जलवायु परिवर्तन के बीच सुरक्षित भविष्य के लिए प्रयास कर रही हूं - रिद्धिमा पांडे

Submitted by HindiWater on Tue, 11/05/2019 - 16:48

अपने पिता दिनेश चंद पांडे के साथ रिद्धिमा पांडे।

{हरिद्वार की बेटी रिद्धिमा पांडेय भी पर्यावरण बचाने की जंग में 'ग्रेटा थनबर्ग' की टीम में शामिल हैं। उत्तराखंड के हरिद्वार के बीएम डीएवी पब्लिक स्कूल की महज 11 साल की छात्रा रिद्धिमा दुनिया के उन चुनिंदा 16 बच्चों में शामिल हैं, जिन्होंने ग्रेटा थनबर्ग के साथ ग्लोबल वार्मिंग से पर्यावरण को हो रहे नुकसान को लेकर संयुक्त राष्ट्र में शिकायत दर्ज कराई है।  

पर्यावरण संरक्षण कितना जरूरी है, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत में वायु प्रदूषण (air pollution)  से होने वाली विभिन्न बीमारियों से हर साल 12 लाख से अधिक लोगों की मौत होती है। देश की राजधानी दिल्ली की हवा इतनी प्रदूषित हो गई है कि 40 प्रतिशत लोग दिल्ली छोड़ना चाहते हैं। दिल्ली हीं नहीं कानपुर, पटना, जयपुर, लखनऊ, मुंबई सहित देश के 23 से अधिक शहरों की हवा मानकों से कई ज्यादा अधिक ज़हरीली हो गई है। इस बदलते प्रदूषण का असर ग्लोबल वार्मिंग पर पड़ रहा है और जलवायु परिवर्तित हो रहा है। जलवायु परिवर्तन (climate change) से युवाओं में कुपोषण बढ़ रहा है। याददाश्त कमजोर हो रही है। बच्चे विभिन्न प्रकार की बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। ग्लेशियर पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। गर्मी के दिनों में इजाफा हो रहा। प्रत्यक्ष रूप से कहें तो पृथ्वी के साथ ही मानव जीवन संकट में है। इन सभी से निराकरण के लिए समय समय पर आंदोलन होते रहे हैं। कई पर्यावरणविदों ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाई, लेकिन कुछ समय पूर्व स्वीडन की पर्यावरणविद ग्रेटा थनबर्ग (Greta Thunbherg) ने यूएन में अपनी आवाज मुखर की और विश्व स्तर पर एक वृहद आंदोलन खड़ा किया। साथ ही विभिन्न देशों के 16 बच्चों ने जलवायु परिवर्तन (climate change) रोकने के लिए पर्याप्त कदम न उठाने पर यूएन काउंसिल (UN Council) में पांच देशों के खिलाफ याचिका दायर की थी। इन 16 बच्चों में भारत के उत्तराखंड राज्य के हरिद्वार जिले के कक्षा 8 की छात्रा रिद्धिमा पांडे (12 वर्ष) भी शामिल रही। रिद्धिमा पांडे (Ridhima Pandey) यूएन और नाॅर्वे सहित विभिन्न मंचों पर पर्यावरण संरक्षण पर अपनी बात रख चुकी हैं। } प्रस्तुत है रिद्धिमा पांडे से हिमांशु भट्ट की बातचीत -


पर्यावरण के मुद्दे से कैसे जुड़े और किस चीज़ ने पर्यावरण संरक्षण (environment protection) के लिए आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया ?

मेरे माता पिता पर्यावरण से संबंधित कार्य करते हैं। जब भी कहीं घूमने का प्लान बनता था, तो पूरा परिवार उन्हीं जगहों पर जाता था, जो प्रकृति के करीब या प्राकृतिक सौंदर्य से सराबोर होती हैं। इससे पर्यावरण को जानने और कुछ करने की प्रेरणा मिली। इसके अलावा उत्तराखंड में केदारनाथ आपदा के दौरान मैंने देखा कि आपदा आने का कारण ग्लोबल वार्मिंग भी था, लेकिन सरकार पर्यावरण को गंभीरता से लेने के बजाए विकास पर ज्यादा जोर दे रही थी। जिससे ऐसा लगा कि मुझे पर्यावरण संरक्षण के लिए आवाज उठानी चाहिए। 

हरिद्वार से निकलकर संयुक्त राष्ट्र में पर्यावरण के मुद्दे पर आवाज उठाने का सफर कैसे तय किया ?

