अगले वर्ष से अविरल बहेगी निर्मल गंगा

Submitted by editorial on Thu, 10/18/2018 - 18:27
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हिन्दुस्तान, 17 अक्टूबर, 2018

नितिन गडकरी (फोटो साभार: डेली हंट)नितिन गडकरी (फोटो साभार: डेली हंट) केन्द्रीय सड़क परिवहन, राजमार्ग, जल-संसाधन और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी केन्द्र सरकार के एक ऐसे मंत्री हैं, जो हमेशा चर्चा में रहते हैं। अपने काम के कारण भी और अपनी साफगोई की वजह से भी। बकौल गडकरी, वह जो कहते हैं, उसे करके दिखाते हैं। नितिन गडकरी ने हाल ही में राँची में हुए ‘हिन्दुस्तान पूर्वोदय’ में हिन्दुस्तान के प्रधान सम्पादक शशि शेखर के तमाम सवालों के जवाब दिये। पेश है प्रमुख अंश-

पूर्वोदय के विकास की योजना क्या है? यह नारे से आगे कैसे बढ़ेगा?
पूरब की सबसे बड़ी क्षमता यहाँ की अपार खनिज सम्पदा है। केन्द्र सरकार ने दो तरह से पूरब के विकास का खाका तैयार किया है। पूर्वी राज्यों में उपलब्ध निम्न स्तर वाले कोयला से मेथेनॉल बनाया जाएगा। यह ईंधन देश में करीब आठ करोड़ लीटर आयात होने वाले पेट्रोल-डीजल का सस्ता विकल्प होगा। डीजल 68 रुपए, जबकि मेथेनॉल 22 रुपए प्रति लीटर है। इससे प्रदूषण भी कम होता है। देश में कम्पनियाँ मेथेनॉल बना रही हैं। केन्द्र सरकार एथेनॉल, मेथेनॉल, बायो सीएनजी और इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहित कर रही है। परिवहन मंत्री होने के नाते गुवाहटी, मुम्बई, नवी मुम्बई और पुणे में पायलट प्रोजेक्ट के तहत मेथेनॉल से बसों के संचालन का निर्णय किया है। गाजीपुर, वाराणसी, साहिबगंज, हल्दिया के साथ 40 रिवर पोर्ट पर मेथेनॉल के बंकर डाले जा रहे हैं। पूरा शिपिंग मेथेनॉल इंजन पर लेकर जाएँगे। निर्यात का सस्ता विकल्प खुलेगा। असम सरकार मेथेनॉल को बांग्लादेश में निर्यात करना चाहती है। पूर्वी राज्यों के जंगल में मौजूद रतनजोत, मोह, साल, करंज, टोली, जट्रोफा, बाँस के पेड़ों से बायो एविएशन फ्यूल बनाना मुमकिन हो गया है।

हम 30 हजार करोड़ लीटर एविएशन फ्यूल आयात कर रहे हैं। इसका भाव 75 रुपए प्रति लीटर है। अब यह साबित हो गया है कि 100 प्रतिशत बायो एविएशन फ्यूल से हवाई जहाज उड़ान भर सकते हैं। पूरब में तैयार बायो एविएशन फ्यूल 50 रुपए प्रति लीटर पर उपलब्ध होगा। एविएशन कम्पनियाँ इसे हाथों-हाथ लेंगी। इस प्रकार, पूर्वी राज्य मिथेनॉल और बायो एविएशन फ्यूल का हब बनकर पूरे देश को फ्यूल देंगे।

ये होगा कब तक?
एथेनॉल पर पाँच निर्णय लिये गए हैं। गन्ने का जूस, मोलायसिस, बी-हेवी मोलायसिस, कॉटन स्ट्रॉ, राइस स्ट्रॉ, कॉर्न और चावल कट से इथेनॉल बनाने की अनुमति दे दी गई है। नागपुर में तनस से बायो सीएनजी निकाला गया है। अब किसान छोटी यूनिट से बायो सीएनजी बना सकेंगे। बायो सीएनजी से ट्रैक्टर चलाने पर देश के किसानों को प्रतिवर्ष करीब 40 हजार रुपए की बचत होगी।

मेरा सवाल वही है कि यह कब तक होगा?
केन्द्र सरकार ने एथेनॉल की खरीद शुरू कर दी है। मेथेनॉल की नीति फाइनल हो गई है। वर्सिला, वोल्वो, स्कैनिया, जैसी मोटर कम्पनियों ने मेथेनॉल से चलने वाला इंजन बना लिया है। मेथेनॉल से शिपिंग और परिवहन के लिये मानक तय हो गये हैं। अगले एक महीने में बायो एविएशन फ्यूल पर नीति बना ली जाएगी।

