नदी मैनुअल - ताकि नदियाँ बहती रहें

Submitted by editorial on Sat, 12/15/2018 - 21:31
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प्रस्तावना

नर्मदा नदीनर्मदा नदीपिछले पचास-साठ सालों से भारत की सभी नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह में कमी नजर आ रही है। हिमालयी नदियों में यह कमी अपेक्षाकृत थोड़ी कम है किन्तु भारतीय प्रायद्वीप के पहाड़ों, तालाबों, कुण्डों, जंगलों या झरनों से निकलने वाली अनेक छोटी नदियाँ मौसमी बनकर रह गईं हैं। भारतीय प्रायद्वीप की बड़ी नदियों यथा कावेरी, कृष्णा, ताप्ती, महानदी, नर्मदा और गोदावरी में भी मानसून के बाद का प्रवाह तेजी से कम हो रहा है। यह देशव्यापी चिन्ता का विशय है। यह मैनुअल नदियों के मानसून के बाद के प्रवाह की कमी को कम करने वाले प्रयासों तथा नवाचारों पर कुछ सुझाव प्रस्तुत करती है।

मैनुअल का उद्देश्य

मैनुअल के मुख्य उद्देश्य निम्नानुसार हैं-

1. नदियों को अविरल बनाने के लिये प्रयास करना।

2. नदी की प्राकृतिक जिम्मेदारियों को पूरा कराने वाले कामों को सहयोग देना।

3. नदी की अस्मिता तथा जैवविविधता की बहाली के लिये प्रयास करना।

4. नदी जल को स्वतः साफ होने वाली नैसर्गिक क्षमता की बहाली हेतु प्रयास करना।

5. नदी जल के उपयोग हेतु समाज की सहमति से प्रकृति सम्मत नियम बनवाना और उनको लागू करवाना। प्रकृति सम्मत सुरक्षित विकास को बढ़ावा देना।

6. नदी जल पर निर्भर समाज की आजीविका के लिये प्रयास करना।

7. अन्य कार्य जो स्थानीय परिस्थितियों में किसी नदी विशेष के लिये आवश्यक हो, करवाने के लिये प्रयास करना।

नदी प्रवाह की बहाली प्रदूषण को कम करती है। जैवविविधता (बायोडायवर्सिटी) को लौटाती है। कछार की सेहत को ठीक करती है। प्रवाह बहाली की गतिविधियों को प्रारम्भ करने के पहले नदी तथा नदी के पर्यावरणी-प्रवाह (देखें परिशिष्ट एक) और नदी-विज्ञान (देखें परिशिष्ट दो) को समझना आवश्यक है। इसके अलावा, प्राकृतिक भूजल रीचार्ज, कछार का भूगोल और भूआकृतियों के कुदरती संकेत, सतही जल और भूजल के अतिशय दोहन के कुप्रभाव तथा कृत्रिम भूजल रीचार्ज जैसे घटकों को भी समझना आवश्यक है। प्रवाह बहाली की प्लानिंग करते समय परम्परागत जलविज्ञान और आधुनिक जलविज्ञान के जानकारों का सहयोग भी जरूरी है। प्रवाह की अविरलता को बनाए रखने के लिये प्रकृति सम्मत सुरक्षित विकास और मूलभूत मानवीय जरूरतों के बीच तालमेल बिठाना और उसे टिकाऊ बनाए रखना भी आवश्यक है।

प्रवाह की अविरलता

पुराने समय में भारत की अधिकांश नदियाँ बारहमासी थीं। छोटी-छोटी नदियों में भी पूरे साल कुछ-न-कुछ प्रवाह अवश्य रहता था। यह सही है कि पुराने समय में कछार के प्रतिकूल भूगोल या प्राकृतिक भूजल पुनर्भरण की कमी के कारण, बरसात के बाद, कुछ छोटी-छोटी नदियाँ सूखती थीं लेकिन हिमालय से निकलने वाली अधिकांश नदियाँ, बर्फ के पिघलने से मिलने वाले पानी के कारण, प्रवाह घटने के बावजूद, लगभग बारहमासी थीं। उनके सूखने या उनके प्रवाह के घटने के उदाहरण अपेक्षाकृत कम ही थे।

प्रवाह की अविरलता का अर्थ है, नदी में साल भर कभी भी खत्म नहीं होने वाला और लगातार बहने वाला न्यूनतम प्रवाह। वह प्रवाह, नदी तल के ऊपर बहता हुआ नंगी आँखों से दिखाई देता है। वह पर्याप्त मात्रा में होता है। यह तभी सम्भव हो पाता है जब नदियों को प्रवाह उपलब्ध कराने वाली प्रक्रियाओं का सहयोग मिलता है। प्रवाह को कम करने वाले घटक, लक्ष्मण रेखा के भीतर रहते हैं। प्रवाह के साथ अवैज्ञानिक, अदूरदर्शी तथा अवांछित छेड़छाड़ नहीं होती। भूजल को सहेजने वाली गागर अर्थात पानी सहेजने वाली उथली परतों के लगातार छलकते रहने तक ही नदी की अविरलता कायम रहती है। अतः नदी में प्रवाह की अविरलता को समझने के लिये सबसे पहले प्राकृतिक जलचक्र (देखें परिशिष्ट तीन) और उसकी कुदरती भूमिका को समझना आवश्यक है।

भारतीय नदियों के प्रवाह के दो मुख्य स्रोत हैं - पहला, बरसात के दिनों में कछार की धरती से बहकर मिलने वाला बरसाती पानी और दूसरा सूखे दिनों में भूगर्भीय परतों से बाहर आकर मिलने वाला भूजल। हिमालय से निकलने वाली नदियों को बर्फ के पिघलने से भी पानी मिलता है। विदित है कि बरसात के दिनों में प्रवाह की बहुलता होती है लेकिन सूखे दिनों में वर्षाजल के प्रत्यक्ष योगदान समाप्त हो जाता है। उसके समाप्त हो जाने के कारण धरती की उथली परतों से छलक कर बाहर आया पानी ही नदी को जिन्दा रखता है। भूजल वैज्ञानिकों के अनुसार जैसे-जैसे कछार के भूजल भण्डार रीतते हैं, भूजल के योगदान में समानुपातिक कमी आती है। यदि अगली बरसात के पहले नदी को मिलने वाला योगदान समाप्त हो जाता है तो नदी सूख जाती है। यह स्थिति अगली बरसात के आगमन तक यथावत रहती है। विदित हो कि नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह का सीधा सम्बन्ध भूजल भण्डारों के छलकने या छलकना बन्द होने से है। ज्ञातव्य है कि छलकना बन्द होने के बाद भी भूजल की यात्रा समाप्त नहीं होती। वह नदी के तल के नीचे-नीचे अपने लक्ष्य की ओर बहता है। इस कारण, जरूरी है कि हम सबसे पहले भूजल के व्यवहार को समग्रता में समझने का प्रयास करें।

हर साल, वर्षाजल की कुछ मात्रा रिसकर धरती के नीचे मौजूद एक्वीफरों में जमा होती है। यही एक्वीफरों का सन्तृप्त होना/भरना या भूजल का पुनर्भरण है। यह पुनर्भरण भूजल भण्डारों का निर्माण करता है। यह प्रक्रिया जब पूरी हो जाती है तो नदी घाटी के भूजल भण्डार इष्टतम स्तर (Optimum level) तक भर जाते हैं। भूजल पुनर्भरण के प्रभाव से भूजल स्तर ऊपर उठता है। उसका ऊपर उठना आपूर्ति की निरन्तरता पर निर्भर होता है और तद्नुसार स्तर हासिल करता है। बरसात के खत्म होते ही भूजल के पुनर्भरण की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। पुनर्भरण प्रक्रिया के समाप्त हो जाने के कारण भूजल स्तर का ऊपर उठना बन्द हो जाता है। प्राकृतिक डिस्चार्ज के प्रभाव से भूजल के स्तर में गिरावट शुरू होती है। इसमें भूजल के दोहन का प्रभाव भी जुड़ जाता है। उनके संयुक्त प्रभाव से गिरावट में तेजी आती है। यह सिलसिला अगली बरसात तक अबाध गति से चलता है। गैर-मानसून सीजन में यदि कृत्रिम भूजल रीचार्ज किया जाता है तो वाटर टेबल की गिरावट समानुपातिक रूप से घट जाती है।

भूजल वैज्ञानिक बताते हैं कि एक्वीफरों में जमा पानी स्थिर नहीं होता। वह ऊँचे स्थानों से निचले स्थानों की ओर लगातार बहता रहता है। यह गुरुत्व बल के कारण होता है। जब तक, भूजल का ऊपरी स्तर, नदी तल के ऊपर रहता है, तब तक वह नदी में डिस्चार्ज होता रहता है। उसके डिस्चार्ज होते रहने तक नदी अविरल रहती है। यह कुदरती प्रक्रिया है। इसी कुदरती प्रक्रिया के कारण नदी में प्रवाह दिखाई देता है। कुदरती डिस्चार्ज तथा भूजल दोहन (कृत्रिम डिस्चार्ज) के असर से कछार में भूजल स्तर तेजी से गिरता है। एक्वीफरों का योगदान घटता है। योगदान के घटने के कारण, नदी का प्रवाह, समानुपातिक रूप से कम हो जाता है। यह प्रक्रिया अगले मानसून तक चलती है। मानसून की वापसी के साथ भूजल का पुनर्भरण पुनः प्रारम्भ होता है। भूजल स्तर का ऊपर उठना प्रारम्भ हो जाता है। जब भूजल स्तर नदी तल के ऊपर आ जाता है तो वह (भूजल) नदी में डिस्चार्ज होने लगता है। यह डिस्चार्ज सूखी नदियों के प्रवाह को जिन्दा करता है और जिन्दा नदियों के प्रवाह को बढ़ा देता है। यही प्रवाह बहाली की साइकिल है। यही धरती की कोख से पानी का छलकना है। झरनों से बाहर आते पानी को देखकर, धरती की कोख से भूजल के छलकने की प्रक्रिया को समझा जा सकता है।

बरसात के दिनों में भूजल और बरसाती पानी (रन-ऑफ) साथ-साथ प्रवाहित होते हैं। बरसात के बाद रन-ऑफ का योगदान समाप्त हो जाता है। उस स्थिति में भूजल का योगदान ही नदी को अविरल रखता है। जब यह योगदान खत्म हो जाता है तो नदी का प्रवाह खत्म हो जाता है। नदी सूख जाती है। यही उसकी अविरलता खत्म होने या सूखने का कारण है।

नदी के सूखने का अर्थ यह नहीं है कि भूजल का योगदान पूरी तरह समाप्त हो गया या कुदरती जलचक्र बाधित हो गया है। उस स्थिति में भी भूजल का योगदान चालू रहता है। उस योगदान के कारण, भूजल, नदी तल के नीचे-नीचे बहता है। वह नदी की तली को खोदने से दिखता भी है। उसका नदी तल के नीचे दिखना, कुछ लोगों के मन में नदी के जिन्दा होने का भ्रम पैदा करता है। यह प्रवाह की बहाली या नदी का जिन्दा होना नहीं है। यह उप-सतही भूजल जल है। यह प्राकृतिक जलचक्र का हिस्सा है। यह उप-सतही भूजल, प्राकृतिक जलचक्र को सक्रिय रखता है और अन्ततः समुद्र में मिल जाता है।

ऊँचाई पर स्थित हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों से, ढाल की अधिकता के कारण, बरसाती पानी, तेजी से नीचे उतरता है और बहुत कम समय में ही नदियों को मिल जाता है। इस कारण नदियों में प्रवाह रहता है और मात्रा बढ़ने पर अक्सर बाढ़ आती है। यही नियति भूजल की भी होती है। वह भी ढाल की अधिकता के कारण तेजी से नीचे उतरता है और नदियों में डिस्चार्ज हो जाता है। एक्वीफर खाली हो जाता है। इसी कारण ऊँचाई पर स्थित इकाइयों से निकलने वाली छोटी-छोटी नदियाँ बरसात के बाद बहुत जल्दी सूख जाती हैं।

मौजूदा युग में अविरल प्रवाह की पुरानी स्थिति काफी हद तक बदल गई है। भूजल के प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोहन एवं वनभूमि के घटते योगदान के कारण नदियों का गैर-मानसूनी प्रवाह, समानुपातिक रूप से कम हो रहा है। कुछ नदियों में प्रवाह की स्थिति चिन्तनीय हो गई है। वे नदियाँ मौसमी हो गई हैं। उनमें यदि कहीं प्रवाह नजर आता है तो वह मुख्यतः नगरीय अपशिष्ट है।

नदियों की अविरलता को फिर से बहाल करने के पहले आवश्यक है कि उसके कम होने तथा नदियों के सूखने के कारणों (देखें परिशिष्ट चार) को ठीक से समझा जाये। वैज्ञानिक मानते हैं कि नदी के प्रवाह का सीधा-सीधा सम्बन्ध नदी घाटियों और उन घाटियों में घट रही गतिविधियों तथा हस्तक्षेपों से है इसलिये नदी घाटियों (जल निकास घाटियाँ) के बारे में मूलभूत बातों को जान लेना सामयिक तथा उपयोगी होगा। भारत की नदी घाटियों का विवरण परिशिष्ट पाँच में दिया गया है।

प्रवाह बहाली की अवधारणा

प्रवाह बहाली की अवधारणा को समझने के लिये हम वृक्ष का उदाहरण लेंगे। हर व्यक्ति जानता है कि वृक्ष के तीन मुख्य भाग होते हैं - जड़ें, मुख्य तना और शाखाएँ। जड़ें, पानी का बैंक नहीं होतीं। वे मिट्टी से पानी और पोषक तत्वों को खींचकर वृक्ष को उपलब्ध कराती हैं। मिट्टी से जड़ों को मिलने वाले योगदान तक ही वृक्ष जीवित और स्वस्थ रह पाता है। योगदान मिलने तक ही वह बढ़ता है, फलता-फूलता है और फायदे दे पाता है। वृक्ष का जीवन और उसके फायदे, मिट्टी की नमी (भूजल) के अवदान का परिणाम या प्रतिफल है। यह अवदान जड़ों के माध्यम से वृक्ष को मिलता है। वही उसके जीवन का आधार है। उसके समाप्त होते ही वृक्ष की मृत्यु हो जाती है।

लगभग यही कहानी नदी की है। उसे भी तीन हिस्सों यथा कछार, सहायक नदियाँ और नदी परिवार की सबसे बड़ी नदी में विभाजित कर समझा जा सकता है। कछार का पानी सहायक नदियों के माध्यम से अन्ततः परिवार की सबसे बड़ी नदी को प्राप्त होता है। यह प्राप्ति कछार की सतह पर और उसके नीचे बहने वाले पानी के माध्यम से होती है। सतह पर से बहकर नदी को मिलने वाले पानी की अवधि सीमित होती है। सतह के नीचे से मिलने वाले पानी की अवधि अधिक होती है। यह योगदान यदि साल भर उपलब्ध रहता है तो नदी साल भर अविरल रहती है। योगदान का यही क्रम, छोटी-छोटी नदियों से उत्तरोत्तर आगे बढ़कर अन्ततः परिवार की सबसे बड़ी नदी पर जाकर खत्म होता है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि जब तक कछार के भूजल भण्डारों का योगदान नदियों को मिलता रहेगा, उनसे पोषित नदियाँ स्वस्थ रहेंगी और अपने-अपने कछारों से समेटे पानी की सौगात, अपने से बड़ी नदी को उपलब्ध कराती रहेंगी, बड़ी नदी जिन्दा रहेगी। अविरल रहेगी और प्रदूषण को यथासम्भव घटाती रहेगी।

प्रवाह बहाली की प्रस्तावित अवधारणा प्रतिपादित करती है कि धरती की कोख के पानी के नदी तल पर छलकते रहने तक ही नदी अविरल रहती है। अविरलता के सुनिश्चित रहने तक ही उसका पानी स्वच्छ तथा निरापद रहता है। उसकी खुद-ब-खुद साफ होने की नैसर्गिक क्षमता बरकरार रहती है। तभी तक उसमें जलीय जीवन फलता-फूलता है। सुरक्षित रहता है। अपना काम करता है। दायित्व निभाता है। नदी, जैवविविधता से परिपूर्ण रहती है। उसके कछार की उथली परतें साफ बनी रहती हैं। कछार के जलस्रोत सामान्यतः जिन्दा रहते हैं। छलकना बन्द होते ही नदी सूख जाती है। जलस्रोतों का सूखना प्रारम्भ हो जाता है।

प्रवाह बहाली की अवधारणा, भूजल स्तर की भूमिका को रेखांकित करती है। नदी की प्राकृतिक जिम्मेदारियों का सम्मान और भूजल स्तर की गिरावट की लक्ष्मण रेखा को मान्यता दे, प्रवाह बहाली की पैरवी करती है। यही, इस मैनुअल की अवधारणा है। यही उसकी रणनीति का आधार है। यही उद्देश्य है।

आदर्श हाइड्रोलॉजिकल इकाई

प्रवाह बहाली के लिये वह हाइड्रोलॉजिकल इकाई आदर्श होगी जिसका क्षे़त्रफल प्लानिंग, क्रियान्वयन तथा प्रबन्ध की दृष्टि से आदर्श हो और जो तर्कसंगत समयावधि में, परिणाम देने में सक्षम हो।

भारत सरकार द्वारा प्रकाशित नेशनल वाटरशेड एटलस (परिशिष्ट पाँच में संक्षिप्त विवरण एवं नक्शा उपलब्ध) में वर्णित पाँचवीं हाइड्रोलॉजिकल इकाई (वाटरशेड) उपरोक्त शर्तों को यथासम्भव पूरा करती है अतः उसे आदर्श हाइड्रोलॉजिकल इकाई माना जा सकता है।

नेशनल वाटरशेड एटलस की पाँचवीं इकाई (वाटरशेड) का औसत क्षेत्रफल एक लाख हेक्टेयर होता है। बेहतर प्लानिंग, क्रियान्वयन तथा प्रबन्ध के लिये उसे छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित करना चाहिए। उन छोटी-छोटी इकाइयों में निवास करने वाले लोगों को, हर स्तर पर, गतिविधियों से जोड़ना चाहिए। पाँचवीं हाइड्रोलजिकल इकाई (वाटरशेड) की प्रस्तावित छोटी उप-इकाइयाँ निम्नानुसार हो सकती हैं-

1. मिलीवाटरशेड (वाटरशेड की उप-इकाई) - औसत क्षेत्रफल पाँच हजार से दस हजार हेक्टेयर। इसे छोटी उप-इकाई भी कहा जा सकता है।

2. माइक्रो-वाटरशेड (मिली वाटरशेड की उप-इकाई) - औसत क्षे़त्रफल पाँच सौ से एक हजार हेक्टेयर। इसे सातवीं उप-इकाई भी कहा जा सकता है।

महत्त्वपूर्ण

चयन, पाँचवीं हाइड्रोलॉजिकल इकाई (वाटरशेड) का किया जाएगा। प्लानिंग सातवीं हाइड्रोलॉजिकल इकाई अर्थात माइक्रो वाटरशेडवार की जाएगी। काम का प्रारम्भ, बिना किसी अपवाद के, सभी सातवीं हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों से एक साथ शुरू किया जाएगा। यह काम उनसे आगे बढ़कर छठी इकाई और उससे आगे बढ़कर पाँचवीं हाइड्रोलॉजिकल इकाई (वाटरशेड) के छूटे हिस्सों पर समाप्त होगा। जल प्रबन्ध का काम पाँचवीं हाइड्रोलॉजिकल इकाई (वाटरशेड) की जागृत नदियों पर किया जाएगा।

सुझाए तरीके से काम करने से पाँचवीं हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों की अधिकांश मुख्य नदियों में प्रवाह लौटेगा। उसकी अवधि में बढ़ोत्तरी होगी। उसका लाभ चौथी हाइड्रोलॉजिकल इकाई (उप-कैचमेंट) की सभी मुख्य नदियों को मिलेगा। उसके मिलने से चौथी हाइड्रोलॉजिकल इकाई की सभी मुख्य नदियों में प्रवाह बढ़ेगा। उसका लाभ तीसरी हाइड्रोलॉजिकल इकाई (कैचमेंट) की सभी मुख्य नदियों को मिलेगा। यह लाभ उत्तरोत्तर बढ़कर दूसरी (बेसिन) और अन्ततः पहली हाइड्रोलॉजिकल इकाई (जल संसाधन क्षेत्र) की मुख्य नदी को मिलेगा। इस प्रकार पूरे जल संसाधन क्षेत्र में प्रवाह की बहाली होगी और अवधि बढ़ेगी।

