चुटका परियोजना पर पुनर्विचार आवश्यक

Submitted by editorial on Sat, 12/08/2018 - 15:52
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हमारे देश में विकास की हड़बड़ी के साथ जिद और भेड़िया धसान का एक और उदाहरण है, मध्य प्रदेश की ‘जीवनदायिनी’ नदी नर्मदा के साथ किया जाने वाला दुर्व्यवहार। अहर्निश ‘माँ-माते’ की गुहार का पाखण्ड करने वाले हमारे सत्ताधारी, नीति-निर्माता और ठेकेदार मिलजुल कर बड़े बाँध, बाँध लेने के बाद अब नर्मदा तट पर परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाने का कारनामा करने में लग गए हैं। पर्यावरण, विस्थापन और महंगी बिजली के सवालों से बेपरवाह ये गिरोह भावी पीढ़ियों को बर्बाद करने पर तुला है।

चुटका परमाणु परियोजनाचुटका परमाणु परियोजनाबिजली एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। एक ओर इससे करोड़ों लोगों को रोशनी मिलती है, दूसरी ओर, खेती, धन्धे, उद्योग आदि भी बिजली पर निर्भर हैं। ‘इण्डियन इलेक्ट्रीसिटी एक्ट-1948’ का उद्देश्य भी सभी को उचित दर पर सतत बिजली उपलब्ध कराना था।

इस समय देश में बिजली की स्थापित उत्पादन क्षमता तीन लाख 44 हजार मेगावाट है, जबकि उच्चतम माँग एक लाख 65 हजार मेगावाट। कुल बिजली उत्पादन में ताप (थर्मल) विद्युत (57.3 प्रतिशत), जल (हाइड्रो) विद्युत (14.5 प्रतिशत), वायु (विंड) ऊर्जा (9.9 प्रतिशत), गैस (7.2 प्रतिशत), सौर (सोलर) ऊर्जा (6.3 प्रतिशत), बायोमास (2.6 प्रतिशत) तथा परमाणु (एटॉमिक) बिजली (2.0 प्रतिशत) की हिस्सेदारी है।

मध्य प्रदेश में बिजली की औसत माँग 8 से 9 हजार मेगावाट है तथा रबी फसल की सिंचाई के समय उच्चतम माँग 11 हजार 500 मेगावाट रहती है, जबकि उपलब्धता 18 हजार 364 मेगावाट अर्थात प्रदेश में माँग से ज्यादा बिजली उपलब्ध है। इसके बावजूद नर्मदा नदी पर बने पहले ‘रानी अवंतीबाई सागर’ उर्फ ‘बरगी बाँध’ से विस्थापित, मंडला जिले के बरगी जलाशय के किनारे के गाँव चुटका में ‘चुटका परमाणु ऊर्जा परियोजना’ प्रस्तावित की गई है।

देश में वर्तमान बिजली व्यवस्था व तुलनात्मक रूप से अन्य स्रोतों से कम दर पर बिजली की उपलब्धता इस पूरी परियोजना पर गम्भीर सवाल खड़े करती है। वर्ष 2005 में अमरीका द्वारा भारत पर लगे नाभिकीय प्रतिबन्ध हटाए गए थे, तब से अब तक ‘अपारम्परिक ऊर्जा,’ विशेषकर पवन व सौर ऊर्जा के क्षेत्र में आये भारी-भरकम बदलाव के कारण ‘चुटका परियोजना’ पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। इस परियोजना को अभी तक पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त नहीं हुई है।

जिस समय 1400 मेगावाट की ‘चुटका परियोजना’ को योजना आयोग से मंजूरी मिली थी, तब सौर ऊर्जा से बिजली पैदा करना महंगा होता था, आज स्थिति बदल गई है। परियोजना की अनुमानित लागत 16 हजार 550 करोड़ रुपए आँकी गई है। इस परियोजना खर्च के आधार पर एक मेगावाट बिजली उत्पादन की लागत लगभग 12 करोड़ रुपए आएगी, जबकि सौर ऊर्जा आजकल लगभग 4 करोड़ प्रति मेगावाट में बन जाती है।

सौर ऊर्जा संयंत्र दो वर्ष के अन्दर कार्य प्रारम्भ कर देता है, वहीं परमाणु बिजली घर बनाने में कम-से-कम दस वर्ष लगते हैं। दिल्ली की एक संस्था ‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ की रिपोर्ट के अनुसार विदेशी परमाणु संयंत्र से वितरण कम्पनियों द्वारा खरीदी जाने वाली बिजली की लागत 9 से 12 रुपए प्रति यूनिट तक आएगी, जिस पर भारत सरकार व उपकरण प्रदायकर्ता के मध्य अभी तक कोई सहमति नहीं बनी है।

चालीस वर्ष तक चलने वाले परमाणु संयंत्र की ‘डी-कमिशनिंग’ आवश्यक होगी, जिसका खर्च संयंत्र के स्थापना खर्च के बराबर होगा। यदि इसका भी हिसाब लगाया जाये तो परमाणु विद्युत की लागत लगभग 20 रुपए प्रति यूनिट आएगी। ऐसी महंगी बिजली के परिप्रेक्ष्य में अन्य विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए। मध्य प्रदेश का ही एक उदाहरण है राज्य सरकार द्वारा रीवा जिले की त्यौंथर तहसील में 750 मेगावाट की सौर विद्युत परियोजना हेतु अन्तरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मक बोली के तहत मात्र दो रुपए 97 पैसे प्रति यूनिट की दर पर बिजली खरीदने का अनुबन्ध अभी 17 अप्रैल 2017 को भोपाल में ही किया गया है।