तब तक हमारा तेल निकलता रहेगा?
अगर देरी करेंगे, तो और तेल निकलेगा।

पूर्वी राज्यों में नये महानगरों का विकास नहीं हुआ। लोगों को अपनी रोजी-रोटी के सिलसिले में बाहर जाना पड़ता है, बच्चे भी पढ़ने बाहर जा रहे हैं?
दूरदर्शी नेतृत्व किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पूँजी है। नये आइडिया के साथ रोजगार के अवसर पैदा करने की सोच रखने वाला नेतृत्व ही अपने राज्य का विकास कर सकता है। झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में काफी विकास हुआ है।

झारखण्ड में विकास की तमाम योजनाएँ बनीं, लेकिन किसी-न-किसी कारण से वे अटक गईं। जैसे राँची से जमशेदपुर की सड़क बनते-बनते रुक गई। अड़चनों को दूर करने के लिये ठोस योजना क्या है?
आप ये सवाल हाईकोर्ट से क्यों नहीं पूछते?

हाईकोर्ट से क्या नाराजगी है?

नाराजगी नहीं है। मैं तो चाहता हूँ कि यह सड़क हाईकोर्ट के मार्गदर्शन में बने। इस सड़क का निर्माण कार्य भाजपा की सरकार ने नहीं शुरू कराया था। पचास फीसदी काम पूरा होने के बाद फाइनेंस करने के लिये भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण आगे आया। लेकिन, हाईकोर्ट ने जाँच बैठा दी। इससे बोर्ड और अधिकारी डर गए। अब पुरानी कम्पनी को बर्खास्त करके नये सिरे से निर्माण करने वाली कम्पनी का चयन किया जा रहा है। अभी भी कुछ जगहों पर भूमि अधिग्रहण होना है। ईपीसी मोड पर यह सड़क बनने जा रही है।

आपने ‘हिन्दुस्तान टाइम्स समिट’ में कहा था कि विदेश की तरह देश में भी उच्चतम मानदण्ड पर गाड़ियाँ बनाने के लिये कम्पनियों को बाध्य किया जाएगा। अभी तक ऐसा हो नहीं पाया, क्यों?
01 अप्रैल, 2020 से यूरो-6 (बीएस-6) मानक पर वाहन बनाना अनिवार्य कर दिया गया है। पेट्रोलियम मंत्रालय यूरो-6 गाड़ियों के लिये 70 हजार करोड़ रुपए खर्च कर ईंधन उपलब्ध कराने जा रहा है। कम्पनियों ने यूरो-6 इंजन बनाना शुरू कर दिया है। अप्रैल 2020 से देश में यूरो-6 के मानक वाली गाड़ियों के आने से देश में वायु प्रदूषण की समस्या खत्म होगी।

शिलांग की आबादी के बराबर लोग हर साल सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। दुर्घटनाओं को कम करने के लिये पुरानी या नई सड़कों के डिजाइन में बदलाव की कोई योजना है?

देश में 30 प्रतिशत ड्राइविंग लाइसेन्स फर्जी हैं। इसे रोकने के लिये ड्राइविंग लाइसेन्स का ई-रजिस्ट्रेशन शुरू किया जा रहा है। पूरे देश में एक हजार ड्राइविंग ट्रेनिंग सेंटर खोले जा रहे हैं। इसके साथ-साथ इंटेलिजेंस ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम लागू हो रहा है। इकोनॉमिक मॉडल की गाड़ियों में एयर बैग अनिवार्य किया गया है। देश में हर साल पाँच लाख सड़क दुर्घटनाओं में करीब 1.5 लाख लोगों की मौत होती है, लेकिन अब इसमें चार प्रतिशत की कमी आई है। सड़क दुर्घटनाओं में 50 प्रतिशत कमी लाने के लक्ष्य को पूरा करने में सफलता नहीं मिली है।

आप पर गंगा को साफ करने की जिम्मेदारी देर से आई। उमा भारती जी ने घोषणा की थी कि 2018 में गंगा निर्मल बहने लगेगी। लेकिन गंगा कहाँ निर्मल हो रही है?
गंगा को निर्मल बनाने के लिये घाट, मोक्षधाम, बायो डायवर्सिटी आदि से जुड़े 245 प्रोजेक्ट हैं। गंगा की 40 सहायक नदियों में प्रदूषित जल का प्रवेश रोकने के लिये दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार में 170 परियोजनाओं पर काम शुरू किया गया है। परिणाम आने में एक साल तो लगेगा। मार्च 2019 में गंगा केमिकल अॉक्सीजन डिमांड और बॉयो अॉक्सीजन डिमांड स्तर पर 80 प्रतिशत तक साफ हो जाएगी। अगले वर्ष के अन्त तक गंगा निर्मल और अविरल होगी।

नदियाँ सूख रही हैं। भीमगौड़ा बैराज से साल 2000 में जितना वाटर डिस्पेंस हुआ, उससे ज्यादा इस साल किया गया। सारा पानी दिल्ली पी जा रही है। नहरों से गंगा का सारा पानी निकाल लिया जा रहा है। निर्मलता आएगी कैसे, जब जल ही नहीं पहुँचेगा?
पाँच प्रोजेक्ट की मदद से यमुना का जल-स्तर 160 प्रतिशत तक बढ़ाया जाएगा। हरिद्वार के बाद उत्तर प्रदेश में तीन स्थानों पर गंगा का पानी नहरों से निकाला जाता है। इसे कम किया जाएगा। अभी प्रोजेक्ट शुरू किया है, परिणाम एक साल में दिखेगा।

