स्वच्छता की संस्कृति और सामाजिक परिवर्तन

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स्वच्छता की संस्कृति ओर सामाजिक परिवर्तन।स्वच्छता की संस्कृति ओर सामाजिक परिवर्तन।

प्रास्ताविक

स्वच्छता प्रत्येक की अनिवार्यता व आवश्यकता है। उनके उपयोग व महत्त्व को निर्विकल्प कह सकते है। स्वच्छता की ओर विध-विध द्रष्टिकोण स्थित होते हैं। स्वच्छता की विविध नजरियें से पहचान प्राप्त की गयी है। स्वच्छता की जरूरतों अपरिहार्य हैं। स्वच्छता संबंधी कई विचार प्रवर्तित हैं ?

स्वच्छता: अर्थ 

मनुष्य जीवन के लिए स्वच्छता एक बुनियादी आवश्यकता है। आंतरिक और बाह्य दो रूपों में स्वच्छता का परिचय प्राप्त हो सकता है। दृश्य, मन व दिमाग के शुद्ध एवं सात्विक विचार, धर्म व वाणी-वर्तन की पावकता, आंतरिक स्वच्छता के आयाम हैं। बाह्य स्वच्छता के तहत सामूहिक स्वास्थ्य, शिक्षा-पर्यावरण, अच्छी सामाजिक व आर्थिक स्थिति इत्यादी बातों का समावेश होता है। बाह्य स्वच्छता का मूलाधार आंतरिक स्वच्छता है। आंतरिक स्वच्छता बाह्य स्वच्छता की कारक है। समाज का विकास व उनके सुखी संपन्न होने की एक दिशा स्वच्छता को अपनाने में रही है। कहा गया है कि ‘‘स्वच्छता से समृद्धि पैदा होती है, स्वच्छता से सुख पैदा होता है।

कमजोर स्वास्थ्य व स्वच्छता का देश के लोगों के आरोग्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है, जो देश के आर्थिक व सामाजिक परिवेश को भी प्रभावित करता है। वैश्विक स्तर पर भारत स्वच्छता संदर्भ में अब भी पिछड़ा हुआ है। देश के अधिकांश नगरों में अति भीड़, अनुचित जल संग्रह, मलमूत्र का अयोग्य निष्काशन, ड्रेनेज परियोजना, दूषित जल, कूड़ा-कर्कट के निष्कासन की अव्यवस्था, शौचालयों का अभाव, झुग्गियाँ, गंदे आवास, प्रदूषणयुक्त वायु, नदी-तालाबो की गंदगी आदि द्रष्टव्य हैं। स्वच्छता व्यक्त्तिगत व सार्वजनिक की जिम्मेदारी थी, वैयक्तिक, सामुदायिक व राज्य की संलग्न जिम्मेदारी है। स्वच्छता सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रथम लक्ष्य है, किन्तु भारत में इसका प्रबंधन कमजोर है। विकास की कमजोरी, विधि-विधान की कमी, कानून व नीति के अमलीकरण की ॠटीयां, टेक्नोलॉजी का अभाव, उद्देश्यों की अपूर्णता, क्षतियुक्त चिकित्सासेवा, गरीबी, नादुरस्ती, जैसे आयाम स्वच्छता को हानि पहुंचाते हैं। स्वच्छता की क्षतियों को समझने हेतु स्वच्छता का समाजशास्त्र महत्वपूर्ण है।

संस्कृति की विभावना 

संस्कृति मानव निर्मित है। मानव समाज के द्वारा आचार-व्यवहार के मानदंड स्थापित किये जाते हैं, जो कालान्तर में रुध होते हुए मूल्य में परिवर्तित हो जाते हैं। समय चक्र के प्रवाह के साथ ऐसे प्रतिस्थापित मूल्य ही संस्कृति का रूप धारण करते हैं। संस्कृति मानव समाज में सार्वत्रिक है। संस्कृति की ही बदौलत प्राणी एवं मानव के बीच की भिन्नता दृश्यमान  है। संस्कृति की उत्पत्ति का सम्बन्ध मनुष्य जाति  से ही है, जिसका विकास भिन्न रूपों में हुआ है। टाइलर का विचार है कि ‘’समाज में सदृश्य के रूप में मनुष्य के द्वारा प्राप्त ज्ञान, अधिगम , कला, मान्यताएं, नीति, इर्वज इत्यादी का जटिल समूह ही संस्क्रति है।’’

