इंसानी परिवेश में ढलते वनमानुष

Submitted by editorial on Fri, 08/17/2018 - 18:26
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डाउन टू अर्थ, अगस्त,2018
वनमानुषवनमानुष (फोटो साभार -एनिमल टाऊन)यदि आप बहुत भाग्यशाली हैं, तो आपने जंगल में किसी वनमानुष को देखा होगा। ज्यादातर लोगों ने वनमानुष केवल टेलीविजन पर ही देखा है। यह जानवर इंसानी पहुँच से दूर घने जंगल में ही रहता है। हम इस लुप्तप्राय जानवर की जो छवि अपने दिमाग में बनाते हैं, वो कुछ इस तरह की होती है-

असुरक्षित और कमजोर, पुराने व घने वनों पर निर्भर और लोगों के साथ सह-अस्तित्व बनाने में असमर्थ। लेकिन ऐसा सोचना गलत भी हो सकता है।

हाल तक, संरक्षण के बारे में हमारा विचार प्रकृति के रोमांटिक विचारों से बाधित होता रहा है। हम अपनी सीमित जानकारी से यह नहीं समझ पाते थे कि प्रकृति कितनी अनुकूल और मजबूत हो सकती है। फिर भी यह समझना कि मनुष्यों के साथ लम्बे समय से सम्पर्क से कोई वन्यजीव कैसे प्रभावित हुआ है और यहाँ तक कि कोई प्रजाति, जिस पर अच्छी तरह से अध्ययन किया गया हो, हमारी धारणाओं को बदलने और संरक्षण के कार्य को और अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकती है। वनमानुष इसका एक अच्छा उदाहरण है।

वनमानुष मुख्य रूप से वृक्षों पर रहने वाले सबसे बड़े स्तनधारी हैं। मनुष्यों से अलग कुछ अन्य भी उनके दुश्मन हैं। वे आमतौर पर कम घनत्व वाले क्षेत्र में रहते हैं। ये लंगूरों के बीच अद्वितीय हैं। यद्यपि वनमानुष दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापक रूप से मौजूद हैं, लेकिन शेष तीन प्रजाति सुमात्रा (पोंगो अबेली और पी.टेपेन्यूलियेंसिस) और बोर्नियो (पोंगो पायगमेयस) तक सीमित हैं। सभी प्रजाति के वनमानुष लुप्तप्राय श्रेणी में आते हैं। यह माना जाता था कि पिछले 60 वर्षों में इनके जीवन में महत्त्वपूर्ण रूप से मानव प्रभाव बढ़ा, जिससे यह विचार पनपा कि वनमानुष अछूत हैं और मानव के कारण खुद को अनुकूलित करने की उनकी क्षमता में कमी आई है।

लेकिन हो सकता है कि वनमानुषों को लेकर हमारा फैसला गलत हो। हमने हाल ही में साथी लेखक के साथ कुछ अनुसन्धान के निष्कर्ष साइंस एडवांसेज में प्रकाशित किये हैं। पारिस्थितिक रूप से नाजुक होने की बजाय, इस बात के सबूत है कि वनमानुष खुद को लम्बे समय से इंसानों के अनुकूल बना रहे हैं। आधुनिक वनमानुष पर्यावरण और मानव प्रभाव के उत्पाद हैं। वे जहाँ रहते हैं और कार्य करते हैं, हमारे साझा इतिहास को दर्शाते हैं।

हम यह नहीं कह रहे हैं कि वर्तमान मानव गतिविधियों से वनमानुष लुप्तप्राय (खतरे में) नही हैं। वे वाकई खतरे में हैं। उदाहरण के लिये, 1999 से 2015 के बीच, बोर्नियों के वनमानुष की आबादी लगभग 50 फीसदी घट गई। 16 वर्षों में अनुमानतः 100,000 वनमानुषों की संख्या कम हो गई। इसके लिये मुख्य रूप से जिम्मेदार कारक शिकार की सम्भावना थी। लेकिन, यदि शिकार जैसे प्रमुख खतरे को नियंत्रित कर लिया जाता है तो वनमानुष लोगों के साथ सहअस्तित्व बनाकर रह सकते हैं। यह वनों की रक्षा से परे संरक्षण के नए अवसर प्रदान करता है।