दल का गठन

प्रवाह वृद्धि का काम ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के ज्ञाताओं, अनुभवी लोगों तथा समाज की सक्रिय भागीदारी द्वारा किया जाने वाला सामूहिक प्रयास है। इसलिये उसकी जिम्मेदारी (दल का नेतृत्व) नदी विज्ञान तथा नदी के प्राकृतिक दायित्वों के ज्ञाता और लक्ष्य के लिये समर्पित वैज्ञानिक/व्यक्ति को ही सौंपी जानी चाहिए। वह व्यक्ति नदी की अविरलता तथा प्रवाह अवधि बढ़ाने वाली गतिविधियों और प्राकृतिक जिम्मेदारियों को ध्यान में रखकर पूरे काम की प्लानिंग करेगा। निर्माण कार्यों को सम्पादित कराने, समाज को संगठित करने और जल के टिकाऊ उपयोग को निर्धारित कराने के लिये दल के मुखिया को अनेक विधाओं के जानकारों की आवश्यकता होगी। इसके अतिरिक्त कार्यालयीन अमला, कम्प्यूटर एवं वाहन सुविधा इत्यादि भी आवश्यक है। निर्माण मदों पर होने वाला व्यय सरकार द्वारा वहन किया जाएगा। समाज की भागीदारी से जल प्रबन्ध तथा पानी का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग किया जाएगा। मानीटरिंग में भी समाज सहयोग प्रदान करेगा।

प्रवाह बहाली में बरसात और उसके चरित्र की भूमिका

बरसात, वायुमण्डल में घटित होने वाली प्राकृतिक घटना है। उसके सभी घटकों (मात्रा, वितरण, चरित्र, अवधि इत्यादि) को प्रकृति नियंत्रित करती है।

नदी के प्रवाह की बहाली में बरसात की भूमिका महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक होती है। उससे सम्बन्धित सभी घटकों की भूमिका को समझना आवश्यक है। सांकेतिक विवरण निम्नानुसार है-

यदि पानी के बरसने की तीव्रता (Intensity) अधिक हो तो बरसे पानी का बहुत सारा हिस्सा तेजी से बहकर नदी को मिल जाता है। बरसात का यह चरित्र बाढ़ उत्पन्न करता है। यह चरित्र भूजल रीचार्ज के लिये बहुत अनुकूल नहीं होता। बरसात का, धीरे-धीरे अधिक देर तक बरसने वाला चरित्र ही भूजल रीचार्ज के लिये उपयुक्त होता है। एक्वीफरों की मोटी परतें और बरसात का उपर्युक्त चरित्र भूजल भण्डारों को अच्छी तरह समृद्ध करता है। उनसे ही प्रवाह की अवधि तथा उसकी मात्रा बढ़ाने वाली परिस्थितियाँ निर्मित होती हैं। प्रकृति ने बरसात के चरित्र को, एकरूपता के स्थान पर विविधता प्रदान की है इसलिये उसका चरित्र अपनी सारी विविधताओं के साथ, हर बरसात में देखने को मिलता है।

भारत के पश्चिमी भाग में स्थित थार मरुस्थल बेहद शुष्क क्षेत्र है। उस इलाके में बहुत कम बरसात होती है। जो भी पानी बरसता है, वह बहुत जल्दी मरुस्थल की रेतीली धरती में गहरे उतर जाता है। उसके धरती में उतर जाने के कारण वाटरटेबिल ऊपर तो उठती है पर रेत की पोरासिटी के अधिक होने के कारण, अन्ततः उसका ऊपर उठना, अक्सर बौना ही सिद्ध होता है। थार मरुस्थल की रेतीली धरती तथा शुष्क जलवायु वाष्पीकरण और रिसाव के लिये तो मुफीद है पर वह प्रवाह की बहाली के लिये काफी हद तक प्रतिकूल है। इस कारण थार मरुस्थल की नदियों के प्रवाह को बढ़ाना सहज नहीं है।

भारत के मध्य तथा पूर्वी हिस्सों में पर्याप्त वर्षा होती है पर उसके चरित्र (वितरण, तीव्रता, मात्रा तथा वर्षा दिवसों) में काफी अन्तर है। उसका चरित्र अनिश्चित है। वह बदलता रहता है। भारत के मध्य भाग की तुलना में पूर्वी भाग में रन-ऑफ की गति तेज और बरसात की मात्रा अधिक है। प्रमुख नदी कछारों को छोड़कर बाकी हिस्से चट्टानी हैं। चट्टानी हिस्सों में पानी का रिसाव कम है। चट्टानी और पहाड़ी हिस्सों में रिसाव और अपर्याप्त जल संचय के कारण प्रवाह बहाली सीमित है। इस कारण देश के मध्य तथा पूर्वी हिस्सों के पहाड़ी क्षेत्रों में प्रवाह बहाली थोड़ी कठिन है लेकिन कछारी हिस्सों में प्रवाह बढ़ाया जा सकता है।

देश के अधिकांश भागों की नदियों पर अलग-अलग क्षमता के बाँध बने हैं। इस कारण रन-ऑफ का अधिकांश हिस्सा उन बाँधों की क्षमता के अनुसार जलाशय में इकट्ठा हो जाता है। बाँध के नदी मार्ग में बनाए जाने के कारण नदी का प्रवाह टूट जाता है। प्रवाह टूटने और पानी के जलाशय में जमा होने के कारण, डाउनस्ट्रीम में मूल प्रवाह की भरपाई नहीं हो पाती। ऐसे नदी-मार्गों पर प्रवाह बहाली के लिये अतिरिक्त प्रयासों की आवश्यकता होती है।

गर्मी के मौसम की समाप्ति के समय नदी में प्रवाह की स्थिति न्यूनतम स्तर पर होती है। अनेक छोटी सहायक नदियों का प्रवाह सूख चुका होता है। वाटरटेबिल भी अपने न्यूनतम स्तर पर होता है। पर जब बरसात प्रारम्भ होती है तो वाटरटेबिल की बहाली प्रारम्भ हो जाती है। यह बहाली मुख्यतः तीन चरणों में होती है। पहले चरण में कछार का वाटरटेबिल ऊपर उठता है। दूसरे चरण में वाटरटेबिल, नदियों की तली तक पहुँचती है। तीसरे चरण में वाटरटेबिल नदी तल के ऊपर आ जाती है। पहले और दूसरे चरण के प्रभाव से नदी जिन्दा नहीं होती। नदी तीसरे चरण के प्रभाव से जिन्दा होती है। तीसरे चरण के हासिल होते ही नदी का प्रवाह बहाल हो जाता है। संक्षेप में, प्रवाह की अविरलता के लिये भूजल स्तर का नदी तल के ऊपर बने रहना आवश्यक है।

प्रवाह बहाली को यदि भूजल भण्डारों, मौसम तथा नदी के प्रवाह की घट-बढ़ से जोड़कर समझा जाये तो ज्ञात होता है कि गर्मी के मौसम में भूजल भण्डार काफी हद तक खाली हो जाते हैं। उनके काफी हद तक खाली होने के कारण अधिकांश नदियों का प्रवाह घट जाता है। कभी-कभी वे सूख भी जाती हैं। वर्षाजल, जब भूजल भण्डारों को समृद्ध करता है तो भूजल स्तर की बहाली प्रारम्भ हो जाती है। बहाली के कारण, भूजल स्तर ऊपर उठता है। पहले, वह, कछार और रेत के कणों के बीच की खाली जगह को भरता है। यदि योगदान की निरन्तरता बनी रहती है तो वह नदी में डिस्चार्ज होने लगता है। नदी प्रवाह जिन्दा हो जाता है।

कई बार, बरसात के प्रारम्भिक दिनों में नदी सूखी बनी रहती है। यह कम बारिश होने के कारण या धरती में रिसे पानी के भूजल भण्डारों और रेत के खाली स्थानों को भरने में खप जाने के कारण होता है। इस अवधि में यदि कुछ प्रवाह दिखता है तो वह अस्थायी होता है। प्रवाह की वास्तविक बहाली डिस्चार्ज की निरन्तरता सुनिश्चित होने के बाद ही हो पाती है।

प्रवाह बहाली और जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन धीरे-धीरे हकीकत बन रहा है। भारत, उसके असर से अछूता नहीं है। जलवायु परिवर्तन के कारण औसत तापमान में वृद्धि तथा बरसात की अनिश्चितता बढ़ रही है। तापमान की वृद्धि वाष्पीकरण को बढ़ाकर मिट्टी की नमी को तेजी से घटा रही है। बरसात के चरित्र की अनिश्चितता धरती में पानी के रिसने, बाढ़ की आवृत्ति और मिट्टी के कटाव तथा संरचना-स्थायित्व को प्रभावित कर रही है। बाढ़ और सूखा उसके संकेतक हैं।

वन क्षेत्रों से नदियों को मिलने वाले स्वाभाविक योगदान को अनवरत बनाए रखने के लिये रीचार्ज की बेहतर और टिकाऊ व्यवस्था अनिवार्य है। वही व्यवस्था धरती में नमी को लम्बे समय तक सहेजेगी। नदी, वृक्षों तथा वनस्पतियों को जलाभाव से और मिट्टी को कटाव से बचाएगी। जलवायु परिवर्तन के असर को किसी हद तक कम करेगी। वही व्यवस्था नदियों को अविरल रखेगी।

वनभूमि पर सारे काम, वन विभाग की कार्ययोजना (Working Plan) के अनुसार ही किये जाते हैं। उनमें बदलाव सम्भव नहीं होता। यह सही है कि कार्ययोजना में मिट्टी के कटाव को रोकने और नमी को बढ़ाने के लिये कन्टूर ट्रेंच, स्टेगर्ड ट्रेंच, गली प्लग या पत्थर की दीवार इत्यादि बनाई जाती हैं। पर ये सभी प्रयास अस्थायी प्रकृति के होते हैं। उनके अस्थायी प्रकृति के होने के कारण, कुछ सालों में वे गाद से पट जाते हैं और कुदरत फिर से पुराने तरीके से व्यवहार करने लगती है। उनके अप्रभावी हो जाने के कारण वे स्थायी तौर पर प्रवाह बहाली के लिये नाकाफी हैं। उनकी क्षमता को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने के लिये डिजाइनों में बदलाव/परिमार्जन आवश्यक है।

जलवायु परिवर्तन के सम्भावित खतरों और वन क्षेत्रों के घटते योगदान को ध्यान में रख मिट्टी के कटाव को कम करने और नमी बढ़ाने वाले मौजूदा कामों को बेहतर बनाना होगा और उनके वैज्ञानिक पक्ष में सुधार करना होगा। उन्हें जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाना होगा। कार्ययोजना में नदियों में प्रवाह की मात्रा और अवधि बढ़ाने वाले उपयुक्त कामों को भी सम्मिलित करना होगा। सघन वनों का रकबा बढ़ाना होगा। वन भूमि पर मिश्रित वनों को विकसित करना पड़ेगा एवं उन वृक्षों तथा वनस्पतियों को विकसित करना होगा जो स्थानीय भूमि और मौसम के अनुकूल होने के साथ-साथ नदी के प्रवाह की वृद्धि में सहायक होते हैं। नदी की इकोलॉजी से सहयोग करने वाली गतिविधियों को बढ़ावा देना होगा। उपर्युक्त कामों को वन भूमि के सभी माइक्रो-वाटरशेडों में करना होगा।

बरसात का चरित्र भूजल रीचार्ज के लिये सहयोगी/असहयोगी या मिश्रित होता है। उसको, प्रवाह के पक्ष में लाने के लिये वनभूमि पर रीचार्ज को बढ़ाने और भूमि के कटाव को कम करने के लिये मिट्टी/उपमिट्टियों को जमा करने वाले कामों को बड़े पैमाने पर करना होगा। भूमि कटाव को कम करने के लिये उपयुक्त किस्म की घासों को भी बढ़ावा देना होगा। वन भूमि पर, एक ही प्रजाति के वृक्षों के स्थान पर बहु-तल्ले (Multy-layer) वाले एवं पानी को सहेजने वाले घने और वास्तविक जंगल विकसित करना होगा। कामों के परिणाम को जानने के लिये नदियों में सिल्ट और प्रवाह की मात्रा तथा अवधि की मॉनीटरिंग करना होगा। कुछ समय बाद, यदि नदी में सिल्ट की मात्रा बढ़ती है या प्रवाह कम होता है तो उपयुक्त कदम उठाए जाने चाहिए तभी प्रवाह बहाली में वन क्षेत्रों की भूमिका सुनिश्चित होगी।

एक्वीफरों के योगदान को प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ

विभिन्न गहराइयों पर भूजल भण्डार पाये जाते हैं। यह सही है कि उनकी जल संचय क्षमता तथा जल प्रदान करने वाली क्षमता अलग-अलग होती है पर अवलोकन बताता है कि नदी के प्रवाह को सबसे अधिक फायदा उथले एक्वीफरों से ही मिलता है। हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों के उथले एक्वीफरों के योगदान को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों के आकलन से कुछ इस प्रकार की स्थितियाँ सामने आ सकती हैं-

1. कुछ हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों में कम जल भण्डारण क्षमता वाले उथले एक्वीफर मिलेंगे। जाहिर है, बरसात में वे जितने जल्दी भरेंगे, बरसात के बाद उतने ही जल्दी खाली भी हो जाएँगे। जल्दी खाली होने के कारण, वे, लम्बी अवधि तक नदी को भूजल की आपूर्ति नहीं कर पाएँगे। अर्थात कम जल भण्डारण क्षमता वाले उथले एक्वीफर प्रवाह बहाली के लिये बहुत अधिक मददगार नहीं होते पर उनके योगदान को खारिज भी नहीं किया जा सकता।

2. कुछ हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों में ऐसे उथले एक्वीफर मिलेंगे जिनका लगभग सारा पानी रबी मौसम में, कुओं और नलकूपों द्वारा खींच लिया जाता है। इस कारण वे फरवरी मार्च तक खाली हो जाते हैं और गर्मी के मौसम में प्रवाह को मदद नहीं दे पाते। ऐसी इकाइयों में भूजल के दोहन के कारण नदी के प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। लेकिन उनके योगदान को भी खारिज नहीं किया जा सकता।

3. कुछ ऐसे उदाहरण भी मिल सकते हैं जिनमें उथले एक्वीफरों में पर्याप्त पानी है पर तीव्र ढाल के कारण वाटर टेबल बहुत जल्दी नदी तल के नीचे उतर जाती है। इस कारण ऐसे एक्वीफरों से लम्बे समय तक भूजल की आपूर्ति सम्भव नहीं होती। यह स्थिति टिकाऊ प्रवाह के लिये किसी हद तक अनुपयुक्त हैं। वे एक्वीफर कुछ समय तक योगदान देते हैं। उस योगदान को खारिज नहीं किया जा सकता।

4. चौड़ी हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों में कभी-कभी अच्छे एक्वीफर मिल सकते हैं। ऐसी इकाइयाँ प्रवाह की लम्बी निरन्तरता के लिये उपयुक्त होती हैं पर उनसे लाभ तभी मिल सकता है जब उनसे, भूजल का दोहन, कुदरती रीचार्ज की तुलना में कम हो। माँग और पूर्ति के आधार पर यह नकारात्मक/सकारात्मक हो सकती है।

5. अच्छी क्षमता वाले एक्वीफरों की उपस्थिति के बावजूद कुछ ऐसी संकरी हाइड्रोलॉजिकल इकाइयाँ भी मिल सकती हैं जिनमें भूजल दोहन का स्तर रीचार्ज की तुलना में अधिक होता है। यह नकारात्मक स्थिति है। इस स्थिति में उनका प्रवाह का योगदान घट जाएगा।

6. कुछ हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों में उथले एक्वीफरों को सतही सिंचाई योजनाओं का रिसा पानी मिलता है। यह पानी भूजल स्तर को ऊपर उठाने में सहायक होता है पर यदि उसे कुओं और नलकूपों द्वारा विभिन्न उपयोगों के लिये खींच लिया जाता है तो सकारात्मक परिस्थितियाँ भी नकारात्मक परिस्थितियों में बदल सकती हैं। इसके अलावा कुछ अन्य स्थितियाँ जिन्हें ऊपर सम्मिलित नहीं किया गया है, फील्ड में मिल सकती हैं। उन स्थानीय परिस्थितियों का संज्ञान लेकर रणनीति तय की जाना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि भारत सरकार के निर्देश पर सारे देश में एक्वीफरों की मैपिंग का काम चल रहा है। इस कारण, भविष्य में देश की सभी नदी घाटियों के एक्वीफरों के नक्शे मिल जाएँगे। उन नक्शों की मदद से एक्वीफरों की ज्यामिट्री, भूजल संचय की सम्भाव्यता इत्यादि की जानकारी मिल सकेगी। इस जानकारी के आधार पर रणनीति तय की जा सकेगी।

भूजल रीचार्ज की वस्तुस्थिति और प्रयास

भूजल के परिदृश्य की अद्यतन स्थिति (Current Status) का विवरण परिशिष्ट छह में उपलब्ध है। उस परिशिष्ट में भूजल पुनर्भरण के विभिन्न पहलुओं की भी चर्चा की गई है। विदित हो कि केन्द्रीय भूजल परिषद (नोडल संस्था) ने सन 2013 में भूजल के कृत्रिम पुनर्भरण के लिये मास्टर प्लान जारी किया है। इस मास्टर प्लान में कहा गया है कि देश में नौ लाख इकतालीस हजार पाँच सौ इकतालीस वर्ग किलोमीटर ही ऐसा इलाका है जहाँ प्राकृतिक मानसूनी रीचार्ज आधा-अधूरा है। परिषद के आकलन के अनुसार इस क्षेत्र में मानसून सीजन में भूजल स्तर, सतह से तीन मीटर नीचे तक नहीं लौट पाता। केन्द्रीय भूजल परिषद के अनुसार देश के केवल उसी क्षेत्र (नौ लाख इकतालीस हजार पाँच सौ इकतालीस वर्ग किलोमीटर) में ही कृत्रिम भूजल रीचार्ज की आवश्यकता है। केन्द्रीय भूजल परिषद के अनुसार, उस इलाकों में 85,565 मिलियन क्यूबिक मीटर वर्षाजल को भूगर्भ में उतारने की आवश्यकता है। ऐसा होने के उपरान्त, पूरे भारत में, भूजल के पुनर्भरण का लक्ष्य हासिल हो जाएगा।

भारत की लगभग सभी नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह पर संकट है। यह संकट उन क्षेत्रों की नदियों पर भी है जहाँ प्राकृतिक पुनर्भरण पूरा है। यह हकीकत इंगित करती है कि गैर-मानसूनी प्रवाह की कमी का सम्बन्ध प्राकृतिक मानसूनी रीचार्ज की कमी-बेशी से नहीं है। उसका सम्बन्ध अन्धाधुन्ध भूजल दोहन और नदियों से पानी के उठाव से है। उसका सम्बन्ध जलाशयों में प्रवाह जमा करने से है। उसका सम्बन्ध जल प्रबन्ध की कमियों से है। उन सबको नियोजित करने के उपरान्त ही प्रवाह की बहाली सम्भव है।

देश में नदियों को सूखने से बचाने के लिये कोई मास्टर प्लान अस्तित्व में नहीं है। प्रवाह बहाली या सूखती नदियों का पुनर्जीवन ही असली चुनौती है। वही आज की आवश्यकता है। उसे ध्यान में रखकर, इस मैनुअल में कुछ व्यावहारिक तथा विज्ञान सम्मत सुझाव सम्मिलित किये गए हैं।

हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों के प्राकृतिक गुण

धरती की ऊपरी परत को कुदरत ने अनेक विलक्षण और अकल्पनीय क्षमताएँ प्रदान की हैं। उस क्षमता के ही कारण बरसाती पानी का कुछ हिस्सा धरती की ऊपरी परत को सन्तृप्त कर वनस्पतियों को आवश्यक नमी/पानी उपलब्ध कराता है। उस क्षमता के ही कारण बरसाती पानी का कुछ हिस्सा विभिन्न गहराइयों में मौजूद एक्वीफरों को अलग-अलग मात्रा में समृद्ध करता है। प्रवाह की अविरलता के लिये पानी उपलब्ध कराता है। कछार की साफ-सफाई करता है। कछार में नया भूगोल गढ़ता है।

धरती की ऊपरी सतह की रीचार्ज तथा जल संचय क्षमता में विविधता है। इस विविधता के कारण, एक ही हाइड्रोलॉजिकल इकाई के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रीचार्ज या जल संचय क्षमता हो सकती है। कुछ विविधताएँ एक्वीफरों में भी होती हैं। उस कारण वे एक दूसरे से जुड़े या असम्बद्ध होते हैं। इसके अतिरिक्त उनसे, एक जैसी मात्रा में पानी का संचय नहीं होता, समान मात्रा में पानी की वापसी नहीं होती। वे एक साथ खाली भी नहीं होते।

हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों पर जब पानी बरसता है तब उन इकाइयों के गुण नदी के मानसूनी प्रवाह, भूजल रीचार्ज और बरसात के बाद के प्रवाह को प्रभावित करते हैं। यह प्रभाव हर जगह अलग-अलग होता है। इस कारण नदी परिवारों के प्रवाह और उसकी अवधि को प्रभावित करने वाले प्राकृतिक तथा कृत्रिम घटकों को पहचानना और समझना आवश्यक है। प्रवाह पर असर डालने वाले लक्षण निम्नानुसार हैं-

