राजस्थान में जलग्रहण विकास चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ

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वर्धमान महावीर ओपन विश्वविद्यालय, कोटा, अप्रैल 2010

परम्परागत जोहड़परम्परागत जोहड़ 11.1 प्रस्तावना (Introduction)
धरती पर जल

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 22 दिसम्बर 1992 को एक प्रस्ताव पारित कर 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में बनाए जाने की शुरूआत की। पहला विश्व जल दिवस वर्ष 1993 में मनाया गया।

धरती का अमृत पानी बड़ी तेजी से कम हो रहा है। रीतते भूजल स्रोतों ने मानव की मुश्किल बढ़ा दी है तथा दुनिया की अधिकांश आबादी स्वच्छ पेयजल के लिये तरस रही है।

धरती की तीन चौथाई सतह पर मौजूद पानी में से ज्यादातर खारा है। कुल उपलब्ध जल में से केवल 2.5 फीसदी मीठा जल है। मीठे पानी का दो फीसदी हिस्सा पहाड़ों और ग्लेशियरों में बर्फ बना पड़ा है। पूरी धरती पर उपलब्ध पानी का बमुश्किल 0.8 प्रतिशत हिस्सा इंसानों के उपयोग का है। इस सम्पदा का भी तकरीबन 2.0 प्रतिशत हिस्सा उन स्थानों पर मौजूद है जहाँ तक इंसान की पहुँच ही नहीं है। पृथ्वी के जल मंडल में कुल 1.46 अरब घन मीटर जल मौजूद है। इसमें से 97.5 फीसदी महासागरों में है।

देश में स्थिति
- देश की 73 प्रतिशत आबादी को नहीं मिलता साफ पानी।
- हर साल पाँच वर्ष से कम उम्र के 50 हजार से डेढ़ लाख बच्चों की मौत का कारण दूषित पानी।
- देश के 32311 गाँव फ्लोराइड युक्त पानी और 4000 गाँव आर्सेनिक, नाइट्रेट, लेड जैसे घातक रसायनों से युक्त पानी पीने को मजबूर हैं।

राजस्थान में स्थिति
- प्रदेश का 49 प्रतिशत हिस्सा जल समस्या से जूझ रहा है।
- पिछले डेढ़ दशक में प्रदेश में अब पहले के 4500 वर्ग किलोमीटर की जगह केवल 3500 वर्ग किमी भू-भाग पर जलाशय बचे हैं।
- पेयजल की 94 फीसदी और सिंचाई की 70 प्रतिशत योजनाएँ परियोजनाएँ भूजल पर आश्रित
- भूजल दोहन के मामले में प्रदेश के 86 ब्लाॅक अतिदोहित और 80 डार्क की श्रेणी में हैं।
- फ्लोराइड युक्त पानी पीने को अभिशप्त सबसे अधिक 18609 गाँव राजस्थान में हैं।
- तीन चौथाई धरती जल से भरी पर पीने के लिये ढाई फीसदी।
- दुनिया में पानी की जरूरत का 90 फीसदी पानी प्राकृतिक जलस्रोतों से प्राप्त होता है। इसके अलावा औद्योगिक जरूरत का 40 प्रतिशत और कृषि का 20 प्रतिशत हिस्सा भी प्राकृतिक जलस्रोतों से ही मिलता है।
- संयुक्त राष्ट्र जल संसाधन विकास रिपोर्ट के अनुसार पेयजल गुणवत्ता में भारत का स्थान 120 वां है। जल उपलब्धता में भारत का स्थान 133वां है।
- भारत में भू-गर्भ जलस्तर तेजी से गिर रहा है। इसमें सात के दशक के बाद से अब तक 15 से 60 मीटर तक की गिरावट दर्ज की गई है।
- भारत में वर्ष के कुल 8760 घंटों में से बमुश्किल 100 घंटे ही बारिश होती है।
- भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता (देश में उपलब्ध कुल जल सम्पदा में से) (1951-52 लाख लीटर, 1991-22 लाख लीटर, 2001-18 लाख 20 हजार लीटर) 2025-13 लाख 40 हजार लीटर) अनुमानित

2025-13 लाख 40 हजार लीटर
2050-11 लाख 40 हजार लीटर

- भारत में महिलाएँ प्रतिदिन औसतन 2.2 घंटे दूरस्थ इलाकों से पानी लाने में खर्च करती हैं।
- नदियों के जल को दूषित करने वाले खतरनाक जैविक रसायन सबसे अधिक बहाने वाले देशों में भारत तीसरे स्थान पर है।
- भारत की 14 प्रमुख नदियों का 80 प्रतिशत पानी दूषित और पीने योग्य नहीं है।
- भारत की 9 नदी-घाटी के आस-पास रहने वाली करीब 20 करोड़ की आबादी गंभीर जल संकट से जूझ रही है।
- दुनिया की कुल आबादी का 60 प्रतिशत हिस्सा एशिया में है। इसके बावजूद एशिया को कुल उपलब्ध जल का केवल 36 फीसदी ही मिलता है।
- स्वच्छ पेयजल मुहैया करवा कर पूरी दुनिया में हर साल 16 करोड़ जिंदगियाँ बचाई जा सकती है।
- 95 फीसदी प्राकृतिक आपदाओं की जड़ में जल ही होता है।

11.2 तेल की तरह कीमती हो जाएगा पानी
- तेल 20वीं सदी का सबसे अधिक मुनाफा देने वाला व्यवसाय रहा। 21 वीं सदी में पानी इसका स्थान ले लेगा। पिछले दस वर्ष के दौरान तीन दिग्गज ग्लोबल कम्पनियों ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में तकरीबन 3 करोड़ लोगों तक जल आपूर्ति करने वाले बाजार पर कब्जा कर लिया।

- पाँच साल में बोतलबंद पानी की खपत भारत में तीन गुना और चीन में दो गुना बढ़ गई है। भारत में हर दिन बोतलबंद पानी की करीब 4 करोड़ बोतलें बिकती है। मतलब लगभग 48 करोड़ रुपए प्रतिदिन।

11.3 राजस्थान में जलग्रहण विकास (Watershed Development in Rajasthan)
11.3.1 परिचय

राज्य में विभिन्न जलग्रहण योजनाओं/कार्यक्रमों राष्ट्रीय जलग्रहण विकास कार्यक्रम, ग्रामीण विकास योजनाओं के अंतर्गत मरू विकास कार्यक्रम, सूखा संभावित क्षेत्र विकास कार्यक्रम, मरू प्रसार रोक कार्यक्रम एवं एकीकृत बंजर भूमि विकास परियोजना का क्रियान्वयन किया जा रहा है। जलग्रहण क्षेत्रों में स्थानीय ग्रामीणों द्वारा गठित जलग्रहण समितियों/ग्राम पंचायत के माध्यम से समस्त योजनाएँ सफलता पूर्वक संचालित की जा रही है।

- राजस्थान के सीमित जल संसाधन के कारण कृषि उत्पादन, प्रमुख रूप से वर्षा पर निर्भर है। कृषि योग्य क्षेत्रफल का मात्र 22 प्रतिशत भाग ही सिंचित है शेष 78 प्रतिशत भाग असिंचित/बारानी है। बारानी क्षेत्र में वर्षा के असमान, कम मात्रा व कम घनत्व आदि होने के कारण फसल उत्पादन प्रायः असुरक्षित रहता है। इस जोखिम से उभरने के लिये मिश्रित खेती, वानिकी, पशुधन विकास, मधुमक्खी पालन आदि कार्य अपनाए जाते हैं।

- राज्य की शुष्क भूमि में उत्पादन में होने वाले उतार - चढ़ाव को कम करने, कृषि उत्पादन की समानता बनाए रखने, विकास कार्यों का समुचित उपयोग कर अन्न एवं चारा के उत्पाद की क्षमता बनाए रखने तथा निरंतर जलस्तर में होने वाले ह्रास को दृष्टिगत रखते हुए विभाग द्वारा जल ग्रहण के आधार पर बारानी क्षेत्र पर विकास कार्य कराया जाना आवश्यक समझा गया। इस प्रकार जलग्रहण विकास के आधार पर जो कार्य लिये गए हैं, उनको लाभान्वित कृषकों का व्यापक समर्थन व सहयोग प्राप्त हो रहा है।

- जलग्रहण क्षेत्रों में क्रियान्वित सभी योजनाएँ जन-भागीदारी से संचालित होती हैं। प्रत्येक जलग्रहण क्षेत्र में स्थानीय ग्रामीणों द्वारा गठित जलग्रहण कमेटी/ग्राम पंचायत के माध्यम से विकास कार्य कराया जाता है। इसके अतिरिक्त गैर सरकारी संस्थाएँ जो जलग्रहण क्षेत्र के विकास में सहयोगी हो सकती हैं, उनका भी यथा-योग्य सहयोग लिया जाता है। कृषि योग्य भूमि में कृषि वानिकी एवं उद्यानिकी विकास कार्य तथा सामुदायिक भूमि पर पौधारोपण व चारागाह विकास के कार्यक्रम लिये जाते हैं। पशुधन विकास कार्यक्रम के तहत नस्लों का विकास, नकारा पशु-नियंत्रण, पशु-रोग उपचार आदि कार्य लिये जाते हैं। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक साधनों द्वारा सस्ती एवं ग्राह्य तकनीक अपनाकर निकास नालियों का उपचार कर पानी का वेग नियंत्रण करना, डग आउट/संकन/फार्म पोंड निर्माण एवं हाउस होल्ड प्रोडक्शन आदि महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम क्रियान्वित किए जा रहे हैं।

