जलवायु परिवर्तन से विलुप्त हो रहे पक्षी

Submitted by HindiWater on Sat, 08/03/2019 - 12:46
Source
विज्ञान प्रगति, जून 2019

जलवायु परिवर्तन से विलुप्त हो रहे पक्षी। जलवायु परिवर्तन से विलुप्त हो रहे पक्षी।

भारत में एक समय था जब चिड़ियों की बारह सौ प्रजातियाँ पाई जाती थीं, लेकिन अब इसमें से 50 से अधिक प्रजातियाँ लुप्तप्राय हो गई हैं। उदाहरण के तौर पर गिद्धों की कुछ प्रजातियाँ, कठफोड़वा, ग्रेट इंडियन बस्टैर्ड जैसे पक्षियों की प्रजातियाँ लुप्त हो गई हैं या लुप्त होने के कगार पर हैं। एक अध्ययन के अनुसार पिछले 50 वर्षों में पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियाँ धरती से लुप्त हो गई और कई लुप्त होने के कगार पर हैं। विकास सम्बन्धी अस्थाई नीतियों और प्रकृति के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता के कारण भारत के कई पक्षी वास खतरे में हैं। इससे पक्षियों के लुप्त होने का खतरा और भी बढ़ गया है।


फुदकती गोरैया, नाचता मोर अथवा रात में आहट पाकर कच्च कू करते उल्लू को सुनने और देखने से मन को सुकून मिलता है, लेकिन विकास की इस अंधीदौड़ में ये पक्षी अब यदा-कदा ही दिखाई पड़ते हैं। यही नहीं प्राकृतिक सफाई करने वाला गिद्ध भी शहरों में तो दिखता ही नहीं, अब गाँवों में भी यदा-कदा ही दिखाई देता है। यानी प्रकृति के ये सहचर हमारे बीच से देखते ही देखते गायब होते जा रहे हैं। सैकड़ों पक्षियों की प्रजातियाँ अब दिखती ही नहीं हैं। जीव वैज्ञानिक नित नए जीव-जन्तुओं की जहाँ खोज में लगे हैं, वहीं पर इनका संरक्षण न होने और ग्रीन हाउस गैसों, अकाल, बाढ़ ग्लोबल वार्मिंग की समस्या, पर्यावरणीय समस्याओं तथा शिकार के कारण लगातार इनके अस्तित्व का खतरा भी बढ़ रहा है। इन्ही जीव जन्तुओं में पक्षी-वर्ग की प्रजातियाँ शामिल हैं। सबसे अधिक प्रजातियाँ अफ्रीकी और दक्षिण एशिया के देशों में लुप्त हुई हैं। भारत में एक समय था जब चिड़ियों की बारह सौ प्रजातियाँ पाई जाती थीं। लेकिन अब इसमें से 50 से अधिक प्रजातियाँ लुप्तप्राय हो गई हैं। उदाहरण के तौर पर गिद्धों की कुछ प्रजातियाँ, कठपोड़वा, ग्रेट इंडियन बस्टैर्ड जैसे पक्षियों की प्रजातियाँ लुप्त हो गई हैं या लुप्त होने की कगार पर हैं। एक अध्ययन के अनुसार पिछले 50 वर्षों में पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियाँ धरती से लुप्त हो गई और कई लुप्त होने के कगार पर हैं। विकास सम्बन्धी अस्थाई नीतियों और प्रकृति के प्रति बढ़ती असंवेदनशीलता के कारण भारत के कई पक्षी वास खतरे में हैं। इससे पक्षियों के लुप्त होने का खतरा और भी बढ़ गया है। इस बात की पुष्टि बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के उस ताजा अध्ययन से मिलती है जिसमें भारत के कम-से-कम दस जैवविविधता वाले इलाकों (इम्पार्टेंट बर्ड एंड बायोडायवर्सिटी एरियाज-आईबीए) पर हमेशा के लिए लुप्त हो जाने का खतरा पैदा हो गया है। गौरतलब है कि पक्षियों के महत्त्वपूर्ण वास स्थानों को दुनियाभर में आईबीए कहा जाता है।

भारत में जिन पक्षीवास स्थानों का खतरा बढ़ गया है उसमें गुजरात के कच्छ की पलेमिंगो सिटी, महाराष्ट्र का सोलापुर, मुम्बई का सीवडी-माहुल क्रीक, अहमदनगर का ग्रेट इंडियन बस्टर्ड अभयारण्य शामिल हैं। इसके अलावा हरियाणा स्थित बसई, मध्यप्रदेश स्थित सैलाना खरगोश अभयारण्य, अंडमान निकोबार का मिल्लांगचोंग, कर्नाटक का रानेबेन्नूर अभयारण्य, मध्यप्रदेश का करेरा वन्यजीव अभयारण्य भी हरियाली की कमी के कारण पक्षियों के लिए प्रतिकूल साबित हो रहे हैं।