1. हाइड्रोलॉजिकल इकाई का भूविज्ञान तथा संरचनात्मक लक्षण

2. हाइड्रोलॉजिकल इकाई की जोनिंग

3. हाइड्रोलॉजिकल इकाई का ड्रेनेज पैटर्न और ड्रेनेज डेंसिटी

4. हाइड्रोलॉजिकल इकाई का क्षे़त्रफल

5. हाइड्रोलॉजिकल इकाई की आकृति

6. हाइड्रोलॉजिकल इकाई का ढाल

7. अन्य हाइड्रोलॉजिकल इकाई का भूविज्ञान तथा संरचनात्मक लक्षण

हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों के भूविज्ञान में काफी विविधता होती है। इस विविधता के कारण उनके भूजलीय गुणों में भी विविधता होती है। उस विविधता के कारण उनकी जल भण्डारण क्षमता, सरन्ध्रता (प्राथमिक सरन्ध्रता से लेकर द्वित्तीयक सरन्ध्रता) और संरचनात्मक लक्षणों (जन्मजात से लेकर विभिन्न कारणों से विकसित), में अन्तर होता है। यह विविधता कहीं कम तो कहीं अधिक होती है।

आग्नेय तथा कायान्तरित चट्टानें ठोस होती हैं। उनमें जल संचय का गुण होता है पर उनमें भूजल को संचित करने और उसे मुक्त करने वाले गुणों का लगभग अभाव होता है। उन गुणों के अभाव के कारण उनसे रिसाव कम तथा रन-ऑफ अधिक होता है। इसके उलट बलुआ पत्थर (सेडीमेंटरी चट्टान) में सामान्यतः भूजल को संचित करने का जन्मजात गुण होता है। काली मिट्टी, पानी को संचित तो करती है पर उससे पानी की निकासी कठिन तथा धीमी होती है। रेतीली मिट्टी में पानी के संचय के साथ-साथ उसे मुक्त करने का गुण होता है। यह गुण उसके स्पेसिफिक इल्ड पर निर्भर होता है।

मौसम के असर से चट्टानों में भौतिक तथा रासायनिक बदलाव (अपक्शय) होता है। अपक्शय के कारण उनमें द्वित्तीयक सरन्ध्रता तथा पारगम्यता के गुण विकसित होते हैं। उस बदलाव को समझना आवश्यक है। वह बदलाव भूजल रीचार्ज या जल संचय संरचनाओं के निर्माण के लिये उपयुक्त क्षेत्रों की पहचान में मददगार होता है। उसके आधार पर निस्तारी तालाब और परकोलेशन-सह-निस्तारी तालाबों की सही-सही साइट का निर्धारण किया जा सकता है।

हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों में कभी-कभी फोल्ड (Fold), फाल्ट (Fault), लीनियामेंट (Lineament), दरारें, सन्धियाँ तथा गुहिकाएँ (Cavities) मिलती हैं। ये संरचनात्मक लक्षण हैं। इन संरचनात्मक लक्षणों के कारण, ठोस तथा कठोर चट्टानों में जल भण्डार विकसित होते हैं। उदाहरण के लिये फोल्डिंग के असर से कठोर चट्टानें टूटती तथा बिखरती हैं। उनके टूटने और बिखरने के कारण प्रभावित हिस्सों में खाली स्थान विकसित होते हैं। बरसाती पानी उसमें प्रवेश करता है। उस पानी के कारण उन खाली स्थानों के आसपास अपक्शय होता है और वह अपक्षीण हिस्सा भूजल संचय के लिये उपयुक्त बन जाता है। चूना पत्थर बरसाती पानी में घुलनशील है इसलिये, बरसाती पानी के असर से, चूना पत्थर में गुहिकाओं (Cavities) का निर्माण होता है। कई बार गुहिकाओं की लम्बाई कई-कई किलोमीटर तक होती है। इन गुहिकाओं में बड़ी मात्रा में जल संचय सम्भव है। उनकी मौजूदगी के चिन्ह नदियों के पैटर्न तथा प्रवाह की घट-बढ़ द्वारा प्रदर्शित होते हैं। उन लक्षणों को टोपोशीट पर भी आसानी से देखा तथा पहचाना जा सकता है।

फाल्ट के कारण चट्टानों में दो प्रकार की स्थितियाँ विकसित होती हैं। फाल्ट की सतह (Fault plane) के दोनों तरफ, चट्टानों के विपरीत दिशा में विस्थापित (Displace) होने के कारण, विस्थापित तल, बरसात के पानी के लिये सुगम मार्ग उपलब्ध कराता है। उसके कारण विस्थापित तल के दोनों ओर अपक्शय होता है। अपक्शय के कारण चट्टानों में द्वित्तीयक सरन्ध्रता तथा पारगम्यता विकसित होती है। सरन्ध्र हिस्सों में जल संचय होता है। कभी-कभी विस्थापन के दौरान, सरन्ध्र चट्टान के सामने अपारगम्य चट्टान आ जाती है। ऐसी स्थिति में बरसाती पानी, केवल सरन्ध्र चट्टानों में ही जमा हो पाता है।


कई बार ग्रेनाइट या समान गुण वाली चट्टानों की ऊपरी सतह, अपक्शय से प्रभावित होती है। अपक्शय के कारण, सामान्यतः उसकी दो से तीन मीटर मोटी परत सरन्ध्र तथा पारगम्य हो जाती है। उस सरन्ध्र तथा पारगम्य हिस्से में भूजल का संचय होता है।

लावा परतों के सन्धिस्थल पर, अपक्शय के कारण, अनेक बार दो से तीन मीटर मोटे एक्वीफरों का विकास होता है। कई बार उनको टोपोशीट/ फील्ड में आसानी से पहचाना जा सकता है। भारत के बहुत बड़े भूभाग में ग्रेनाइट तथा बेसाल्ट चट्टानें मिलती हैं। उन उपयुक्त लक्षणों की मदद से प्रवाह बढ़ाने वाले प्रयासों को मदद मिलती है।

अनेक स्थानों पर ग्रेनिटिक तथा बेसाल्टिक चट्टानों के एक्वीफर कम गहराई पर मिलते हैं। ऐसे स्थानों पर रिसाव तालाबों को, एक्वीफर की तली मिलने तक, खोदना चाहिए। ऐसा करने से जल संग्रह तथा भूजल रीचार्ज का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। ऐसे तालाबों के निर्माण से जल संचय के अलावा एक्वीफर भी सन्तृप्त होता है। प्रवाह बहाली को मदद मिलती है।

निस्तारी तालाब (जल संचय) बनाने के लिये हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों के ऐसे हिस्सों को खोजा जाना चाहिए जहाँ रीचार्ज की सम्भावना नहीं है या बहुत कम है। ऐसे भूभागों पर पर्याप्त गहराई (न्यूनतम छह मीटर गहराई) के निस्तारी तालाब बनाना चाहिए।

चित्र एक और दो में ग्रेनिटिक तथा बेसाल्टिक चट्टानों में जल संचय-सह-परकोलेशन तालाब का खड़ा काट (Verticle section) दर्शाया गया है। यह खड़ा काट दर्शाता है कि ऐसे तालाब, जल संचय के साथ-साथ एक्वीफर को भी सन्तृप्त कर सकते हैं।

हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों में कभी-कभी लीनियामेंट, सन्धियाँ, दरारें इत्यादि पाई जाती हैं। ये संरचनात्मक लक्षण/संकेतक हैं जो एक्वीफर की उपस्थिति को दर्शाते हैं। रिमोट सेंसिंग विधि से तैयार नक्शों से लीनियामेंट की जानकारी तथा भूवैज्ञानिक रिपोर्टस से फाल्ट, फोल्ड, अपक्षीण क्षेत्रों इत्यादि की जानकारी मिल जाती है। चित्र तीन में लीनियामेंट (अलग अलग दिशाओं में जाती सरल रेखा) दर्शाए गए हैं। उल्लेखित सकारात्मक संरचनात्मक लक्षणों का उपयोग प्रवाह बहाली के लिये किया जाना चाहिए।

हाइड्रोलॉजिकल इकाई की जोनिंग

प्रत्येक हाइड्रोलॉजिकल इकाई (नदी कछार) को भूजल रिचार्ज और डिस्चार्ज की सम्भावनाओं के आधार पर तीन जोन में विभाजित किया जा सकता है। ये जोन निम्नानुसार हैं-

1. रीचार्ज जोन
2. ट्रांजीशन जोन
3. डिस्चार्ज जोन

उपर्युक्त तीनों जोन नदी कछार के अन्दर स्थित होते हैं। रीचार्ज जोन कछार की सीमा अर्थात जल विभाजक रेखा (Water divide line) से प्रारम्भ होती है। उसका विस्तार, कुछ किलोमीटर दूर तक नदी की दिशा में होता है। इस जोन में भूजल का ढाल, सतह के ढाल, से अधिक होता है। भूजल के ढाल के अधिक होने के कारण बरसाती पानी, जमीन में रिसता है और भूजल भण्डारों का विकास करता है। यदि पानी बरसने की गति तेज होती है तो रिसाव दर घट जाती है। यह परिस्थितियों के प्रतिकूल होने के कारण होता है।

प्रत्येक हाइड्रोलॉजिकल इकाई में रीचार्ज जोन के बाद ट्रांजीशन जोन मिलती है। यह जोन रीचार्ज और डिस्चार्ज जोन के बीच में स्थित होती है। ट्रांजीशन जोन में भूजल तथा धरती का ढाल लगभग बराबर होता है अर्थात इस जोन में सतही कंटूर और भूजल कंटूर एक दूसरे के लगभग समानान्तर होते हैं। उपयुक्त स्थितियों के मिलने पर ट्रांजीशन जोन में भूजल रिचार्ज होता है।

किसी भी हाइड्रोलॉजिकल इकाई में डिस्चार्ज जोन वह क्षेत्र है जो सामान्यतः नदी के दोनों किनारों के बीच स्थित होता है। उस जोन में भूजल का डिस्चार्ज/उत्सर्जन होता है। उत्सर्जन के कारण भूजल बाहर आता है और नदी को प्रवाहमान बनाता है। चित्र चार में रीचार्ज, ट्रांजीशन और डिस्चार्ज जोन को पृथक-पृथक दर्शाया गया है।

भूजल रीचार्ज में वृद्धि करने के लिये, हाइड्रोलॉजिकल इकाई की रीचार्ज और ट्रांजीशन जोन में, एक्वीफर की उपस्थिति तथा अन्य सकारात्मक गुणों को सुनिश्चित करने के बाद, अधिक-से-अधिक संख्या में भूजल रीचार्ज संरचनाओं का निर्माण करना चाहिए।

हाइड्रोलॉजिकल इकाई का ड्रेनेज पेटर्न और ड्रेनेज डेंसिटी

ड्रेनेज पैटर्न (Drainage pattern) को नदी परिवार द्वारा बनाई कुदरती डिजाइन या नदी का हस्ताक्षर भी कहा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि नदी परिवार का हर सदस्य अपने-अपने मार्ग का निर्धारण ढाल, पानी की मात्रा, उसके साथ बहने वाले कणों द्वारा किये कटाव तथा क्षरण इत्यादि की मदद से, खुद करता है। इस प्रकार के विकसित मार्ग, प्रत्येक नदी की अपनी निजी पहचान होती है। उनकी सघनता/विरलता तथा वितरण ड्रेनेज पैटर्न तय करता है।

यात्रा के दौरान नदी परिवार का ड्रेनेज पैटर्न बदलता है। उस पैटर्न को उपयुक्त स्केल वाली टोपोशीट पर आसानी से देखा तथा पहचाना जा सकता है। ड्रेनेज पैटर्न की सर्वाधिक विविधता, कछार की सीमाओं तथा अधिक ढाल वाले इलाकों में पाई जाती है।

भूवैज्ञानिकों ने ड्रेनेज गठन (Drainage texture) का अध्ययन किया है। उनके अनुसार, मुख्यतः निम्न तीन प्रकार का ड्रेनेज गठन पाया जाता है-

अ. सूक्ष्म ड्रेनेज गठन (Fine drainage texture)
ब. मीडियम ड्रेनेज गठन (Medium drainage texture)
स. स्थूल ड्रेनेज गठन (Coarse drainage texture)

चित्र पाँच में उपर्युक्त तीनों प्रकार की ड्रेनेज गठन को दर्शाया गया है।

नदी वैज्ञानिकों ने धरती की सतह और ड्रेनेज गठन के अन्तर्सम्बन्ध का अध्ययन किया है। यह अध्ययन इंगित करता है कि यदि किसी क्षेत्र में सूक्ष्म ड्रेनेज गठन पाया जाता है तो उस इलाके की चट्टानें मुख्यतः अप्रवेश्य (Impervious) तथा अपारगम्य (Impermeable) होंगी। ऐसे इलाके (सूक्ष्म ड्रेनेज गठन या झाड़ियों से मिलते-जुलते गठन वाले इलाके) निस्तार तालाबों के निर्माण के लिये उपयुक्त होते हैं। कुछ क्षेत्रों में मीडियम ड्रेनेज गठन मिलता है। ऐसे क्षेत्रों में मिलने वाली चट्टानें करीब-करीब प्रवेश्य (Pervious) तथा पारगम्य (Permeable) होती हैं। उन क्षेत्रों में रीचार्ज संरचनाएँ बनाई जा सकती हैं। इसी प्रकार, स्थूल ड्रेनेज गठन वाले क्षेत्रों में मुख्यतः प्रवेश्य (Pervious) तथा पारगम्य (Permeable) चट्टानें मिलती हैं। उन इलाकों में अधिक-से-अधिक संख्या में जल संचय-सह-परकोलेशन तालाब बनाना चाहिए।

ड्रेनेज डेंसिटी
वैज्ञानिकों ने निम्न सूत्र की मदद से हाइड्रोलॉजिकल इकाई के क्षेत्रफल और उसकी सभी छोटी-बड़ी नदियों की लम्बाई के योग की मदद से ड्रेनेज डेंसिटी का मान ज्ञात किया है-

ड्रेनेज डेंसिटी के मान को संख्या (अंक) द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यह मान, उस हाइड्रोलॉजिकल इकाई में भूजल रीचार्ज की क्षमता की कमी-बेशी को दर्शाता है। यह मान जितना कम होगा, रीचार्ज क्षमता उतनी बेहतर होगी। उल्लेखनीय है कि हाइड्रोलॉजिकल इकाई के अलग-अलग हिस्सों में ड्रेनेज डेंसिटी का मान अलग-अलग हो सकता है। उसे ध्यान में रख, उपयुक्त संरचनाओं का निर्माण किया जाना चाहिए।

ड्रेनेज डेंसिटी सूत्र का उपयोग मुख्यतः छोटी हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों (मिली तथा माइक्रो वाटरशेडों) के लिये किया जाता है। बड़ी हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों के लिये उसकी उपयोगिता सीमित है।

प्रवाह बहाली प्लानिंग करते समय प्रत्येक हाइड्रोलॉजिकल इकाई को उसके ड्रेनेज पैटर्न के अनुसार छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित करना चाहिए। उसके बाद उन इकाइयों की ड्रेनेज डेंसिटी ज्ञात की जानी चाहिए। वे हिस्से जिनमें ड्रेनेज डेंसिटी का मान 2.5 से कम है, में भूजल रीचार्ज संरचनाओं का अधिक-से-अधिक निर्माण करना चाहिए। प्रवाह बहाली की आवश्यकता को ध्यान में रख सामान्यतः चार ड्रेनेज डेंसिटी तक के मान वाले इलाकों में रीचार्ज संरचना बनाई जा सकती है। यह निर्णय लेते समय साइट के भूविज्ञान, एक्वीफर की क्षमता और उसकी नदी से सम्बद्धता जैसे गुणों को भी अनिवार्य रूप से देखा जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, कछार में, भूजल की खपत को कम करने के लिये 4.5 से अधिक ड्रेनेज डेंसिटी वाले क्षेत्र में अधिक-से-अधिक निस्तार तालाबों का निर्माण करना चाहिए।

परकोलेशन-सह-जलसंचय तालाबों को हाइड्रोलॉजिकल इकाई की रीचार्ज जोन में बनाना चाहिए। यह जोन कछार की मुख्य नदी से दूर होती है इसलिये उसमें रिसे भूजल को नदी तक पहुँचने में समय (देखें परिशिष्ट - भूजल की प्राकृतिक वेग (गति) की गणना) लगता है। रीचार्ज जोन में काम पूरा करने के बाद यही काम ट्रांजीशन जोन में सम्पन्न करना चाहिए। यह जोन, रीचार्ज जोन और कछार की मुख्य नदी के बीच में स्थित होती है इसलिये उसमें रिसे भूजल को नदी तक पहुँचने में भी समय (देखें परिशिष्ट - भूजल की प्राकृतिक वेग (गति) की गणना) लगता है। इस कारण, नदी अधिक समय तक प्रवाहमान रहती है। भूजल रीचार्ज के लिये, डिस्चार्ज जोन, उपयोगी नहीं होती। उसका उपयोग तभी सम्भव है जब नदी का प्रवाह समाप्त हो जाता है।

हाइड्रोलॉजिकल इकाई का क्षेत्रफल

प्रवाह बहाली के प्रयासों के लिये हाइड्रोलॉजिकल इकाई का क्षेत्रफल महत्त्वपूर्ण घटक होता है क्योंकि इकाई का क्षेत्रफल जितना अधिक होगा उस पर बरसे पानी की मात्रा उतनी अधिक होगी। पानी की मात्रा की अधिकता का अर्थ है जल संचय तथा भूजल रीचार्ज के लिये पर्याप्त पानी की उपलब्धता और संरचना निर्माण हेतु अधिक जमीन। दूसरे शब्दों में, अधिक क्षेत्रफल वाली इकाइयाँ जल संचय तथा कृत्रिम रीचार्ज या दोनों कामों के लिये उपयुक्त होती हैं। उन पर बहुत सी संरचनाओं का निर्माण सम्भव होता है।

किसी भी इकाई में सबसे पहले, कम तथा मध्यम ड्रेनेज डेंसिटी वाले हिस्सों की खोज की जानी चाहिए। उनकी खोज के साथ-साथ अन्य सहयोगी गुणों को भी तलाशना चाहिए। इसके बाद ही उपयुक्त हिस्सों पर अधिक-से-अधिक जल संचय-सह-परकोलेशन तालाब बनाना चाहिए। अधिकतम निर्माण कार्य रीचार्ज जोन में होना चाहिए। वहीं सबसे अधिक लाभप्रद काम होगा। उसके बाद ट्रांजीशन जोन में कामों का विस्तार करना चाहिए। निर्मित तालाबों की गहराई का निर्धारण वाष्पीकरण और जल उपयोग को ध्यान में रखकर करना चाहिए। उनकी गहराई कम-से-कम छः मीटर होना चाहिए। उन तालाबों में गर्मी के मौसम के अन्त तक पानी रहना चाहिए। कम गहरे/जल्दी सूखने वाले तालाबों की उपयोगिता बेहद सीमित होती है। अन्तिम चरण में अधिक ड्रेनेज डेंसिटी वाले हिस्सों में निस्तार तालाब बनाना चाहिए।

हाइड्रोलॉजिकल इकाई की आकृति

हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों की आकृतियों में काफी विविधता होती है। वे लम्बी, संकरी, चौड़ी या अन्य किसी भी आकृति की हो सकती हैं। हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों की आकृति की विविधता सतही जल और भूजल की यात्रा अवधि को निर्धारित करती है। संकरी आकृति वाली इकाइयों की सीमा रेखा और नदी के बीच की दूरी के कम होने के कारण पानी बहुत कम समय में नदी को मिल जाता है वहीं चौड़ी हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों पर बरसे पानी को नदी तक पहुँचने में, अपेक्षाकृत, अधिक समय लगता है। हाइड्रोलॉजिकल इकाई का ढाल भी पानी की यात्रा को प्रभावित करता है। यही नियति भूजल की होती है।

संकरी हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों में भूजल तेज गति से प्रवाहित होता है। इस कारण वह बहुत कम समय में नदी को मिल जाता है। इस कारण, संकरी इकाइयों का योगदान, समय की कसौटी पर, सीमित होता है। इन इकाइयो में ड्रेनेज डेंसिटी को ध्यान में रखकर निस्तार तालाब तथा रीचार्ज तालाबों का निर्माण किया जाना चाहिए। निस्तार तालाबों के निर्माण से भूजल के दोहन पर दबाव घटता है। जिसके कारण, प्रवाह की अवधि और मात्रा को लाभ हो सकता है।

हाइड्रोलॉजिकल इकाई का ढाल

हाइड्रोलॉजिकल इकाई का ढाल भूमि उपयोग, रन-ऑफ और प्रवाह के वेग इत्यादि को नियंत्रित करता है। उसके अधिक होने से पानी, बहुत कम समय में बह जाता है और रीचार्ज के लिये अपेक्षाकृत कम समय मिलता है। इस कारण तीखे खड़े ढाल वाली इकाइयों की छोटी नदियाँ जल्दी सूख जाती हैं। इस हकीकत के बावजूद इन इकाइयों के कम ड्रेनेज डेंसिटी तथा तीव्र ढाल वाले हिस्सों में स्टेगर्ड ट्रेंच, वानस्पतिक आच्छादन, घास, धान की खेती और छोटी-छोटी नदियों पर तालाबों की शृंखला बनना चाहिए। इस प्रकार के कामों से रिसाव बढ़ जाता है और प्रवाह की मात्रा में वृद्धि सम्भव होती है।

