जमीन पर जंग

Submitted by editorial on Mon, 09/17/2018 - 14:00
Source
डाउन टू अर्थ, सितम्बर, 2018


ऋषिकेश में खसरा नम्बर 276 विवादित भूमिऋषिकेश में खसरा नम्बर 276 विवादित भूमि उत्तराखण्ड में जहाँ-जहाँ विकास हो रहा है, वहाँ-वहाँ भूमि विवाद के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। राज्य के मैदानी इलाकों में ही नहीं अब आश्चर्यजनक ढंग से पर्वतीय इलाकों में भी इस तरह के मामले सामने आने लगे हैं। यह बात उत्तराखण्ड के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (लॉ एंड अॉर्डर) अशोक कुमार ने कही। उत्तराखण्ड में विकास जितनी तेजी से रफ्तार पकड़ रहा है, उतनी ही तेजी से यहाँ जमीन की कीमतें बढ़ रही हैं और उसी रफ्तार से भूमि को लेकर लड़ाइयाँ सामने आ रही हैं। कुमाऊँ की अपेक्षा गढ़वाल में जमीन की कीमत ज्यादा बढ़ी है, इसलिये यहाँ जमीन पर ‘जंग’ से जुड़े मामले भी बढ़े हैं। कुमार का कहना है कि अब तक की जाँच से यह पता चलता है कि जहाँ-जहाँ सड़कें पहुँच रही हैं, वहाँ-वहाँ इस प्रकार के मामलों में इजाफा हो रहा है। उनके मुताबिक खासतौर पर देहरादून, मसूरी, ऋषिकेश, हरिद्वार और इनके आस-पास के क्षेत्रों में जमीन के लेन-देन से जुड़ी गतिविधियाँ बढ़ी हैं। भूमि को लेकर आपस में लड़ाई लगातार बढ़ी हैं। वह कहते हैं, “पहले गढ़वाल में लूट-चोरी-डकैती होती थी, लेकिन अब जमीन की जालसाजी तेजी से हो रही है क्योंकि ये सफेदपोश अपराध है।”

उत्तराखण्ड के मैदानी और पर्वतीय इलाकों में जमीनी तकरार पिछले एक दशक में लगातार बढ़ी है। गढ़वाल रेंज में इस प्रकार के मामलों की संख्या हर साल बढ़ रही है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए अक्टूबर, 2014 में भूमि धोखाधड़ी के मामलों की जाँच के लिये गढ़वाल और कुमाऊँ रेंज के लिये अलग-अलग विशेष जाँच दल (एसआईटी) का गठन किया गया। इस सम्बन्ध में गढ़वाल रेंज के पुलिस उप महानिरीक्षक पुष्पक ज्योति का कहना है कि वर्ष 2014 में जमीन को लेकर होने वाली लड़ाइयों की संख्या में तेजी आई इसलिये इन्हें हल करने के लिये एसआईटी का गठन किया गया। उनका दावा है कि इसके बाद से फिलहाल राज्य में इस तरह की घटनाओं में हल्की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि वह राज्य के मैदानी हिस्सों में जमीन के मामलों में टकराव की बढ़ती घटना से इनकार नहीं करते। वह कहते हैं कि एसआईटी की जरूरत महसूस हुई क्योंकि पुलिस स्टेशन पर पुलिस महकमा पर्याप्त संसाधनों से सुसज्जित नहीं था। अधिकांश जमीन को लेकर होने वाली लड़ाइयाँ देहरादून से हैं। हाल के वर्षों में शहर का तेजी से विकास इसका एक कारण हो सकता है।