संस्कृति मनुष्य के समाज के द्वारा उद्धभावित, स्वीकृत, व्यवहार व विचारधारा की वह प्रणाली है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती हुई, परिवर्तनशीलता के साथ सत्य बनाये रखती है। 

स्वच्छता व संस्कृति का सम्बन्ध 

संस्कृति संबंधित देश, समय व भौगोलिकता के साथ संलग्न होती है। स्वच्छता का भी संस्कृति से संलग्न होना सहज-स्वाभाविक है। स्वच्छता समाज के भिन्न समुदायों व बिरादरियों के सांस्कृतिक मूल्यों से सम्बंधित होती है। जैसे कि कला और स्वच्छता, साहित्य और स्वच्छता, लोकजीवन और स्वच्छता, धार्मिक पर्व-त्यौहार और स्वच्छता, लोकोत्सव और स्वच्छता इत्यादी स्वच्छता के साथ सांस्कृतिक पारस्परिक सम्बन्ध है। स्वच्छता को संस्कृति के विविध आयाम प्रभावी बनाते हैं। संस्कृति के विकास व परिवर्तनों की कई प्रक्रिया से स्वच्छता भी हानिग्रस्त हुई है। स्वच्छता पर इन पहलुओं के होने वाले विपरीत असर को निम्न रूपों में देखा जा सकता है।

कला और स्वच्छता

स्वच्छता का कला के साथ प्रत्यक्ष व परोक्ष संबंध है। प्रत्येक कलाओं में स्वच्छता निहित होती है। चित्र कला, माटी कला, चर्म कला, नृत्य कला, आदि के साथ स्वच्छता का किसी न किसी रूप में संबंध है। जैसे कि चर्मकला मृतक पशुओं के चर्म को साफ करने के साथ संलग्न है। जिसमें निम्नवर्ण से लोग संलग्न होते हैं। उनके हाथों की सफाई, चर्म की सफाई-स्वच्छता अति आवश्यक बन जाती है। चर्म संबंधित जूते आदि के निर्माण में भी स्वच्छता अनिवार्य है। चर्म संबंधित कार्य में मृतक पशुओं के चर्म को निकालने की क्रिया में जल का व्यय, बदबू व गंदगी का प्रभाव बना रहता है। फलतः पर्यावरणीय प्रश्न पैदा होता है। उत्तरप्रदेश के कानपूर शहर में चर्म उद्योगों के कारखानो से निकलनेवाला जल, जो लाल रंग का भी होता है, नदी में बहाया जाता है। इससे लोगों के स्वास्थ्य पर सीधा खतरा पैदा हुआ है। यद्यपि कला का अवश्य विकास हुआ है किन्तु पर्यावरण, स्वच्छता के भी कई प्रश्न उपस्थित हुए हैं। इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को निम्नवर्ण का माना जाता है। इस कार्य से संलग्न लोगों के प्रति भेदभाव नीति प्रवर्तित है, अतः चर्मकला के साथ स्वच्छता का संबंध है।    

जुलाहे का कार्य भी स्वच्छता से प्रभावित रहता है। इस कला का भी इनसे प्रत्यक्ष संबंध रहा है। इस कार्य के प्रत्येक चरण को सावधानीपूर्ण नहीं उठाया गया तो कार्य में निष्फलता प्राप्त हो सकती है। स्वच्छता के बिना उत्तम वस्त्र का निर्माण असंभव है। आज लोगों के पसंद करने के नजरिये बदल गये है। जुलाहे की कला संस्कृति से संबंध है। जुलाहे लोग निम्न जाति के माने जाते हैं। इस कार्य में सूक्ष्मातिसूक्ष्म गतिविधियाँ करनी पड़ती है। रूई से तार बनाये जाता हैं, छोटे तारो को बुनने का कार्य कठिन है। इस कार्य से बदबू पैदा होती है। तैयार वस्त्र को लेकर भी बदबू फैलती है। रंगकार्य, छपाई कार्य से बदबू फैलती है। लोग जुलाहे के पास से विविध उपयोग हेतु वस्त्र प्राप्त करते हैं। पूजा-विधि हेतु कपड़ों का इस्तेमाल होता है। जिससे लोग इन निम्न जाति के लोगों के द्वारा तैयार किये गये कपड़ो के प्रति भी छुआछूत का भाव रखते हैं। अतः उनकी कला को मान न देते हुए उसे सामाजिक परिप्रेक्ष्य से जोड़ दिया जाता है।