कांजीरंगा असम का प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यान है। यह यूनेस्को घोषित विश्व धरोहरों में शामिल है। इसमें पक्षियों की चार सौ पचास प्रजातियाँ पाई जाती हैं जिसमें बंगाल फ्लोरिकन, हॉर्नबिल और उल्लू की कुछ प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर हैं। बदले मौसम, अति वर्षा, बढ़ते प्रदूषण, शिकारियों द्वारा किए जा रहे शिकार के कारण पक्षियों के लिए अब यह उद्यान सुरक्षित नहीं रह गया है। इसी तरह राजस्थान के भरतपुर जनपद में स्थित केवलादेव उद्यान 1985 से विश्व धरोहरों में शामिल है। यहाँ पक्षियों की 365 प्रजातियाँ तीन शताब्दी पहले पाई जाती थीं। जो चीन, अफगानिस्तान, साइबेरिया से बड़ी तादाद में यहाँ आए थे। आजादी के पहले यहाँ पक्षियों के शिकार करने के लिए राजशाही परिवार के अलावा अन्य मांसभक्षी पक्षियों का शिकार करते थे जिससे अनेक तरह के पक्षी हमेशा के लिए लुप्त हो गए। विश्व धरोहर होने के बावजूद यह पक्षी उद्यान पक्षियों के लिए सुरक्षित नहीं है। इसका कारण यह है कि चोरी-छिपे पक्षियों का शिकार ही नहीं बिक्री के लिए भी पक्षियों को बाहर भेजने का सिलसिला जारी है। आस-पास कई गाँव आबाद होने के कारण स्थाई निवासियों और अभयारण्य के भीतर हिंसक झड़पे भी हुआ करती हैं। जिससे कई तरह से पक्षियों के लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। जिसमें तीतर, बटेर आदि शामिल हैं।

भारत में केन्द्रीय स्तर पर अनेक राष्ट्रीय प्राणी उद्यान हैं जिसमें राष्ट्रीय प्राणी उद्यान, नई दिल्ली, काजीरंगा असम के अलावा पद्मजा नायडू हिमालयन प्राणी उद्यान, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल के अलावा राज्यस्तर पर प्रत्येक राज्य में प्राणी उद्यान बनाए गए हैं। नई दिल्ली स्थिति राष्ट्रीय प्राणी उद्यान 214 एकड़ भूमि में फैला हुआ है, जहाँ स्तनपायी, सरीसृपों के अलावा पक्षियों की अनेक दुर्लभ प्रजातियाँ मिलती हैं। केन्द्रीय पक्षी उद्यान होने के बावजूद इस उद्यान के पक्षियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। इसका कारण जहाँ पर्यावरण का अधिक प्रदूषण है वहीं पर आस-पास अनेक अनगिनत अट्टालियों का खड़ा हो जाना भी है। पक्षियों को जैसा वातावरण जीवित रहने और वंशवृद्धि के विकास के लिए जरूरी है जो कि अब इस उद्यान में नही मिल पा रहा है। दिल्ली की आबोहवा जहाँ पूरी तरह विषैली हो चुकी है वहीं पर यहाँ के निवासियों में प्रकृति के प्रति संवेदना भी बहुत कम हुई है। इससे स्थानीय पक्षियों की संख्या भी लगातार कम होती जा रही है। तीतर, बटेर, गिद्धों की कुछ प्रजातियाँ, गोरैया और कठफोड़वे जैसे पक्षियों के लगातार कम होते जाने से इनके अस्तित्व पर खतरा मडराने लगा है। इसी तरह हिमालय के तलहटी क्षेत्र, पश्चिमी हिमालय के ऊँचे क्षेत्र, पूर्वी हिमालय का क्षेत्र, दक्षिण भारत तथा गंगा बेसिन क्षेत्र, भारतीय मरुस्थल थार रेगिस्तान, इंडोमलायन उपखण्ड जैसे क्षेत्रों में पाए जाने वाले अनेक पक्षियों के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया है। गोल्डन ईगल, बाज, गौर, गोडावन, सारस, तिलोर, हाक, निकोबारी कबूतर के अस्तित्व पर खतरा आता दिख रहा है। हिमाचल प्रदेश भारत का ऐसा हरियाली सम्पन्न प्रदेश है जहाँ तरह-तरह की जैविक विविधताएँ मौजूद हैं। यहाँ पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ निवास करती हैं। यहाँ पौंग बाँध में हर साल मध्य एशिया और यूरोप की 54 पक्षी प्रजातियाँ आती हैं। हिमालयी क्षेत्र में आने के कारण यहाँ का वातावरण हमेशा ठंडा बना रहता है। लेकिन बदलते मौसम, लोगों का कृत्रिमता की ओर अधिक झुकने, प्रकृति के प्रति असंवेदनशील होने तथा चोरी-छिपे शिकार के कारण यहाँ के उद्यान के दुर्लभ पक्षियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। राज्य सरकार इस ओर जागरूक जरूर है, लेकिन समस्या है, लोगों का पक्षियों के प्रति घटता प्यार है, जो इनके लिए संकट का कारण बन रहा है।
 
