावा लंबी अवधि के अतिरिक्त प्रशिक्षण की आवश्यकता हो सकती है। अतिरिक्त घटकों में प्रशिक्षकों की प्रशिक्षण कुशलता और अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों को सरलता से कुशलता पूर्वक संचालित करने पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। उपर्युक्त समस्त घटकों के लिये अधिक अवधि की आवश्यकता हो सकती है, जिसमें कम से कम तीन अनुवर्ती प्रशिक्षण कार्यक्रमों में मास्टर प्रशिक्षण के पर्यवेक्षण के अंतर्गत अपेक्षित कुशलता प्राप्त करना व अभ्यास करना सम्मिलित किया जा सकता है।

क्रियान्वयन कर्ताओं को उपर्युक्त मदों/विषयों से संबंधित लघु अवधि के आमुखीकरण प्रशिक्षण के साथ-साथ दीर्घावधि कुशलता वृद्धि प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में समन्वय स्थापित करना अपेक्षित होगा। कुशलता वृद्धि पाठ्यक्रमों की विषय वस्तु में हेर फेर इस बात पर निर्भर करेगा कि निम्न विस्तृत विवरणानुसार पाठ्यक्रम डब्ल्यू डी.टी. के लिये तैयार किया गया है या जलग्रहण समुदाय के लिये तैयार किया गया है।

संबंधों की पुनरावृत्ति के परिप्रेक्ष्य में कुशलता आमुखीकरण पाठ्यक्रमों की अवधि को बढ़ाया जा सकता है ताकि सहभागी सीखने के साथ-साथ क्रमिक रूप से कुशलता का अभ्यास भी कर सकें।

8.7 जलग्रहण विकास में जन चेतना जागृत करने के उद्देश्य से उपयोग में लिये जाने वाले नारे (Slogan for Purpose of Self Awakening of people in Watershed Development)
खुड़ का पानी खुड़ में,
खेत का पानी खेत में,
गाँव का पानी गाँव में,
गाँव को जानो, गाँव को बदलो
अपना जीवन, अपना पानी
सबको एक ही पाठ पढ़ाओं
जल संग्रहण में हाथ बटाओं
व्यर्थ पानी नष्ट न हो
मिट्टी पानी का कष्ट न हो
गाँव-गाँव में जाएँगे
जलग्रहण क्षेत्र अपनाएँगे
बच्चे बूढ़े और जवान
सफल करे जलग्रहण अभियान
स्वस्थ पशु समृद्ध किसान
उन्नत तकनीक की पहचान
दलहन, तिलहन को उपजाओ
अब बारानी से खूब कमाओ
जद कन्टूरा पर लगाओ ला घास
फेर कर सको अच्छी फसल री आस

8.8 सारांश (Summary)
जलग्रहण विकास परियोजना कर्मियों की क्षमता निर्माण राज्य स्तर पर, जिला स्तर पर एवं जलग्रहण स्तर के सहभागियों हेतु आमुखीकरण व प्रशिक्षण द्वारा किया जाता है। इसके लिये प्रशिक्षण संस्थाओं की पहचान की जाती है तथा प्रशिक्षण का कलेंडर तैयार किया जाता है।

8.9 संदर्भ सामग्री (Reference Material)
1. जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग के वार्षिक प्रतिवेदन।
2. बारानी क्षेत्रों की राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजना हेतु जारी वरसा-7 मार्गदर्शिका।
3. प्रशिक्षण पुस्तिका-जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग द्वारा जारी।
4. जलग्रहण मार्गदर्शिका-संरक्षण एवं उत्पादन विधियों हेतु दिशा-निर्देश-जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग द्वारा जारी।
5. जलग्रहण विकास हेतु तकनीकी मैनुअल-जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग द्वारा जारी।
6. राजस्थान में जलग्रहण विकास गतिविधियाँ एवं उपलब्धियाँ-जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग द्वारा जारी।
7. कृषि मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजना के लिये जलग्रहण विकास पर तकनीकी मैनुअल।
8. ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी जलग्रहण विकास-दिशा निर्देशिका।
9. ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी जलग्रहण विकास-हरियाली मार्गदर्शिका।
10. Compendium of circulars जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग द्वारा जारी।
11. विभिन्न परिपत्र-राज्य सरकार/जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग।
12. जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग द्वारा जारी स्वयं सहायता समूह मार्गदर्शिका।
13. इंदिरा गांधी पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास संस्थान द्वारा विकसित संदर्भ सामग्री-जलग्रहण प्रकोष्ठ।
14. कृषि मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी वरसा जन सहभागिता मार्गदर्शिका।
15. प्रसार शिक्षा निदेशालय, महाराणा प्रताप कृषि एवं तकनीकी विश्वविद्यालय, उदयपुर द्वारा विकसित सामग्री।
16. भारत सरकार द्वार जारी नई काॅमन मार्गदर्शिका।

जलग्रहण विकास - सिद्धांत एवं रणनीति, अप्रैल 2010

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जलग्रहण विकास-सिद्धांत एवं रणनीति

2

मिट्टी एवं जल संरक्षणः परिभाषा, महत्त्व एवं समस्याएँ उपचार के विकल्प

3

प्राकृतिक संसाधन विकासः वर्तमान स्थिति, बढ़ती जनसंख्या एवं सम्बद्ध समस्याएँ

4

जलग्रहण प्रबंधन हेतु भूमि उपयोग वर्गीकरण

5

जलग्रहण विकासः क्या, क्यों, कैसे, पद्धति एवं परिणाम

6

जलग्रहण विकास में जनभागीदारीःसमूहगत विकास

7

जलग्रहण विकास में संस्थागत व्यवस्थाएँःसमूहों, संस्थाओं का गठन एवं स्थानीय नेतृत्व की पहचान

8

जलग्रहण विकासः दक्षता, वृद्धि, प्रशिक्षण एवं सामुदायिक संगठन

9

जलग्रण प्रबंधनः सतत विकास एवं समग्र विकास, अवधारणा, महत्त्व एवं सिद्धांत

10

पर्यावरणःसामाजिक मुद्दे, समस्याएँ, संघृत विकास

11

राजस्थान में जलग्रहण विकासः चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ

 

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