मंद ढाल वाली हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों में सतही जल और भूजल को अपनी यात्रा पूरी करने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है। वे रीचार्ज तथा प्रवाह वृद्धि में सहायक होती हैं। ऐसी इकाइयों के सर्वाधिक उपयुक्त कामों में मुख्य हैं - निस्तारी तालाब तथा परकोलेशन तालाब। उनका निर्माण रीचार्ज और ट्रांजीशन जोन में किया जाना चाहिए।

गाद जमाव के कारण जल संचय संरचनाओं की उपयोगिता घटती है इसलिये उनकी डिजाइन को भारत के परम्परागत जल विज्ञान तथा वर्षा के चरित्र को ध्यान में रखकर तय करना चाहिए। परम्परागत तालाबों का सुधार, बिना उनकी डिजाइन में बदलाव किया जाना चाहिए। संक्षेप में, पानी को भूगर्भ में उतारने के लिये अधिकतम प्रयास करना चाहिए।

संकेतक जिन्हें ऊपर सम्मिलित नहीं किया गया है।

सम्भव है, फील्ड में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ मिलें जिनका पूर्व में संज्ञान नहीं लिया गया है, उन विशिष्ट परिस्थितियों में अनिवार्य रूप से सम्मिलित करना चाहिए।

रणनीति

यह मैनुअल गंगा तथा नर्मदा जैसी बड़ी नदियों के प्रवाह को बढ़ाने के लिये दोहरी रणनीति को अपनाने की अनुशंसा करता है। प्रवाह बहाली प्रयासों का प्रारम्भ उनके कैचमेंट जो वन भूमि तथा राजस्व भूमि पर स्थित हैं, के सभी माइक्रो वाटरशेडों से एक साथ प्रारम्भ करना होगा। इस रणनीति पर काम करने से वाटरशेड से लेकर जल संसाधन क्षेत्र तक का समूचा नदीतंत्र लाभान्वित होगा। उस लक्ष्य को हासिल करने के लिये जिन कामों को करना पड़ेगा, उन्हें निम्न दो मुख्य वर्गों में बाँटा जा सकता है -

1. वैज्ञानिक काम
2. सामाजिक सहमति से पानी का प्रबन्ध

वैज्ञानिक कार्य

वैज्ञानिक कार्यों को, बिना किसी अपवाद के, वन तथा राजस्व भूमि पर स्थित सभी माइक्रो-वाटरशेडों (सभी सातवीं इकाइयों) पर एक साथ प्रारम्भ करना होगा। विभिन्न निर्माण कार्यों का चयन माइक्रो-वाटरशेडों के विशिष्ट गुणों के आधार पर होगा।

वन भूमि पर कार्य

देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग तेईस प्रतिशत (लगभग 6.5 करोड़ हेक्टेयर) इलाका वनभूमि के रूप में वर्गीकृत है। अनुमान है कि करीब बारह प्रतिशत क्षेत्र (लगभग 3.5 लाख करोड़ हेक्टेयर) पर स्थित वनों की हालत अच्छी है। बाकी इलाकों में विरले वन पाये जाते हैं। वन भूमि के कुछ इलाके मरुस्थली हैं तो कुछ इलाके बर्फ से ढँके हैं।

नदियों के प्रवाह में वृद्धि के लिये कार्ययोजना में समूची वन भूमि को, बिना किसी अपवाद के सम्मिलित करना आवश्यक है। सभी जानते हैं कि घने जंगल, बरसात की बूँदों की प्रहारक क्षमता को कम करते हैं। वृक्षों के पत्तों से टपका पानी, धरती पर पड़ी सूखी पत्तियों और मिट्टी को गीला करता है। काफी देर तक मिट्टी/धरती के सम्पर्क में रहता है। इस कारण, अधिक मात्रा में जमीन में रिसता है। यदि वन भूमि पर स्थित धरती की परतों की मोटाई, सरन्ध्रता और परमियाबिलिटी अच्छी हो तो ही पर्याप्त मात्रा में भूजल का संचय हो सकता है। यदि ढाल मंद हों तो उन परतों में जमा भूजल, काफी दिनों तक नदी को, मिल सकता है। उल्लेखनीय है कि वनभूमि पर जलसंरक्षण कार्य करने के लिये जलविज्ञान से सम्बन्धित बहुत कम आँकड़े उपलब्ध हैं।

देश की अधिकांश नदियों का उद्गम वनभूमि से है। सभी जानते हैं कि वनभूमि के जल संसाधन अक्शत होते हैं। उस पर बरसा पानी, काफी हद तक, प्रदूषण से मुक्त होता है पर मिट्टी के कटाव को कम करने/रोकने वाले कार्यों के अपर्याप्त मात्रा में सम्पन्न होने तथा स्थायी नहीं होने के कारण वनभूमि से निकलने वाली नदियाँ बरसात में बड़ी मात्रा में रेत, बजरी और सिल्ट लेकर यात्रा करती हैं। इस स्थिति में सुधार की आवश्यकता है।

वन भूमि के लगभग तेईस प्रतिशत इलाके पर पर्याप्त संख्या में बनी संरचनाओं (परकोलेशन तालाब, तालाब और कन्टूर ट्रेंच इत्यादि) की मदद से छोटी-छोटी नदियों के प्रवाह और उसकी समयावधि में वृद्धि सम्भव है। इस हेतु वन विभाग को परिष्कृत अवधारणा अपनाना होगा। उस अवधारणा में प्राकृतिक संसाधनों के आधार को मजबूत बनाने के साथ-साथ नदीतंत्र के प्रवाह और अवधि की वृद्धि पर भी पर्याप्त ध्यान होगा। इस प्रकार के कामों से नमी की उपलब्धता अवधि में वृद्धि होगी और जंगलों को फायदा होगा। वे जलवायु परिवर्तन के कुप्रभावों का बेहतर तरीके से सामना कर सकेंगे।

वन विभाग की कार्ययोजना में वानिकी कार्यों के साथ-साथ, प्रवाह बहाली कार्यों को, अनिवार्य रूप से सम्भाव्यतानुसार जोड़ना होगा। सभी माइक्रोवाटरशेडों की रीचार्ज और ट्रांजीशन जोन के विभिन्न हिस्सों में, इकाइयों के गुणों के अनुसार कन्टूर ट्रेंचों, तालाबों तथा परकोलेशन-सह-सामान्य तालाबों इत्यादि का बड़े पैमाने पर निर्माण करना होगा। जहाँ तक सम्भव हो, पाँचवी हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों की मुख्य नदी पर किसी भी अवरोधक संरचना को नहीं बनाया जाना चाहिए। मिली वाटरशेड/माइक्रोवाटरशेड की मुख्य नदियों पर शृंखलाबद्ध तालाबों में जल संग्रह किया जा सकता है। इसे करते समय गाद प्रबन्ध और संरचनाओं की लम्बी सेवा अवधि को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

वन क्षेत्रों में स्थानीय प्रजातियों के पुनरोत्पादन की अच्छी सम्भावना है। उस सम्भावना को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। पुनरोत्पादन और सघन वनों के अलावा, घास की कुछ किस्मों को, जो भूजल रीचार्ज और भूमि कटाव को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती हैं, को अधिक-से-अधिक बढ़ावा दिया जाये। ऐसा करते समय जलवायु बदलाव का भी ध्यान रखा जाये। नदी की राइपेरियन जोन और वनों की सघनता बढ़ाए जाने वाले प्रयासों में समाज की भागीदारी भी सुनिश्चित होना चाहिए। अनुभव बताता है कि जिन इलाकों में जनजातीय समाज निवास करता है उन इलाकों में वनों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। प्रवाह बहाली के लिये सघन वनों की मौजूदगी अनिवार्य है।

उल्लेखनीय है कि वन क्षेत्र सतही जल और भूजल दोहन के कुप्रभावों से मुक्त होते हैं। उनमें भूजल स्तर की गिरावट वाष्पीकरण, झरनों तथा नदियों से डिस्चार्ज जैसे प्राकृतिक कारणों के कारण होती है इसलिये ऊपर उल्लेखित कामों को करने से, प्रवाह की अवधि और मात्रा में जो वृद्धि होगी, वह अल्प समय में दिखाई देगी और उसका असर नदी घाटी में भी परिलक्षित होगा।

भूजल के योगदान में वृद्धि

सभी जानते हैं कि मानसून सीजन में कुदरती रीचार्ज के कारण भूजल भण्डार समृद्ध होते हैं। उनके समृद्ध होने के कारण ही नदी के प्रवाह तथा उसकी अवधि को सम्बल मिलता है। यदि रीचार्ज की व्यवस्था बरसात के बाद भी कायम रहती है तो उसका सकारात्मक असर सूखे दिनों के प्रवाह की मात्रा और अवधि पर दिखाई देगा इसलिये प्रत्येक हाइड्रोलॉजिकल इकाई के उन खास गुणों और परिस्थितियों को पहचानना आवश्यक है जिन पर ध्यान देने से भूजल का कुदरती और कृत्रिम रीचार्ज बढ़ता है या बढ़ाया जा सकता है। अतः भूजल के योगदान में वृद्धि के लिये निम्न कदम उठाए जाने चाहिए-

1. चौड़ी हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों की रीचार्ज जोन और मुख्य नदी के बीच पर्याप्त दूरी होती है। इस दूरी के कारण रीचार्ज जोन में रिसे पानी को मुख्य नदी तक पहुँचने में पर्याप्त समय (देखें परिशिष्ट भूजल की प्राकृतिक वेग (गति) की गणना) लगता है वहीं ट्रांजीशन जोन में रिसा पानी भी, दूरी के अनुपात में, कुछ-न-कुछ समय अवश्य लेता है। समय लगने के कारण मुख्य नदी काफी समय तक अविरल रहती है। अतः सभी चौडी हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों की रीचार्ज और ट्रांजीशन जोन में कन्टूर ट्रेंचों, परकोलेशन तालाबों के अलावा, जलसंचय-सह-रीचार्ज तालाबों का अधिक-से-अधिक निर्माण किया जाना चाहिए। यह निर्माण उन इकाइयों के मंद ढाल, कम ड्रेनेज डेंसिटी, एक्वीफर की पर्याप्तता, सहयोगी भूविज्ञान और छोटी-छोटी नदियों के वितरण के उपयुक्त पैटर्न वाले हिस्सों पर होगा। तालाबों को उथले एक्वीफर की निचली परत तक खोदा जाना चाहिए। ऐसा करने से ही बरसात में उथला एक्वीफर पूरी तरह सन्तृप्त होगा। बरसात के बाद जब उसका खाली होना प्रारम्भ होगा तब तालाब में संचित पानी, घटते भूजल की यथासम्भव भरपाई कर सकेगा। तालाबों की गहराई के निर्धारण में वाष्पीकरण की हानि (लगभग तीन मीटर) को अनिवार्य रूप से सम्मिलित करना चाहिए। ऐसा करने से ही तालाब में अधिक समय तक पानी बचेगा। यदि इकाई में रीचार्ज की सम्भावनाएँ बहुत अच्छी नहीं हैं तो भी बहुत बड़ी संख्या में गहरे निस्तारी तालाबों का निर्माण किया जाना चाहिए। उनकी गहराई छह मीटर से अधिक होना चाहिए। गाद जमाव से यथासम्भव मुक्त होना चाहिए। गाद की सफाई के लिये प्रावधान होना चाहिए। इससे कछार में पानी की उपलब्धता बढ़ेगी और प्रकारान्तर से प्रवाह को लाभ मिलेगा।

प्रकृति में संकरी हाइड्रोलॉजिकल इकाइयाँ भी मिलती है। संकरी इकाइयों में रीचार्ज तथा ट्रांजीशन जोन की मुख्य नदी से दूरी, अपेक्षाकृत कम होती है। इस कारण प्रवाह अवधि बढ़ाने में उनकी उपयोगिता सीमित है। इसलिये उन इकाइयों की ढालू जमीन पर अधिक-से-अधिक संख्या में स्टेगर्ड कन्टूर ट्रेंचों का निर्माण किया जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि अनेक मामलों में स्टेगर्ड कन्टूर ट्रेंचों के मानक स्पेसिफिकेशन, स्थान विशेष की परिस्थितियों से मेल नहीं खाते इसलिये उनका निर्धारण, उस स्थान की एक दिन की अधिकतम बरसात की मात्रा, मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता तथा ढाल इत्यादि को ध्यान में रख कर करना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि स्टेगर्ड कन्टूर ट्रेंचों का अक्शत आयतन ही भूजल के बेहतर योगदान को सुनिश्चित बनाता है। उसी के बेहतर योगदान के कारण नदी के प्रवाह को मदद मिलती है। इसलिये समय-समय पर कन्टूर ट्रेंचों का रख-रखाव करना चाहिए। इसके अलावा, संकरी हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों के उपयुक्त स्थानों पर विविध प्रकार के तालाब बनाने चाहिए।

धरती के ढाल का विकास प्रकृति करती है। उसमें परिवर्तन करना काफी खर्चीला और कठिन भी होता है। प्राकृतिक व्यवस्था से तालमेल के अभाव में बदलाव टिकाऊ भी नहीं होता। मृदा वैज्ञानिकों ने पहाड़ी इलाकों के तीखे ढाल को परिमार्जित कर मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये सीढ़ीदार खेत विकसित किये हैं। यह व्यवस्था किसी हद तक भूजल रीचार्ज में सहायक है।

कई बार, हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों में एक ही प्रकार की चट्टान मिलती है लेकिन हाइड्रोलॉजिकल इकाई के अलग-अलग हिस्सों में उस चट्टान के गुणों में थोड़ा-थोड़ा अन्तर होता है। इस अन्तर का असर भूजलीय गुणों पर पड़ता है। इस कारण उस चट्टान के पानी सोखने वाले हिस्सों पर परकोलेशन तालाबों का निर्माण करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, मौसम के असर से प्रभावित तथा कमजोर हुई चट्टानों, चट्टानों के जोड़ों तथा द्वितीयक सरन्ध्रता (Joints and Secondary porosity) वाले हिस्सों पर भी तालाबों का निर्माण करना चाहिए। इसी प्रकार लीनियामेंट, फाल्ट और फोल्ड के उपयुक्त हिस्सों तथा रेत बजरी की परतों पर परकोलेशन-सह-संचय तालाबों का निर्माण करना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि, अपवादों को छोड़कर, देश की अधिकांश नदियों के मानसूनी प्रवाह में कोई खास अन्तर नहीं आया है पर पिछले पचास-साठ सालों से उनका गैर-मानसूनी प्रवाह लगातार कम हो रहा है। इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि पिछले पचास-साठ सालों में बदली परिस्थितियों के कारण, नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह के लिये मानसूनी रीचार्ज कम पड़ रहा है। उसे माकूल बनाने के लिये सभी वांछित प्रयास करना पड़ेगा। विकल्प खोजना होगा। गैर-मानसूनी सीजन में अतिरिक्त रीचार्ज भी करना होगा। वही एकमात्र रास्ता है।

अनुभव बताता है कि कुछ ही सालों में अधिकांश तालाब और ट्रेंचें गाद से भर जाते हैं। गाद से भर जाने के कारण उनका योगदान कम/खत्म हो जाता है। अतः संरचनाओं की डिजाइन में गाद मुक्ति की व्यवस्था को सुनिश्चित करना होगा। उल्लेखनीय है कि भारत के परम्परागत जल विज्ञान के आधार पर बने तालाब सैकड़ों साल के बाद भी लगभग गाद मुक्त हैं। सुझाव है कि परकोलेशन तालाबों को भारत के परम्परागत जल विज्ञान के आधार पर बनाया जाये। उन पुराने तालाबों की डिजाइन को अपनाया जाये।

रीचार्ज की वृद्धि के साथ-साथ उन हस्तक्षेपों तथा गतिविधियों और विकल्पों को भी लगातार बढ़ावा देना होगा जिनको अपनाने से भूजल की माँग घटती है। उन हस्तक्षेपों तथा गतिविधियों की पैरा (जल संचय) और पैरा (अवलोकन और गणनाएँ) में चर्चा की गई है। यदि नवाचार सम्भव है तो उसे अपनाया जाये।

जल संचय

रीचार्ज वृद्धि के साथ-साथ हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों में सतही जल संचय को भी पर्याप्त प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। संचित सतही जल और भूजल के मिले-जुले उपयोग से भूजल का दोहन कम होता है। उसे लागू किया जाना चाहिए। संक्षेप में, उन सभी विकल्पों, जल उपयोग के तौर-तरीकों और साधनों तथा नवाचारों इत्यादि का उपयोग किया जाना चाहिए जो भूजल के गैर-मानसूनी दोहन को कम करते हैं तथा नदियों के प्रवाह की बहाली में सहायक हैं।

सामाजिक सहमति से नदी के पानी का प्रबन्ध

पानी की माँग लगातार बढ़ रही है। यह माँग बहुआयामी तथा लगातार बढ़ने वाली माँग है। इसके कारण जल भण्डारों पर भारी दबाव है। बढ़ते दबाव के कारण, हर दिन नदी प्रवाह की बहाली के कार्य की चुनौती बढ़ती जा रही है। इस हकीकत की रोशनी में कहा जा सकता है कि नदियों के प्रवाह की बहाली के लक्ष्य को केवल विज्ञान सम्मत कामों को करने से हासिल नहीं किया जा सकता। प्रवाह को टिकाऊ बनाए रखने के लिये, समाज के सहयोग से, नदी जल का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग तथा प्रबन्ध आवश्यक है।

देश में समाज की सहमति से नदी के पानी के बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग और टिकाऊ प्रबन्ध का उदाहरण उपलब्ध है। वह उदाहरण इंगित करता है कि यह सम्भव है। सुझाव है कि समाज सम्मत नदी जल प्रबन्ध को, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप, मुख्य धारा में लाया जाये। उस अवधारणा को मानक बनाया जाये। हर नदी या नदी समूह या उसके हिस्से पर उसे अविलम्ब लागू किया जाये। नदी जल के इस प्रबन्ध पर समाज की आम सहमति सुनिश्चित हो। नदी के पानी का बँटवारा, नदी की सेहत को ध्यान में रखकर, समानता तथा सामाजिक न्याय के आधार पर किया जाये। पानी के बँटवारे के सारे नियम-कायदे, हितग्राही समाज की आम सहमति से बनें। पारदर्शी हों। बाहरी दखलन्दाजी से पूर्णतः मुक्त हों। प्रजातांत्रिक हों। सरकार की भूमिका केवल प्रेरक की हो। यही नदी के पानी के बुद्धिमत्तापूर्ण तथा टिकाऊ उपयोग का रोडमैप है।

नदियों को अविरल बनाए रखने के लिये अलवर (राजस्थान) के ग्रामीण समाज ने स्थानीय परिस्थितियों एवं नदी घाटी की परिस्थितियों को समझ कर सामाजिक स्वीकृति से नियम (देखे परिशिष्ट आठ - तरुण भारत संघ का अनुभव) बनाए हैं। उन्होंने अरवरी सहित सात सूखी नदियों को जिलाया है। उन नदियों के पानी का समझदारी से उपयोग तय किया है। उसे लागू कर समाज और जीव जगत की आवश्यकताओं को पूरा किया है। नदियों को सूखने से बचाया है। यह काम, कम वर्षा वाले अर्धशुष्क इलाके में करके दिखाया है। अरवरी जल संसद द्वारा बनाए नियमों और परिपाटियों का संज्ञान लिया जाना चाहिए।

अवलोकन और गणनाएँ

नदियों के प्रवाह बहाली कार्यक्रम की सफलता के लिये सही दृष्टिबोध, गणनाओं तथा अनेक अवलोकनों की आवश्यकता होती है। परिशिष्ट सात में उनका विवरण उपलब्ध है। उस विवरण का अध्ययन किया जाये। कुछ महत्त्वपूर्ण घटक जिनका मान ज्ञात करना आवश्यक है, निम्नानुसार हैं-

सुझाव है कि मानसूनी तथा गैर-मानसूनी प्रवाह के मान को पृथक-पृथक ज्ञात किया जाये। यह जानकारी प्लानिंग के लिये बेहद महत्त्वपूर्ण है। मानसून के दिनों में उपलब्ध रन-ऑफ की मात्रा सम्भावनाओं के द्वारा खोलती है वहीं गैर-मानसूनी प्रवाह के रूप में बहने वाले भूजल की कमी उस सम्भावना को मूर्त रूप प्रदान करने के लिये अवसर प्रदान करती है। इस कारण गैर-मानसूनी प्रवाह की मात्रा के साथ-साथ उसकी अवधि भी ज्ञात की जाये।

