देर न हो जाए, संभलते-संभलते

Submitted by editorial on Mon, 12/24/2018 - 10:14
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 22 दिसम्बर, 2018

देश की राजनीति और कृषि विश्वविद्यालय के बीच उलझे हुए किसान अपने पारम्परिक ज्ञान से कटते जा रहे हैं। देश की सरकारें विकास को गति देने में इतनी व्यस्त हैं कि उन्हें एहसास भी नहीं है कि यह विकास देश की कृषि के लिये धीरे-धीरे चुनौती बनता जा रहा है। देश में 40 फीसद से अधिक खेती में हिस्सा धान की फसल का है। तापमान वृद्धि यों ही होती रही तो धान की खेती में भी कमी को हम सब रोक नहीं पाएँगे। चूँकि धान वर्षा पर आधारित फसल है। यदि बरसात का पैटर्न बिगड़ेगा तो धान की फसल खराब होनी ही है।

लम्बे समय तक इस बात के महत्व को देश और दुनिया में समझा ही नहीं गया कि जलवायु परिवर्तन से पर्यावरण के सामने किस तरह की चुनौती सामने आ सकती है? इससे पहले हमारे शब्दकोष में जब भी परिवर्तन शब्द का इस्तेमाल हुआ है, वह सकारात्मक अर्थो में हुआ है। मेरी जानकारी में यह पहली बार हुआ कि परिवर्तन शब्द को नकारात्मक अर्थ में देश और दुनिया में समझा गया। इस बात को कुछ समय बीता है, जब पर्यावरण बदलाव पर अध्ययन करने वाले दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी दुनिया के सभी देशों की सरकारों को दे दी है कि जलवायु परिवर्तन को पूरी दुनिया ने अब यदि गम्भीरता से नहीं लिया तो इसके परिणाम बेहद गम्भीर होंगे।संयुक्त राष्ट्र के आईपीसीसी (Intergovernmental panel on climate change) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया को जलवायु परिवर्तन के भयानक नतीजों से बचाने के लिये तुरन्त ही कदम उठाने होंगे। इसके लिये 2030 तक धरती के तापमान को पूर्व औद्योगिक स्तर के औसत तापमान से अधिकतम डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक ही सीमित रखना होगा।

जलवायु परिवर्तन का असर धीरे-धीरे समाज में दिखने लगा है। ठंड के मौसम में अब पहले सी ठंड नहीं पड़ती। बरसात कहीं होती नहीं और जहाँ बारिश नहीं होती थी, वहाँ बाढ़ की स्थिति पैदा हो रही है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हमारी बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के चलते बढ़ते वाहनों और उद्योगों की संख्या से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में इजाफा हुआ है। जिससे तापमान वृद्धि और बरसात के दिनों में कमी आई है। सरकार की नीतियाँ भी विकास के नाम पर उद्योगों को बढ़ावा देने वाली हैं। कृषि के लिये ट्रैक्टर पर मिलने वाली सब्सिडी का जिक्र सत्ता पक्ष के किसान हितों की बात करने वाले नेता करते हैं लेकिन ट्रैक्टर का उपयोग किसानों से अधिक माल ढुलाई के काम में लगे कारोबारी कर रहे हैं। खेतों से हल को खत्म करने की नीति ने कृषि को ना सिर्फ नुक्सान पहुँचाया बल्कि लाखों किसानों को जो आत्मनिर्भर थे, उन्हें बैंकों का कर्जदार बनाया।

