जलवायु बदलाव से बेहाल किसान

Submitted by editorial on Sat, 12/22/2018 - 17:07
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 22 दिसम्बर, 2018

आने वाले समय में दुनिया के तापमान में 2 डिग्री तक की बढ़ोत्तरी होती है, तो भारत में और दुनिया भर के देश में गेहूँ की पैदावार पर इसका सीधा प्रतिकूल असर पड़ेगा और गेहूँ की उत्पादकता में कई गुना गिरावट देखी जाएगी। एक अनुमान के अनुसार तापमान में एक डिग्री सेंटीग्रेड की बढ़ोत्तरी से गेहूँ की पैदावार में 4 से 5 करोड़ टन की कमी आ जाएगी।

आज जलवायु परिवर्तन को मानवता के लिये सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है और पूरी दुनिया का ध्यान इस ओर लगा है। इस कारण विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय शासकीय, आर्थिक तथा शैक्षिक स्तरों पर विचार विमर्श हो रहे हैं। इस घटना ने विकास और पर्यावरण के अस्तित्व के बीच सम्बन्धों के महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर गम्भीर ध्यान आकर्षित किया है। इस महीने पोलैंड के कातोविसे शहर में 24वीं कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज टू द यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज का समापन हो गया। यह सुनिश्चित करने के लिये यह बैठक महत्त्वपूर्ण रही कि दुनिया भर की 200 सरकारें ऊष्मा उत्सर्जन में अधिकाधिक कमी करने के प्रति वचनबद्ध हैं, जिससे विश्व में बढ़ते तापमान को 2 डिग्री से कम रखा जा सकेगा। जहाँ एक ओर इस अन्तरराष्ट्रीय बैठक में विश्व स्तर पर ‘जलवायु सन्तुलन’ को बनाए रखने को लेकर बहस की शुरुआत हुई तो इस बहस में भारत के लिये देश में जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ते हुए कृषि संकट के खतरे को दुनिया को समझाने का एक बेहतर मौका था।

भारत में खेती अब भी सबसे बड़ा कारोबार है। भारत की कुल आबादी का लगभग 40 से 60 फीसद हिस्सा आज भी खेती से जुड़ा है। इसमें जो सबसे बड़ी आबादी है, वह आबादी भारत के छोटे और मझोले किसानों की है। यही किसान ज्यादातर फसलें उगाते हैं। विडम्बना है कि बीते तीस सालों में जलवायु परिवर्तन की वजह से देश के छोटे और मझोले किसान सबसे ज्यादा भूख और गरीबी का शिकार हुए हैं। मझोले और छोटे किसान आबादी में तो बड़ी संख्या में हैं, लेकिन इसके बावजूद खेतिहर जमीन इनके पास कम ही है।

ये वे किसान हैं, जो देश के घनी आबादी वाले हिस्से में ज्यादातर बसते हैं। इसका प्रमुख कारण यह भी है कि इन इलाकों से गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और महानदी जैसी नदियाँ बहती हैं। इन इलाकों में जलवायु परिवर्तन के रुझान साफ देखने को मिल रहे हैं। किसी साल बाढ़ तो किसी साल सुखाड़ जैसे हालात से जूझ रहे इन इलाकों में जलवायु परिवर्तन ने भयंकर कृषि संकट पैदा कर दिया है। जलवायु परिवर्तन, जिससे जोतने योग्य भूमि तथा पानी जैसे पहले से कम उपलब्ध संसाधनों में और कमी आई है, की वजह से यहाँ का किसान गरीब और ज्यादा हाशिए पर आ गया है।