नदी के गैर-मानसूनी प्रवाह के दो भाग होते हैं। पहले भाग में वह भूजल सम्मिलित होता है जो नदी तल के ऊपर प्रवाहित होता है। दूसरा भाग, भूजल का वह हिस्सा है जो जमीन के नीचे-नीचे बहता है। गैर-मानसूनी प्रवाह बहाली के लिये दोनों घटकों की मात्रा तथा अवधि को पृथक-पृथक ज्ञात करना आवश्यक है।

प्रत्येक हाइड्रोलॉजिकल इकाई की नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह का सम्बन्ध वाटरटेबिल की घट-बढ़ से होता है। आवश्यकतानुसार उसकी गणना (देखें परिशिष्ट भूजल की प्राकृतिक वेग (गति) की गणना) की जा सकती है। अर्थात वाटरटेबिल की घट-बढ़ की मदद से प्रवाह की अवधि और मात्रा का सम्बन्ध ज्ञात किया जा सकता है। इसके अलावा, हाइड्रोलॉजिकल इकाई से हो रहे सकल डिस्चार्ज को भी ज्ञात किया जा सकता है। उस आधार पर रीचार्ज हेतु लगने वाले पानी की सम्भावित मात्रा का अनुमान लगाया जा सकता है। उपर्युक्त गणनाएँ, प्रवाह बहाली के लिये सही विकल्प खोजने के लिये आधार प्रदान करती है।

उल्लेखनीय है कि सारे सकारात्मक एवं सघन प्रयासों के बावजूद प्रवाह बहाली पर लगातार बढ़ती बहुआयामी माँग का खतरा है इसलिये नदी के प्रवाह और उसके कछार के सतही जल और भूजल के उपयोग में बुद्धिमत्ता का परिचय देना आवश्यक है। कुछ व्यावहारिक सुझाव निम्नानुसार हैं-

1. भूजल और सतही जल का मिला-जुला उपयोग

2. आर्गेनिक/परम्परागत/प्राकृतिक खेती

3. मिट्टी में नमी सहेजने वाले गुणों का विकास

4. कम पानी में भरपूर उत्पादन देने वाले देशज बीजों का विकास तथा उपयोग

5. जल मितव्ययता

6. स्प्रिंकलर सिंचाई

7. समाज की सहमति से जल प्रबन्ध

8. पानी की गुणवत्ता को निरापद रखने हेतु प्रयास

संक्षेप में, व्यावहारिक सुझावों के साथ-साथ नदी कछार में समानुपातिक रीचार्ज करना होगा। यह प्रयास वर्षा ऋतु तथा वर्षा ऋतु के बाद, आवश्यकतानुसार किया जाएगा। समय-समय पर उसमें परिमार्जन भी आवश्यक हो सकता है। यह लगातार चलने वाला कार्य है। इसके साथ-साथ नदी के कछार में वनों तथा मिट्टी जैसे प्राकृतिक संसाधनों को ठीक करने/रखने के साथ-साथ टिकाऊ बनाना होगा।

नदी-अस्मिता की बहाली के लिये प्रयास

नदी-अस्मिता व्यापक शब्द है। वह शब्द, स्वस्थ नदी की उस आदर्श स्थिति की कल्पना करता है जिसके अनुसार नदी अविरल होती है, प्रदूषण मुक्त होती है, जैवविविधता से परिपूर्ण होती है, अपने पानी को स्वच्छ रखने की क्षमता रखती है और अपनी सभी कुदरती जिम्मेदारियों का पालन करती है। नदी-अस्मिता के निम्न मुख्य संकेतक हैं-

1. सुरक्षित कैचमेंट (Secure catchment)
2. पर्याप्त बहाव (Adequate flow)
3. स्वच्छ पानी (Clean water)
4. अक्शत चरित्र (Intact characters)

यह आदर्श स्थिति है। विभिन्न कारणों से आधुनिक युग में उस आदर्श स्थिति को हासिल करना सम्भव नहीं है परन्तु उसकी दिशा में लगातार काम करते रहने से नदी, समाज की जीवनरेखा बनी रह सकती है। कुछ हद तक नदी-अस्मिता कायम रह सकती है। कुछ प्रयास जो सम्भव हैं, निम्नानुसार हैं-

सबसे पहले हमें स्वीकारना होगा कि नदी मात्र बहता पानी नहीं है। वह जटिल जीवन्त प्रणाली है। उस जटिल जीवन्त प्रणाली में जल धारा के अलावा अन्य अन्तरंग घटक भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। वे घटक हैं- नदी तल (River Bed), नदी तट (River Bank), नदी पथ पर बोल्डर, बजरी, मोटी रेत, बारीक रेत, सिल्ट इत्यादि की परत, उसका कुदरती जमाव एवं विस्तार, बाढ़ क्षेत्र (Flood plain), राईपेरियन जोन (Riparian zone) और बेसिन (Basin)। उन घटकों को नदी से पृथक करके नहीं देखा जा सकता। वे सभी घटक नदी के अभिन्न अंग या परिवार के सदस्य की तरह हैं। प्रत्येक घटक, नदी की अस्मिता को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिये नदी पथ पर बोल्डर, बजरी, मोटी रेत, बारीक रेत, सिल्ट इत्यादि का कुदरती जमाव बाढ़ के नियमन के साथ-साथ नदी के पानी की निर्मलता, अविरलता तथा जैवविविधता को प्रभावित करता है। वह समस्त जलीय जीव-जन्तुओं तथा वनस्पतियों के लिये निरापद आवास उपलब्ध कराता है। इसीलिये पर्यावरणविद और नदी वैज्ञानिक रेत के अवैज्ञानिक खनन को अनुचित मानते हैं। नदी अस्मिता को अक्षुण्ण रखने के लिये रेत का खनन, नदी विज्ञान के सिद्धान्तों के आधार पर किया जाना चाहिए। उसके पानी पर मनुष्य के अलावा, कुदरत का भी अधिकार है। इस बारे में पृथक से भी यथास्थान विवरण उपलब्ध है।

प्रवाहमान नदी में खुद-ब-खुद साफ होने की नैसर्गिक क्षमता होती है। उसके लिये सहायक घटकों के साथ-साथ, न्यूनतम प्रवाह और जलीय जीव-जन्तुओं की मौजूदगी भी जरूरी होती है। प्रवाह की बहाली के लिये किये जाने वाले प्रयासों की चर्चा पूर्व में की जा चुकी है। उन सभी प्रयासों को मूर्त रूप देना होगा। इसके अलावा, पानी की गुणवत्ता को अक्षुण्ण रखने के लिये उसे नगरीय निकायों इत्यादि की अनुपचारित गन्दगी तथा प्रदूषित भूजल से सुरक्षित रखना होगा। नदी के कछार में आर्गेनिक/परम्परागत खेती/प्राकृतिक खेती को अपनाना होगा। जैवविविधता को लौटाना होगा। लक्ष्मण रेखा का सम्मान करना होगा।

नदी के दोनों किनारों पर, कुदरती रूप से उगने वाली विशेष प्रकार की वनस्पतियों के क्षेत्र को राईपेरियन जोन कहते हैं। इस जोन में पाई जाने वाली वनस्पतियों की अपनी भूमिका है। उस भूमिका के अनुसार जब राईपेरियन जोन की वनस्पतियों के सूखे पत्ते नदी को मिलते हैं तो वे मृत होने के कारण, भले ही ऑक्सीजन उपलब्ध कराने में असमर्थ हों पर वे जलीय जीव-जन्तुओं को भोजन अवश्य उपलब्ध कराते हैं। उस भोजन में सम्मिलित है सूखी पत्तियों पर पनप रहे बैक्टीरिया/फंगस/कीड़े। इसके अलावा राईपेरियन जोन की वनस्पतियाँ नदी के घाट को स्थायित्व तथा नदी के पानी को सही अम्लीयता प्रदान करती हैं। भूजल रीचार्ज में सहयोग देती हैं। नदी जल को निर्मल बनाने में राईपेरियन जोन का विशिष्ट महत्त्व है।

नदी का मूल चरित्र, उसका प्रवाहमान होना होता है। यह प्रवाह, नदी की यात्रा के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ता है पर जब नदी पर बाँध बनता है तो जलाशय में पानी जमा होने लगता है और प्रवाह खंडित हो जाता है। बाँध के डाउनस्ट्रीम में उसकी मात्रा लगभग शून्य हो जाती है। दूसरा बदलाव नदी की इकोलॉजी में होता है। वह धीरे-धीरे, जलाशय की इकोलॉजी में परिवर्तित होने लगती है। जलाशय के पानी का जैविक चरित्र बदल जाता है और पानी की गुणवत्ता धीरे-धीरे खराब होने लगती है। इस कारण, उसका उपयोग सीमित होने लगता है। धीरे-धीरे नदी अपनी अस्मिता खोने लगती है। अतः आवश्यक है कि नदी को प्रवाहमान बनाए रखने के लिये हर मुमकिन प्रयास किया जाये। छेड़छाड़ की लक्ष्मण रेखा हो। उसका उल्लंघन नहीं हो। अन्त में, यह सही है कि मौजूदा परिवेश में आदर्श परिस्थितियों की शत-प्रतिशत बहाली सम्भव नहीं है लेकिन लक्ष्मण रेखा को निर्धारित कर हानि को कम अवश्य किया जा सकता है। उस दिशा में हर सम्भव प्रयास करना होगा।

नदी के पानी पर निर्भर समाज की आजीविका को सम्बल

सदियों से मछुआरों, नाविकों और खरबूज-तरबूज पैदा करने वाले निर्धन लोगों को सदानीरा नदी के स्वच्छ पानी से आजीविका मिलती रही है। इस व्यवस्था में अवसरों का क्षेत्र बहुत विशाल हैं। उसका केनवास जलक्रीड़ा से लेकर परिवहन तक, कुछ भी हो सकता है। इसलिये, जैसे ही नदी की अस्मिता बहाल होना प्रारम्भ होगा, आजीविका के अवसर अपने आप पनपने लगेंगे। कुदरत से तालमेल बनाकर उन अवसरों को स्थायित्व प्रदान किया जा सकता है।

नदी की कुदरती जिम्मेदारियों को निभाने वाले प्रयास

नदी की प्रमुख कुदरती जिम्मेदारियाँ - सिल्ट और घुलित रसायनों को समुद्र में पहुँचाकर कछार को साफ और स्वस्थ रखना और धरती के भूगोल को बदलने के लिये उपयुक्त परिस्थितियाँ निर्मित करना है। नदी मार्ग पर बनाई संरचनाओं और घटते प्रवाह के कारण कछार में अवरोध बढ़ रहे हैं इसलिये ऐसी डिजाइनों को बढ़ावा देना होगा जो नदी की कुदरती जिम्मेदारियों को बिना अधिक नुकसान पहुँचाए मानवीय आवश्यकताओं को यथासम्भव पूरा करती है। गौरतलब है कि कुदरत के नियमों की अनदेखी करके या उसके विरुद्ध किया निर्माण कार्य अन्त में अस्थायी ही सिद्ध होता है।

विदित हो कि भारत के परम्परागत जल विज्ञान में सिल्ट के सुरक्षित निपटान के लिये बेहतर समाधान मौजूद हैं। उन्हें अपनाकर बाँधों में सिल्ट के जमाव को न्यूनतम स्तर पर रखा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि विभिन्न देशों में भी सिल्ट निपटान के अनेक तरीके उपलब्ध हैं। उनका अध्ययन किया जाये और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त तकनीक को अपनाया जा सकता है।

बहाल किये नदी जल का उपयोग

प्रवाह बहाली के उपरान्त नदी के अविरल चरित्र को टिकाऊ बनाने के लिये माँग और पूर्ति के बीच सन्तुलन बिठाना आवश्यक है। दूसरी आवश्यकता पर्यावरणी प्रवाह को लगातार कायम रखना है। उपर्युक्त दोनों लक्ष्यों की प्राप्ति, नदी जल के समाज सम्मत और बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग द्वारा ही सम्भव है। इसके साथ-साथ नदियों के प्रवाह की अविरलता को कायम रखने के लिये लगातार अनुसन्धान करना होगा। जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखकर पुरानी अवधारणा तथा कार्यक्रमों को लगातार परिमार्जित करना होगा। बहाल हुए पानी का उपयोग तय करना होगा। पेयजल योजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। नदी जल के उपयोग में अन्तरराज्यीय और अन्तरराष्ट्रीय समझौतों को सम्मान देना होगा। प्रवाह बहाली की विधियों को निर्दोष तथा साइड-इफेक्ट से बनाना होगा। अन्त में, परिस्थितियों की विविधता जगजाहिर है, इसलिये सम्भव है कि इस मैनुअल में किसी विशिष्ट परिस्थिति की चर्चा छूट गई हो। उसका पता लगाकर समाधान खोजा जाना चाहिए।

उपलब्धियाँ

प्रवाह बढ़ने से नदियों की सेहत सुधरेगी। पानी की उपलब्धता बढ़ेगी। पर्यावरणी प्रवाह की समस्या समाप्त होगी। किसी हद तक नदी की अस्मिता बहाल हो सकेगी। नदी की कुदरती जिम्मेदारियों को पूरा होने में मदद मिलेगी। नदियों के प्रदूषण के स्तर में कमी आएगी। पानी की गुणवत्ता में सुधार होगा। जैवविविधता की बहाली और पानी की नैसर्गिक सफाई का मार्ग प्रशस्त होगा। जल जनित बीमारियों में कमी आएगी और बीमारी पर होने वाले खर्च घटेगा। समाज निरोगी होगा। नदी पर निर्भर समाज की आजीविका को सम्बल मिलेगा। विकास का प्रकृति सम्मत, सन्तुलित और निरापद मॉडल विकसित होगा। नदी प्रवाह की वृद्धि से पानी से सम्बन्धित अनेक समस्याएँ अपने आप सुलझेंगी। भूजल स्तर के ऊपर उठने से तालाबों, कुओं तथा नलकूपों में पानी लौटेगा। पानी की उपलब्धता बढ़ने के कारण पेयजल संकट में कमी आएगी। जल संकट के कारण होने वाला पलायन घटेगा। नगरों पर ग्रामीण आबादी को मूलभूत सुविधाएँ तथा रोजगार उपलब्ध कराने का दबाव कम होगा। अनेक प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष लाभ होंगे।

नदी मैनुअल- सैद्धान्तिक पक्ष एवं गणनाएँ

परिशिष्ट एक - नदी और उसके घटक

नदी

कल कल के मधुर संगीत के साथ बहे वही नदी है। ताजे पानी की अविरल कुदरती धारा ही नदी है। प्रकृति द्वारा विकसित एवं लगातार परिमार्जित होते मार्ग पर प्रवाहित जीवन्त जलधारा ही नदी है। बरसात का पानी उसे जन्म देता है। उसका जन्म ग्लेशियर, पहाड़, झीलों अथवा झरनों से भी होता है। सामान्यतः नदियों की यात्रा सागर अथवा झील से मिलकर समाप्त हो जाती है। कुछ नदियों को अपनी यात्रा के दौरान कभी-कभी मरुस्थल भी मिल जाता है। यदि पानी की पूर्ति पर्याप्त होती है तो वे मरुस्थल की बाधा को पार कर लेती हैं अन्यथा उनकी यात्रा मरुस्थल में ही समाप्त हो जाती है। अपनी यात्रा के दौरान मुख्य नदी को अनेक छोटी-छोटी नदियाँ मिलती हैं। वे सहायक नदियाँ कहलाती हैं। सहायक नदियाँ, अपना सारा पानी मुख्य नदी को सौंपती हैं। उनके योगदान के कारण बड़ी नदी में पानी की मात्रा बढ़ती है। पानी की मात्रा बढ़ने में जमीन के नीचे से मिलने वाले पानी की भी भूमिका होती है। मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियाँ मिलकर नदी-तंत्र का निर्माण करती हैं। नदी-तंत्र का रकबा नदी घाटी या जल निकास घाटी कहलाता है। उसे जलग्रहण क्षे़त्र या कछार भी कहते हैं। जल निकास घाटी पर बरसा पानी अन्ततः नदी को मिलता है। नदी, उसे, अपने पूर्ववर्ती प्रवाह में शामिल कर, आगे बढ़ाती है। यही व्यवस्था नदी के प्रवाह की सतत समृद्धि का आधार है।

वर्षा ऋतु में नदी को पर्याप्त पानी मिलता है। वर्षा ऋतु बीतने के बाद, नदी को धरती के नीचे का पानी (भूजल) मिलता है। ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियों को बर्फ के पिघलने से अतिरिक्त पानी की पूर्ति होती है। सूखे दिनों में भारतीय प्रायद्वीप की नदियों को भूजल से जुड़ी दो प्रकार की परिस्थितियाँ मिलती हैं। पहली परिस्थिति में भूजल भण्डारों का पानी नदी को मिलता है। यह भूजल के बहिःस्राव की स्थिति (Effluent– Gaining stage) है। दूसरी परिस्थिति में नदी का पानी भूजल भण्डारों को मिलता है। यह भूजल के अन्तःस्राव की स्थिति (Influent– losing stage) है। नदी, दोनों ही परिस्थितियों का सामना करते हुए आगे बढ़ती है। नीचे दिये चित्र छह में उपर्युक्त परिस्थितियों को दर्शाया है-

नदी के प्रवाह को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। उसका पहला भाग सतही रन-ऑफ और दूसरा भाग भूजल प्रवाह कहलाता है। बरसात में भूजल सहित मुख्यतः सतही रन-ऑफ और सूखे दिनों में धरती की कोख से रिसा भूजल ही नदी में बहता है। नदी तल के ऊपर बहने वाले सकल पानी और नदी तल के नीचे बहने वाले पानी का अनुपात लगभग 38:01 होता है। उल्लेखनीय है कि रन-ऑफ नदी तल के ऊपर तथा भूजल नदी तल के ऊपर तथा नीचे बहता है। जब नदी सूख जाती है तब भी नदी तल के नीचे प्रवाह बना रहता है। उल्लेखनीय है कि नदी को भूजल का अधिकतम योगदान उथले एक्वीफरों से मिलता है।

नदी अपने साथ में बोल्डर, बजरी, रेत, मिट्टी, सिल्ट और उपजाऊ तत्व इत्यादि बहाकर ले जाती है। उसका कुछ हिस्सा बाढ़-क्षेत्र में जमा होता है। बाकी हिस्सा पानी के साथ आगे बढ़ता है और अन्त में डेल्टा बनाकर समुद्र में मिल जाता है। नदी तंत्र में प्रवाहित पानी के साथ बहने वाले मलबे का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा ठोस और 30 प्रतिशत हिस्सा घुलित रसायनों का होता है। ठोस हिस्सा मुख्यतः बोल्डरों, बजरी, रेत और सिल्ट इत्यादि का होता है। नदी मार्ग में उनका जमाव धरती का ढाल, प्रवाह की गति, जल की परिवहन क्षमता इत्यादि से नियंत्रित होता है। बोल्डर, बजरी जैसे बड़े कण नदी के प्रारम्भिक भाग में तथा छोटे कण अन्तिम भाग में जमा होते हैं। घुलित रसायन समुद्र में जमा होते हैं।

नदी अपने जीवन काल में युवा अवस्था (Youth stage), प्रौढ़ अवस्था (Mature stage) तथा वृद्धावस्था (Old stage) से गुजरती है। अपनी युवावस्था तथा प्रौढ़ावस्था में नदी अपने कछार में भूआकृतियों (Land forms) का निर्माण करती है। उनका परिमार्जन (Modify) करती है। वह जीवन भर अपनी प्राकृतिक भूमिका का निर्वाह करती है।

प्रत्येक नदी का अपना पारिस्थितिक तंत्र होता है जो स्थिर पानी (Lake and reservoir) के पारिस्थितिक तंत्र से पूरी तरह भिन्न होता है। दोनों तंत्रों के पानी की गुणवत्ता में अन्तर होता है। उनमें पलने वाले जीवन में भी अन्तर होता है।

नदी, जैवविविधता से परिपूर्ण होती है। वह प्राकृतिक एवं प्रकृति नियंत्रित व्यवस्था है जो वर्षाजल, सतही जल तथा भूजल को सन्तुलित रख, अनेक सामाजिक तथा आर्थिक कर्तव्यों का पालन करती है। वह जागृत इकोसिस्टम है। नदी पर निर्भर समाज के लिये वह आजीविका का विश्वसनीय आधार है।

सामान्यतः स्वस्थ नदी का प्रवाह अविरल होता है। सूखे दिनों में उसका प्रवाह धीरे-धीरे कम होता है। नदी में रहने वाले समस्त जीव-जन्तु और वनस्पतियाँ उस बदलाव से परिचित होते हैं। कुछ, उस बदलाव के अनुसार अपने को ढाल लेते हैं तो कुछ अन्य इलाकों में पलायन कर जाते हैं। यही उनके जीवन की निरन्तरता का आधार है।

वृद्धावस्था में नदी का कछार लगभग समतल हो जाता है। इस स्थिति में, बरसाती पानी पूरे कछार में फैलकर बहता है। नदी के दोनों तटों का अस्तित्व भी लगभग समाप्त हो जाता है। उस स्थिति में नदियों की पहचान भी लगभग खत्म हो जाती है। वे विलुप्त हो जाती हैं पर कछार पर पानी का बरसना जारी रहता है।