एसआईटी के गठन के बाद पाँच सालों में गढ़वाल व कुमाऊँ में कुल 3,070 मामलों के लिये आवेदन प्राप्त हुए। हालांकि इसमें गढ़वाल क्षेत्र के विवाद ज्यादा हैं। यहाँ कुल 2,822 लोगों ने अपनी विवादित भूमि के हल के लिये एसआईटी को आवेदन किया। वहीं कुमाऊँ क्षेत्र में मात्र 248 विवादों के लिये आवेदन किये गए। एसआईटी ने गढ़वाल क्षेत्र से पिछले पाँच सालों में विवादित भूमि के मामलों में कुल 946 लोगों को गिरफ्तार किया है। एसआईटी ने गढ़वाल में विवादित भूमि के मामले अधिक हैं, लेकिन उसका इन मामलों में निस्तारण का प्रतिशत लगभग 90 से अधिक है, वहीं कुमाऊँ क्षेत्र में तो यह लगभग 98 प्रतिशत से अधिक है। झगड़े के मामले में एसआईटी ने समझौते भी कराए हैं। जैसे गढ़वाल में 434 व कुमाऊँ में 35 मामलों में दोनों पक्षों के बीच समझौते कराए। एसआईटी दोनों क्षेत्रों से आए आवेदन पत्रों पर सीधे कार्रवाई करने के पूर्व उसकी सत्यता की जाँच करके ही मामला आगे बढ़ाती है। उदाहरण के लिये गढ़वाल में पिछले पाँच सालों में आवेदनों में से एसआईटी ने 236 मामलों को झूठा पाया वहीं कुमाऊँ में 13 मामले झूठे पाए गए।

ध्यान रहे कि देहरादून राज्य की राजधानी (09 नवम्बर, 2000) घोषित होने के बाद अचानक अचल सम्पत्ति बहुत महत्त्वपूर्ण हो गई। एक पूर्व पुलिस अधिकारी कहते हैं कि 2000 के बाद भूमि मूल्य तेजी से बढ़ा। देहरादून और मसूरी में अधिकांश बड़ी भूमि धोखाधड़ी उस भूमि से सम्बन्धित है जो ब्रिटिश काल में यहाँ के निवासियों की थी। भूमि की देखभाल करने के लिये उनमें से कइयों ने ट्रस्ट बनाए लेकिन जब ट्रस्ट के सदस्यों की मृत्यु हो गई और ट्रस्ट निष्क्रिय हो गया, तब से इन भूखंडों की देखभाल करने के लिये कोई भी नहीं था। निहित स्वार्थी लोगों ने दस्तावेजों में धोखाधड़ी करके अपने स्वामित्व का दावा करना शुरू कर दिया। वे इतनी आसानी से ऐसा कर सकते थे क्योंकि उनका विरोध करने के लिये कोई भी जीवित नहीं था।

देहरादून में 2000 के पहले तक यहाँ बड़े-बड़े जमींदार थे लेकिन वे कभी अपनी जमीनों के लिये किसी प्रकार की चिन्ता नहीं करते थे। पिछले दशक में यहाँ नकली और जाली वसीयत तैयार करना और आसान हो गया है। ऐसे कई जमीन के स्वामित्व वाले लोग हैं जो वर्षों से देहरादून नहीं आए हैं। ऐसी जमीनों पर भूमाफियाओं ने भूखंडों पर कब्जा कर लिया है। इसके अलावा, चूँकि पुरानी भूमि के रिकॉर्ड सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) में राजस्व प्राधिकरण से तैयार होते हैं तो लोगों के लिये जाली दस्तावेजों को तैयार करना और आसान हो गया है।

कुमाऊँ रेंज के आईजी पूरन सिंह रावत का कहना है कि जमीन से जुड़े विवाद के मामलों के लिये कुमाऊँ में भी गढ़वाल रेंज की तर्ज पर एसआईटी गठित की गई। जिसके तहत इस समय 21 मामले विचाराधीन हैं। आईजी का कहना है कि गढ़वाल की तुलना में यहाँ भूमि विवाद कम है, क्योंकि यहाँ जमीन की कीमतें भी कम हैं।

सामाजिक कारण

राज्य में जमीन को लेकर बढ़ते विवादों की एक बड़ी वजह बताते हुए राज्य में जमीन संघर्ष पर अध्ययन करने वाले रघु तिवारी बताते हैं, “इसकी वजह ये नहीं कि लोगों को अपनी जमीन से कोई मोह नहीं है। बल्कि पिछले डेढ़ सौ साल में जो नीतियाँ रही हैं और आजादी के बाद भी जिन पर अमल किया जाता रहा, उसने जल-जंगल-जमीन से लोगों को अलग किया है।” वे बताते हैं कि वर्ष 1823 में जब पहली बार अंग्रेजों ने लैंड एग्रीमेंट किया था, उसमें लोगों को उनकी कृषि भूमि दे दी गई, शेष जमीन को सरकारी जमीन में बदल दिया गया। जंगल और पानी पर सरकार का नियंत्रण हो गया। इस तरह लोगों की कुदरत के साथ रहने की प्रक्रिया खत्म हुई और इससे सामाजिक पारिस्थितिकी प्रभावित हुई।