मेरे अनुसार पैरिस समझौते को लेकर केवल फाइलों में ही काम हो रहा था और धरातल पर कार्य होता नहीं दिख रहा था। इससे अधिक कार्बन उत्सर्जन होने से जलवायु परिवर्तन (climate change) बढ़ रहा था। बच्चे विभिन्न प्रकार की बीमारियों की चपेट में आ रहे थे। ग्लेशियर पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा था। जिस कारण मैने वर्ष 2017 में एनजीटी में एक याचिका डाली। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस याचिका के बारे में सभी को खबर मिल चुकी थी। जिसके बाद एक लाॅ फर्म ने मेरे वकील से संपर्क किया और फिर मेरे पिता से बात की। इसके बाद मेरा इंटरव्यू हुआ और फिर उन्होंने कहा कि वे मुझे यूएन में डाली जाने वाली याचिका का हिस्सा बनाना चाहते हैं। हमने सहमति दी और फिर इस माध्यम से मैं यूएन गई।

यूएन जाने का अनुभव कैसा रहा ?

यूएन का सफर काफी अच्छा और ज्ञानवर्धक था। वहां मैंने देखा कि ये देश विकसित हैं और वहां काफी सफाई भी है। भारत की अपेक्षा यहां के लोग पर्यावरण के मुद्दों को ज्यादा अच्छे से समझते और गंभीरता से लेते हैं तथा पर्यावरण के सुधार के लिए निर्णय भी लिए जाते हैं। 

पर्यावरण के प्रति आपके कार्य को लेकर अंतर्राष्ट्रीय लीडर्स की क्या प्रतिक्रिया रही ?

मेरे अनुसार अंतर्राष्ट्रीय लीडर्स की कोई खास प्रतिक्रिया नहीं रही। यदि भारत की बात की जाए तो यहां काफी योजनाएं आती हैं, काफी पैसा भी खर्च किया जाता है। सरकारी फाइलों में तो काफी अच्छा काम किया जाता है, लेकिन धरातल पर वही काम ठीक से होता दिखता नहीं है। जैसे कि मैं हरिद्वार में ही रहती हूं और हरिद्वार में ही गंगा नदी भी है, लेकिन गंगा की स्वच्छता के लिए कोई खासा प्रयास होता नहीं दिखा। प्लास्टिक बैन (plactic ban) होने के बाद भी प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जा रहा है। दरअसल हमारे यहां काफी भाषणबाजी की जाती है, पाॅलिसी बनाई जाती है, लेकिन धरातल पर जो असर दिखना चाहिए वो दिखाई नहीं देता है।

विश्व में सबसे अधिक वायु प्रदूषण (air pollution भारत में है। भूमि मरुस्थल में बदल रही है। क्या आपको लगता है कि सरकार पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रयास कर रही है ? यदि हां, तो ये प्रयास कितने कारगर हैं ?

सरकार प्रयास कर रही है या नहीं, ये तो पता नहीं चलता क्योंकि बहुत-सी योजनाएं हैं। प्रदूषण को कम करने के लिए भी काफी नीतियां हैं। नीतियों को लगू करने का प्रयास भी किया जाता है, लेकिन कहीं पर सरकार सख़्त नहीं है, तो कहीं लोग इसे गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। इससे पता चलता है कि हमारे यहां टीम वर्क नहीं है, जिससे नीतियां यदि लागू भी होती हैं, तो वो ज्यादा समय तक कारगर नहीं रहती। इसलिए नीतियों को लागू करने के लिए थोड़ा सरकार को खुद को बदलना होगा और जनता को भी अपनी मानसिकता में थोड़ा बदलाव करना होगा।

आपको सोशल मीडिया पर काफी ट्रोल किया गया है। ट्रोल करने वाले इन लोगों के लिए आप क्या कहना चाहेंगी ?

कोई ट्रोल करता है कि ‘‘स्कूल से बचने के बहाने है’’, तो कोई कहता है कि ‘‘ये आ गया ग्रेटा थनबर्ग (Greta Thunberg) का देशी वर्जन’’। इस प्रकार से कई ट्रोल किए जाते हैं, लेकिन ट्रोलर्स ट्रोल करने से पहले ये नहीं सोचते हैं कि ये लोग हमारे हौंसले को तोड़ने का कार्य कर रहे हैं। हम बच्चे जो भी संषर्घ कर रहे हैं, हम केवल अपने लिए नहीं कर रहे हैं। भविष्य में इसका जो भी सकारात्मक परिणाम होगा, उसका लाभ न ही मुझे मिलेगा और न ही ग्रेटा को मिलेगा, बल्कि इसका लाभ तो सभी को किलेगा, यानी देश दुनिया के हर व्यक्ति को लाभ मिलेगा। ये सब सोचने के बजाए ऐसे लोगों का काम केवल ट्रोल करना ही है और ये लोग एक ऐसे ‘‘डिस्टर्बिंग एलिमेंट’’ की तरह हैं, जैसा कि स्कूल में हमारी कक्षा में डिस्टर्बिंग एलिमेंट के रूप में कुछ बच्चे होते हैं। जैसे हम कक्षा में ऐसे बच्चों को नजरअंदाज करते हैं, उसी प्रकार मैं ट्रोलर्स को भी नजरअंदाज करती हूं।

पर्यावरण के क्षेत्र में अन्य देशों से भारत क्या सीख सकता है ?