जुलाहे के कार्य के साथ पर्यावरण भी संलग्न है। वस्त्र तैयार करने में पानी का व्यापक उपयोग होता है। पानी में रासायनिक तत्वों का मिश्रण होता है, जो प्रदूषण फैलाते हैं और जमीन में उतरने वाला दूषित जल एक प्रकार का खतरा फैलाता है। अतः इस कला से भी स्वच्छता का संबंध है। मूर्तिकला या माटी कला व चित्रकला परंपरागत संस्कृति से संबंध है। स्वच्छता में संलग्न इन कलाओं का विशेष महत्त्व है। पत्थर से निर्मित मूर्तियाँ ईश्वर, राजकीय नेता व महानुभावों की होती हैं, जिससे लोगों का आदरभाव जुड़ा होता है। फलतः इससे स्वच्छता का होना अनिवार्य है। इन मूर्तियों, चित्र आदि की स्वच्छता, सुंदरता व मूर्ति का प्रभाव पूर्ण होना चाहिए। चित्रों की स्पष्टता व मूर्ति की प्रभावपूर्ण निर्मिति एक विशेष वातावरण को पैदा करती है। यद्यपि चित्रकार व मूर्तिकार उच्चवर्ण के नहीं भी हो सकते हैं। वे महेनतकश लोग भी छुयाछूत व भेदभाव की स्थिति का शिकार बनते हैं। उन्हें भी शोषण सहना पड़ता है। असामान्य कलाशक्त्ति युक्त्त इन लोगों के साथ स्वच्छता का प्रश्न बना रहा है।

मूर्ति-कला, चित्र कला, काष्ठकला पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। काष्ठकला में लकडियों की मूर्तिकला बनाने हेतु वृक्षो की कटाई होती है। संगमरमर की मूर्ति हेतु भी मूल्यवान संगमरमर को निकाला जाता है। इसके असंतुलन से भूकंप की स्थिति पैदा होती है। मूर्तिकला में भी उर्वर भूमि से मिट्टी प्राप्त की जाती है। अतः मिट्टी का भी व्यय होने के साथ ही जमीन को भी नुकसान पहुंचता है। इन सभी कलाओं के साथ स्वच्छता का संबंध रहा है।

साहित्य और स्वच्छता

साहित्य संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। साहित्य समाज का दर्पण है। संस्कृति से हमारी सांस्कृतिक पहचान पैदा होती है। साहित्य समाज सापेक्ष होता है। भौगोलिकता, सामाजिकता, प्रादेशिकता आदि का साहित्य में विशेष प्रभाव निहित होता है। फिल्मे, टेलीविजन, विविध माध्यमों में साहित्य का दृश्य स्वरूप प्राप्त होता है। समाज की वास्तविकता का रूपायन साहित्य के द्वारा होता है। वेदकालीन साहित्य, बौद्ध व जैनकालीन साहित्य, भक्त्तिकालीन साहित्य, ब्रिटिशकालीन साहित्य तथा आधुनिक कालीन साहित्य में कई साहित्यकारो का योगदान प्राप्त हुआ है। उन्होंने अपने साहित्य में अपने समय के समाज की स्वच्छता को प्रतिबिंबित किया है। प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप में स्वच्छता के चित्र अंकित किये हैं।     