11.3.2 स्थापना
- राज्य में वर्ष 1957 से भू-संरक्षण कार्य कराए जा रहे हैं। इनमें से अधिकांश कार्य मरू विकास कार्यक्रम एवं सूखा सम्भावित क्षेत्र कार्यक्रम के तहत ही कराए जा रहे थे।
- 7 वीं पंचवर्षीय योजना के काल में बारानी क्षेत्र पर जलग्रहण के आधार पर कार्य कराया जाना प्रारम्भ किया गया।
- 8 वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान भारत सरकार द्वारा शुल्क खेती पर विशेष ध्यान दिया गया और इस हेतु वरीयता के आधार पर वित्तीय सहायता उपलब्ध करायी गई।
- राज्य में भू-संरक्षण कार्य कृषि विभाग के अधीन ही कराए जा रहे थे।
- भू एवं जल संरक्षण के महत्त्व को देखते हुए यह महसूस किया गया कि बारानी क्षेत्र विकास हेतु पृथक से एक विभाग का गठन किया जाए।
- वर्ष 1990-1991 में पृथक से “निदेशालय जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण” के नाम से निदेशालय का गठन किया गया।
- राज्य सरकार की आज्ञा क्रमांक एफ4 (66) प.रा/पी.सी./2002/565 दिनांक 19 जून 2003 के क्रम में आदेश क्रमांक प.14(27) कृषि-I/96 पार्ट-III दिनांक 02 जुलाई 2003 के द्वारा इस विभाग का प्रशासनिक नियंत्रण पंचायती राज विभाग के अधीन किया गया तथा जलग्रहण विकास कार्य जिला परिषदों को हस्तान्तरित किए गए।

11.3.3 जलग्रहण प्रबंधन योजना के विस्तृत उद्देश्य निम्न प्रकार हैं
- प्रत्येक चयनित जलग्रहण क्षेत्र में भूमि का संरक्षण करने के उपाय करना ताकि भू-क्षरण को कम करके कृषि उत्पादन व आमदनी बढ़ाई जाए।
- जल-संसाधनों के विकास के लाभ के लिये जलग्रहण प्रबंधन, संरक्षण व प्रगति को बढ़ाना।
- जलग्रहण क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाएँ जैसे- सूखा आदि को प्राकृतिक संसाधनों को बढ़ावा देकर रोकथाम करना।
- जलग्रहण क्षेत्र के सामान्य आर्थिक विकास में संसाधनों एवं लाभान्वितों का स्तर बढ़ाना ताकि क्षेत्र में रहने वाले विभिन्न समाज के लोगों में असमानता कम हो सके।
- प्राकृतिक संसाधनों के सक्षम उपयोग के लिये जलग्रहण क्षेत्र के सामुदायिक संगठन को मजबूत बनाना ताकि वे विकास कार्यक्रमों को आगे बढ़ा सकें।
- रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाना।

11.3.4 विकास कार्य की विभिन्न गतिविधियाँ
- जलग्रहण विकास के कार्यक्रमों के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए राज्य में विभिन्न कार्यक्रम क्रियान्वित किए जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों के विभिन्न चरण निम्न प्रकार से हैं-
- सर्वेक्षण और परियोजना प्रारूप तैयार करना
- परियोजना का प्रारूप लाभान्वित कृषकों से विचार-विमर्श कर उनके अनुभवों के आधार पर तैयार किया जाता है। जलग्रहण क्षेत्र के सर्वेक्षण, भू-सर्वेक्षण, सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के आधार पर स्थानीय लाभार्थियों से विचार-विमर्श कर उनकी इच्छा तथा उनके अनुभव आदि को ध्यान में रखते हुए परियोजना के प्रारूप को अंतिम रूप दिया जाता है।

प्रशिक्षण
- जलग्रहण परियोजनाओं के क्रियान्वयन हेतु प्रशिक्षण एक आवश्यक अंग है। अतः प्रशिक्षण लाभार्थियों, परियोजना क्रियान्वयन में कार्यरत कर्मचारी एवं अधिकारियों को दिया जाता है। मुख्यतः भूमि एवं नमी संक्षारण की तकनीक तथा सामुदायिक एवं व्यक्तिगत विकास कार्य के रख-रखाव, उन्नत कृषि विधि, उद्यानिकी, कम्पोस्ट एवं घरेलू बागवानी, पशुधन विकास कार्य, चारा विकास कार्य, मत्स्यपालन, सकल घरेलू उत्पाद आदि में दक्षता हासिल किए जाने के उद्देश्य से प्रशिक्षण दिया जाता है।

- उपर्युक्त सभी कार्यों में लाभान्वित कृषक की सहभागिता की आवश्यकता को देखते हुए लाभार्थी कृषक को उपर्युक्त कार्यों हेतु प्रशिक्षण दिया जाता है।

सामुदायिक संगठन एवं जनभागीदारी
- जलग्रहण विकास कार्यों के स्थायी लाभ प्राप्ति हेतु, स्थानीय समुदाय की प्लानिंग स्तर पर ही सहभागिता की आवश्यकता है। क्योंकि जलग्रहण विकास कार्य स्थानीय समुदाय द्वारा स्थापित कमेटी के माध्यम से कराए जाते हैं। अतः जलग्रहण विकास में जनभागीदारी एवं सामुदायिक संगठन की विशेष भूमिका है। अतः स्वयं सहायता समूह, उपभोक्ता आदि का गठन किया जाता है तथा जलग्रहण विकास कार्यक्रम संबंधी जानकारी बढ़ाने हेतु भ्रमण कैम्पस आदि आयोजित किए जाते हैं।

संरक्षण कार्य निम्न प्रकार हैः
- समोच्च खेती
- पानी के बहाव को रोकने के लिये कंटूर/वानस्पतिक अवरोध
- गली कन्ट्रोल के तरीके
- बेंच ट्रेसिंग
- ग्रेडेड बंडिंग
- छोटे नालों की रोकथाम दूर करने के साथ-साथ ड्रेनेज लाइन उपचार कराना। नाले के किनारों को मजबूत करवाना
- एल.एस.सी.डी. गेबियन, चेकडैम, ब्रुशवुड, चेकडैम
- पानी एकत्रित करने हेतु साधन जैसे फार्म पोण्ड, चेकडैम, एनीकट, खडीन आदि का निर्माण कराना

शष्य क्रियाएँ
- चारा, लकड़ी, ईंधन, उद्यान की फसल, नर्सरी तैयार करना
- चारागाह विकास
- वानिकी विकास
- कृषि वानिकी एवं उद्यानिकी विकास
- फसल प्रदर्शन द्वारा कृषि क्रियाओं का विकास जैसे मिश्रित फसल, अन्तः फसल, एलोक्रोपिंग फसल चक्र इत्यादि
- कार्बनिक खेती
- किचन गार्डन का विकास

पशुधन विकास
- जलग्रहण क्षेत्रों में पशुओं का सुधार करना ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास के लिये महत्त्वपूर्ण अंग है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत विशेष रूप में निम्न कार्य करवाए जा रहे हैं।
- नस्ल सुधार
- बधियाकरण
- पशुओं के स्वास्थ्य की देखभाल हेतु कैम्पस आयोजित करना

हाउस होल्ड प्रोडक्शन सिस्टम
- जलग्रहण क्षेत्र के भूमिहीन श्रमिक, लघु एवं सीमांत कृषकों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिये घरेलू उत्पादन के साधनों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से जैसे मुर्गीपालन, बकरी पालन, कुटीर उद्योग, लुहार कार्य, मधुमक्खी पालन, सेरीकल्चर आदि लघु उद्योगों को कृषकों द्वारा अपनाए जाने हेतु बढ़ावा दिया जाता है।

अनुसंधान एवं नवीन तकनीकी
- परियोजना में अनुसंधान एवं नवीन तकनीकी अपनाने हेतु प्रावधान है।

11.3.5 क्रियान्वित योजनाएँ
- जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण कार्यों का क्रियान्वयन राज्य में विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत किया जा रहा है। इनका योजनावार विवरण निम्नानुसार हैः-

राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजना
1. राजस्थान में बारानी क्षेत्रों के विकास को समर्पित ‘राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजना’ कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के वित्तीय सहयोग से क्रियान्वित की जा रही है। आठवीं पंचवर्षीय योजना अवधि से निरंतर उक्त योजना का प्रसार होता चला आ रहा है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों जैसे जल, जंगल, जमीन, जन-मानस, जानवर का स्थायी एवं सतत विकास सुनिश्चित करना, कृषि योग्य भूमि से उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाना तथा स्थानीय स्तर पर रोजगार के साधन उपलब्ध कराना है।

2. राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजना का प्रमुख उद्देश्य बारानी खेती को अधिक टिकाऊ और उत्पादन वाली कृषि प्रणालियों में परिवर्तित करना और उस पर आश्रित जनसंख्या को बेहतर सहारा सतत रूप से देना है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, विकास, उपयोग एवं पारिस्थितिकीय संतुलन की पुनःस्थापना करते हुए ग्रामीण समुदाय के साथ-साथ भूमिहीनों के लिये रोजगार के सतत अवसर पैदा कर सिंचित एवं बारानी क्षेत्रों की क्षेत्रीय विभिन्नता में कमी किया जाना भी इस योजना का प्रमुख उद्देश्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु वर्तमान में उन्हीं ब्लाॅक्स का चयन इस योजना हेतु किया गया है, जहाँ 30 प्रतिशत से कम कृषि योग्य भूमि सिंचाई के सुनिश्चित साधनों द्वारा सिंचित की जाती है। योजना अंतर्गत चयन हेतु अन्य मापदंड लैंड डिग्रेडेशन की विभीषिका, जलग्रहण के ऊपरी भाग की स्थिति, ग्राम में पूर्व में जलग्रहण विकास परियोजना हेतु किए गए निवेश में कमी, निजी जोत में आने वाली कृषि योग्य भूमि की उपलब्धता, अनुसूचित जाति/जनजाति, संसाधन विहीन गरीबों की उपलब्धता और जनसमुदाय की कार्यक्रम में भाग लेने की इच्छा शक्ति एवं सृजित परिसम्पतियों के रख-रखाव की जिम्मेदारी लेने का अभाव है।

3. राजस्थान में केन्द्रीय प्रवर्तित योजना राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजनान्तर्गत 1 अप्रैल 2001 से भारत सरकार द्वारा जारी नवीन दिशा-निर्देशों, ‘वरसा जनसहभागिता’ के अनुरूप जलग्रहण परियोजनाओं का क्रियान्वयन किया गया है। इस योजना के अंतर्गत वर्तमान में श्रीगंगानगर व बूँदी (श्रीगंगानगर सिंचित क्षेत्र होने एवं बूँदी में पायलेट जलग्रहण क्षेत्र संचालित होने के कारण) जिले के अतिरिक्त राज्य के 30 जिलों की 199 पंचायत समितियों में कुल 818 जलग्रहण परियोजनाएँ क्रियान्वित की गई हैं। इनमें से 320 जलग्रहण क्षेत्र जो कि पायलेट आधार पर वर्ष 2001-02 में चयनित किए गए थे, वर्ष 2005-06 तक पूर्ण हो चुकी है एवं मार्गदर्शिका के अनुसार कुछ जलग्रहण क्षेत्रों में सितम्बर, 06 तक भी क्रियान्वयन हुआ है। शेष 818 जलग्रहण क्षेत्रों का चयन वर्ष 2002-03 में किया गया था एवं इनकी अवधि वर्ष 2006-07 में पूर्ण हो गई। 320 पायलेट जलग्रहण क्षेत्रों का एक्जिट प्रोटोकाॅल करवाया गया है। ताकि सृजित परिसम्पत्तियों का रखरखाव स्थानीय लाभार्थियों एवं समुदाय द्वारा किया तब जाकर भविष्य में भी इनसे निरंतर लाभ प्राप्त किया जा सके।

4. जलग्रहण योजना का सीमांकन एवं प्राथमिकीकरण जिला मानचित्र, माइक्रो वाटरशेड (25000 से 30000 हेक्टेयर) सर्व विभाग एवं स्टेट रिमोट सेंसिंग एजेंसी के नक्शों पर करते हुए क्रमशः उप वाटरशेडों 5000 से 6000 हेक्टेयर में विभक्त करते हुए अंत में 500-500 हेक्टेयर की इकाई में किया जाता है, जिन्हें माइक्रो वाटरशेड कहते हैं। यह क्षेत्र जलग्रहण संस्था हेतु एक आदर्श इकाई होता है। इस परियोजना हेतु नोडल विभाग राजस्थान सरकार का जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग है। जिले पर जिला परिषद (ग्रामीण विकास प्रकोष्ठ) द्वारा परियोजना का कार्य देखा जाता है एवं ब्लॉक पर पंचायत समिति परियोजना क्रियान्वयन एजेंसी है।

5. वरसा जन सहभागिता मार्गदर्शिका के अनुसार परियोजना क्रियान्वयन एजेंसी द्वारा जलग्रहण विकास दल की नियुक्ति की जाती है, जिसमें कृषि अभियांत्रिक, कृषि, पशुपालन एवं समाजिक-विज्ञान के विशेषज्ञ होते हैं। इनके परामर्श एवं तकनीकी मार्गदर्शन में ही जलग्रहण विकास गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं। जलग्रहण समुदाय की साधारण सभा जिसे ‘जलग्रहण संस्था’ कहा जाता है, का गठन करवाया जाता है, जो कि औपचारित रूप से सहकारिता विभाग द्वारा सोसाइटी अधिनियम अंतर्गत पंजीकृत करवाई जाती है। स्वयं सहायता समूहों में से चार, उपभोक्ता समूहों में से पाँच ग्राम पंचायत व डब्ल्यू डी.टी. में से एक प्रतिनिधि नामजद कर ग्यारह सदस्यीय “जलग्रहण समिति” बनाई जाती है। समिति के रोजमर्रा के काम एवं लेखे आदि संधारण करने में मदद हेतु वेतनभोगी जलग्रहण सचिव एवं जलग्रहण कार्यकर्ताओं की पहचान की जाती है।

6. परियोजना हेतु निधियों का आवंटन जलग्रहण संस्था द्वारा स्वीकृत कार्य योजना के विपरीत राशि आवंटन पी.आइ.ए.द्वारा इस कार्य के लिये विशेष रूप से खोले गए खाते में किया जाता है, जो कि जलग्रहण कमेटी के अध्यक्ष, डब्लू डी.टी. के एक सदस्य और जलग्रहण सचिव के संयुक्त हस्ताक्षरों से संधारित होता है। राशि का मदवार आवंटन/व्यय पाँच वर्षों तक लगातार उपर्युक्त खाते में से किया जाता है। परियोजना अंतर्गत निर्मित सामुदायिक परिसम्पत्तियों के उपयुक्ता रख-रखाव की सुनिश्चितता हेतु अनुमोदित परियोजना लागत का एक प्रतिशत जलग्रहण विकास निधि (कोरपस) निधि के रूप में चिन्हित कर समुदाय को उपलब्ध कराया जाता है। स्थानीय ग्रामीण अपना अंशदान नियमानुसार अलग से उपलब्ध कराते हैं, जो कि एक बैंक खाते में रखा जाता है। परियोजना के अनुवेक्षण एवं मूल्यांकन हेतु भी व्यवस्थाएँ की गई हैं।

7. परियोजना में जनसमुदाय को परियोजना से लाभ उठाने एवं इसकी तैयारी के क्रम में स्थानीय जन-समुदाय की क्षमता निर्माण, योजना का प्रचार-प्रसार, क्रियान्वयन प्रारम्भ करने के लिये (ताकि जनसमुदाय सरकार पर निर्भर न होकर आत्मनिर्भर बनना सीखें एवं स्वयं ही योजना के विभिन्न पहलुओं से परिचित हो, अपने हाथों से अपना भविष्य सँवार सके) प्रबंधक घटक अंतर्गत विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं दूरस्थ सफलतम जलग्रहण क्षेत्रों के भ्रमण कार्यक्रम अनुवेक्षण एवं मूल्यांकन किए जाते हैं।

8. योजना में प्रवेश बिंदु गतिविधि अंतर्गत स्थानीय जनता की आकांक्षा के अनुरूप अधिकतम 3 प्रतिशत राशि से जनोपयोगी कार्य यथा भवन निर्माण, सड़क निर्माण/तलाई-खुदाई आदि किए जाते हैं। यह कार्य स्थानीय ग्रामीणों एवं पी.आई.ए. के मध्य एक कड़ी का कार्य कर उन्हें आपस में जोड़ता है। योजना अंतर्गत दो प्रकार के समूह ग्राम/जलग्रहण स्तर पर गठित करवाए जाते हैं, जैसे स्वयं सहायता समूह (भूमिहीन, सीमांत कृषक एवं घरेलू महिलाओं का), उपभोक्ता समूह (चयनित जलग्रहण में आने वाले उपभोग कर्ताओं का)। समूह गठन में ग्राम स्तरीय सामुदायिक संगठनकर्ता की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है।

9. नवीन वरसा जनसहभागिता मार्गदर्शिका के अनुसार कुल 100 प्रतिशत राशि का वृहद मदों के अंतर्गत निम्नानुसार बँटवारा किया जाता है:-

 

 

1.

प्रबंधन मद

%

()

प्रशासनिक मद

10

()

प्रशिक्षण मद          

5

()

सामुदायिक संगठन मद        

7.5

 

योग(1)   

22.5

2.