सालाना बाढ़ और सुखाड़ का कहर

जलवायु परिवर्तन से उपजी सालाना बाढ़ और सुखाड़ जैसी आपदाओं पर सरकारी सहायता में भी ज्यादातर बार नदी के मुहाने पर रहने वाले लाखों छोटे किसानों की गिनती कम ही हो पाती है। इन किसानों के पास संसाधनों की कमी होती है और उन्हें सरकारी सहायता भी नहीं मिल पाती ताकि बढ़ते तापमान के अनुसार वे अपनी खेती को ढाल सकें। गरीब किसान को विषम मौसम और बढ़ते समुद्री जल-स्तर से अपनी खेती को बचाने के लिये एक बुनियादी ढाँचागत सुविधाओं को विकसित करने की बड़ी चुनौती है, जिसे विभिन्न राज्यों की सरकारों को गम्भीरता से लेना चाहिए। राज्यों के आपदा बजट में जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते कृषि संकट को गम्भीरता से समझने और आर्थिक हिस्सेदारी देने की जरूरत है।

24वीं कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज टू द यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज से कुछ महीने पहले से दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने जलवायु संकट के कृषि उत्पादनों पर प्रतिकूल असर को लेकर गहरी चिन्ता दर्ज कराई है, जिस कारण न केवल जल के विभिन्न स्रोत सूख जाएँगे, बल्कि अधिकांश खेतिहर भूमि में बढ़ते तापमान की वजह से दरारें पड़ जाएँगी। यही नहीं, मक्का एवं चावल की पैदावार की मात्रा वर्तमान की तुलना में चालीस फीसद रहने से दुनिया की खाद्य सुरक्षा पर भी व्यापक असर पड़ेगा। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से सर्वाधिक पीड़ित दक्षिण ब्राजील, उत्तरी भारत, दक्षिणी चीन, दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका जैसे देश हो रहे हैं। इसलिये भी कि इन इलाकों में रहने वाली बड़ी आबादी कृषि पर आश्रित है।

वैश्विक स्तर पर बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव के खतरों के प्रति पोलैंड कोताविसे में 24वीं कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज टू द यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज के दौरान आईपीसीसी की रिपोर्ट पर गम्भीर चिन्ता दर्ज की गई। आईपीसीसी ने भविष्यवाणी की है कि वर्ष 2100 तक तापमान में 1.1 डिग्री सेंटीग्रेड से 6.4 डिग्री सेंटीग्रेड तक की वृद्धि सम्भव है, समुद्री जल-स्तर में 18 से लेकर 58 सेंटीमीटर तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है। रिपोर्ट की मानें तो साल 2080 तक 3.20 अरब लोग पानी के गम्भीर संकट का सामना करने को मजबूर हो जाएँगे और हो सकता है कि इतनी बड़ी आबादी के पास पानी ही न हो।

तापमान बढ़ा तो..

आने वाले समय में दुनिया के तापमान में 2 डिग्री तक की बढ़ोत्तरी होती है, तो भारत में और दुनिया भर के देश में गेहूँ की पैदावार पर इसका सीधा असर पड़ेगा और गेहूँ की उत्पादकता में कई गुना गिरावट देखी जाएगी। एक अनुमान के अनुसार तापमान में एक डिग्री सेंटीग्रेड की बढ़ोत्तरी से गेहूँ की पैदावार में 4 से 5 करोड़ टन की कमी आ जाएगी। समय रहते जलवायु परिवर्तन के संकट को रोकने के लिये ठोस उपाय नहीं किये गए और अगर ऐसा ही रहा तो वर्ष 2100 तक कृषि उत्पादकता में लगभग 10 से 40 फीसदी तक की कमी आ जाएगी जिससे देश की खाद्य सुरक्षा पर गम्भीर असर पड़ेगा। भारत में बढ़ते हुए जलवायु परिवर्तन ने देश की विभिन्न नदियों के आस-पास बसने और खेती करने वाली आबादी को खतरे में डाल दिया है। स्थिति ऐसी ही रही तो आने वाले समय में माही, पोंनार, साबरमती में जलाभाव जैसा संकट बन जाएगा जबकि दूसरी तरफ, गोदावरी, महानदी तथा ब्रहाणी में भीषण बाढ़ के संकट उत्पन्न होंगे जिनसे इन इलाकों के किसानों को भी भारी नुकसान का सामना करना पड़ेगा।

(लेखक ग्रीन पीस से सम्बद्ध रहे हैं।)


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