स्वच्छता के संबंध में विविध कार्यक्रम, आयोजन आदि तैयार किये जाते हैं, किन्तु पाठशाला-महाविद्यालयों में इसे अभ्यासक्रम के रूप में स्थान प्राप्त नहीं हुआ है। विद्यालय स्तर पर ऐसा स्वच्छतालक्षी साहित्य अभी तैयार नहीं किया गया है। पर्यावरण विषय का इस स्तर पर स्वतंत्र अभ्यास करवाया जाता है किन्तु स्वच्छता के साहित्य के संबंध में अब भी उदासीनता प्रवर्तित है। सुलभ इन्टरनेशनल सोशल सर्विसेज़ के प्रणेता डॉ. बिन्देश्वर पाठक के द्वारा ‘स्वच्छता का समाजशास्त्र‘ एक विषय के रूप में यूजीसी के पास मान्यता प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है। उनका स्वप्न है कि भारत के सभी विश्वविद्यालयों में स्वच्छता संबंध में साहित्य प्राप्त हो और एक विषय के रूप में स्वीकार हो। 

जन जीवन और स्वच्छता 

भारतवर्ष का जन जीवन, जन संस्कृति की एक विशेष पहचान है। विविधता में एकता की स्थिति भारतवर्ष का वैशिष्ट्य है। समयांतर के साथ लोकजीवन का स्वयंमेव प्रभाव प्रवर्तित होता दृष्टव्य हुआ है।  विविध जातियाँ, धर्म आचार-विचार अपने अनूठे मूल्यों व मानदण्डो के साथ प्रवर्तित हैं। जातियो के पारस्परिक आतंरिक व्यवहार विशेष प्रभाव पैदा करते हैं। विविध जाति व बिरादरियों के अन्य बिरादरियो के साथ के व्यवहार के अनूठे नियम व बंदिश हैं। पारस्परिक जातियों के बीच ‘कार्यात्मक आवश्यकता‘ के संबंध स्थित थे, जिसे जजमान व यजमान प्रथा कहा जाता है। उच्चवर्ण के लोगो का अपने से निम्न जातिवाली जातियों के साथ घनिष्ठ व्यवहार नहीं था। वर्तन-व्यवहार में जातियों के बीच विविध मानदण्ड प्रवर्तित रहे हैं। स्वच्छता के परिप्रेक्ष्य में देखे जाने पर फलित होता है कि स्वच्छता का कार्य करनेवाले निम्न माने गये हैं, जिनसे भेदभाव की निति अपनायी जाती थी। सामाजिक भेदभाव का स्वच्छता के साथ प्रत्यक्ष व परोक्ष संबंध है।

भारत देश का संविधान ‘बिन सांप्रदायिक‘ देश की पहचान देता है। सभी को समान अधिकार दिये गये हैं। इस देश में हिन्दू-मुस्लिम, सिखा, जैन, बौद्धा, पारसी आदि धर्म के लोग निवास करते हैं। इन सभी धर्मो के अपने आचार-विचार हैं, जिनसे लोग प्रभावित होते हैं। पवित्रता, मानवता, ईश्वर भक्त्ति का सन्देश सभी धर्मो से प्राप्त होता है। मन की स्वच्छता का सन्देश भी प्राप्त होता है। अतः इन धर्मो के विचारो का जन मानस पर असर पैदा होता है। भारत में विशेषतः नगरीय, ग्रामीण व आदिवासी समुदाय प्रवर्तमान है। सभी समुदायों की विशेष पहचान है। नगरीय समुदाय की अपनी संस्कृति, प्रणाली है जो अन्य समुदायो से भिन्न है। लोग स्वच्छता के आग्रही होने पर भी सार्वजनिक स्वच्छता के संबंध में लापरवाह हैं। ग्राम्य समुदाय के लोग अशिक्षित होने के कारण स्वच्छता के प्रति जागरुक नहीं हैं और आदिवासी लोग प्राकृतिक पर्यावरण पर आधारित होने के कारण स्वच्छता प्रति जागृत नहीं है। अतः भारत में स्वच्छता की स्थिति असंतुलित रही है।