विकास मद

%

()

प्राकृतिक संसाधन विकास     

50

()

फार्म उत्पादन प्रवृति              

20

()

भूमिहीन परिवारों हेतु सहायता

7.5

 

योग(2)   

77.5

 

महायोगः- (1+2)    

100


10. जनसहभागिता आधारित ग्रामीण सिंहावलोकन अभ्यास (पी.आर.ए.) द्वारा ग्राम के सामाजिक, भौगोलिक, आर्थिक परिदृश्य की जानकारी प्राप्त कर जनसहभागिता के माध्यम से करवाए जाने वाले कार्यों हेतु सर्वेक्षण करवाए जाते हैं। इसके परिणामों के आधार पर कार्य स्वीकृत कर कार्ययोजना बनायी जाती है, जिसे जलग्रहण संस्था द्वारा स्वीकृत कर क्षेत्र में विकास करवाए जाते हैं।

11. प्राकृतिक संसाधनों के अंतर्गत निजी भूमि संसाधन हेतु कम से कम भूमि को बिना जुता रखने एवं खेतों में पूर्ण रूप से नमी संरक्षित रखने के मार्गदर्शी सिद्धांतों के तहत अंशदान देने के इच्छुक कृषकों के यहाँ ही “रिज टू वैली एप्रौच” से कार्य किया जाता है, जिसमें निजी एवं बंजर भूमि का सुधार भी शामिल है। जल एवं मृदा-संरक्षण उपायों सहित समस्याग्रस्त भूमि भी उपचारित की जाती है। सामान्य (सामूहिक) भूमि संसाधन प्रबंधन अंतर्गत चारागाह विकास में संरक्षण के उपाय वी डिच बीजारोपण/पौधारोपण आदि कार्य किए जाते हैं। जल संसाधनों के विकास हेतु जहाँ की तहाँ (इन सिटु) नमी संरक्षण, विभिन्न संरचनाओं द्वारा जल संरक्षण, भूजल एवं अधिशेष वर्षाजल के संरक्षण हेतु अधिकतम देशी ज्ञान का सदुप्रयोग किया जाता है।

12. भूमि की उत्पादकता एवं जल आधारित उपक्रमों के सुधार के लिये तकनीकी प्रबंधन व्यवस्था में नवीन एवं चिरस्थायी तकनीकों का परीक्षण एवं प्रदर्शन जैसे कि एकीकृत कीटनाशक, सूखा प्रतिरोधी अल्पावधि प्रजातियाँ, खेती पद्धति में विभिन्नीकरण पर जोर दिया जाता है। पशुधन के मामले में मौजूद नस्ल सुधार, बीमारी के नियंत्रण हेतु लागत प्रभावी पद्धतियों के अंगीकरण/पोषकों का वित्तीय प्रबंधन, मौसमी चारे की उपलब्धता, अनुत्पादक पशुओं की छंटनी कर पशुधन उत्पादकता में वृद्धि की जाती है। खेतीहर भूमि में बागवानी एवं वानिकी के सम्मिलित प्रयासों से चारा, लकड़ी एवं फल आदि से नगद आय उपलब्ध करायी जाती है।

13. भूमिहीन परिवारों की आय एवं आजीविका की उन्नति हेतु संबंधित परिवारों द्वारा तैयार किए गए माइक्रो प्लान के विरुद्ध स्वयं सहायता समूहों को मैचिंग रिवॉल्विंग निधि, परियोजना मद से उपलब्ध करायी जाती है। इसमें संसाधनहीन परिवारों एवं महिलाओं के सशक्तिकरण हेतु पूरा ध्यान रखा जाता है, जिसकी अधिकतम सीमा 25000/- रुपये प्रति समूह है।

14. इस प्रकार राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजना राज्य के दो तिहाई से अधिक बारानी क्षेत्रों के समग्र एवं सतत विकास में एक वरदान के रूप में सिद्ध हो रही हैं।

15. इस योजनान्तर्गत आठवीं पंचवर्षीय योजना अवधि में कुल 204 जलग्रहण क्षेत्रों में कार्य पूर्ण करवाए गए, जिन पर 146.27 करोड़ रु. व्यय किए जाकर 5.48 लाख हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र उपचारित किया गया। इसके अतिरिक्त नवीं पंचवर्षीय योजना अवधि में कुल 193 जलग्रहण क्षेत्रों में कार्य पूर्ण करवाए गए। जिन पर 178.73 करोड़ रु. व्यय किए जाकर 4.83 लाख हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र उपचारित किया गया।

16. दसवीं पंचवर्षीय योजना अवधि के दौरान कुल 1138 जलग्रहण क्षेत्रों में कार्य हाथ में लिया गया है जिनकी कुल स्वीकृत लागत एवं 5.46 लाख हेक्टेयर क्षेत्र उपचारित करने का लक्ष्य रखा गया।

17. उत्पादन पद्धति के अंतर्गत कृषि/अकृषि योग्य भूमि पर इस विभाग द्वारा राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजनान्तर्गत राज्य में फसल प्रदर्शन कार्यक्रम, चारा विकास कार्यक्रम एवं उद्यानकीय पौधारोपण कार्यक्रम, पशुधन विकास, चारागाह विकास के साथ-साथ रोजगारोन्मुखी अन्य कार्यक्रम जैसे-घरेलू उत्पादन पद्धति एवं आॅर्गेनिक फार्मिंग आदि गतिविधियाँ ली गई है।

18. ‘राज्य के जलग्रहण क्षेत्रों के पौष्टिक चारा, पर्याप्त ईंधन एवं लकड़ी उपलब्ध कराने, बायोमास में बढ़ोतरी, पानी के बहाव को रोकने, पर्यावरण संतुलित करने, कालांतर में प्रति हेक्टेयर में उपज वृद्धि करने की दृष्टि से राष्ट्रीय जलग्रहण विकास कार्यक्रम के अंतर्गत वृक्षारोपण कार्य सम्पादित किया गया।

19. फलों के उत्पादन में वृद्धि एवं कृषकों को आमदनी बढ़ाने के उद्देश्य से राज्य के जलग्रहण क्षेत्रों में फलदार पौधारोपण का कार्यक्रम लिया गया है।

20. सामुदायिक भूमि में चारागाह विकास के कार्य हाथ में लिये गए।

21. पशुधन विकास कार्यक्रम : कृषि एवं भू-संरक्षण कार्यों के साथ-साथ संचालित विभिन्न योजनाओं में पशुधन विकास कार्यों की क्रियान्वित भी की जाती है, जिनमें पशु चिकित्सा कैम्पों का आयोजन, टीकाकरण, कृत्रिम गर्माधान, बधियाकरण किया जाता है।

22. स्वयं सहायता समूह: जलग्रहण क्षेत्र के भूमिहीन परिवारों 7 कृषक परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधारने, आत्मनिर्भर एवं स्वावलम्बी बनाने हेतु विभिन्न प्रकार के स्वयं सहायता समूहों का गठन कर रिवॉल्विंग फंड उपलब्ध करवाया जाता है।

नई काॅमन मार्गदर्शिका के अनुसार 11 वीं पंचवर्षीय योजना अवधि में राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजना का क्रियान्वयन
वर्तमान में राज्य में राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजनान्तर्गत जलग्रहण क्षेत्रों की उपचार दर भारत सरकार द्वारा रु. 12000/- प्रति हेक्टेयर अधिकतम किए जाने के फलस्वरूप 21 जिलों की 111 चयनित ब्लाॅक (पंचायत समिति) में कुल 286 जलग्रहण परियोजनाएँ क्रियान्वित की जा रही है जिस हेतु स्वीकृत राशि रु. 260.09 करोड़ तथा उपचार हेतु लक्षित क्षेत्रफल 2.19 लाख हेक्टेयर है। 11 वीं योजना के स्वीकृत जलग्रहण क्षेत्रों को वित्तीय वर्ष 2012-13 तक क्रियान्वित किया जाना है।

कृषि मंत्रालय एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा स्वीकृत समस्त जलग्रहण विकास योजनाओं का क्रियान्वयन 11 वीं पंचवर्षीय योजना अवधि में सन 2008 से काॅमन मार्गदर्शिका के अंतर्गत किया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2009-10 के अंतर्गत परियोजना के क्रियान्वयन हेतु राशि रु. 2500 करोड़ का एलोकेशन रखा गया है। नई मार्गदर्शिका के अनुसार इस परियोजना के तीन विशिष्ट क्रियान्वयन चरण हैं-

- प्रारंभिक तैयारी चरण (प्रिपेरेटरी फेज)
- कार्य क्रियान्वयन चरण (वर्क्स फेज)
- पूर्णतः चरण (कन्सोलिडेशन फेज)

राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजना कृषि के वृहद प्रबंधन मद अर्थात कार्य योजना अंतर्गत एक केन्द्रीय प्रवर्तित योजना है जिसमें केन्द्रीयांश 90 प्रतिशत व राज्यांश 10 प्रतिशत है।