यह ध्यान देने वाली बात है कि उत्तराखण्ड में लोगों के पास जमीनें बेहद कम हैं। ज्यादातर किसानों के पास 0.1 हेक्टेयर से कम जमीन है। इससे उनकी आजीविका पूरी नहीं होती। सिर्फ लगाव के चलते वो जमीनें उनके पास हैं। तिवारी कहते हैं कि इन जमीनों पर कब्जे के लिये अब भू-माफिया पूरे राज्य में सक्रिय हो चुके हैं। पहाड़ के छोटे-छोटे गाँवों तक में ऐसा हो रहा है। इसलिये अब पूरे उत्तराखण्ड में छोटे-बड़े रिजॉर्ट और होटल बहुत तेजी से खड़े हो रहे हैं।

उत्तराखण्ड की इस स्थिति को नैनीताल उच्च न्यायालय में आए मामले से भी समझा जा सकता है। नैनीताल हाईकोर्ट में 1 जून, 2018 को दाखिल किए गए एक एफिडेविट में राज्य के मुख्य सचिव उत्पल सिंह ने बताया कि कार्बेट टाइगर रिजर्व के पास 44 रिजॉर्ट और होटल ऐसे हैं, जिन्होंने सरकारी जमीन का अतिक्रमण किया है। जबकि 30 सम्पत्ति ऐसी पाई गई जिन्होंने राजस्व भूमि से जुड़े नियमों का उल्लंघन किया है, 14 सम्पत्तियों ने जंगल की जमीन और कोसी नदी के क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। ये मामले वर्ष 2010 से सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट की अदालत में लम्बित चल रहे हैं।

इसी प्रकार का एक उदाहरण अल्मोड़ा के नैनीसार में जिंदल ग्रुप को दी गई जमीन का भी है। वर्ष 2015 में पूर्व की हरीश रावत सरकार के कार्यकाल में बिना जमीन ट्रांसफर किए जिंदल ग्रुप को कब्जा दे दिया गया। यहाँ तक कि तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत और बीजेपी नेता मनोज तिवारी ने उस जमीन का उद्घाटन भी किया। ऐतराज जताए जाने पर छह महीने बाद वो जमीन आधिकारिक तौर पर जिंदल ग्रुप को ट्रांसफर की गई। ये उदाहरण बताता है कि देवभूमि में जमीनों पर किस तरह कब्जा हो रहा है।

देहरादून की वरिष्ठ अधिवक्ता अनुपमा ने बताया कि मई, 2018 में उत्तराखण्ड राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि प्रबन्धन अधिनियम, 1950 में संशोधन किया है। राज्य सरकार ने उत्तराखण्ड (उत्तर प्रदेश) जमींदारी उन्मूलन अधिनियम में धारा-154 (3,4,5), 129(ब), 152(अ) को शामिल किया है। इसमें यह स्पष्ट किया गया कि 12 सितम्बर, 2003 तक जिन लोगों के पास राज्य में जमीन हैं, वे 12.5 एकड़ तक जमीन खरीद सकते हैं। मगर जिनके पास जमीन नहीं है, वह इस तिथि के बाद 250 वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन नहीं खरीद सकते हैं। इससे ज्यादा जमीन खरीदने के लिये राज्य सरकार से इजाजत लेने का प्रावधान किया गया है।

वर्ष 2003 या उससे पूर्व जिन्होंने भी राज्य में सम्पत्ति अर्जित की है, वे अपनी सम्पत्ति परिवार में ही जैसे पति-पत्नी, बेटे-बेटी, भाई-बहन, सौतेले भाई-बहन, तलाकशुदा बहन को बेच सकते हैं, परिवार से बाहर नहीं। वह बताती हैं कि ये कानून कृषि योग्य भूमि पर लागू है। हालांकि राज्य के बाहर के लोगों ने उत्तराखण्ड में निवेश की खातिर नया तरीका ढूँढ निकाला है। जमीन मूल व्यक्ति के नाम पर ही होती है। वे जमीन के स्वामी से डेवलपर के तौर पर अनुबन्ध करते हैं। जमीन को विकसित करते हैं। अपने प्रोजेक्ट चलाते हैं। जमीन का स्वामित्व राज्य के व्यक्ति के पास ही होता है।