हमें महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक दूसरे का सहयोग सीखना होगा, साथ ही आपसी एकता जरूरी है। हमारे देश में लोग धर्म और राजनीति के मुद्दे पर ज्यादा ध्यान देते हैं, लेकिन पर्यावरण के मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया जाता है। हम विदेशों से ये सीख सकते हैं कि जो चीज महत्वपूर्ण है, उसे महत्ता दी जानी चाहिए और हमें अपनी मानसिकता में भी बदलाव करना होगा तथा हमें अपने जीवन में भी कुछ बदलाव करने की आवश्यकता है। 

भारत में गंदगी से पार पाना एक चुनौती है। देश में स्वच्छता के लिए स्वच्छ भारत अभियान भी शुरू किया गया, लेकिन स्वच्छ भारत अभियान का धरातल पर कितना असर दिख रहा है ?

जैसे स्वच्छ भारत के लिए स्वच्छ गंगा/नमामि गंगे अभियान भी चला है। इन सभी अभियानों के अंतर्गत लोगों को जागरुक भी किया जाता है, लेकिन धरातल पर काम बहुत कम होता है, यानी 10 से 20 प्रतिशत या इससे थोड़ा ज्यादा काम होता है। इन योजनाओं पर धन भी काफी व्यय किया जाता है। योजनाएं कुछ समय तक तो ठीक चलती हैं, लेकिन फिर स्थिति पहले जैसी ही हो जाती है। फिर से लोग खुले में कूड़ा फेंकने लग जाते हैं। इसके लिए कहीं न कहीं राजनेताओं की कमी भी है। तो वहीं लोगों को इस धारणा में भी बदलाव लाना होगा कि ‘‘मेरे अकेले के करने से क्या होगा’’। 

पर्यावरण के बारे में स्कूल में भी पढ़ाया जाता है, लेकिन बड़े होने पर अधिकांश लोग पर्यावरण के प्रति अपना कर्तव्य भूल जाते हैं। तो क्या ऐसा लगता है कि स्कूल लेवल पर कुछ बदलाव लाने चाहिए या पाठ्यक्रम को बदलने की आवश्यकता है ?

पाठ्यक्रम में बदलाव करने के बारे में इतना नहीं पता है, लेकिन स्कूलों में पर्यावरण के बारे में केवल कीताबी ज्ञान दिया जाता है और खानापूर्ति के लिए थोड़ा बहुत बता दिया जाता है, लेकिन इसके स्थान पर व्यावहारिक ज्ञान दिया जाना चाहिए, जिसके लिए  प्रैक्टिकल कराए जाने चाहिए, ताकि पर्यावरण के प्रति बच्चों की रूचि बढ़े। 

अक्सर देखा जाता है कि पर्यावरण के मुद्दे पर भारत में लोगों को एकजूट करना बड़ी चुनौती है, लेकिन ज्यादा समस्याएं भी भारत में हैं, तो आप कैसे लोगों को एकजूट करेंगी और भविष्य के लिए क्या योजनाएं हैं ?

लोगों को एकजूट करने के लिए लोग को सबसे पहले ये बताना पड़ेगा कि पर्यावरण हमारे जीवन में क्यों जरूरी है और हमारे जीवन में इसकी क्या भूमिका है। साथ ही ग्लोबल वार्मिंग (global warming) बढ़ने का हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा। जैसे ग्लोबल वार्मिंग का बच्चों और वृद्धों पर सबसे सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ेगा। अस्थमा और कैंसर सहित कई बीमारियां बच्चों में बढ़ती जा रही हैं। खेती को नुकसान हो रहा है। समुद्र का जलस्तर पर बढ़ने से इसके किनारे बसे शहरों और देशों के सामने संकट गहरा जाएगा। इसलिए जातिगत और धार्मिक भेदभाव भुलाकर और किसी एक पार्टी विशेष के समर्थन में जाने के बजाए हमें पर्यावरण के इन मुद्दों पर हम सभी को एक साथ मिलकर सोचना पड़ेगा और ये सोचाना होगा कि कैसे हम पर्यावरण को बचा सकते हैं। इसके लिए मेरी योजना ज्यादा से ज्यादा लोगों को जागरुक करने की रहेगी। जितना मुझसे होगा, अपने स्तर पर मैं करुंगी।

पर्यावरण संरक्षण के लिए समाज से विशेषकर भारतीय समाज के लिए कोई संदेश या अपील ?

पर्यावरण संरक्षण (environment protection) के लिए घरेलू स्तर पर प्रयास शुरू करें। कोई आपके सामने किसी पेड़ का काटता है तो उसका विरोध करना चाहिए। पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज्यादा उपयोग किया जाए। बिजली और पानी को अधिक से अधिक बचाने का प्रयास करें। भोजन को बर्बाद न करें। 

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