प्रोजेक्ट की विषय वस्तु व किए जाने वाले कार्य: नई काॅमन मार्गदर्शिका में उल्लेखित विभिन्न मदों के अंतर्गत जलग्रहण परियोजना में आवंटित बजट का वितरण निम्न प्रकार है-

 

बजट घटक

कुल बजट का %

प्रशासनिक व्यय    

10

मॉनीटरिंग              

1

मूल्यांकन

1

तैयारी चरण, जिसमें सम्मिलित हैं

 

प्रवेश बिंदु गतिविधियाँ

4

संस्थान क्षमता निर्माण

5

विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डी.पी.आर)

1

जलग्रहण कार्य चरण

 

जलग्रहण विकास कार्य

50

संसाधनहीन व्यक्तियों हेतु आजीविका गतिविधियाँ

10

उत्पादन व्यवस्था एवं सूक्ष्म उद्यम

13

सघनीकरण चरण

5

कुल

100


बीसलपुर पेयजल वितरण परियोजना
बीसलपुर पेयजल वितरण परियोजना (डैम) के पानी आवक क्षेत्र (कैचमेंट) से पानी बहाव की तीव्रता कम करने एवं मिट्टी रोकने के उद्देश्य से पंचायत समिति केकड़ी (जिला अजमेर) जहाजपुरा (जिला भीलवाड़ा) एवं देवली (जिला टोंक) में मृदा एवं जल संरक्षण कार्यों की परियोजना सिंचाई विभाग द्वारा माह मार्च, 2005 में स्वीकृत की गई है, जिसके अंतर्गत 20222 हेक्टेयर क्षेत्र को वर्ष 2008-09 तक उपचारित करने के लिये 11.06 लाख रुपये का प्रावधान रखा गया है।

ग्रामीण विकास योजनाएँ (भू-संसाधन)
मरू विकास कार्यक्रम (डी.डी.पी)
परिचय

मरू विकास कार्यक्रम मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया को रोकने, प्रभावित क्षेत्रों में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और इन क्षेत्रों में भूमि की उत्पादकता और जल संसाधनों में वृद्धि करने के उद्देश्य से समेकित क्षेत्र विकास कार्यक्रम के रूप में 1977-78 से शुरू किया गया था। शनैः शनै इस कार्यक्रम में अनके परिवर्तन किए गये तथा वर्ष 1995-96 से यह कार्यक्रम जलग्रहण विकास दृष्टिकोण के आधार पर तथा 01 अप्रैल 2003 से हरियाली मार्गदर्शिका के अनुसार क्रियान्वित किया जा रहा है।

उद्देश्य
प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम उपयोग द्वारा ग्राम समुदाय के आर्थिक विकास को बढ़ावा देना जिससे पारिस्थितिक निम्नीकरण और मरुस्थलीकरण को रोका जा सके और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने को बढ़ावा मिले। संसाधनों के समान वितरण के माध्यम से साधनहीन और उपेक्षित वर्गों की स्थिति में सुधार लाने पर विशेष बल दिया जाता है।

मुख्य बिंदु
- प्रो.सी.एच हनुमन्था राव की अध्यक्षता में तकनीकी समिति की सिफारिशों के अनुसरण में मरू विकास कार्यक्रम के क्रियान्वयन की नीति को 1 अप्रैल 1995 से पुनर्गठित किया गया है।

- यह कार्यक्रम राज्य के 16 जिलों यथा अजमेर, बाड़मेर, बीकानेर, चूरू हनुमानगढ़, जयपुर, जैसलमेर, जालौर, झुंझुनूं, जोधपुर, नागौर, पाली, राजसमंद, सीकर, सिरोही एवं उदयपुर के 85 विकासखंडों में लागू है जिनका विवरण परिशिष्ट-1 पर उपलब्ध है।

- एक जलग्रहण परियोजना में लगभग 500 हेक्टेयर भूमि पर जलग्रहण विकास दृष्टिकोण के आधार पर विकासीय कार्य किए जा रहे हैं जिसमें हर श्रेणी की भूमि शामिल होती है अर्थात एक जलग्रहण परियोजना लगभग 500 हेक्टेयर की होती है। परियोजना को 5 वर्षीय परियोजना काल में पूर्ण किया जाना होता है।

- दिनांक 1 अप्रैल 2000 से पूर्व स्वीकृत परियोजनाओं के लिये लागत मापदंड 5000/- रुपये प्रति हेक्टेयर था, लेकिन दिनांक 01 अप्रैल 2000 एवं इसके पश्चात स्वीकृत परियोजनाओं पर लागत मापदंड 6000/- रुपये प्रति हेक्टेयर किया गया है।

- जिला परिषद द्वारा गाँवों/जलग्रहण परियोजनाओं का चयन करने के साथ-साथ जलग्रहण विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिये परियोजना क्रियान्वयन एजेंसियों का भी चयन किया जाता है।

- जहाँ पर एक जलग्रहण का क्षेत्र एक ग्राम पंचायत के तहत आने वाले क्षेत्र के बराबर हो अथवा इसका क्षेत्र एक ग्राम पंचायत की सीमाओं के भीतर आता हो तो संबंधित पंचायत की ग्राम सभा को जलग्रहण संघ के रूप में नामजद किया जाता है, जिसमें ग्राम के सभी वयस्क व्यक्ति सदस्य होते हैं। जलग्रहण परियोजनाओं के दिन प्रतिदिन के कार्य जलग्रहण समिति द्वारा बहुआयामी जलग्रहण विकास दल की सहायता से किए जाते हैं एवं यह कार्य संपूर्ण रूप से जलग्रहण संघ के निरीक्षण और नियंत्रण के अधीन रहते हुए किए जाते हैं।

- जलग्रहण कार्यक्रम में पंचायतीराज संस्थाओं की भूमिका सुनिश्चित किए जाने के उद्देश्य से पंचायतों को जलग्रहण परियोजनाओं की क्रियान्वयन एजेंसी बनाने में प्राथमिकता दी जाती है।

- जलग्रहण परियोजनाओं के क्रियान्वयन हेतु राशि जलग्रहण समिति/ग्राम पंचायत को रिलीज की जाती है। जलग्रहण परियोजना कार्य पूर्ण होने के पश्चात बहिर्गमन व्यवस्था के अधीन ग्राम पंचायत को परियोजनान्तर्गत सृजित परिसम्पत्तियों को सम्भलवानें की व्यवस्था है।

- 01 अप्रैल 1999 से इस कार्यक्रम के अंतर्गत स्वीकृत परियोजनाओं हेतु 75 प्रतिशत केन्द्रीय सहायता देय हैं। दिनांक 01 अप्रैल 2003 से योजनान्तर्गत हरियाली मार्गदर्शिका जलग्रहण विकास के लिये प्रभावी है जिसमें पूर्व मार्गदर्शिका में संशोधन करते हुए निम्नानुसार प्रमुख परिवर्तन किए किए गए हैंः-

- कार्य मद में 80 प्रतिशत के स्थान पर 85 प्रतिशत प्रावधान।
- प्रशिक्षण एवं सामुदायिक संगठन मद में 10 प्रतिशत के स्थान पर 5 प्रतिशत का प्रावधान।
- प्रशासनिक मद के लिये निर्धारित 10 प्रतिशत में से अवशेष राशि का उपयोग कार्य तथा प्रशिक्षण के लिये किए जाने का प्रावधान किंतु कार्य मद तथा प्रशिक्षण मद के लिये निर्धारित सीमा राशि में से अवशेष राशि का उपयोग प्रशासनिक मद के लिये अमान्य।
- पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका विशेष प्राथमिकता के आधार पर जलग्रहण विकास के लिये सुनिश्चित।
- कार्य निष्पादन केवल संबंधित ग्राम पंचायत के माध्यम से करवाए जाने का प्रावधान।
- जलग्रहण परियोजना कार्य पूर्ण होने के पश्चात बहिर्गमन व्यवस्था के अधीन ग्राम पंचायत को परियोजनान्तर्गत सृजित परिसम्पत्तियों को सम्भलवाने की व्यवस्था है।

मरू प्रसार रोक (सी.डी.पी.)
- भारत सरकार द्वारा मरू विकास कार्यक्रम के अंतर्गत वर्ष 1999-2000 में मरू प्रसार रोक पर एक विशेष परियोजना स्वीकृत की गई है। यह विशेष परियोजना राज्य के 10 मरुस्थलीय जिलों यथा बाड़मेर, बीकानेर, चूरू, जोधपुर, जैसलमेर, जालौर, झुंझुनू, नागौर, पाली एवं सीकर में क्रियान्वित की जा रही है। इस योजनान्तर्गत मुख्यतया टिब्बा स्थरीकरण शेल्डरबेल्ट प्लान्टेशन एवं वनारोपण के कार्य करवाए जा रहे हैं। परियोजना की क्रियान्विति राज्य सरकार के वन विभाग द्वारा की जा रही है।

- भारत सरकार द्वारा विशेष परियोजना को वर्ष 1999-2000 से प्रत्येक वर्ष स्वीकृति दी गई है।

सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम (डी.पी.ए.पी.)
परिचय

सूखा संभावित क्षेत्र विकास कार्यक्रम राज्य में 1974-75 से आरम्भ किया गया था। इस कार्यक्रम के अंतर्गत भूमि, जल, पशुधन, मानव संसाधनों का संरक्षण, विकास एवं उन्हें बनाए रखकर भौगोलिक संतुलन रखने के उपाय किए गये। शनैः शनै आवश्यकतानुसार इस कार्यक्रम में अनेक परिवर्तन किए गए तथा वर्ष 1995-96 से यह कार्यक्रम जलग्रहण विकास आधारित दृष्टिकोण के आधार पर क्रियान्वित किया जा रहा है।

उद्देश्यः
कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य सूखाग्रस्त क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग करते हुए आर्थिक विकास करना तथा सूखे के प्रतिकूल प्रभाव को कम कर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना है।

मुख्य बिंदु
- वर्ष 1995-96 से कार्यक्रम का संचालन प्रो. हनुमन्था राव कमेटी की सिफारिशों के अनुसार जल ग्रहण विकास दृष्टिकोण के आधार पर क्रियान्वित किया जा रहा है।
- यह कार्यक्रम राज्य के 11 जिलों यथा बांसवाड़ा, डूंगरपूर, उदयपुर, अजमेर, झालावाड़, कोटा, बारा, टोंक, सवाई माधोपुर, करौली एवं भरतपुर के 32 विकासखंडों में लागू है। इन विकासखंडों का विवरण परिशिष्ट-2 पर उपलब्ध है।
- लगभग 500 हेक्टेयर की चिन्हित परियोजना को 5 वर्षीय परियोजना काल में पूर्ण किया जाना होता है।
- दिनांक 01 अप्रैल 1999 से इस कार्यक्रम के अंतर्गत स्वीकृत परियोजनाओं हेतु 75 प्रतिशत केन्द्रीय सहायता देय है।
- दिनांक 01 अप्रैल 2000 से पूर्व स्वीकृत परियोजनाओं के लिये लागत मापदंड 4000/- रुपये प्रति हेक्टेयर है लेकिन दिनांक 01 अप्रैल 2000 एवं इसके पश्चात परियोजनाओं पर लागत मापदंड 6000/- रुपये प्रति हेक्टेयर है।
- जिला परिषद द्वारा गाँवों/जलग्रहण परियोजनाओं का चयन करने के साथ-साथ जलग्रहण विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिये परियोजना क्रियान्वयन एजेंसियों का भी चयन किया जाता है।
- जहाँ पर एक जलग्रहण का क्षेत्र एक ग्राम पंचायत के तहत आने वाले क्षेत्र के बराबर हो अथवा इसका क्षेत्र एक ग्राम पंचायत की सीमाओं के भीतर आता हो तो संबंधित पंचायत की ग्राम सभा को जलग्रहण संघ के रूप में नामजद किया जाएगा, जिसमें ग्राम के सभी वयस्क व्यक्ति सदस्य होते हैं। जलग्रहण परियोजनाओं के दिन प्रतिदिन के कार्य जलग्रहण समिति द्वारा बहुआयामी जलग्रहण विकास दल की सहायता से किए जाते हैं एवं यह कार्य सम्पूर्ण रूप से जलग्रहण संघ के निरीक्षण और नियंत्रण के अधीन रहते हुए किए जाते हैं।
- जलग्रहण कार्यक्रम में पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका सुनिश्चित किए जाने के उद्देश्य से पंचायतों को जलग्रहण परियोजनाओं की क्रियान्वयन एजेंसी बनाने में प्राथमिकता दी जाती है।
- जलग्रहण परियोजनाओं के लिये राशि जलग्रहण समिति/ग्राम पंचायत को रिलीज की जाती है।
- जलग्रहण परियोजना कार्य पूर्ण होने के पश्चात बहिर्गमन व्यवस्था के अधीन ग्राम पंचायत को परियोजनान्तर्गत सृजित परिसम्पत्तियों को सम्भलवाने की व्यवस्था।
दिनांक 01 अप्रैल 2003 से योजनान्तर्गत हरियाली मार्गदर्शिका विकास के लिये प्रभावी है। जिसमें पूर्व मार्गदर्शिका में संशोधन करते हुए निम्नानुसार प्रमुख कार्य किए गए हैंः-

- कार्य मद में 80 प्रतिशत के स्थान पर 85 प्रतिशत प्रावधान।
- प्रशिक्षण एवं सामुदायिक संगठन मद में 10 प्रतिशत के स्थान पर 5 प्रतिशत का प्रावधान।
- प्रशासनिक मद के लिये निर्धारित 10 प्रतिशत में से अवशेष राशि? का उपयोग कार्य तथा प्रशिक्षण के लिये किए जाने का प्रावधान किंतु कार्य मद तथा प्रशिक्षण मद के लिये निर्धारित सीमा राशि में से अवशेष राशि का उपयोग प्रशासनिक मद के लिये अमान्य।
- पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका विशेष प्राथमिकता के आधार पर जलग्रहण विकास के लिये सुनिश्चित।
- कार्य निष्पादन केवल संबंधित ग्राम पंचायत के माध्यम से करवाए जाने का प्रावधान।

एकीकृत बंजर भूमि विकास कार्य क्रम (आई. डब्ल्यू.डी.पी.)
परिचय

राजस्थान राज्य का भौगोलिक क्षेत्र 342 लाख हेक्टेयर है तथा लगभग 101.45 लाख हेक्टेयर बंजर भूमि है। इस तरह राजस्थान में भौगोलिक क्षेत्र की दृष्टि से 29 प्रतिशत भूमि बंजर है। इस योजना की क्रियान्विति वर्ष 1992 में प्रारम्भ हुई थी। दिसम्बर, 1999 तक यह योजना ग्रामीण विकास विभाग द्वारा संचालित की जा रही थी। इसके उपरांत इस योजना का संचालन सिंचित क्षेत्र विकास विभाग द्वारा किया गया था। वर्ष 2003-4 से यह योजना पुनः ग्रामीण विकास विभाग द्वारा क्रियान्वित की जा रही है।

उद्देश्य
इस योजना का मुख्य उद्देश्य गैर वन क्षेत्र (नाॅन फॉरेस्ट एरिया) में जलाने के लिये लकड़ी, इमारती लकड़ी, चारा एवं घास पैदा करना है जिससे स्थानीय निवासियों की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके एवं वन क्षेत्र पर दबाव कम करने के साथ-साथ पर्यावरण को संतुलित किया जा सके तथा बंजर भूमि को उपचारित कर भूमि की उत्पादकता बढ़ाई जा सके।

मुख्य बिंदु
- योजना का क्रियान्वयन जलग्रहण विकास दृष्टिकोण के आधार पर किया जा रहा है।

- एकीकृत बंजर भूमि विकास कार्यक्रम के अंतर्गत 31 मार्च 1999 तक स्वीकृत परियोजनाओं पर शत-प्रतिशत केन्द्रीय सहायता उपलब्ध रही एवं 01 अप्रैल 2000 से स्वीकृत परियोजनाओं के संबंध में 11.1 की दर से क्रमशः केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा धनराशि उपलब्ध करायी जा रही है अर्थात निर्धारित लागत इकाई 6000/- रुपये प्रति हेक्टेयर में से 5500/- रुपये की राशि केन्द्र सरकार द्वारा तथा शेष 500/- रुपये राज्य सरकार द्वारा वहन की जाती है। वर्तमान में एक परियोजना में लगभग 5000 हेक्टेयर क्षेत्र को उपचारित किया जाता है।

11.3.6 राष्ट्रीय पुरस्कार
- राज्य में जलग्रहण विकास के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यों हेतु जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग को राष्ट्रीय स्तर के 15 पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। यह राज्य के लिये गौरव की बात है। जलग्रहण विकास के क्षेत्र में राजस्थान सफलता के माॅडल प्रदर्शित करता देश का एक आदर्श राज्य है।

- इंडिया टेक फ़ाउंडेशन, मुम्बई से ग्रामीण अधिसंरचना विकास की श्रेणी में राज्य को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है। राज्य में संचालित अजमेर जिले की टोकरा जलग्रहण विकास परियोजना में खरीफ एवं रबी क्षेत्र में क्रमशः पौंने दो एवं साढ़े छह गुनी वृद्धि दर्ज की गई, एवं कुओं के जलस्तर में अनौपचारिक क्षेत्र की तुलना में (2003 में) 2 फीट से लेकर 8.5 फीट (2006 में) तक की वृद्धि दर्ज की गई। अनौपचारिक क्षेत्र में 2003-04 से 2005-06 तक दलहन की उत्पादकता 0.30-0.35 टन प्रति हेक्टेयर रही। जबकि टोकरा जलग्रहण क्षेत्र में इसी अवधि में उक्त 0.45 से बढ़कर 0.85 टन प्रति हेक्टेयर हो गई। तिलहन में वृद्धि दर 0.60 से 0.45 टन प्रति हेक्टेयर की तुलना में टोकरा में 0.60-1.15 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। खाद्यान्न में वृद्धि दर 0.60-0.95 टन प्रति हेक्टेयर की तुलना में उक्त वर्षों में टोकरा में 1.25-2.25 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई।