वैसे तो ब्रिटिश काल में ही 1873 में वन्यजीवों के संरक्षण के लिए कानून बनाए गए थे, लेकिन उन कानूनों से भी वन्य जीवों के शिकार की समस्या हल नहीं होती थी। स्वतंत्र भारत में सर्वप्रथम 1952 में वन्यजीव बोर्ड की स्थापना की गई, जिसका पुनर्गठन 1991 में किया गया। इस बोर्ड की स्थापना पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अन्तर्गत की गई है। यह जहाँ जीव-जन्तुओं के कल्याण की योजनाओं और उनके क्रियान्वयन पर जोर देता है वहीं पर वन्य जीवों पर अत्याचार को रोकना भी इसका कार्य है। इसी प्रकार पक्षियों के संरक्षण के लिए केन्द्रीय स्तर पर केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की स्थापना वन्यजीव अधिनियम 1972 के अन्तर्गत 1992 में की गई। इसका उद्देश्य संरक्षण कार्य में चिड़ियाघरों की भूमिका बढ़ाने में चिड़ियाघरों के कामकाज को देखना है। यह 12 सदस्यों वाली संस्था है। राज्य स्तर पर भी तकरीबन इसी तरह संरक्षण बोर्ड बने हुए हैं, लेकिन इनकी सक्रियता के बारे में समय≤ पर सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। 

विश्व स्तर पर वन्य जीवों की दुर्लभ प्रजातियों का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार कन्वेंशन भी बनाया गया है जिसका कार्य ही संकटापन्न प्रजातियों के अवैध अन्तर्राष्टीय व्यापार को रोकना है। भारत भी इसका सदस्य है। भारत ने इस बाबत अनेक जीव-जन्तुओं की तस्करी पर रोक लगाने के लिए बड़े स्तर पर कदम उठाए हैं, लेकिन वे कदम नकाफी रहे हैं। क्योंकि पक्षियों और अन्य वन्य जीवों की घटती संख्या और लुप्त होती पक्षियों की प्रजातियों पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है। अब सवाल उठता है कि विश्व स्तर पर और देश स्तर पर पक्षियों की घटती संख्या को कैसे रोका जा सके ? क्या संरक्षण वाली परियोजनाओं को और सुधारने की जरूरत है या दूसरे स्तर पर भी कदम उठाए जाने चाहिए ? जिसमें राष्ट्रीय स्तर के वन्य अभ्यारण्यों और उद्यानों के निर्धारित क्षेत्रफल को बढ़ाना और पक्षियों के संरक्षण के लिए बजट में और अधिक व्यय का प्रावधान, अवैध शिकार, सुरक्षा क्षेत्र को और अधिक सशक्त करना, दुर्लभ पक्षियों के संरक्षण पर अधिक ध्यान देना, पर्यावरण के पक्षियों के अनुकूल बनाना, विकास की अंधीदौड़ में पक्षी उद्यानों के आस-पास के रिहायशी बस्ती को हटाना या दूसरे स्थानों पर उद्यानों को स्थानांतरित करना, जल, भोजन और अन्य वातावरणीय समस्याओं को खत्म करके पक्षियों के वास के अनुकूल बनाना और अवैध शिकारियों को दंड देने के लिए और अधिक कड़े कानून बनाने से लेकर पक्षियों के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ना जैसे उपाय शामिल किए जा सकते हैं। इसमें सबसे अधिक आवश्यकता जनभागीदारी की है। पालतू या वन्य पक्षियों के प्रति लोगों में ऐसी संवेदना पैदा की जानी चाहिए कि प्रकृति की ये अनमोल धरोहर हमारे लिए भोजन की वस्तु नहीं बल्कि प्रेम का सबब बन जाएं।

 

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