हर स्वस्थ नदी अविरल तथा जागृत इकोसिस्टम होती है। वह लगभग प्रदूषण मुक्त रहती है। अविरलता उसकी सही पहचान है। स्वस्थ नदी के निम्न मुख्य संकेतक हैं-

1. सुरक्षित कैचमेंट (Secure catchment)
2. पर्याप्त बहाव (Adequate flow)
3. स्वच्छ पानी (Clean water)
4. अक्शत चरित्र (Intact characters)

उपर्युक्त संकेतकों से स्पष्ट है कि नदी मात्र बहता पानी नहीं है। वह जटिल जीवन्त प्रणाली है। उस जटिल जीवन्त प्रणाली में अविरल जलधारा के साथ-साथ कुछ और अन्तरंग घटक भी पाये जाते हैं। उन अन्तरंग घटकों को नदी तल (River Bed), नदी तट (River Bank), बाढ़ क्षेत्र (Flood plain), राईपेरियन जोन (Riparian zone) और कछार/बेसिन (Basin) कहते हैं। वे सभी घटक नदी परिवार के सदस्य हैं। उसके शरीर के अभिन्न अंग हैं। उनका संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है-

नदी तल

नदी तल वह सतह है जिस पर नदी का पानी बहता है। नदी तल की सतह ढालू होती है। उसकी सतह पर कैचमेंट से बहकर आये कण जमा होते हैं। उन कणों का जमाव व्यवस्थित और निश्चित क्रम (बड़े से छोटे) में होता है। नदी तल की सतह स्थानीय परिस्थिति अनुसार चट्टानी, कच्चे पत्थर, बालू या मिट्टी की होती है। नदी का तल हमेशा नदी की भौतिक सीमाओं अर्थात किनारों के अन्दर स्थित होता है। कुदरती प्रक्रिया की मदद से बहता पानी, लगातार उसका निर्माण और परिमार्जन करता है।

नदी तल के गुण प्रवाह को नियंत्रित करते हैं। यदि अपस्ट्रीम से आने वाला प्रवाह समाप्त हो जाता है और स्थानीय वाटर टेबिल नदी तल के नीचे उतर जाती है तो नदी सूख जाती है। यदि अपस्ट्रीम से आने वाले प्रवाह की निरन्तरता कायम रहती है और स्थानीय वाटर टेबिल, गिर कर, नदी के तल के नीचे पहुँच जाती है तो नदी का तल पानी को सोखने लगता है। प्रवाह घट जाता है। इस परिस्थिति में यदि रिसाव की दर, पूर्ति की दर से अधिक हो तो नदी सूख जाती है।

अपवादों को छोड़कर, पानी, सामान्यतः नदी तल के आंशिक हिस्से से ही बहता है। जैसे ही बरसात प्रारम्भ होती है, वैसे ही पानी की आवक बढ़ जाती है तो सबसे पहले वह नदी की रेत को सन्तृप्त करती है। उसके बाद पानी, नदी तल के पूरे हिस्से पर फैलकर बहता है। बाढ़ के दौरान, पानी, उसकी सीमाओं (नदी तट) को लाँघ कर बाढ़ क्षेत्र में बहता है। उसका विस्तार क्षेत्र लगातार बदलता रहता है। प्रकृति में कहीं-कहीं परित्यक्त नदी मार्ग भी मिलते हैं।

नदी तट

सामान्य आदमी के लिये नदी तट का अर्थ नदी के तल की दाहिनी और बाँईं सीमा है। नदी तट सामान्यत ढालू और उनके ढाल सामान्यतः असमान होते हैं। उनकी सतह अनियमित तथा ऊबड़-खाबड़ होती है। वे नदी के तल की सीमा को निर्धारित करते हैं। बाढ़, हर साल, मिट्टी काट कर, उनको परिमार्जित करती है। परिमार्जन के कारण उनका विस्तार होता है। उनके बीच की दूरी बढ़ती है। उनके बीच की दूरी के बढ़ने के कारण नदी की चौड़ाई बढ़ती है।

गैर-मानसूनी सीजन में नदी का पानी किसी एक किनारे के पास से अथवा उससे अलग-अलग दूरी से बहता है। यह स्थिति भी स्थायी नहीं है। साल-दर-साल उसमें बदलाव सम्भव है। नदी के तटों को दाँया तट और बाँया तट के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। यह पहचान, उन्हें, प्रवाह के दाहिनी ओर या बाँई ओर स्थित होने के कारण मिलती है। मैदानी इलाकों में सामान्यतः एक तट के निकट रेत और दूसरे तट के निकट घाट मिलता है।

बाढ़ क्षेत्र

वर्षा ऋतु में नदियों में अक्सर बाढ़ आती है और बाढ़ का पानी कछार में फैल जाता है। हर बाढ़ के साथ डूब क्षेत्र बदलता है। जल विज्ञानियों ने बाढ़ क्षेत्र को परिभाषित किया है। उनके अनुसार अधिकतम बाढ़ के दौरान नदी कछार का वह आप्लावित इलाका जो पानी में डूबता है, बाढ़ क्षेत्र कहलाता है। यही वह क्षेत्र है जो बाढ़ के समय अस्थायी रूप से पानी में डूबता है। बाढ़ क्षेत्र में जन-धन तथा सम्पत्ति की हानि होती है।

बाढ़ हमेशा हानिकारक नहीं होती। वह बाढ़ क्षेत्र में उपजाऊ मिट्टी और पोषक तत्व जमा करती है। वह कछार को परिमार्जित करती है। जल प्रपातों को समाप्त करती है। नदी को परिवहन के काबिल बनाती है। उल्लेखनीय है कि बाढ़ के कारण कुछ नदियाँ अपना रास्ता भी बदलती हैं। कोसी नदी, अक्सर अपना मार्ग बदलती है और वह मार्ग परिवर्तन का सबसे सटीक भारतीय उदाहरण है।

बाढ़ क्षेत्र को पहचानना बहुत सरल है। कछार के अन्य इलाके की तुलना में, नदी मार्ग के दोनों ओर पाई जाने वाली कुदरती वनस्पतियों तथा वृक्षों में काफी भिन्नता होती है। यह भिन्नता वृक्षों तथा वनस्पतियों की अनुकूलन क्षमता में भिन्नता होने के कारण होती है। उदाहरण के लिये बाढ़ क्षेत्र में नमी की अधिकता होती है। नमी की अधिकता के कारण अक्सर हरी घास और फूलों की अधिकता देखी जाती है। कुछ परिस्थितियों में दलदली भूमि भी मिल सकती है। यह भूमि, वनस्पतियों, काई या शैवाल से ढँकी होने के बावजूद नदी तथा जैवविविधता का आवश्यक हिस्सा होती है। बाढ़ क्षेत्र में वही वनस्पतियाँ तथा वृक्ष पाये जाते हैं जो उपलब्ध नमी में फल-फूल सकते हैं तथा अनुकूल होते हैं।

राईपेरियन जोन

नदी के किनारों का वह क्षेत्र जिस में कुछ विशेष प्रकार की ही वनस्पतियाँ पैदा होती हैं, राईपेरियन जोन कहलाता है। नदी की सेहत के लिये राईपेरियन जोन का अप्रतिम महत्त्व है। सामान्य व्यक्ति, राईपेरियन जोन को नहीं पहचान पाते। वनस्पति विज्ञानियों और स्थानीय जानकारों के लिये उनको पहचानना बेहद सहज या आसान होता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार राईपेरियन जोन, वह सीमित इलाका है जो कुछ विशेष प्रकार की वनस्पतियों के पनपने में सहयोग करती है। उल्लेखनीय है कि नदी की सेहत के लिये वे बेहद महत्त्वपूर्ण और आवश्यक होती हैं। हर साल, बाढ़, उन्हें समृद्ध करती है। अनुसन्धानों से पता चला है कि नदी के पानी (सतही जल और भूजल) की गुणवत्ता सुधारने में राईपेरियन जोन की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण होती है। राईपेरियन जोन, पानी में मौजूद नाइट्रेट की सान्द्रता को कम करती हैं। राईपेरियन जोन का सबसे बड़ा योगदान है - जलीय जीव-जन्तुओं को भोजन उपलब्ध कराना। सामान्यतः राईपेरियन जोन में पनपने वाली वनस्पतियों के सूखे पत्ते झड़कर या बहकर नदी को मिलते हैं। ये सूखे पत्ते ऑक्सीजन उपलब्ध कराने में असमर्थ होते हैं। वे जलीय जीव-जन्तुओं को वांछित भोजन उपलब्ध कराते हैं। यह भोजन बैक्टीरिया या फंगस या कीड़ों के रूप में होता है। इसके अलावा राईपेरियन जोन की वनस्पतियाँ नदी के घाट को स्थायित्व तथा नदी के पानी को सही अम्लीयता प्रदान करती हैं। वे भूजल रीचार्ज में सहयोग भी देती हैं। नदी जल को निर्मल बनाने में राईपेरियन जोन का विशिष्ट महत्त्व है। अनजाने में, कई बार उनकी उपेक्षा होती है।

नदी घाटी

नदी को पानी (सतही तथा भूजल) प्रदान करने वाला क्षेत्र नदी घाटी या नदी का कछार कहलाता है। उसे अनेक नामों से पुकारा जाता है। भारत की नदी घाटियों का विवरण परिशिष्ट तीन में दिया गया है।

नदी का प्रवाह

पानी जो कुदरती रूप से नदियों में प्रवाहित होता है, प्रवाह कहलाता है। भारत की मानसूनी जलवायु होने के कारण नदियों को लगभग चार माह भारी मात्रा में पानी मिलता है। बाकी के आठ माह सामान्यतः सूखे होते हैं। इन सूखे महीनों में बहुत कम बरसात होती है। सूखे माहों में नदी के प्रवाह का स्रोत एक्वीफरों से बाहर आया भूजल होता है। जैसे-जैसे एक्वीफरों का पानी नदी में डिस्चार्ज होता है, वैसे-वैसे एक्वीफर खाली होते हैं। उनका योगदान घटता है इसलिये सूखे महीनों में प्रवाह धीरे-धीरे घटता है और पानी की पूर्ति के समाप्त होते ही नदी का प्रवाह समाप्त हो जाता है। नदी सूख जाती है।

पचास-साठ साल पहले तक भारत की अधिकांश नदियाँ बारहमासी थीं। उस समय मौसमी परिवर्तनों के कारण उनके प्रवाह में घट-बढ़ देखी जाती थी। नदी तंत्र की जैवविविधता सुरक्षित थी। दक्षिण भारत की नदियों की तुलना में हिमालयीन नदियाँ बेहतर स्थिति में थीं क्योंकि उनको बर्फ के पिघलने से भी पानी की आपूर्ति होती थी। अब यह स्थिति बदल गई है। उनका प्रवाह भी घट गया है।

पर्यावरणी प्रवाह

पर्यावरणी प्रवाह, नदी में पानी के प्रवाह की वह न्यूनतम मात्रा है, जिसकी उपलब्धता के कारण, नदी अपने दायित्वों का निर्वाह करती है। नदी के प्रमुख दायित्व हैं - जलीय जीव-जन्तुओं को सुरक्षित आवास, राईपेरियन वनस्पतियों के इष्टतम विकास, उनकी निरन्तरता तथा उनके द्वारा उत्तरदायित्वों का निर्वाह और प्रवाह की निरन्तरता द्वारा छोटे-छोटे कणों तथा घुलित रसायनों का परिवहन। यदि पर्यावरणी प्रवाह की इष्टतम मात्रा घटती है तो नदी की सेहत बिगड़ती है, जलीय जीव-जन्तुओं के निरापद जीवन के लिये घातक वातावरण पनपता है और नदी को कुदरती जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिये अनुपयुक्त वातावरण का सामना करना पड़ता है।

सूखे मौसम में प्रवाह का कम होना स्वाभाविक तथा कुदरती है। इसके बावजूद, हर स्वस्थ नदी में हर समय न्यूनतम पर्यावरणी प्रवाह, मिलता है। न्यूनतम पर्यावरणी प्रवाह, उसका मौलिक अधिकार है। यह अधिकार, प्रकृति ने नदी को प्रदान किया है। इस कारण वह, कुदरती दायित्वों को बिना किसी रुकावट के पूरा करती है। यदि कुदरत ने नदी का संविधान लिखा होता तो निश्चित ही न्यूनतम पर्यावरणी प्रवाह का उल्लेख, उसकी भूमिका में प्रमुखता से दर्ज होता। अतः प्रत्येक नदी के लिये सूखे मौसम में मिलने वाले न्यूनतम पर्यावरणी प्रवाह को परिभाषित किया जाना चाहिए।

पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, नदियों में पर्यावरणी प्रवाह की पुरजोर पैरवी करते हैं। उनके अनुसार, पर्यावरणी प्रवाह, नदी में पानी की सतत प्रवाहित वह न्यूनतम मात्रा है जो हर हाल तथा हर परिस्थिति में अनिवार्य रूप से नदी में मिलना तथा बहना चाहिए। इस अनुक्रम में नदियों का पर्यावरणी प्रवाह, हकीकत में, जीवन रक्षक प्रवाह है। उस प्रवाह को नदी की अस्मिता से भी जोड़कर देखा जाना चाहिए। पर्यावरणी प्रवाह रहित नदी हकीकत में मृत शरीर की तरह है।

पर्यावरणी प्रवाह की आवश्यकता को सबसे पहले सन 1940 के अन्तिम वर्षों में अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा पहचाना गया। उसके बाद, मछलियों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों द्वारा शिद्दत से उसकी पैरवी की गई। अनुसन्धानकर्ताओं ने उसे आगे बढ़ाया। उस पैरवी में सैलमन और ताजे पानी की ट्राउट मछली (Saloman – a large silver scaled fish and Trout – a fresh water fish) की भूमिका केन्द्रीय रही है। धीरे-धीरे इसमें अनेक नए-नए विषय जुड़ते गए। अध्ययनों ने स्थापित किया है कि पर्यावरणी प्रवाह की आवश्यकता, खंड-खंड में नहीं अपितु नदियों की पूरी लम्बाई (उद्गम से लेकर डेल्टा तक) के लिये है। इसके अलावा, बाढ़-क्षेत्र के नम इलाकों में सम्पन्न होने वाली इकोलॉजिकल प्रक्रियाओं के लिये भी पर्यावरणी प्रवाह आवश्यक है इसलिये उसे किसी भी परिस्थिति में न्यूनतम स्तर के नीचे नहीं जाना चाहिए। उसका लक्ष्मण रेखा के नीचे उतरना जलीय जीव-जन्तुओं के लिये घातक है। वैज्ञानिक बताते हैं कि इकोलॉजिकल प्रक्रियाओं का सम्बन्ध बाढ़ के नियमन, नदी के पानी की अपने आप साफ-सफाई, मछली उत्पादन जैसी कुछ महत्त्वपूर्ण सेवाओं से है। इसी कारण न्यूनतम पर्यावरणी प्रवाह को आवश्यक माना गया है। धीरे-धीरे उसका महत्त्व बढ़ रहा है और उसके अध्ययन में नए-नए विषय जुड़ रहे हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि नदियों के प्रवाह के परिवर्तनों का सम्बन्ध कुदरती घटकों यथा कछार के मौसम बदलावों और अवधि तथा बाढ़ की विभीषिका या सूखे के समय की वस्तुस्थिति पर निर्भर होता है। नदियों के प्रवाह की घट-बढ़, हर नदी के लिये अलग-अलग होती है। पहले यह घट-बढ़ कुदरती थी। अब, उस घट-बढ़ पर बढ़ते मानवीय हस्तक्षेपों और जलवायु परिवर्तन का कुप्रभाव बढ़ रहा है। यह नदी अस्मिता पर संकट है। यह संकट साल-दर-साल बढ़ रहा है। इस कारण हर देश में न्यूनतम पर्यावरणी प्रवाह को परिभाषित करने का प्रयास कर रहा है। भारत में भी उसको लेकर जागरुकता धीरे-धीरे बढ़ रही है।

नदियों के पर्यावरणी प्रवाह के आकलन (Environmental Flow Assessment) का सिलसिला प्रारम्भ हो रहा है। वैज्ञानिकों ने पर्यावरणी प्रवाह के आकलन के लिये अनेक विधियों का विकास किया है। हर साल उस सूची में नई-नई विधियाँ जुड़ रही हैं। पुरानी विधियाँ परिमार्जित हो रही हैं। उन विधियों का उद्देश्य, हमें, सम्पूर्ण नदी में साफ पानी के न्यूनतम पर्यावरणी प्रवाह की आवश्यकता तथा सटीकता से परिचित कराना है। अर्थात यह तथ्य अच्छी तरह रेखांकित करना है कि कठिन दिनों में भी नदी में न्यूनतम पर्यावरणी प्रवाह प्रवाहित होना ही चाहिए। मौजूदा समय में पर्यावरणी प्रवाह पर तेजी से संकट पनप रहा है। उसके पनपने का सबसे बड़ा कारण सूखे महीनों में भूजल का अतिदोहन दोहन है।

नदी के पर्यावरणी प्रवाह की बहाली के लिये नदी-तंत्र को समग्रता में समझने की आवश्यकता है।

ऑल इण्डिया सॉयल एंड लेंड यूज सर्वे (all india soil and land use survey) कृषि मंत्रालय, भारत सरकार ने वाटरशेड एटलस ऑफ इण्डिया को प्रकाशित किया है। उस एटलस के अनुसार भारत में केवल छः जल संसाधन क्षेत्र हैं। उनके अन्तर्गत 36 नदी घाटियाँ स्थित हैं। प्रत्येक नदी घाटी की पहचान एक मुख्य नदी है। उन 36 नदियों की मुख्य सहायक नदियों की संख्या 112 है। उन 112 मुख्य नदियों की चिह्नित मुख्य सहायक नदियों की संख्या लगभग 500 है। उन 500 चिह्नित नदियों की मुख्य सहायक नदियों की संख्या लगभग 3237 है। इससे छोटी नदियों को वाटरशेड एटलस ने चिह्नित नहीं किया है।

जाहिर है कि जल संसाधन क्षेत्र की प्रमुख नदी के प्रवाह को उसकी सहायक नदियों के प्रवाह से सहयोग मिलता है। दूसरी हकीकत के अनुसार किसी भी जल संसाधन क्षेत्र के अन्तर्गत वर्गीकृत नदी, अन्य जल संसाधन क्षेत्र की नदी से, नहीं मिलती। वह आपस में पानी की अदला-बदली भी नहीं करती।

पर्यावरणी प्रवाह का मुद्दा छह जल संसाधन क्षेत्रों या छत्तीस नदी घाटियों या एक सौ बारह कैचमेंटों या 500 उप-कैचमेंटों या 3237 वाटरशेडों की मुख्य नदियों तक सीमित नहीं है। उसका सम्बन्ध उन सभी नदियों से है जिन्हें इस हेतु चिह्नित किया जाना आवश्यक है।

पर्यावरणी प्रवाह की सबसे अधिक खराब हालत 3237 वाटरशेडों से होकर बहने वाली प्रमुख नदियों तथा उनकी सहायक नदियों में है। दूसरे, यह खतरा उप-कैचमेंट की प्रमुख नदियों में भी बढ़ रहा है। भारत में पर्यावरणी प्रवाह जो प्रवाह बहाली का अभिन्न अंग है, को सुनिश्चित करने के लिये निम्न कदम उठाए जाने की आवश्यकता है-

1. न्यूनतम पर्यावरणी प्रवाह की मात्रा को सुनिश्चित करना

2. नदियों की सूची जिनमें न्यूनतम पर्यावरणी प्रवाह सुनिश्चित किया जाना है

3. नदी के पानी की गुणवत्ता के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक मानक तय करना

4. नदी के पानी की गुणवत्ता के देशज संकेतक तय करना

5. नियमित मानीटरिंग और सोशल ऑडिट

6. अन्य कदम जो आवश्यक हैं

परिशिष्ट दो

नदी विज्ञान

नदी विज्ञान अपेक्षाकृत नया विज्ञान है इसलिये उन सब लोगों को जो प्रवाह की बहाली में रुचि रखते हैं, सबसे पहले नदी विज्ञान के मूल तत्वों को समझना आवश्यक है।

नदी विज्ञान उन सभी घटकों और उनके प्रभावों को समझने का प्रयास करता है जिनका नदी की समग्र भूमिका से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सम्बन्ध है। विज्ञान की यह शाखा, उन सभी गतिविधियों तथा बदलावों को समझने का प्रयास करती है जो नदी की गतिविधियों को प्रभावित करती हैं। यह विज्ञान उन जटिल सम्बन्धों को भी समझने का प्रयास करता है जो जल संसाधन क्षेत्र (water resource region) की नदियों के बीच मौजूद होते हैं। यह उन भौतिक, रासायनिक तथा जैविक बदलावों का भी अध्ययन करता है जो दैनिक, मौसमी, वार्षिक अथवा शताब्दियों में घटित होते हैं। यह एक जीवित सिस्टम को उसके वृहत परिवेश सहित जानने की गम्भीर अकादमिक एक्सरसाइज भी है। वह व्यावहारिक अकादमिक एक्सरसाइज है। संक्षेप में, नदी विज्ञान का कैनवास बहुत विशाल है और उसमें वह सब जो नदी को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तरीके से प्रभावित करता हैं, समाहित हैं। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि जल सम्पदा के टिकाऊ विकास के लिये नदी और उसके विज्ञान को समझना आवश्यक है। नदी विज्ञान के अन्तर्गत संस्कृति, इतिहास और परम्पराओं जैसे विषयों का भी अध्ययन किया जाता है।