- इसके अतिरिक्त उदयपुर जिले में संचालित उरासिया जलग्रहण परियोजना में वर्ष 2000-01 से 2003-04 में तिलहन उत्पादन 2.00-3.25 टन प्रति हेक्टेयर रहा जबकि अन्य क्षेत्रों में 1.25-2.25 टन प्रति हेक्टेयर रहा। इसी प्रकार दलहन का उत्पादन 0.3-1.5 टन प्रति हेक्टेयर रहा जबकि अन्य क्षेत्रों में 0.2 से 0.9 टन प्रति हेक्टेयर रहा। खाद्यान्न में 04 टन प्रति हेक्टेयर से बढ़कर यह 250 टन प्रति हेक्टेयर हो गया, जबकि अन्य क्षेत्रों में 03 टन प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 1.4 टन प्रति हेक्टेयर हुआ। जलस्तर में वृद्धि 5 फीट (वर्ष 2000 में) से लेकर 30 फीट तक (2003 में) आँकी गई इस प्रकार जलस्तर एवं फसल उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है, जिनसे इन परियोजनाओं की सार्थकता सिद्ध होती है।

11.3.7 प्रोजेक्टाईजेशन
वर्षाजल संचय योजना

- अकाल प्रभावित क्षेत्रों में अकाल राहत कार्यों के अंतर्गत “वर्षाजल संचय योजना”। शुभारम्भ/उद्घाटन माननीय मुख्यमंत्री महोदय द्वारा दिनांक 7 दिसम्बर, 2004 को सीकर जिले’ किया गया। इस योजना की अवधि जून, 2005 तक थी।

जल अभियान
- जल के समुचित उपयोग संबंधित जल चेतना जागृत करने के उद्देश्य से माननीय मुख्यमंत्री महोदय द्वारा दिनांक 10 दिसम्बर 2005 को जल अभियान का शुभारंभ किया गया।

- अभियान के प्रथम चरण (माह दिसम्बर, 05-मार्च, 2006) में विभाग द्वारा जल संरक्षण एवं जल के समुचित प्रबंधन हेतु अपनाई जाने वाली गतिविधियों के प्रचार-प्रसार हेतु विभिन्न प्रचार सामग्री के माध्यम से, क्षेत्रीय स्तर पर बैठकों का आयोजन कर व पंचायत समिति स्तर पर कार्यशालाओं का आयोजन कर सक्रीय सहायोग प्रदान किया गया।

- अभियान के प्रथम चरण (माह दिसम्बर, 05-मार्च, 2006) में विभाग द्वारा जल संरक्षण एवं जल के समुचित प्रबंध हेतु अपनाई जाने वाली गतिविधियों के प्रचार-प्रसार कर सक्रिय सहयोग प्रदान किया गया।

- अभियान के द्वितीय चरण (माह अप्रैल, 06-जून, 2006) में जल संरक्षण हेतु विभाग द्वारा जलग्रहण क्षेत्रों में रिज टू वेली के सिद्धांत पर विभिन्न शृंखलाबद्ध चेकडैम, गेबियन नाडी, खडीन, फार्म पौण्ड एवं एनीकट आदि बनाए गए। इस प्रकार विभाग द्वारा निर्धारित 25000 जल संग्रहण ढाँचों के निर्माण लक्ष्य के विरुद्ध कुल 27656 ढाँचे बनवाए गए।

प्रचार-प्रसार
राज्य में जलग्रहण विकास गतिविधियों के प्रचार-प्रसार हेतु वर्ष 2005-06 एवं 2006-07 में विभिन्न जलग्रहण क्षेत्रों की सफलता की कहानियों की सीडी तैयार की गई व विभिन्न सफलता की कहानियों का प्रकाशन राजस्थान विकास, सुजस व खेती री बाता पत्रिकाओं में करावाया गया।

पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप
जलग्रहण विकास कार्यों में प्रथम बार पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप को प्रोत्साहित करने हेतु विभाग द्वारा कार्यवाही प्रारम्भ की जा रही है जिसके अंतर्गत आईटीसी संस्था एवं विभाग के समन्वय से भीलवाड़ा जिले के एक जलग्रहण क्षेत्र में विकास कार्य करवाए जाएँगे।

बायोफ्यूल नीति एवं कार्यक्रम
वर्ष 2002 में योजना आयोग द्वारा संबंधित मंत्रालयों को सम्मिलित करते हुए डॉ. डी.एन.तिवारी की अध्यक्षता में बायो डीजल के व्यावसायिक उपयोग की संभावनाओं पर सुझाव देने हेतु एक समिति का गठन किया गया। योजना आयोग की बायोफ्यूल को प्रोत्साहित करने की मंशा एवं तदनुरूप दिए गए दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार द्वारा राज्य में बायोफ्यूल के उत्पादन को प्रोत्साहित करने हेतु बायोफ्यूल नीति का अनुमोदन दिनांक 10 जनवरी 2007 को किया गया है।

- राज्य सरकार की नीति के अनुसार काफी बड़े क्षेत्र में रतनजोत की खेती के प्रयास किए जाएँगे। जलग्रहण परियोजनाओं में जलग्रहण क्षेत्र में उपलब्ध पड़त एवं बंजर भूमि तथा खेतों की मेड़ों ड्रेनेज लाइनों पर रतनजोत वृक्षारोपण पर जोर दिया जा रहा है। राज्य सरकार द्वारा प्रत्येक जलग्रहण क्षेत्र के एक प्रतिशत क्षेत्र में रतनजोत बुवाई का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। मानसून 2006 में 2561 जलग्रहण क्षेत्रों में कृषि योग्य भूमि में 1220 हेक्टेयर, अकृषि योग्य भूमि में 2819 हेक्टेयर तथा ड्रेनेज लाइनों पर 114.60 कि.मी. पर रतनजोत की पौध/बीज की बुवाई के लक्ष्य तय किए गए थे जिसके विरुद्ध कृषि योग्य भूमि में 1328 हेक्टेयर, अकृषि योग्य भूमि में 3641 हेक्टेयर तथा ड्रेनेज लाइन पर 110 कि.मी. पर रतनजोत की पौध/बीज बुवाई की गई।

प्रशिक्षण एवं मानव संसाधन विकास
जलग्रहण क्षेत्रों के समुचित विकास हेतु उनमें विभाग द्वारा स्वीकृत विकास के कार्य करवाए जाते हैं। इन कार्यों की नवीनतम तकनीकी, विधि तथा कृषि क्षेत्र में हो रहे नित्य नए अविष्कारों एवं पनप रही नयी-नयी अवधारणाओं से विभाग के अंतर्गत एवं विशिष्ट प्रशिक्षण देने वाली संस्थाओं से समन्वय स्थापित कर प्रशिक्षण सत्रों/अध्ययन-भ्रमण आदि की वार्षिक कार्य योजना तैयार कर तदनुसार प्रशिक्षण सत्रों/अध्ययन-भ्रमण का आयोजन करवाया जाता है।

विभागीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने के साथ-साथ विभाग के अंतर्गत चल रही विभिन्न योजनाओं में कराए जा रहे जलग्रहण विकास कार्यों के प्रति प्रचार-प्रसार के विभिन्न माध्यमों द्वारा लाभान्वितों में रुझान उत्पन्न कर, उन्हें जागरूक बनाकर विकास कार्यों में उनकी सहभागिता के उद्देश्य के मद्देनजर लाभान्वितों को भी कार्यों में अपनायी जा रही विधि एवं नवीनतम तकनीक से प्रशिक्षित करने हेतु प्रशिक्षण की वार्षिक कार्य योजना बनाकर तदानुसार उसे क्रियान्वित करवाया गया।

ग्रामीण विकास परियोजनाओं के तहत ट्रेनर की ट्रेनिंग, वाटरशेड फंक्शनरीज की ट्रेनिंग, वाटरशेड कम्युनिटी की ट्रेनिंग, स्वयं सहायता समूहों की ट्रेनिंग एवं प्रशिक्षण भ्रमण पर प्रशिक्षण आयोजित करवाए गए।

राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजना के अंतर्गत यूजर्स ग्रुप/स्वयं सहायता समूह की ट्रेनिंग, वाटरशेड फंक्शनरीज की ट्रेनिंग, वाटरशेड कम्युनिटी की ट्रेनिंग, वाटरशेड कमेटी/वाटरशेड एसोसिएशन की ट्रेनिंग एवं प्रशिक्षण भ्रमण इत्यादि पर प्रशिक्षण आयोजित करवाए गए।

राज्य में नवंबर माह के अंतिम पखवाड़े में 7 दिवस हेतु भू-संरक्षण सप्ताह कार्यक्रम का आयोजन करवाया जाता है जिसमें विभिन्न माध्यमों के द्वारा जलग्रहण विकास कार्यक्रमों के महत्त्व पर प्रकाश डाला जाता है तथा इससे होने वाले लाभों से ग्रामीण जनता को अवगत कराया गया।