भारत भौगोलिक स्थिति से भी विशिष्ट है। मैदानों की संस्कृति, पर्वतीय आबादी, वन निवासी, समुद्रतटीय लोग, शीत प्रदेश के लोग आदि विविधता प्रवर्तित है। जहाँ मैदानी इलाके हैं वहाँ कृषि व औद्योगिकता संबंध में जागरुकता है। पर्यावरणीय प्रश्नों के प्रति जागरुकता है। पर्वतीय व ढलानयुक्त्त इलाको में पशुपालन अधिक है। ऐसे इलाको में प्राकृतिक हवा और जल पर्याप्त प्राप्त होते हैं। किन्तु ऐसे इलाको में वृक्षो की कटाई भी अपनी मात्रा में होने के कारण पर्यावरणीय खतरा पैदा होता है। भारत का जनजीवन वैविध्यपूर्ण रीत-रिवाज, जीवनशैली, कला-कारीगरी, प्राचीन हस्तप्रत, चित्र, धार्मिक संस्कृति, साहित्य संगीत, भजन आदि के द्वारा चलता रहता है। सभी क्षेत्रो में स्वच्छता के संबंध में संदेश फैलाये जाते हैं। धार्मिक विचारधारा पूर्ण रूप से स्वच्छता की आग्रही है।
    
कृषिप्रधान देश भारत में कला और कारीगरी के बेमिसाल उदाहरण प्राप्त हैं। विविध व्यवसाय की जो आर्थिक स्थिति से भी संलग्न’ है जैसे कि, मिस्त्रीकार्य, लोहार का कार्य, दरजी का कार्य, सफाई कार्य, माटी कार्य, मजदूरी कार्य आदि सभी में स्वच्छता का विशेष महत्त्व है। व्यवसाय की सफलता का आधार स्वच्छता पर निर्भर है। अतः भारत के जन जीवन की स्थिति को स्वच्छता के परिप्रेक्ष्य से सम्बद्ध माना जा सकता है। विश्वभर में भारत जैसी विविधता प्राप्त नहीं होती है। ‘एकता‘ को भारत की जान माना जा सकता है। जन जीवन के प्रति उदासीनता समाप्त हो सकती है और स्वच्छता जन जीवन का एक हिस्सा बन सकती है।

धार्मिक उत्सव और स्वच्छता     

भारत देश में धार्मिकता बुलंद है। धर्म, उपधर्म की अनेक दिशाएँ प्रवर्तमान है। वर्ष के दौरान कई प्रकार के त्यौहार-उत्सवों को मनाया जाता है। किसी न किसी रूप में धार्मिक स्थानों का उपयोग होता रहता है। धार्मिक मेले, पूजा-पाठ, कीर्तन, रथयात्रा, प्रदर्शनी आदि के आयोजन समयांतर में किये जाते हैं। ऐसे माहौल में ऐसे स्थानों पर स्वच्छता की अनिवार्यता सविशेष रहती है। वास्तविकता यह है कि ऐसे माहौल में, उत्सवो में गंदगी, अस्वच्छता, मल-मूत्र का दूषण, निवास के प्रश्न, दूषित जल की समस्या आदि अनेक दुविधाएँ पैदा हो उठती हैं। कुंभ मेले का आयोजन इसका सशक्त्त उदाहरण है। लाखों की तादाद में इकठ्ठे होने वाले लोगों से पैदा होने वाली गंदगी का कोई सुनियोजित निवारण नहीं होता। अस्वच्छता का प्रभाव उत्सव की समाप्ति के लम्बे अरसे तक रहता है। ईश्वर पर रहने वाली श्रद्धा का प्रथम चरण ‘‘स्वच्छता’’ होने के बावजूद भी लोग लापरवाह हैं। सार्वजानिक, धार्मिक स्थानों पर स्नान क्रिया को पुण्य कार्य माना जाता है। किन्तु लोगों के मन में स्वच्छता की संकल्पना पैदा नहीं होती है। भारत वर्ष में कई छोटे बड़े मंदिर, गुरुद्वारा, मस्जिदों में लोग इकठ्ठे होते हैं और गंदगी फैलाते हैं। विभिन्न जुलूसो में भी लोग स्वच्छता के संबंध में लापरवाह ही रहते हैं। सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में धर्म संबंधित अनेक कार्यों में स्वच्छता अनिवार्य होने पर भी लोगों की लापरवाही दुष्प्रभाव पैदा करती है।