बड़ी संख्या में पलायन के बाद उत्तराखण्ड में चकबन्दी विधेयक जून, 2016 को विधान सभा में पारित कर दिया गया लेकिन इसे अनिवार्य नहीं किया गया है बल्कि स्वैच्छिक तौर पर है। इसके अलावा इसके माध्यम से सरकारी सोच है कि आगामी 2022 तक पलायन कर गए लोग वापस अपनी जमीन की ओर लौटेंगे। हालांकि यह भी एक सच्चाई है कि आने वाले समय में राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में भी जमीन विवाद और बढ़ेंगे। क्योंकि कुमाऊँ और नेपाल के बीच काली नदी पर बनने वाले बाँध के कैचमेंट एरिया के कारण लगभग डेढ़ सौ गाँवों की जमीन डूब में आएगी और इसके बनने से स्थानीय लोग इसलिये डरे हुए हैं कि इस तरह के निर्माण से एक बार फिर से जमीन को लेकर संघर्ष तेज होगा।

राज्य महिला सामाख्या की निदेशक रह चुकीं गीता गैरोला बताती हैं कि गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ बेल्ट के पूरे रूट की भूमि को लेकर झगड़े दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर में जमीन के दाम आसमान छू रहे हैं। इसलिये वहाँ जमीन का बँटवारा है। लोग अपना हिस्सा नहीं छोड़ते। इसलिये आज, हरिद्वार, उधम सिंह नगर और देहरादून जिलों में समृद्धि का औसत 1,22,900 रुपए प्रतिवर्ष है जबकि पहाड़ी जिलों में प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 59,791 रुपए है।

एसआईटी-गढ़वाल में दर्ज वर्ष वार मामलों का लेखा-जोखा

गढ़वाल में पिछले पाँच सालों में विवादित भूमि के लिये प्रार्थना पत्र बड़ी संख्या में आए और इसका परिणाम हुआ कि यहाँ 900 से अधिक लोगों की गिरफ्तारी सम्भव हुई।

वर्ष

प्रार्थना पत्र

समझौते

जाँच में झूठे पाए गए

कुल निस्तारण

गिरफ्तारी

2014
39
6
5
39
0
2015
474
55
39
474
213
2016
1238
190
107
1238
640
2017
947
174
81
945
93
2018
124
9
4
68
00
कुल
2822
434
236
2764
946

 

एसआईटी-कुमाऊँ में दर्ज वर्ष वार मामलों का लेखा-जोखा

कुमाऊँ में जितने प्रार्थना पत्र आए उनमें से लगभग 99 फीसदी मामलों का निस्तारण हुआ, हालांकि यहाँ गिरफ्तारी एक भी नहीं हुई।

वर्ष

प्रार्थना पत्र

समझौते

जाँच में झूठे पाए गए

कुल निस्तारण

2014
4
0
0
4
2015
43
2
0
43
2016
104
14
9
104
2017
60
16
4
57
2018
37
3
0
16
कुल मामले
248
35
13
224
स्रोत: एसआईटी कुमाऊँ-गढ़वाल द्वारा 2014-2018 के बीच उपलब्ध कराए गए आँकड़े

 

खाली होते गाँव

आखिर क्या वजह है कि एक तरफ तो उत्तराखण्ड में भुतहा होते गाँवों की संख्या बढ़ रही है और दूसरी तरफ जमीनों के झगड़े भी बढ़ रहे हैं। इस सम्बन्ध में देहरादून के वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट कहते हैं कि राज्य में जमीन से जुड़े संघर्षों को विश्लेषण करें तो इस तरह के मामले उन क्षेत्रों में अधिक हैं, जहाँ सड़कें पहुँच चुकी हैं या जिन क्षेत्रों के निकट भविष्य में पर्यटन सर्किट के रूप में उभरने की सम्भावना है। आमतौर पर इन झगड़ों को मुआवजे के लालच के रूप में देखा जा रहा है। जहाँ तक खाली होते गाँव की बात है तो ये राज्य के दूर-दराज इलाकों में बसे गाँव का हाल है, न कि मैदानी इलाकों में बसे गाँवों का। राज्य के जन आन्दोलन से जुड़े पुरुषोत्तम असनोड़ा कहते हैं कि जमीन सम्बन्धी झगड़ों के बढ़ने की मुख्य वजह मुआवजे का लालच ही है।