11.4 मरू विकास कार्यक्रम के अंतर्गत चयनित जिले/विकासखंड (District/Block covered under Desert Development Programme)

 

क्र.सं.                                                 

जिला

पूर्ण अथवा आंशिक   सम्मिलित

योजना के अंतर्गत सम्मिलित विकासखंड

1

2

3

4

1                          

अजमेर

आंशिक

पीसांगन किशनगढ़, श्रीनगर(3)

2                                 

बाइमेर

पूर्ण

बायुत, बाइमेर, चौहटन, धौरिमन्ना, बालोतरा, शिव, सिन्धरी, सिवाना(8)

3                   

बीकनेर

पूर्ण

बीकानेर, कोलायत, लूनकरणसर, नोखा, डूंगरगढ़(5)

4    

चूरू

पूर्ण

राजगढ़, चूरू, रतनगढ़, सरदारशहर, सुजानगढ़, तारानगर(6)

5                                 

हनुमानगढ़

आंशिक

नोहर, भादरा (2)

6                                      

जयपुर

आंशिक

दूदू(1)

7

जैसलमेर

पूर्ण

जैसलमेर, सम, सांकडा(3)

8  

जालौर

पूर्ण

आहौर, भीनमाल, जालौर, जसवंतपुरा, रानीवाड़ा, संचौर, सायला (7)

9             

झुंझुनू

पूर्ण

अलसीसर, बुहाना, चिड़ावा, झुंझुनू, खेतड़ी, नवलगढ़, सुरजगढ़, उदयपुरवाटी(8)

10                               

जोधपुर

पूर्ण

बालेसर, बाप, भोपालगढ़, बिलाड़ा, मणडोर, लूनी, ओसियां, फलौदी, शेरगढ़ (9)

11                               

नागौर

पूर्ण

डीडवाना, डेगाना, जायल, कुचामन, लाडनू, मकराना, मूण्डवा, मेड़ता, परबतसर, नागौर, रियां (11)

12

पाली

पूर्ण

बाली, देसूरी, जेतारण, खारची, पाली, रायपुर, रानी, स्टेशन, रोहट, सोजत, सुमेरपुर(10)

13               

राजसमंद

आंशिक

 भीम, देवगढ़(11)

14               

सीकर

पूर्ण

दातारामगढ़, धोद, फतेहपुर, लक्ष्मनगढ़, नीम का थाना, पीपराली, श्रीमाधोपुर,   खंडेला(8)

 

सिरोही

आंशिक  

 शिवगंज (1)

 

उदयपुर

आंशिक  

 गोगुन्दा(1)

 

योग                                        

 

कुल सम्मिलित विकासखंड(85)


11.5 सूखा सम्भावित क्षेत्र कार्यक्रम के अंतर्गत चयनित जिलाविकासखंड (District/Block Covered under Drought prone Area Programme)

 

क्र.सं.

जिला

पूर्ण अथवा आंशिक   सम्मिलित

योजना के अंतर्गत सम्मिलित विकासखंड

1

2

3

4

1       

अजमेर

आंशिक

जवाजा, मसूदा, भिनाय (3)

2                 

बांसवाड़ा

पूर्ण

आनन्दपुरी, बागीडोरी, गढ़ी, घाटोल, कुशलगढ़, पीपलखूंट, सज्जनगढ, तलवाड़ा (8)

3

बारां

आंशिक  

बीकानेर, कोलायत, लूनकरणसर, नोखा, डूंगरगढ़(5)

4   

चूरू

आंशिक

राजगढ़, चूरू, रतनगढ़, सरदारशहर, सुजानगढ़, तारानगर(6)

5      

हनुमानगढ़

आंशिक

नोहर, भादरा (2)

6

जयपुर

आंशिक

दूदू(1)

7      

जैसलमेर

पूर्ण

जैसलमेर, सम, सांकडा(3)

8                 

जालौर

पूर्ण

आहौर, भीनमाल, जालौर, जसवंतपुरा, रानीवाड़ा, संचौर, सायला (7)

9

सवाई  माधोपुर

आंशिक

खण्डार (1)

10          

टोंक

आंशिक

देवली, टोडारायसिंह, उनियारा (3)

11               

उदयपुर

आंशिक

डीडवाना, डेगाना, जायल, कुचामन, लाडनू, मकराना, मूण्डवा, मेड़ता, परबतसर, नागौर, रियां (11)

12               

पाली

पूर्ण

बाली, देसूरी, जेतारण, खारची, पाली, रायपुर, रानी, स्टेशन, रोहट, सोजत, सुमेरपुर(10)

13

राजसमंद

आंशिक  

 भीम, देवगढ़(11)

14

सीकर

पूर्ण

दातारामगढ़, धोद, फतेहपुर, लक्ष्मंनगढ़, नीम का थाना, पीपराली, श्रीमाधोपुर  खंडेला(8)

15

सिरोही

आंशिक

शिवगंज (1)

16

   

गोगुन्दा(1)

 

योग                                        

 

कुल सम्मिलित विकासखंड(85)


11.6 सारांश (Summary)
राजस्थान राज्य में राष्ट्रीय जलग्रहण विकास कार्यक्रम, मरू विकास कार्यक्रम, सूखा संभावित क्षेत्र विकास कार्यक्रम एवं एकीकृत बंजर भूमि विकास परियोजना के तहत जलग्रहण विकास कार्य चल रहे हैं। कृषि योग्य क्षेत्रफल का मात्र 22 प्रतिशत भाग ही सिंचित है, शेष 78 प्रतिशत भाग असिंचित है, इसे बारानी क्षेत्र में जलग्रहण विकास कार्य किए जा रहे हैं।

11.7 संदर्भ सामग्री (Reference Material)
1. जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग के वार्षिक प्रतिवेदन।
2. भू एवं जल संरक्षण - प्रायोगिक मार्गदर्शिका शृंखला-3 श्री एस.सी. महनोत एवं श्री पीके सिंह।
3. प्रशिक्षण पुस्तिका - जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग द्वारा जारी।
4. जलग्रहण मार्गदर्शिका - संरक्षण एवं उत्पादन विधियों हेतु दिशा निर्देश - जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग द्वारा जारी।
5. जलग्रहण विकास हेतु तकनीकी मैनुअल - जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग द्वारा जारी।
6. राजस्थान में जलग्रहण विकास गतिविधियाँ एवं उपलब्धियाँ - जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग द्वारा जारी।
7. कृषि मंत्रालय भारत सरकार द्वारा जारी राष्ट्रीय जलग्रहण विकास परियोजना के लिये जलग्रहण विकास पर तकनीकी मैनुअल।
8. वाटरशेड मैनेजमेंट - श्री वी.वी ध्रुवनारायण, श्री जी. शास्त्री, श्री वी.एस. पटनायक।
9. ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी जलग्रहण विकास - दिशा निर्देशिका।
10. ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी जलग्रहण विकास - हरियाली मार्गदर्शिका।
11. Compendium of Circulars जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग द्वारा जारी।
12. विभिन्न परिपत्र - राज्य सरकार/जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग।
13. जलग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग द्वारा जारी स्वयं सहायता समूह मार्गदर्शिका।
14. इन्दिरा गांधी पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास संस्थान द्वारा विकसित संदर्भ सामग्री - जलग्रहण प्रकोष्ट।
15. कृषि मंत्रालय भारत सरकार द्वारा जारी वरसा जन सहभागिता मार्गदर्शिका।
16. जलग्रहण का अविरत विकास - श्री आर.सी. एलमीणा।
17. भारत सरकार द्वारा जारी नई काॅमन मार्गदर्शिका।

 

जलग्रहण विकास - सिद्धांत एवं रणनीति, अप्रैल 2010

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जलग्रहण विकास-सिद्धांत एवं रणनीति

2

मिट्टी एवं जल संरक्षणः परिभाषा, महत्त्व एवं समस्याएँ उपचार के विकल्प

3

प्राकृतिक संसाधन विकासः वर्तमान स्थिति, बढ़ती जनसंख्या एवं सम्बद्ध समस्याएँ

4

जलग्रहण प्रबंधन हेतु भूमि उपयोग वर्गीकरण

5

जलग्रहण विकासः क्या, क्यों, कैसे, पद्धति एवं परिणाम

6

जलग्रहण विकास में जनभागीदारीःसमूहगत विकास

7

जलग्रहण विकास में संस्थागत व्यवस्थाएँःसमूहों, संस्थाओं का गठन एवं स्थानीय नेतृत्व की पहचान

8

जलग्रहण विकासः दक्षता, वृद्धि, प्रशिक्षण एवं सामुदायिक संगठन

9

जलग्रण प्रबंधनः सतत विकास एवं समग्र विकास, अवधारणा, महत्त्व एवं सिद्धांत

10

पर्यावरणःसामाजिक मुद्दे, समस्याएँ, संघृत विकास

11

राजस्थान में जलग्रहण विकासः चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ

 

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