सबसे अधिक दुष्प्रभाव कृषि पर

मानसून चक्र के बिगड़ने की बात हर तरफ हो रही है। कहा जा रहा है, मौसम बदल रहा है। जिस महानगर ने इस मानसून चक्र के बिगड़ने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई उनके साथ-साथ इसका दुष्परिणाम गाँवों, खेत-खिलहानों पर भी साफ दिखने लगा है। सच कहा जाए तो इसका सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव कृषि पर पड़ रहा है, जहाँ परम्परागत रूप से पैदा होने वाली फसलों का बड़ी संख्या में नामो-निशान तक मिट गया है। जलवायु परिवर्तन का ही परिणाम है कि कम पानी और बिना रासायनिक खाद के होने वाली फसलों की कई किस्में समाप्त हो चुकी हैं। अब जिन फसलों का उत्पादन बढ़ा है, गौरतलब है कि उनमें बड़ी मात्रा में रासायनिक खाद, कीटनाशक, बीटी बीज और सिंचाई के लिये अधिक मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है। इससे किसानों पर खर्च का बोझ बढ़ा है।

एक समय कृषि को सबसे अच्छा काम माना जाता था और नौकरी समाज का सबसे निम्न दर्जे का कार्य माना जाता था। यह ‘विकास’ के साइड इफेक्ट से उपजे जलवायु परिवर्तन की वजह से हुआ कि अब कृषि समाज का सबसे निम्न दर्जे का कार्य माना जाने लगा है। अब कोई किसान अपने बेटे को किसान नहीं बनाना चाहता है। अब नौकरी को समाज में सम्मान प्राप्त हुआ है। ऐसा समाज निर्माण करके हम विकास कर रहे हैं या फिर पतन की गर्त में जा रहे हैं, यह हमें अभी तय करना है।

जलवायु परिवर्तन का परिणाम है कि 1971-81 के दशक के बाद भारत में औसत वर्षा में गिरावट दर्ज की गई है। यह जानकारी एक वैज्ञानिक अध्ययन से सामने आई। अब मॉनसून में जो वर्षा होती है, उसमें भी अनियमितता बढ़ती जा रही है, कभी वर्षा होना अथवा कभी बरसात बिल्कुल भी नहीं होना। बरसात का यह पैटर्न भी बढ़ा है। जैसे दिसम्बर चल रहा है, पहले शीत आने से पहले औसत जितनी बरसात होती थी, बरसात के उस औसत में भी कमी आई है, जबकि मानसून से पहले की बरसात का औसत बढ़ा है। कुल मिलाकर जलवायु परिवर्तन ने मौसम का पूरा चक्र बिगाड़ कर रख दिया है। जिसका सबसे अधिक असर खेती पर पड़ रहा है।

तो गेहूँ का उत्पादन चौपट

इस बात के लिये बार-बार वैज्ञानिक आगाह कर रहे हैं कि मौसम का तापमान 1.5 से 02 सेंटीग्रेड तक यदि बढ़ता है तो गेहूँ का उत्पादन चौपट हो जाएगा। यदि एक सेंटीग्रेड भी तापमान बढ़ता है तो देश में 5-6 करोड़ टन गेहूँ का उत्पादन प्रभावित हो जाएगा। किसान आज सबसे अधिक भूल भूलैया में फँसे हुए हैं। देश की राजनीति और कृषि विवि के बीच उलझे हुए किसान अपने पारम्परिक ज्ञान से कटते जा रहे हैं। देश की सरकारें विकास को गति देने में इतनी व्यस्त हैं कि उन्हें एहसास भी नहीं है कि यह विकास देश की कृषि के लिये धीरे-धीरे चुनौती बनता जा रहा है। देश में 40 फीसद से अधिक खेती में हिस्सा धान की फसल का है। तापमान वृद्धि यों ही होती रही तो धान की खेती में भी कमी को हम सब रोक नहीं पाएँगे। चूँकि धान वर्षा पर आधारित फसल है। यदि बरसात का पैटर्न बिगड़ेगा तो धान की फसल खराब होनी ही है। बहरहाल, देर नहीं हुई ऐसा नहीं लिख सकता। लेकिन अब और देर होने के बाद हम होश में आएँगे भी तो इसका कोई खास लाभ नहीं होगा। इसलिये हमें सावधान हो जाना चाहिए।

(लेखक युवा पत्रकार हैं।)


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