भारत सरकार द्वारा संशोधित ‘टैरिफ पॉलिसी-2016’ के अनुसार किसी भी नए सार्वजनिक उपक्रम से विद्युत वितरण कम्पनियों को प्रतिस्पर्धात्मक बोली के आधार पर ही बिजली खरीदने की अनिवार्यता है। ‘चुटका परियोजना’ हेतु ऐसी किसी प्रक्रिया का प्रारम्भ ‘परमाणु ऊर्जा निगम’ द्वारा नहीं किया गया है।

मप्र पॉवर मैनेजमेंट कम्पनियों द्वारा निजी विद्युत कम्पनियों से महंगी बिजली खरीदी अनुबन्ध के कारण 2014-15 तक कुल घाटा 30 हजार 280 करोड़ रुपए तथा सितम्बर 2015 तक कुल कर्ज 34 हजार 739 करोड़ रुपए हो गया था, जिसकी भरपाई बिजली दर बढ़ाकर प्रदेश के एक करोड़ 35 लाख उपभोक्ताओं से वसूली जा रही है। उत्पादन के स्थान से उपभोक्ताओं तक पहुँचते-पहुँचते 30 फीसदी बिजली बर्बाद हो जाता है जो अन्तरराष्ट्रीय मापदंडों से बहुत ज्यादा है।

जितना पैसा और ध्यान परमाणु बिजली कार्यक्रम पर लगाया जा रहा है, उसका आधा भी पारेषण-वितरण में होने वाली बर्बादी को कम करने पर लगाया जाये तो यह बिजली उत्पादन बढ़ाने जैसा ही होगा। नई परियोजना को लगाने की बजाय जो परियोजना स्थापित है उसकी कुशलता बढ़ाई जाये तो वो कम खर्च में ज्यादा परिणाम देगी।

सौर ऊर्जा एक स्वच्छ व पर्यावरण हितैषी ऊर्जा स्रोत है जबकि परमाणु ऊर्जा तुलनात्मक दृष्टि से पूर्णतः असुरक्षित और खतरनाक है। जापान सरीखे उन्नत प्रौद्योगिकी वाले देश के फुकुशिमा में घटी परमाणु दुर्घटना के बाद जापान और जर्मनी ने परमाणु बिजली संयंत्र बन्द करने का फैसला किया था।

इटली ने रूस के चेर्नोबिल शहर में हुई परमाणु दुर्घटना के बाद ही अपने परमाणु विद्युत कार्यक्रम को बन्द कर दिया था। कजाकिस्तान ने 1999 में और लिथुआनिया ने 2009 में अपने-अपने एकमात्र परमाणु रिएक्टर्स बन्द कर दिये थे। विगत 30 वर्षों से अमेरिका ने अपने यहाँ एक भी नए परमाणु संयंत्र की स्थापना नहीं की है।

दरअसल इस दौर में परमाणु बिजली उद्योग में जबरदस्त मंदी है इसलिये अमेरिका, फ्रांस और रूस आदि की परमाणु विद्युत कम्पनियाँ भारत में इसके ठेके और आर्डर पाने के लिये बेचैन है। भारत में 6 परमाणु बिजली घर बनना प्रस्तावित हैं, जिनमें से हरिपुर संयंत्र को पश्चिम बंगाल सरकार ने निरस्त कर दिया है। गुजरात के मिठीविर्दी में स्थानीय लोगों के विरोध के कारण उसे आन्ध्र प्रदेश के कोवाडा ले जाया गया है।

दूसरी ओर, चुटका के संयंत्र से निकलने वाले पानी का तापमान समुद्र के तापमान से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक होगा। तापमान की यह अधिकता बरगी जलाशय और नर्मदा नदी में मौजूद जलीय जीव-जन्तुओं का खात्मा करेगी। इससे नर्मदा घाटी की जैव-विविधता पर प्रतिकूल असर पड़ेगा तथा निकलने वाले विकिरण युक्त जहरीले पानी से नदी भी जहरीली हो जाएगी। ‘आपदा प्रबन्धन संस्थान, भोपाल’ की रिपोर्ट के अनुसार मंडला जिले की टिकरिया बस्ती के आसपास का क्षेत्र भूकम्प की दृष्टि से अतिसंवेदनशील बताया गया है।

वर्ष 1997 में नर्मदा किनारे के इस क्षेत्र में 6.4 रिक्टर स्केल का विनाशकारी भूकम्प आ भी चुका है। नर्मदा नदी में भी पानी की मात्रा लगातार घट रही है तथा जलग्रहण क्षेत्र का उपचार (केचमेंट एरिया ट्रीटमेंट) नहीं होने के कारण भारी मात्रा में गाद (सिल्ट) से जलाशय भर रहा है। राज्य की जीवनदायिनी नर्मदा के किनारे परियोजना को लगाने की जल्दबाजी कहीं प्रदेश को गहरे संकट में तो नहीं डालेगी?

श्री राजकुमार सिन्हा ‘बरगी बाँध विस्थापित एवं प्रभावित संघ’ तथा ’नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ के वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं।


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