नैनीताल के सामाजिक कार्यकर्ता राजीव लोचन शाह कहते हैं कि कुछ सालों से सरकार ग्रामीण पर्यटन की बातें कर रही है। सरकार के इस प्रचार के बाद गाँव छोड़ चुके लोगों को लगता है कि यदि उनका गाँव भी ग्रामीण पर्यटन के दायरे में आया तो आर्थिक लाभ हो सकता है। ऐसे में वे फिर से गाँवों के चक्कर लगाने लगे हैं। जाहिर है कई लोगों की जमीन पर दूसरे लोग काबिज हो गए हैं, ऐसे में झगड़े बढ़ने ही हैं। गोपेश्वर के क्रान्ति भट्ट बढ़ते झगड़ों की एक वजह प्राचीन परम्पराओं को त्याग कर देना मानते हैं। पहाड़ों में प्राचीन काल से जमीन का बँटवारा होने पर सीमांकन के रूप में खेत के बीच में एक बड़ा पत्थर गाड़ दिया जाता है। इसे पहाड़ों में ओडा या जूला कहा जाता है। पहाड़ों में ओडा पत्थर को देवतुल्य मानने की परम्परा है।

एक बार ओडा गाड़ दिए जाने के बाद इसे खिसकाने की बात सोचना भी पाप माना जाता था, लेकिन ग्रामीणों ने उन प्राचीन परम्पराओं को मानने से इनकार कर दिया है। देवतुल्य माना जाने वाला ओडा अब सिर्फ एक पत्थर है और इंच-इंच जमीन के लालच में लोग अक्सर ओडा खिसकाने से बाज नहीं आ रहे हैं। उनका कहना है कि अपनी एक इंच जमीन भी न छोड़ने की सैन्य परम्परा भी पहाड़ में गहरी पैठ चुकी है। यहाँ के लोग देश की ही नहीं अपनी निजी सरहद पर भी एक इंच जमीन तक छोड़ने के लिये तैयार नहीं होते।

देहरादून में वरिष्ठ पत्रकार जयसिंह रावत का मानना है कि पहाड़ों में बंजर पड़ी जमीन को अब नेपाली नागरिक आबाद कर रहे हैं। इन खेतों पर कड़ी मेहनत करके वे अच्छी पैदावार भी ले रे हैं। कुछ दिन के लिये गाँव आने वाले लोग इन खेतों में लहलहाती फसल देखते हैं तो उन्हें लालच आ जाता है। हालांकि दूसरी ओर उत्तराखण्ड से दिल्ली आ बसे उमाकांत लखेडा भुतहा गाँव की बात का कारण राजनीति बताते हैं। वह बताते हैं, “जान-बूझकर राजनीतिक स्तर पर राज्य में गाँव के गाँव भुतहा घोषित कर उस गाँव की जमीन पर अपनी पैठ बनाने की एक सोची समझी साजिश है। यह सौ फीसदी सही है कि रोजगार के लिये उत्तराखण्ड में तेजी से पलायन हो रहा है। गाँव के गाँव खाली हो रहे हैं और सरकारी तौर पर भुतहा घोषित किए जा रहे हैं। लोगों ने अपनी जमीनें बेची नहीं, बस छोड़ दी हैं। लड़ाई के मुआवजे पर टिकी है।”

दिल्ली में उगे कंक्रीट के जंगल का दायरा उत्तराखण्ड की ओर भी तेजी से सरक रहा है। जिसने यहाँ जमीनी विवादों को और तेज करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वक्त रहते यदि इस पर रोक नहीं लगाई गई तो भविष्य में उत्तराखण्ड में जमीनी विवाद और बढ़ने से इनकार नहीं किया जा सकता।

(साथ में देहरादून से वर्षा सिंह)

 

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