लोक उत्सव और स्वच्छता 

लोक उत्सव भारतीय संस्कृति की धरोहर हैं। समग्र भारत में इनका विशेष आयोजन किया जाता है। कृषि प्रधान देश भारत में कृषि विषयक विविध क्रियाओं में भी लोक उत्सव आयोजित होते रहते हैं। बोने की क्रिया, पानी वितरण की क्रिया, फसल कटाई कार्य आदि लोक उत्सवों के साथ किये जाते हैं। धार्मिक त्योहारों के उपक्रम में नौरात्र, लोकनृत्य, आदिवासी नृत्य, भवाई आदि का आयोजन किया जाता है। गुजरात में तरनेतर का मेला, वौठा का पशु मेला, डाकोर का पूर्णिमा मेला, भावनगर का निष्कलंक मेला, अम्बाजी का भाद्रपद की पूर्णिमा का मेला आदि साल भर में आयोजित होते रहते हैं। लाखों लोगों के इकठ्ठे होने पर स्वच्छता के संबंध में कई प्रश्न उठते हैं। स्वच्छता के प्रति दुर्लक्ष कई खतरे पैदा करता है।

स्वच्छता और सामाजिक परिवर्तन  

विविध परिस्थितियों के अधीन सामाजिक परिवर्तन होता है। स्वच्छता सामाजिक परिवर्तन का सशक्त्त माध्यम है। स्वच्छता को समाज का प्रत्येक व्यक्त्ति स्वीकृत करता है। कहीं कोई अस्वीकृत करे, तब भी पुनः विचारने के पश्चात उसका स्वीकारना अनिवार्य हो जाता है। स्वच्छता संबंधित कई परिवर्तन प्राप्त हुए हैं।

स्वच्छता से विविध परिवर्तन -

1. लोगों की विचारधारा में परिवर्तन - सुरक्षा व सलामती के विचार से सामान्यतः लोग परंपरागत विचारधारा से सलंग्न रहते हैं। स्वच्छता व शौचालय से रूढिगत-विचारों में परिवर्तन प्राप्त हुआ है। अपने घरों में लोग अब स्वच्छता व शौचालय के आग्रही बने हैं। सार्वजनिक शौचालय के उपयोग में बढोत्तरी हुई है। स्वच्छता व शौचालय खर्चीला होने पर भी उसे प्रतिष्ठा का माध्यम माना गया है। अतः शौचालय व स्वच्छता की स्थिति में विचारों में परिवर्तन प्राप्त हुआ है।

2. रोजगार के नये अवसर - स्वच्छता व शौचालय के उपयोग से रोजगार के नये आयाम-खुले हैं। संबंधित सामग्री, साधन इत्यादी का उत्पादन, बिक्री, नयी तकनीकों का उपयोग रोजगार के निमित्त बने हैं। रोजगारी के स्थानों पर रहनेवाली भेदभाव नीति समाप्त हुई है। केन्द्र व राज्य सरकारों के प्रयासों से सफाई कर्मियों की शिक्षा-रोजगारी की सुविधा मुहैया कराने पर आमूल सामाजिक परिवर्तन हुआ है।

3. विवाह संबंधित विचारों में बदलाव - शिक्षा व अन्य माध्यमों से विचारों में परिवर्तन देखा गया है। लोगों की मानसिकता में सुधार हुआ हैं। शौचालय सुविधायुक्त्त घरों में अपनी बेटी के विवाह का विचार लोग करने लगे हैं। स्वच्छता व शौचालय  का महत्त्व प्रस्थापित हुआ है। जीवनसाथी के चयन में भी मानदंड बदले हैं। शौचालय व स्वच्छतायुक्त्त घर प्रतिष्ठित माने जा रहे हैं। जिन घरों में इनका अब भी अभाव है उन घरों के बेटे-बेटियों के विवाह में दिक्कते पैदा होती हैं। अतः विवाह संबंधित विचारों में स्वच्छता व शौचालय की बदौलत परिवर्तन हुआ है।

