इंग्लैंड में स्वच्छता अभियान और भारत में स्वच्छ नगर

Submitted by HindiWater on Wed, 11/13/2019 - 10:47
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नैनीताल एक धरोहर

फोटो - The Indian Express 14वीं शताब्दी के दूसरे दशक के बाद विश्व के अनेक देशों में पारिस्थितिक तंत्र का सन्तुलन गड़बड़ा गया था। उस दौरान यूरोप अनेक पर्यावरणीय संकटों से जूझ रहा था। पारिस्थितिक तंत्र के गड़बड़ा जाने से यूरोप में मिट्टी में प्रदूषण बढ़ गया, जिस कारण मिट्टी की उर्वरता कम हो गई। अनाज की उपज घट गई। परिणामस्वरूप भुखमरी बढ़ी और अकालों का युग आ गया। अकाल और भुखमरी से लोगों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई। महामारियाँ फैली। 1348-1351 की अवधि को काली मौत का दौर कहा गया। इस दौरान फैली हैजे की बीमारी ने यूरोप की करीब आधी आबादी को निगल लिया था। 14वीं शताब्दी के अन्त तक यूरोप की 40 प्रतिशत जनसंख्या घट गई। श्रमिकों का अभाव हो गया। कृषक विद्रोह पर उतर आए।
 
1837 में रानी विक्टोरिया ब्रिटेन के सिंहासन की उत्तराधिकारी बनीं। उन्होंने अतीत के कुछ कटु अनुभवों के मद्देनजर पारिस्थितिकीय, पर्यावरण और स्वच्छता पर ध्यान केन्द्रित किया। 1842 में इंग्लैंड में गंदगी को शत्रु की संज्ञा देते हुए गंदगी हटाओ अभियान शुरू हुआ। इस अभियान को सफाई प्रबन्ध की जागरुकता के नाम से जाना गया। स्वच्छता का यह अभियान प्रकारांतर में पुनर्जागरण और धर्म सुधार आन्दोलन के चिंतन से जन्मे मानववाद की अवधारणा से प्रेरित था। चूँकि रेनेसां के बाद मानव शरीर पाप का प्रतीक नहीं रह गया था। अब इसे सुन्दरता, गरिमा और आनन्द की वस्तु माना जाने लगा था। रेनेसां से जन्मी मानववादी सोच के चलते ही कस्बों एवं नगरों में नागरिक स्वतंत्रता का उदय हुआ था। सुन्दरता, गरिमा और आनंद की अनुभूति के लिए स्वच्छता को बुनियादी तत्व माना गया।
 
इधर भारत के मैदानी क्षेत्रों की भीषण गर्मी ब्रिटिश अभिजात्य वर्ग के लिए बर्दाश्त से बाहर होती जा रही थी। उस दौर में भारत के मैदानी हिस्सों में फैलने वाले मलेरिया, हैजा और काला ज्वर जैसी जानलेवा बीमारियों से अंग्रेज त्रस्त थे। उन्हें स्वास्थ्यवर्धक हवा और साफ पानी की सख्त जरूरत थी। भारतीय मौसम के कडुवे अनुभवों से गुजर रहे अंग्रेजों को भारत के पहाड़ों की आह्लादित कर देने वाली शुद्ध हवा, प्राकृतिक वातावरण की शुद्धता, शाश्वत नीरवता, मनमोहक नैसर्गिक सौन्दर्य तथा हिमालय की रोमांचक, अनोखी और मनोहारी छवि बेहद आकर्षित करती थी।
 
अंग्रेज भारतीय पहाड़ों के पर्यावरण की वजह से ही भारत में हिल स्टेशन विकसित नहीं करना चाहते थे। ब्रिटिश साम्राज्यवादी राज्य की व्यवहारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी उन्हें हिल स्टेशनों को विकसित करने के लिए प्रेरित किया। अंग्रेज अपनी श्रेष्ठता की भावनाओं को बनाए रखते हुए भारत के भीतर दूसरी संस्कृति के प्रभाव में आए बगैर स्वच्छ और सुरक्षित स्थानों में अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा सकते थे। क्योंकि तब तक अभिजात्य वर्ग के ब्रिटिश हुकमरानों, सिविल सेवा और सेना के उच्चधिकारियों को अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए अपने से बहुत दूर सात समुद्र पार इंग्लैंड भेजना पड़ा था। भारत में हिल स्टेशनों के विकसित होने के बाद यहाँ के शिक्षा केन्द्रों में अंग्रेजी शासक और उनके बच्चों को दूसरे लोगों के मुकाबले पदानुक्रम में सर्वोच्च रखा जाना सम्भव था। पीटर बैरन द्वारा नैनीताल की भौगोलिक एवं पर्यावरणीय स्थिति के बारे में दिए ब्योरे ने तब भारतमें रह रहे स्वच्छता एवं प्रकृति प्रेमी अंग्रेजों के मन की मुराद पूरी कर दी। उधर इंग्लैंड में स्वच्छता अभियान चला और इधर भारत में नैनीताल को स्विट्जरलैंड की तर्ज पर एक स्वास्थ्यवर्धक नगर के रूप में विकसित करने की प्रक्रिया शुरू हो गई।
 
बसावट के प्रारम्भिक दौर में नैनीताल का उच्चारण एवं शब्द-विन्यास बदलता रहा। पिलग्रिम ने अपनी किताब- नोट्स ऑफ वॉण्डरिंग्स इन द हिमाला में NAINEETAL और NYNEETAL लिखा है। जबकि 1867 के स्टेट्स प्लान एवं 1872 के दौरान बने यहाँ के सेटेलमेंट के मानचित्रों में NYNEETAL (नयनीताल) लिखा गया है। 1880 के बाद के दस्तावेजों में NAINITAL लिखा जाने लगा था।

 

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