इंसानों के आसान शिकार

70,000 साल पहले जब आधुनिक इंसानों ने गीले उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अपना घर बनाया, तब से इंसान और वनमानुष सम्पर्क में रहे हैं। उस समय वनमानुषों की अच्छी-खासी संख्या थी। चीन, वियतनाम और थाइलैंड में पाये गए पशु अवशेषों के दाँत बताते हैं कि वे प्रागैतिहासिक शिकारियों के लिये आसान शिकार थे।

20,000 साल पहले वनमानुषों की संख्या में तेजी से गिरावट आई थी। परिणामस्वरूप पिछली शताब्दी में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से पहले ही उनका वितरण और घनत्व कम हो गया। जलवायु का भी कुछ प्रभाव था। जीवाश्म, पुरातत्व और जेनेटिक्स सबूत बताते हैं कि इसमें मानवीय भूमिका भी थी। हमने पाया कि मनुष्यों का आगमन और उनकी उन्नत शिकार तकनीकों, जैसे प्रोजेक्टाइल हथियार, ब्लोगन और बंदूक के कारण वनमानुषों की संख्या में तेजी से गिरावट आई।

दरअसल, ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन समय में इंसानों ने वनमानुषों को करीब-करीब खत्म कर दिया था। ऐसा उन्होंने ऊनी गैंडो, विशाल ग्राउंड स्लॉद और अन्य बड़े जानवरों के साथ किया था। जीवित रह गए वनमानुषों ने शायद इस खतरे का सामना करने के लिये अपने व्यवहार को संशोधित कर लिया वे शायद मानव शिकारी से बचने के लिये सबसे घने जंगलों में पीछे चले गए।

वनमानुषों में खुद को अनुकूलित करने की क्षमता अब भी मौजूद है। यही कारण है कि वे आज भी हमारे आस-पास हैं। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि वे सघन वन में भी रह सकते हैं और वे पॉम अॉयल या अन्य फसलों से घिरे और बिखरे जंगलों में भी उचित तरीके से जीवन जी सकते हैं। हालांकि उन्हें अब भी प्राकृतिक जंगल की आवश्यकता है। जब पसंदीदा खाद्य पदार्थ (पके फल) उपलब्ध नहीं होते हैं, तो वनमानुष छाल जैसे ‘फॉलबैक फूड्स’ (कम पोषक खाना) खाकर भी जी सकते हैं।

अच्छी खबर

यह अहसास कि वनमानुष मनुष्यों के प्रभुत्व वाली दुनिया में खुद को अनुकूलित कर चुके हैं, संरक्षण पर प्रभाव डालता है। अब यह तथ्य साबित हो चुका है कि वनमानुष घने और पुराने जंगलों से अलग, बागान और खेतिहर भूमि में भी अच्छी तरह से जीवित रह सकते हैं, यदि उनका शिकार नहीं किया जाये। इसका मतलब है कि इन क्षेत्रों को संरक्षण रणनीतियों के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए। यह विशेष रूप से इसलिये भी महत्त्वपूर्ण है कि अधिकांश वनमानुष आज संरक्षित जंगलों में नहीं रहते हैं, बल्कि वे मानव उपयोग वाले खुले क्षेत्रों में रहते हैं।

प्रकृति और मानव-वर्चस्व वाली दुनिया के बीच की रेखा तेजी से धुँधली होती जा रही है। अधिकांश प्रजातियों ने मानव गतिविधियों को देखते हुए खुद को किसी-न-किसी तरह से अनुकूलित किया है। यह कोई बहुत अच्छी बात नहीं है। लेकिन वनमानुष के मामले में हमें संरक्षण के नए अवसरों को देखने का मौका मिलता है, जो पहले अदृश्य था।

(लेखक फैकल्टी अॉफ एनवायरनमेंट साइंस एंड नेचुरल रिसोर्स मैनेजमेंट, नार्वेजियन यूनिवर्सिटी अॉफ लाइफ साइंसेज में प्रोफेसर हैं। यह लेख द कन्वरसेशन से विशेष अनुबन्ध के तहत प्रकाशित किया गया है।)

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