4. व्यावसायिक कोटि में परिवर्तन - भारत में सभी को व्यावसाय चुनने का स्वतंत्र अधिकार प्राप्त है। बीते समय में दलित व पिछड़ी जाति के लोगों को शौचालय व स्वच्छता के कार्य अनिवार्यतः करने पड़ते थे। समाज के द्वारा रची गयी यह व्यावसायिक कोटि अपरिवर्तनीय कोटि थी। समयांतार में शौचालय कर्मियों के पुनर्वासन व उद्धार का अभियान प्रारंभ हुआ। आधुनिक शौचालय के विकास से उन लोगों को व्यवसाय चयन करने का मौका मिला। निम्न व दलित लोगों के व्यवसायों में भी अब परिवर्तन आया है। इन जाति-बिरादरियो की सामाजिक स्थितियों में बदलाव आया है।

5. ग्रामीण समूहों के स्वरूप में परिवर्तन - ग्रामीण समूहों की रुढिवादिता, मान्यताएँ, वहम, संदेह, जातिभेद, अस्पृश्यता जैसी मानसिकता थी। शौचालय व स्वच्छता संबंधित कार्यों में सफाईकर्मियों को नाना प्रकार के अन्यायों, भेदभाव व शोषण का शिकार बनना पड़ता था। उन्हे मंदिर में प्रवेश निषेध, कुँए-तालाब से जल उपयोग निषेध, अलग शमशाम, पाठशाला प्रवेशादी के अनूठे नियम प्रवर्तित थे। प्रभावी बिरादरियो का बोलबाला था। आज शौचालय संबंधित नियमों में परिवर्तित होने से सफाई कर्मियों को पर्याप्त स्वतंत्रता प्राप्त हुई है। ग्रामीण समूहों के स्वरूप में आमूल परिवर्तन प्राप्त हुआ है।

6. जन आरोग्य क्षेत्र में परिवर्तन - शौचालय की बदौलत जन आरोग्य में सुधार आया है। स्वच्छता व शौचालय लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं। खुले में होने वाली शौचक्रिया पर स्वैच्छिक पाबंदी लग गयी है। स्वच्छतालक्षी विचार, खान-पान संबंधित विचार व आदतों में बदलाव आया है। स्वच्छता के लिए लोग अब जिम्मेदाराना व्यवहार करने लगे हैं। जन जागृति के परिपाकरूप आरोग्य के प्रश्नों का समाधान प्राप्त हुआ है। स्वास्थ्य के सुधार में स्वच्छता व शौचक्रिया की अहम् भूमिका रही है।

7. शौचालय एक सामाजिक प्रतिष्ठा  - शौचालय व स्वच्छता से सामाजिक परिवर्तन प्राप्त होता रहा है। इनकी प्रभावोत्पादकता के संदर्भ में अब कोई संदेह की स्थिति नहीं है। घर में शौचालय होना प्रतिष्ठा का कारण बन गया है। जैसे जागीर, धनसंपति व गहनों का महत्त्व है वैसे ही अब शौचालय को प्रतिष्ठा का कारक माना जा रहा है। गाँव के इज्जतदार लोगों में उनकी गिनती होती है, जिनके अपने घरों में शौचालय है। घर का जनाना वर्ग तथा अतिथिगण शौचक्रिया में संकोच का अब अनुभव नहीं करते।

8. स्थानांतरण पर नियंत्रण  - विविध कारणों में शौचालय का अभाव स्थानांतरण का महत्वपूर्ण कारण है। कुछ ग्रामीण प्रांतो में आज भी निःसंकोच रूप से ग्रामीण खुले में शौचक्रिया करते हैं। आज शिक्षा के प्रचार प्रसार से, संचार माध्यमों के प्रभाव से लोगों के मन में शौचालय की गरिमा का ख्याल विकसित होने लगा है। जन जागृति से स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं के हल प्राप्त होने लगे हैं। रुढिवादी लोग जब आज भी शौचालय से विमुख हैं, तब नयी पीढ़ी मजबूरन स्थानांतरण करने लगी है। दोनों पीढियों के बीच वैचारिक व भौतिक अंतर बढ़ने लगा है। परिणाम स्वरूप रुढिवादी पुरानी पीढ़ी अब शौचालय संबंध में विधेयात्मक विचार अखत्यार करती है। फलतः स्थानांतरण की प्रक्रिया में रोक लगी है। स्नांतरण का नियंत्रण एक सटीक सामाजिक परिवर्तन है।