पैसे की कमी नहीं, तो फिर एनएफएलएस कैसे दिवालिया हो गई? 96 हजार करोड़ रुपए डूब गए। सबसे बड़ी बात यह कि सरकारी परियोजनाओं में लगाए पैसे वापस नहीं मिले?
यह गलत रिपोर्ट है। कोचीन शिपयार्ड के लिये 1,600 करोड़ की जरूरत थी। हमें मुम्बई स्टॉक एक्सचेंज से 1.26 हजार करोड़ मिले। टीओटी के नौ प्रोजेक्ट के लिये 6,400 करोड़ की जगह अॉस्ट्रेलियन कम्पनी ने 10,400 करोड़ दिये हैं। एक लाख करोड़ रुपए से दिल्ली-मुम्बई 12 लेन एक्सप्रेस-वे बना रहे हैं। 44 हजार करोड़ रुपए का काम शुरू हो गया है। दिसम्बर तक सारे काम शुरू हो जाएँगे। गुड़गाँव-जयपुर रिंग रोड भी शुरू कर रहे हैं। हमारे पास पैसे की कोई कमी नहीं है।

आप देश की नदियों को जोड़ने का भी काम कर रहे थे। उसका पहला उदाहरण कब तक देखने को मिलेगा?
अटल बिहारी बाजपेयी ने नदियों को जोड़ने की शुरुआत की थी। इसके लिये 30 प्रोजेक्ट मंजूर किये गए हैं। छह प्रोजेक्ट फाइनल किये गए हैं। इसके लिये दो लाख करोड़ रुपए की जरूरत है। इस प्रोजेक्ट के लिये हमारे पास पैसे नहीं हैं। विश्व बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक से 30 वर्षों के लिये लोन लेना होगा। गुजरात और महाराष्ट्र के बीच दमन गंगा पींजर, ताप्ती, नर्मदा को जोड़ने के लिये दो प्रोजेक्ट पर काम किया जाएगा। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच केन बेतवा का बड़ा प्रोजेक्ट है।

सुना है कि इस परियोजना पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री चाहते हैं कि चुनाव के बाद काम हो?
मुझे पता नहीं। इन दोनों राज्यों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुआ है। गोदावरी का करीब 3,000 टीएमसी पानी समुद्र में जाता है। हम आन्ध्र प्रदेश में 60,000 करोड़ का पोलावरम बना रहे हैं। गोदावरी का बैक वाटर कृष्णा में कृष्णा का पेनार में और पेनार का कावेरी में ले जाकर तमिलनाडु लाएँगे। 45 एमएलडी के लिये कर्नाटक और तमिलनाडु में झगड़ा है। हम 750 एमएलडी पानी इन राज्यों को देंगे। पान का झंझट ही खत्म हो जाएगा। इस प्रोजेक्ट को कैबिनेट से स्वीकृति मिलनी बाकी है। 90 प्रतिशत पैसा केन्द्र और 10 प्रतिशत राज्यों को देना है। बैंक से कर्ज के बाद छह प्रोजेक्ट को शुरू करने की स्थिति बनेगी।

राजनीति की गंगा थोड़ी टेढ़ी-मेंढ़ी बह रही है। उत्तर प्रदेश में कोई गठबन्धन हवा में है। गठबन्धन हुआ, तो आपको कितनी दिक्कत आएगी?
जो लोग कल तक एक-दूसरे को आँखे दिखाते थे, आज गले लगकर हाथ मिला रहे हैं। केवल मोदी और भाजपा को मजबूत होता देख गठबन्धन की कोशिश की जा रही है। राजनीति में दो प्लस दो तीन होता है। 1971 में जनसंघ, कांग्रेस-ओ जनता पार्टी और स्वतंत्र पार्टी ने मिलकर इन्दिरा जी को हराने का समीकरण बनाया था। लेकिन हार हाथ लगी।

लेकिन 1977 में उन्होंने मिलकर इन्दिरा जी को हरा दिया।
1977 के चुनाव की परिस्थितियाँ अलग थी। मैं भी आपातकाल में ही नेता बना। वह वक्त ही अलग था। हमें कोई भरोसा नहीं था। न पार्टी, न एजेंडा, न कार्यालय था, लेकिन लोगों ने जनता पार्टी को चुना।

कई सर्वे मेंं दिखाया जा रहा है कि राहुल गाँधी की लोकप्रियता काफी बढ़ रही है?
अच्छा ! अरे भाई उनकी पार्टी उनको गम्भीरता से नहीं लेती, तो आप क्यों ले रहे हैं?

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