नदी विज्ञान ने नदी-तंत्र के अनेक कामों और दायित्वों की पहचान की है। उदाहरण के लिये कुछ लोग नदी को जीवनरेखा कहते हैं। वह जीवनरेखा, राइपेरियन गलियारों से मिलकर अनेक जीव-जन्तुओं को आवास उपलब्ध कराती है। वे पोषक तत्वों और मछलियों को समुद्र तक ले जाती है। वे उपजाऊ मिट्टी को कछार में जमा करती है। वे कछार और नदी मार्ग का भूगोल परिमार्जित करती है। उनके स्वच्छ जल में जीवन जो खाद्य शृंखला का हिस्सा है, आश्रय पाता है तथा पनपता है। नदी का भौतिक और जैविक वातावरण प्रवाह के आगे बढ़ने के साथ बदलता है।

नदियों पर बने बाँधों ने नदी की भूमिका को प्रभावित किया है। उसे समझना आवश्यक है। नदी विज्ञान ने नदी-तंत्र से सम्बद्ध अनेकानेक अल्पकालिक तथा दीर्घकालिक प्रभावों, बदलावों और दायित्वों की पहचान की है। वही उसके अध्ययन के महत्त्वपूर्ण पड़ाव हैं। उन अध्ययन पड़ावों में साल-दर-साल सुधार हो रहा है इस कारण नदी को मात्र प्रवाह या उसके सीमित प्रबन्ध द्वारा पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।

नदियों के कैचमेंट की साइज एक वर्ग किलोमीटर से भी अत्यन्त छोटे क्षेत्र से लेकर हजारों वर्ग किलोमीटर तक हो सकती है। उसके कैचमेंट की आकृति के अनेक अविश्वसनीय स्वरूप हो सकते हैं। यही बात उसके प्रवाह पर भी लागू है। वह मौसम के अनुसार बदलता है। प्राकृतिक तथा कृत्रिम घटकों द्वारा प्रभावित होता है। जलवायु बदलाव तथा बरसात के चरित्र में हो रहे बदलावों की रोशनी में प्रवाह के उतार-चढ़ाव को समझना आवश्यक है। संक्षेप में, नदी विज्ञान को समझकर ही हम नदियों की अस्मिता बहाली और प्रवाह बढ़ोत्तरी के लिये कारगर प्रयास कर सकते हैं।

नदी विज्ञान के अन्तर्गत आने वाले वैज्ञानिक पहलुओं को जैविक और भौतिक वर्गों (Biological and physical categories) में बाँटा जा सकता है। जैविक वर्ग में आने वाले वैज्ञानिक पहलुओं का सम्बन्ध मुख्यतः नदी की इकोलॉजी (Stream ecology), सरोवर विज्ञान (Limnology), मत्स्य विज्ञान (Fisheries Science), जलीय कीटविज्ञान, (Aquatic Entomology), नदी तल की इकोलॉजी (Benthic Ecology), जलीय विष-विज्ञान (Aquatic Toxicology) और भूतलीय इकोलॉजी (landscape ecology) से होता है। भौतिक वर्ग में अध्ययन के विषय हैं जल-विज्ञान (Hydrology), जलीय गतिज विज्ञान (Hydro-dynamics) नदी सम्बन्धित भू-आकृति विज्ञान (Fluvial Geomorphology), सिविल इंजीनियरिंग, नदी आकृति विज्ञान (River Morphology), भूगर्भशास्त्र, चतुर्थ महाकल्प का भूविज्ञान (Quaternary Geology) और जल का गतिज विज्ञान (Hydraulics)।

उल्लेखनीय है कि नदी विज्ञान की उपरोक्त शाखाओं में से केवल उन शाखाओं का बेहतर विकास हुआ है जो मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करती हैं। नदी विज्ञान की वे शाखाएँ जो मात्र अकादमिक महत्त्व की हैं या जिनका सीधा-सीधा लाभ समाज को आसानी से दिखाई नहीं देता, पिछड़ गया है। वे शाखाएँ हाशिए पर हैं। उन शाखाओं में नदी की कुदरती भूमिका और खराब होते पर्यावरण की शाखा मुख्य है। उनकी अनदेखी, कुछ ऐसी समस्याओं को जन्म दे रही है जो कालान्तर में नदी से मिले लाभों को इतिहास बना देगी।

परिशिष्ट तीन
प्राकृतिक जलचक्र

पृथ्वी पर पानी तीन माध्यमों से गुजरता है। ये माध्यम हैं जल मण्डल (मुख्यतः समुद्र), वायुमण्डल और स्थलमण्डल की ऊपरी परत। पानी की यह यात्रा प्राकृतिक जलचक्र कहलाता है। यह यात्रा (समुद्र - वायुमण्डल - स्थलमण्डल - समुद्र) बेहद जटिल और एक दूसरे पर निर्भर प्रक्रियाओं (वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन (Evaporation and transpiration), बरसात, रन-ऑफ और भूजल प्रवाह) की मदद से पूरी होती है।

अनुमान है कि प्राकृतिक जलचक्र में भाग लेने वाले पानी की मात्रा लगभग 13100 लाख घन किलोमीटर है। उस पानी का लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा समुद्र में मिलता है। बचा तीन प्रतिशत पानी महाद्वीपों पर मिलता है। महाद्वीपों पर मौजूद पानी का 68.7 प्रतिशत हिमनदियों एवं बर्फ की चोटियों में, 30.1 प्रतिशत पानी भूजल के रूप में तथा 0.3 प्रतिशत सतही जल और बाकी अन्य स्रोतों में मिलता है।

प्राकृतिक जलचक्र दर्शाता है कि पृथ्वी से जितना पानी भाप बनकर वायुमण्डल में पहुँचता है उतना ही पानी बरसात के रूप में पृथ्वी पर लौटता है। इसके अलावा, भाप के रूप में स्थायी रूप से पानी की जितनी मात्रा वायुमण्डल में हमेशा मौजूद होती है उतनी ही मात्रा नदियों तथा जमीन के नीचे के पानी द्वारा समुद्र को लौटाई जाती है। जलवायु परिवर्तन उसकी अवस्थाओं (द्रव, ठोस और भाप) को भले ही प्रभावित करे, उसकी सकल मात्रा और यात्रा यथावत रहेगी। चित्र सात प्राकृतिक जलचक्र और उसके घटकों को दर्शाता है।

प्राकृतिक जलचक्र दर्शाता है कि पानी, भाप के रूप में वायुमण्डल में लगभग 15 किलोमीटर की ऊँचाई तक और धरती की ऊपरी परत में लगभग एक किलोमीटर की गहराई तक पाया जाता है। यह, मौजूदगी प्रकृति द्वारा सौंपी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिये है। वह, कहीं जीवन जीने के लिये परिस्थितियाँ उपलब्ध करा रही है तो कहीं भौतिक तथा रासायनिक बदलावों को अंजाम दे रही है। आम आदमी को, प्राकृतिक जलचक्र अत्यन्त सरल नजर आता है पर हकीकत में, वह बहुत जटिल है। वास्तव में, जलचक्र को एक शृंखला से नहीं दर्शाया जा सकता। उसकी अनेक उप-शाखाएँ हैं जो स्थानीय, क्षेत्रीय तथा महाद्वीपों के स्तर पर पाई जाती हैं और लगातार संचालित हो रहीं हैैं। वह एक जटिल सिस्टम की तरह है। उनमें मौजूद पानी, लगातार चलता रहता है। अपने दायित्व पूरा करता है तथा परिणामों को उनके अंजाम तक पहुँचाता है। उसका न आदि है और न अन्त। यह सच है कि समय तथा मौसम के अनुसार जलचक्र में निहित पानी की मात्रा में कमीबेशी होती रहती है पर उसकी सकल मात्रा अपरिवर्तनीय है। स्थानीय, क्षेत्रीय तथा महाद्वीपों के स्तर पर भी उसका वितरण लगातार बदलता रहता है।

धरती पर स्वच्छ तथा निर्मल पानी बरसता है। उसका कुछ भाग, रन-ऑफ के माध्यम से नदीतंत्र को मिलता है। पानी की इस यात्रा में उसे अनेक पदार्थ मिलते हैं। वह उन्हें अपने साथ बहाकर आगे ले जाता है। नदीतंत्र, पानी और उसके साथ बहकर आये पदार्थों को समुद्र में जमाकर देता है। सम्पादित प्रक्रिया से प्रतीत होता है कि, प्राकृतिक जलचक्र, हर साल महाद्वीपों की साफ-सफाई करता है।

प्राकृतिक जलचक्र अनवरत चलने वाला प्रकृति नियंत्रित जल प्रबन्ध है। यह प्रबन्ध हितग्राहियों के लिये निर्धारित मात्रा में जल उपलब्ध कराता है। प्राकृतिक जल प्रबन्ध के घटक (वाष्पीकरण, बरसात तथा हिमपात, नदी जल, मिट्टी की नमी, ओस और समुद्री पानी इत्यादि) अनन्त काल से अपने कर्तव्यों को पूरा कर रहे हैं। संक्षेप में, कुदरती जलचक्र, केवल पानी की यात्रा नहीं है। वह पृथ्वी पर जीवन को स्थायित्व प्रदान करने वाली नियामत है।

समुद्र के खारे पानी को, प्राकृतिक जलचक्र, अनुपयोगी नहीं मानता इसीलिये महाद्वीपों से बिलकुल अलग परिवेश में, समुद्र के खारे पानी में सान्द्रता, गहराई तथा तापमान की भिन्नता के बावजूद जीवन पनपता है। समुद्र की अन्य महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी है, पर्याप्त वर्षा के लिये भाप के रूप में कच्चा माल उपलब्ध कराना।

संक्षेप में, प्राकृतिक जलचक्र, धरती की सतह तथा स्थलमण्डल की उथली परतों की साफ-सफाई करता है। वह जीव-जन्तुओं तथा वनस्पतियों के लिये शुद्ध पानी उपलब्ध कराता है। वह नदी घाटी के भूगोल को परिमार्जित करता है। अपक्षीण पदार्थों को समुद्र में जमा करता है। गौरतलब है कि जलचक्र द्वारा सम्पादित अधिकांश क्रियाओं तथा उप-क्रियाओं पर केवल प्रकृति तथा उसकी शक्तियों का ही नियंत्रण है। पृथ्वी पर जीवन की निरन्तरता के लिये प्राकृतिक जलचक्र आवश्यक है।

परिशिष्ट चार

नदियों के सूखने के कारण

बीसवीं सदी के पहले कालखण्ड तक भारत की अधिकांश नदियाँ बारहमासी थीं। उस कालखण्ड में यदि कोई नदी सूखती थी तो वह सूखना अपवाद स्वरूप था।

पिछले 50-60 सालों से भारत की सभी नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह में गम्भीर कमी आ रही है। यह कमी भारतीय प्रायद्वीप की नदियों में अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट है। हिमालयीन नदियों में यह कमी अपेक्षाकृत कम स्पष्ट है। प्रवाह की कमी के कारण भारत की अनेक नदियाँ लगभग मौसमी बनकर रह गईं है।

बरसात के दिनों में नदी में मुख्यतः बरसाती पानी बहता है। वहीं, बरसात के बाद, नदी में प्रवाहित पानी मुख्यतः भूजल होता है। बरसात के बाद यदि नदी सूखती है तो उसका कारण भूजल के स्तर का नदी तल के नीचे उतर जाना और सहायक नदियों का योगदान खत्म हो जाना होता है। भूजल स्तर का नदी तल के नीचे उतरना अनेक कारणों से हो सकता है। उन्हें निम्न दो वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है -

1. प्राकृतिक कारणों से प्रवाह में कमी
2. कृत्रिम कारणों से प्रवाह में कमी

कारणों का संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार हैं-

प्रवाह में कमी के प्राकृतिक कारण

किसी भी नदी या नदी तंत्र में में प्रवाह की कमी का मुख्य प्राकृतिक कारण है प्राकृतिक तरीके से होने वाली आपूर्ति में कमी। यह कमी भूजल भण्डारों के खाली होने या उनके जल के नदी या झरनों में डिस्चार्ज होने के कारण हो सकती है। अगले पैराग्राफों में वस्तुस्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है-

सभी जानते हैं कि बरसात के मौसम में एक्वीफर रीचार्ज होते हैं और बरसात के बाद वे धीरे-धीरे डिस्चार्ज होते हैं। बरसात में एक्वीफर के रीचार्ज होने के कारण, भूजल स्तर ऊपर उठता है। जब भूजल स्तर नदी तल के ऊपर तक आ जाता है तो वह नदी में डिस्चार्ज होने लगता है। उसके डिस्चार्ज होने के कारण नदी प्रवाहित होने लगती है। उस डिस्चार्ज के नदी को मिलने तक नदी प्रवाहमान रहती है और उसके घटने से प्रवाह कम होने लगता है।

आम व्यक्ति भी जानता है कि मौसम, नदी के प्रवाह को प्रभावित करता है। बरसात के दिनों में नदी का प्रवाह अपने चरम पर होता है। बरसात के बाद नदी का प्रवाह धीरे-धीरे घटने लगता है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक है। वह मानसूनी रीचार्ज के समाप्त हो जाने और नदी को पानी उपलब्ध कराने वाले एक्वीफरों के धीरे-धीरे खाली होने के कारण होती है। उस पर कोई बाहरी दबाव नहीं होता। उस कमी के असर को अगले मानसून तक देखा जा सकता है। उसके असर से कुछ छोटी नदियों में प्रवाह समाप्त हो जाता है पर बरसात प्रारम्भ होते ही उनका प्रवाह पुनः लौट आता है। उक्त अवलोकन के आधार पर कहा जा सकता है कि प्रवाह की घट-बढ़ मौसमी प्रक्रिया है।

हर साल बरसात के मौसम में भूजल भण्डारों से डिस्चार्ज हुई मात्रा की भरपाई हो जाती है। इस कारण भूजल भण्डार पुनः भर जाता है। भूजल भण्डारों के पुनः भर जाने के कारण प्रवाह जिन्दा हो जाता है या बढ़ जाता है। बरसात के मौसम में इस प्रवाह को रन-ऑफ का अतिरिक्त लाभ मिलता है। यह अतिरिक्त लाभ प्रवाह के बढ़ने का मुख्य कारण है। यह वृद्धि मानसून सीजन तक ही सम्भव होती है। बरसात के बाद प्रवाह को एक्वीफर से हुए डिस्चार्ज का ही लाभ मिलता है। शुरू में डिस्चार्ज की दर अधिक होती है पर समय के साथ उसकी दर घटती है। इस कारण नदी के प्रवाह में तद्नुरूप कमी आती है। यह, नदी के प्रवाह की मौसम जनित घट-बढ़ है। यह हर साल घटित होने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया है।

प्रवाह की कमी को स्थानीय ढाल भी प्रभावित करता है। यदि ढाल अधिक है तो एक्वीफर तेजी से खाली होंगे। तेज गति से एक्वीफर का रिक्त होना, प्रवाह को कम करता है। इसके अलावा, सहायक नदियों का योगदान भी, प्रवाह की घट-बढ़ को प्रभावित करता है।

कछार की टोपोग्राफी के विषम होने के कारण भी छोटी नदियों का प्रवाह जल्दी खत्म हो जाता है। इसी प्रकार विपरीत गुणों वाले कठोर चट्टानी इलाके, अपर्याप्त रीचार्ज के कारण, नदियों के प्रवाह को अधिक समय तक योगदान नहीं दे पाते। इस कारण उन इलाकों में छोटी-छोटी नदियों का प्रवाह जल्दी सूख जाता हैं। प्रवाह घटाने में अपर्याप्त बरसात की भी अच्छी-खासी भूमिका होती है।

नदियों के प्रवाह की कमी का एक अन्य प्राकृतिक कारण भूजल भण्डारों की परतों की घटती मोटाई है। यह मिट्टी के कटाव से जुड़ा मामला है। मिट्टी के कटाव का प्रमुख कारण है जंगलों और कैचमेंट के वानस्पतिक आवरण में लगातार हो रही कमी। मिट्टी की परतों की मोटाई के कम होने के कारण उनकी भूजल संचय क्षमता घट रही है। भूजल संचय क्षमता घटने के कारण उनका प्रवाह को मिलने वाला कुदरती योगदान घट रहा है। कुदरती योगदान के घटने से नदी का प्रवाह कम हो रहा है और अवधि घट रही है।

नदियों के प्रवाह के कम होने का सम्भावित प्राकृतिक कारण ग्लोबल वार्मिंग है। उसके कारण बरसात के वितरण, मात्रा तथा वर्षा दिवसों में बदलाव हो रहा है। कुछ इलाकों में औसत वर्षा दिवस कम हो रहे हैं तो कहीं उनकी संख्या बढ़ रही है। यही स्थिति बरसात की मात्रा की है। औसत वर्षा दिवस कम होने के कारण वर्षा की तीव्रता में वृद्धि हो रही है और रन-ऑफ बढ़ रहा है। भूजल की प्राकृतिक बहाली के लिये कम समय मिल पा रहा है। इस कारण अनेक इलाकों में भूजल की कुदरती बहाली घट रही है। इस कारण प्रभावित इलाकों में अनेक छोटी-छोटी नदियों के प्रवाह और अवधि में कमी आ रही है। उसका असर बड़ी नदियों के प्रवाह पर परिलक्षित हो रहा है।

प्रवाह में कमी के कृत्रिम कारण

प्रवाह की कमी के प्रमुख कृत्रिम कारण निम्नानुसार हैं-

1. भूजल का अतिदोहन
2. नदी जल की सीधी पम्पिंग
3. बाँधों के कारण प्रवाह में व्यवधान

प्रमुख कृत्रिम कारण जिन्हें मानवीय हस्तक्षेप भी कहा जाता है, के कारण भी प्रवाह कम होता है। उन कारणों का संक्षिप्त विवरण आगे दिया गया है-

भूजल का अतिदोहन

नदियों के प्रवाह के कम होने का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कारण नदी कछार में हो रहा भूजल का अतिदोहन है। उसके प्रभाव से एक्वीफर समय के पहले रीतते हैं। उसके असर से नदियों का प्रवाह कम होने लगता है। जैसे ही भूजल स्तर नदी तल के नीचे उतरता है, नदी को पानी की आपूर्ति खत्म हो जाती है। नदी सूख जाती है। चित्र आठ में भूजल दोहन की तीन अलग-अलग परिस्थितियों के प्रभाव को दर्शाया गया है।

दोहन शून्य है। भूजल का प्रवाह नदी की ओर है। वह नदी को मिल रहा है। चूँकि नदी को कछार से पानी की प्राप्ति हो रही है अतः नदी प्रवाहमान है। इस स्थिति में भूजल स्तर की गिरावट केवल प्राकृतिक उत्सर्जन के कारण होती है।

दूसरे चित्र आठ (ब) में पम्पित नलकूप की कोन-आफ-डिप्रेशन (cone of dipression) को दिखाया गया है। यह चित्र, जल-विभाजक तल (नदी तथा नलकूप के बीच स्थित तल) को भी दर्शाता है। चूँकि जल-विभाजक तल नदी से सुरक्षित दूरी पर है इस कारण नलकूप की पम्पिंग (O1) का नदी के प्रवाह पर कोई पभाव नहीं पड़ रहा है। अर्थात पहली नजर में नदी का प्रवाह सुरक्षित है। इस स्थिति में भी भूजल दोहन के कारण क्षेत्रीय भूजल स्तर में गिरावट आती है। उस गिरावट के कारण सहायक नदियों का प्रवाह घट सकता है। कुछ छोटी नदियाँ सूख भी सकती हैं। संक्षेप में, भूजल दोहन के कारण कछार की नदियों का सकल प्रवाह कम होता है। यह स्थिति मुख्य नदी के सकल प्रवाह को कम करती है।

तीसरा चित्र आठ (स) दर्शाता है कि नदी के निकट नलकूप स्थित है। उसकी कोन आफ डिप्रेशन का दाहिना हिस्सा नदी के जल के सम्पर्क में है। नलकूप द्वारा पानी की पम्पिंग (O1) हो रही है। इस स्थिति में, पम्पित पानी की आंशिक पूर्ति, नदी के प्रवाह से होगी। यह पम्पन नदी के प्रवाह को सीधे-सीधे कम करेगा। अनेक नदी कछारों में, यह स्थिति बेहद आम है। वह स्थिति नदी-तंत्रों के प्रवाह को कम करने तथा छोटी नदियों के समय पूर्व सूखने का प्रमुख कारण है।