9. स्त्रियों के दरज्जे में परिवर्तन - ग्रामीण प्रांतो में शौचालय के उपयोग के संदर्भ में स्त्रियाँ कमजोर रही हैं। खुले में शौचक्रिया करने वाले विविध जन समूहों में साथ स्त्रियाँ भी कार्य करती हैं। गृह सफाई, जाडू-पोछा, शिशुपालन, रसोई काम, कपडे की धुलाई आदि भूमिकाएँ निभाने वाली औरतों का स्थान निम्न स्थिति में था। समयांतर में इस स्थिति में बदलाव आया है। अपने हक व अधिकार के प्रति अब स्त्रियाँ जागृत हुई हैं। शौचालय संदर्भ में स्त्रियों का अति आग्रह रहा है। समाज को स्त्रियों के प्रश्न को लेकर शौचालय को स्वीकार करना पड़ा है। औरतो के सामाजिक दरज्जे में वृद्धि हुई है। जिसे सामाजिक परिवर्तन ही कह सकते है।

10. नये कानून का प्रादुर्भाव - औपचारिकता व अनौपचारिक माध्यमों के द्वारा सामाजिक नियंत्रण संभव है। अनौपचारिक माध्यम की कमजोरी पर औपचारिक माध्यम की सक्रियता बढ़ाई जाती है। तात्पर्य है कि रिवाज, रूढ़ी, मान्यताएँ व जनरीति से नियंत्रण प्राप्त नहीं होता है। तब कानून के द्वारा, नीतियों के द्वारा प्रयत्न किये जाते हैं। स्वच्छता व शौचालय संदर्भ में भी अनौपचारिक माध्यमों के कारगर न रहने पर नये कानून, पुलिस प्रशासन, न्यायालय आदि को अपनी भूमिका निभानी पड़ती है। पूर्व कानूनों में परिवर्तन करते हुए कई नये कानून लागू किये जा रहे है। कानून के जरिये जन जागृति फैलाने का प्रयास एक सामाजिक परिवर्तन है। शौचालय की अब अनिवार्यता पैदा हो गयी है। भले ही शौचालय निर्माण को महँगा माना जा रहा है किन्तु लोग अब समझने लगे हैं कि इसमें निवेश किये गये रुपयों से दीर्घकालीन कई खर्चो पर काबू प्राप्त किया जा सकता है। लोगों की रुढिवादी व पारंपरिक विचारधाराओ में भी बदलाव पैदा हुआ है। शौचालय व स्वच्छता के द्वारा सामाजिक क्रांति, सामाजिक परिवर्तन के सुपरिणाम प्राप्त हुए हैं।

समापन 

स्वच्छता के प्रति अभिमुखता के संदर्भ में भारत अभी भी पिछड़ा हुआ देश है। स्वच्छता का परिप्रेक्ष्य अस्पष्ट है, लापरवाही, गैर जिम्मेदाराना रवैया कई जोखिम पैदा करता है। स्वच्छता को लोक साहित्य में, साहित्य के विविध स्वरुपो में स्थान प्राप्त हुआ है। कई कलाओं में भी स्वच्छता की महत्ता को स्वीकार किया गया है। भारतीय लोकजीवन, लोकोत्सव, धार्मिक सम्मेलन आदि में स्वच्छता के प्रति दुर्लक्ष बने रहे हैं। स्वच्छताभिमुख होने की अति आवश्यकता है। सांस्कृतिक दृष्टि से स्वच्छता का व्यक्त्तिगत महत्त्व है किन्तु व्यावहारिक महत्त्व नहीं है।

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डॉ.अनिल वाघेला,
एसोसिएटेड प्रो. एंड हेड ऑफ सोसिओलोजी डिपार्टमेंट,
एम.के.भावनगर यूनिवर्सिटी,
शामलदास आर्ट्स कॉलेज, भावनगर-364002 गुजरात, इंडिया

 

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