बरसात के बाद अनेक नदियों का प्रवाह समाप्त हो जाता है। प्रवाह के खत्म होने का अर्थ कछार सूख गया या भूजल खत्म हो गया, नहीं है। उसका अर्थ है कि भूजल स्तर नदी तल के नीचे उतर गया है। इस स्थिति में भी नदी तल के नीचे-नीचे भूजल का प्रवाह बना रहता है। यह स्थिति अस्थायी है। मानसून सीजन में स्थिति पलट जाती है और नदी फिर से बहने लगती है।

नदियों का प्रवाह (नदी तल के ऊपर और नीचे) प्राकृतिक जलचक्र का अंग है। ज्ञातव्य है कि नदी में बहने वाले पानी की अवधि की तुुलना में नदी तल के नीचे बहने वाले पानी की अवधि अधिक होती है।

नदी जल की सीधी पम्पिंग

देश की अनेक नदियों से, नदी के पानी की सीधी पम्पिंग की जाती है। कई बार उनसे नहरें निकाल कर या उनके पानी से नहरों को पानी दिया जाता है। इस कारण भी नदियों के प्रवाह में कमी आ जाती है। नदियों से उठाए पानी की मात्रा की गणना की जा सकती है और उसके असर को ज्ञात किया जा सकता है।

बाँधों के कारण प्रवाह में व्यवधान

बाँधों के निर्माण के कारण नदी के प्रवाह में व्यवधान आता है। जलाशय से मिलकर मूल प्रवाह की पहचान समाप्त हो जाती है और नदी जलाशय या बड़ी झील में बदल जाती है। बाँध के नीचे से नदी का नया प्रवाह प्रारम्भ होता है। यह व्यवस्था प्रवाह और बायोडायवर्सिटी को हानि पहुँचाती है। स्टाप डेमों द्वारा भी प्रवाह को समान प्रकार की हानि पहुँचाई जाती है।

परिशिष्ट पाँच

भारत की नदी घाटियाँ

नदी घाटी को दर्शाने के लिये चूँकि अनेक नामों का उपयोग किया जाता है इसलिये नदी घाटी से जुड़ी शब्दावली से परिचित होना आवश्यक है।

शब्दावली परिचय

एक नाली को प्रदर्शित करने के लिये ड्रेनेज शब्द का और एक से अधिक नालियों को प्रदर्शित करने के लिये ड्रेनेज-सिस्टम शब्द का उपयोग किया जाता है। ड्रेनेज-सिस्टम कुदरती या कृत्रिम हो सकता है पर इस मार्गदर्शिका में ड्रेनेज शब्द का उपयोग नदी तथा ड्रेनेज-सिस्टम शब्द का उपयोग नदी-सिस्टम या नदी परिवार को दर्शाने के लिये किया गया है। ड्रेनेज-बेसिन शब्द का उपयोग हाइड्रोलॉजिकल इकाई, जिसके अतिरिक्त जल (रन-ऑफ) की निकासी उभयनिष्ठ बिन्दु (common point) से होती है, के लिये किया गया है। इस मार्गदर्शिका में हाइड्रोलॉजिकल इकाई शब्द का अर्थ नदी कछार या वाटरशेड है। ड्रेनेज-बेसिन या वाटरशेड या नदी घाटी की विशेषता यह है कि उनके क्षेत्रफल की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। वह कुछ सेंटीमीटर से लेकर कुछ लाख वर्ग किलोमीटर हो सकती है। इसी प्रकार विभिन्न लोगों द्वारा नदियों के लिये विभिन्न नामों यथा सहायक नदी, क्रीक, स्ट्रीम, हेड स्ट्रीम, नदी, वाटरकोर्स इत्यादि का उपयोग किया जाता है।

सभी लोग जानते हैं कि बरसाती पानी किसी-न-किसी बड़ी नदी के माध्यम से अन्ततः समुद्र में पहुँचता है। बड़ी नदी, सम्पूर्ण नदी घाटी के पानी का नियमन करती है। वैज्ञानिकों ने जब पानी के नियमन के नजरिए से भारत की नदियों का अध्ययन किया है तो पता चला है कि उन्हें मात्र छः नदी परिवारों में बाँटा जा सकता है। इसके उलट, जब इन छः नदी परिवारों की सूखती नदियों का अवलोकन किया तो पता चला कि नदियों के सूखने की कहानी परिवार की सबसे छोटी नदी से प्रारम्भ होती है और धीरे-धीरे परिवार की क्रमशः बड़ी होती नदियों की ओर अग्रसर होती है।

भारतीय नदियों द्वारा 90 प्रतिशत से अधिक पानी बंगाल की खाड़ी में पहुँचाया जाता है। बाकी बचे पानी का कुछ हिस्सा अरब सागर में तो कुछ हिस्सा देश की सीमाओं के अन्दर ही झीलों तथा मरुस्थल में जज्ब होकर रह जाता है।

इस मैनुअल में भारत की नदी घाटियों/ड्रेनेज बेसिनों के बारे में संक्षिप्त एवं सांकेतिक जानकारी दी गई है। यह जानकारी पाठक को आदर्श नदी घाटी चुनने और प्रवाह बहाली के लिये उपयुक्त रणनीति तय करने में सहायक होगी। विदित हो कि जो हाइड्रोलॉजिकल इकाई नदियों के लिये प्रवाह जुटाती है वही इकाई प्रवाह बहाली का उद्देश्य भी पूरा कर सकती है। अतः हमें, सबसे पहले हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों को समझने का प्रयास करना चाहिए। उसके बाद, उन घटकों की पहचान करना चाहिए जो प्रवाह बहाली की प्रक्रिया को मदद देते हैं। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि अवैज्ञानिक कामों यथा नदी तल खोदने जैसे कामों से कुछ भी हासिल नहीं होता।

भारत के प्रमुख ड्रेनेज सिस्टम

भारत के प्रमुख ड्रेनेज सिस्टमों को उनके उद्गम के इलाकों की भौगोलिक स्थिति के आधार पर निम्न दो प्रमुख सिस्टमों में वर्गीकृत किया जा सकता हैं-

अ. हिमालयी ड्रेनेज सिस्टम/हिमालयीन नदी तंत्र

हिमालयी ड्रेनेज सिस्टम में सिंधु नदी का ड्रेनेज सिस्टम, ब्रह्मपुत्र नदी का ड्रेनेज सिस्टम और गंगा नदी का ड्रेनेज सिस्टम आते हैं। इन ड्रेनेज सिस्टमों को दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व मानसून से पानी की पूर्ति होती है। भारतीय प्रायद्वीप से निकलने वाली नदियों को छोड़कर हिमालयी नदियाँ मुख्यतः बारहमासी हैं। हिमालयी ड्रेनेज सिस्टम के पूर्वी भाग को यदाकदा चक्रवातों से भी पानी मिलता है।

ब. प्रायद्वीपीय ड्रेनेज सिस्टम/प्रायद्वीपीय नदी तंत्र

प्रायद्वीपीय ड्रेनेज सिस्टम में पूर्व दिशा में प्रवाहित गोदावरी नदी का ड्रेनेज सिस्टम, कृष्णा नदी का ड्रेनेज सिस्टम, कावेरी नदी का ड्रेनेज सिस्टम और महानदी का ड्रेनेज सिस्टम आते हैं। प्रायद्वीपीय ड्रेनेज सिस्टमों में पश्चिम की ओर प्रवाहित नर्मदा नदी का ड्रेनेज सिस्टम और ताप्ती नदी का ड्रेनेज सिस्टम भी सम्मिलित है। प्रायद्वीप की सभी नदियों को पानी की पूर्ति मुख्यतः दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है। उसकी मात्रा अपेक्षाकृत कम है। भारतीय प्रायद्वीप की नदियाँ बरसात पर आश्रित हैं। बड़ी नदियों को छोड़कर अधिकांश नदियाँ मौसमी हैं। नीचे दी गई तालिका एक में दोनों ड्रेनेज सिस्टमों/नदी तंत्रों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है।

तालिका एक - हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदी तंत्र

 

 

क्रमांक

चरित्र

हिमालयी नदी तंत्र

प्रायद्वीपीय नदी तंत्र

1.

उद्गम

हिमालय की बर्फ से ढँकी चोटियों तथा ग्लेशियरों से गंगा की कुछ सहायक नदियों का उद्गम मध्य प्रदेश, ओड़िशा, झारखण्ड, राजस्थान इत्यादि से।

प्रायद्वीपीय पठार तथा सेंट्रल उच्च भूमि

2.

प्रवाह का प्रकार

मुख्यतः बारहमासी। पानी का स्रोत वर्षा तथा बर्फ के पिघलने से। मात्रा अपेक्षाकृत बहुत अधिक।

मुख्यतः मौसमी। प्रवाह मानसून पर निर्भर। मात्रा अपेक्षाकृत कम

3.

नदी का चरित्र

नदी मार्ग की लम्बाई अधिक, पहाड़ी इलाकों में तेज बहाव, शीर्ष की दिशा में कटाव। मैदानी इलाकों में घुमावदार मार्ग तथा मार्ग में यदाकदा परिवर्तन

नदी मार्ग की लम्बाई कम। नदी मार्ग निश्चित। उनका घाटी से सम्बन्ध निश्चित।

4.

कैचमेंट रकबा

रकबा विशाल से अति विशाल

रकबा अपेक्षाकृत छोटा

5.

नदियों की आयु और भूमि कटाव

युवावस्था – आयु कम। नदी घाटी विकास तेज। भूमि कटाव की गति तेज।

आयु अधिक। घाटी का विकास लगभग पूरा। कटाव का आधार तल हासिल। कटाव गति कम।

भारत के जल संसाधन क्षेत्र

सेंट्रल वाटर एंड पावर कमीशन (central water and power commission) ने सबसे पहले सन 1949 में, भारत की नदी घाटियों के व्यवस्थित और वैज्ञानिक सीमांकन का प्रयास किया। बाद में, सन 2012 में जल संसाधन मंत्रालय ने भारत की नदी घाटियों का एटलस जारी किया। उक्त एटलस में दिये नक्शे, केन्द्रीय जल आयोग के नदी घाटियों के वर्गीकरण के अनुसार हैं। एटलस में प्रदर्शित ड्रेनेज नेटवर्क में देश की सभी प्रमुख नदियों में उनकी प्रमुख सहायक नदियों को दर्शाया गया है।

केन्द्रीय जल आयोग के प्रकाशन में जल संसाधन क्षेत्रों के प्रमुख बाँधों और हाइड्रोलॉजिकल ऑबजर्वेटरियों की स्थिति और उनसे सम्बन्धित जानकारी दी गई है। इसके अलावा बाढ़ों की पूर्व सूचना देने वाले केन्द्रों को भी अलग से नक्शों में दर्शाया गया है। केन्द्रीय जल आयोग ने अपनी जिम्मेदारियों को ध्यान में रखकर नदी घाटियों की परिकल्पना की है। वे नदी घाटियाँ बाँधों की प्लानिंग के लिये उपयुक्त हैं। चित्र नौ में केन्द्रीय जल आयोग द्वारा प्रकाशित भारत की नदी घाटी का नक्शा दिया गया है।

सन 2006 में सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड, भारत सरकार ने विश्व बैंक की मदद से संचालित हाइड्रोलॉजी परियोजना के अन्तर्गत जी.आई.एस. तकनीक का उपयोग कर 1: 2,50,000 पैमाने पर वाटरशेडों के नक्शे बनाए थे। इस परियोजना के अन्तर्गत हाइड्रोलॉजिकल इन्फॉरमेशन सिस्टम (hydrological information system) विकसित किया गया था। उसका उद्देश्य था वाटरशेड के आधार पर भूजल का आकलन।

आल इण्डिया सॅायल एंड लैंड यूज सर्वे (AISLUS) संगठन, कृषि और सहकारिता विभाग, कृषि मंत्रालय, भारत सरकार ने सन 1990 में वाटरशेड एटलस ऑफ इण्डिया (watershed atlas of india) (पैमाना 1: 10 लाख) प्रकाशित किया। सन 2012 में, एटलस को पुनरीक्षित किया गया और 1: 10 लाख पैमाने पर डिजिटाइजेशन किया गया। आल इण्डिया सॅायल एंड लैंड यूज सर्वे संगठन ने देश की नदियों को छह जल संसाधन क्षेत्रों (water resource region) में विभाजित किया है। चित्र दस में जल संसाधन क्षेत्रों और बेसिन (नदी कछारों) के उनके नाम दिये हैं-

1. जल संसाधन क्षेत्र 1 - सिंधु नदी का ड्रेनेज क्षेत्र।
2. जल संसाधन क्षेत्र 2 - गंगा नदी का ड्रेनेज क्षेत्र।
3. जल संसाधन क्षेत्र 3 - ब्रह्मपुत्र नदी का ड्रेनेज क्षेत्र।
4. जल संसाधन क्षेत्र 4 - सभी नदियों का ड्रनेज क्षेत्र (2 और 3 को छोड़कर) जिनका पानी बंगाल की खाड़ी को प्राप्त होता है।
5. जल संसाधन क्षेत्र 5 - सभी नदियों का ड्रनेज क्षेत्र (1 को छोड़कर) बाकी नदी तंत्र जिनका पानी अरब सागर को मिलता है।
6. जल संसाधन क्षेत्र 6 - पश्चिमी राजस्थान की अल्पकालिक नदियों का ड्रेनेज क्षेत्र।

एटलस में जल संसाधन क्षेत्रों को छोटी-छोटी इकाइयों में निम्नानुसार बाँटा गया है। इकाइयों का विवरण निम्नानुसार हैं-

1. जल संसाधन क्षेत्र - भारत में जल संसाधन क्षेत्रों की कुल संख्या छह है। भारत की सारी नदियाँ इनमें से किसी-न-किसी इकाई के अन्तर्गत आती हैं। यह भारत की सबसे बड़ी हाइड्रोलॉजिकल इकाई है।

2. बेसिन -यह जल संसाधन क्षेत्रों (क्रमांक 1) से छोटी इकाई है। इनकी कुल संख्या 37 है।

3. कैचमेंट - यह बेसिन (क्रमांक 2) से छोटी इकाई है। इनकी कुल संख्या 117 है।

4. उप-कैचमेंट -यह कैचमेंट (क्रमांक 3) से छोटी इकाई है। इनकी कुल संख्या 588 है।

5. वाटरशेड - यह उप-कैचमेंट (क्रमांक 4) से छोटी इकाई है। इनकी संख्या 3851 और औसत रकबा एक लाख हेक्टेयर है।

एटलस में छह जल संसाधन क्षेत्रों, 37 बेसिनों, 117 कैचमेंटों, 588 उप-कैचमेंटों और 3851 वाटरशेडों का विवरण दिया गया है। इन सभी इकाइयों की पहचान सुनिश्चित की गई है और प्रत्येक इकाई को व्यवस्थित संकेत पद्धति द्वारा दर्शाया गया है। इस व्यवस्था के कारण यह एटलस प्रवाह बहाली प्रयासों के लिये उपयुक्त हैं।

सीमांकन और पहचान (Delineation and codification)

हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों केे सीमांकन और उनकी विशिष्ट पहचान के लिये अंक-अक्षर कूट पद्धति (Alpha numeric symbolic codes) अपनाई गई है। इस पद्धति में विभिन्न हाइड्रोलॉजिकल इकाइयों को दर्शाने के लिये अंकों (1, 2, 3, 4 .......) और अंग्रेजी भाषा के केपिटल अक्षरों (A, B, C ………) का उपयोग किया गया है। प्रतीकात्मक संकेत निम्नानुसार हैं-

1. जल संसाधन क्षेत्र को दर्शाने के लिये अंक जैसे 1, 2, 3, 4.......................
2. बेसिन को दर्शाने के लिये अक्षर जैसे A, B, C ………
3. कैचमेंट को दर्शाने के लिये अंक जैसे 1, 2, 3,....................................
4. उप-कैचमेंट को दर्शाने के लिये अक्षर जैसे A, B, C ………
5. वाटरशेडों को दर्शाने के लिये अंक जैसे 1, 2, 3 ......................

इस पद्धति द्वारा प्रत्येक हाइड्रोलॉजिकल इकाई के लिये संकेत तय किया गया है। यह उसकी पहचान है।
उदाहरण के लिये 1A1A1, 2B2A3 इत्यादि इत्यादि।

वाटरशेड एटलस आफ इण्डिया की इकाइयों को अल्प प्रयास से सर्वे ऑफ इण्डिया की टोपोशीट पर अध्यारोपित (Superimpose) किया जा सकता है। उनमें अतिरिक्त विवरण जोड़े जा सकते हैं। उपर्युक्त खूबियों के कारण, प्रवाह बहाली हेतु यह पद्धति सर्वाधिक उपयुक्त पद्धति है।

परिशिष्ट छह
भूजल परिदृश्य

नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह की बहाली के लिये भूजल की भूमिका निर्णायक होती है इसलिये देश के मौजूदा भूजल परिदृश्य का ज्ञान आवश्यक है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर अगले पन्नों में मौजूदा भूजल परिदृश्य का संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है।

केन्द्रीय भूजल परिषद द्वारा भूजल की वस्तुस्थिति पर हर साल वार्षिक पत्रिका प्रकाशित की जाती है। इस पत्रिका में भूजल का सालाना पुनर्भरण, भूजल के दोहन का प्रतिशत, खेती, पेयजल और उद्योगों में प्रयुक्त भूजल की मौजूदा पृथक-पृथक मात्रा तथा भविष्य के आवंटनों को दर्शाया जाता है।

केन्द्रीय भूजल परिषद ने नदियों के प्रवाह हेतु सकल भूजल रीचार्ज की पाँच प्रतिशत मात्रा प्रावधानित की है। नीचे दी तालिका एक में भूजल की वस्तुस्थिति वर्णित है।

तालिका एक - राज्यों में भूजल की वस्तुस्थिति (बिलियन क्यूबिक मीटर)

 

 

 

 

सरल क्र.

राज्य

उपयोग में लाने योग्य भूजल भंडार

दोहन की स्टेज प्रतिशत में

सरल क्रमांक

राज्य

उपयोग में लाने योग्य भूजल भंडार

दोहन की स्टेज प्रतिशत में

1.

आन्ध्र प्रदेश

20.39

44

16.

महाराष्ट्र

33.19

54

2.

अरुणाचल

4.433

0.23

17.

मणिपुर

0.474

1.01

3.

असम

32.11

16

18.

मेघालय

3.31

0.4

4.

बिहार

31.31

45

19.

मिजोरम

0.03942

2.9

5.

छत्तीसगढ़

12.80

37

20.

नागालैंड

1.94

2.0

6.

दिल्ली

0.34

127

21.

ओड़िशा

17.78

30

7.

गोवा

0.24

37

22.

पंजाब

25.91

149

8.

गुजरात

20.85

68

23.

राजस्थान

12.51

140

9.

हरियाणा

11.36

135

24.

सिक्किम

.....

......

10.

हिमाचल प्रदेश

0.56

51

25.

तमिलनाडु

2065

77

11.

जम्मू कश्मीर

5.25

24

26.

तेलंगाना

14.74

58

12.

झारखण्ड

6.55

23

27.

त्रिपुरा

2.471

7.3

13.

कर्नाटक

17.00

66

28.

उत्तर प्रदेश

76.34

74

14.

केरल

6.27

47

29.

उत्तराखण्ड

2.00

50

15.

मध्य प्रदेश

35.98

57

30.

पश्चिम बंगाल

29.33

45

 

भारत

446.87

62.00

केन्द्र शासित इकाइयाँ

0.73

 

29

स्रोत - केन्द्रीय भूजल परिषद की 2016-17 की वार्षिक भूजल रिपोर्ट (पेज 40-42)

भूजल का आकलन 6584 इकाइयों के लिये हुआ है। इनमें से 4520 इकाइयाँ सुरक्षित श्रेणी में, 681 इकाइयाँ सेमी-क्रिटिकल श्रेणी में, 253 इकाइयाँ क्रिटिकल श्रेणी में, 1034 इकाइयाँ अतिदोहित श्रेणी में और 96 इकाइयाँ खारे पानी की श्रेणी में आती हैं। क्रिटिकल श्रेणी (91 प्रतिशत से 100 प्रतिशत) और अतिदोहित श्रेणी (100 प्रतिशत से अधिक) की इकाइयों में होने वाले भूजल के दोहन को असुरक्षित तथा सुरक्षित श्रेणी की इकाइयों में होने वाले भूजल के दोहन को सुरक्षित माना जाता है।

हरित क्रान्ति के पहले तक, धरती में रिसा सारा पानी प्राकृतिक डिस्चार्ज के लिये उपलब्ध था। जाहिर है, उस उपलब्धता के कारण अधिकांश नदियाँ बारहमासी थीं। उनके प्रवाह पर बरसात या रीचार्ज की मात्रा की थोड़ी-बहुत कमी का खास असर नहीं पड़ता था।

बहुत से लोगों का मानना है कि भारतीय प्रायद्वीप के भूजल भण्डारों की तुलना में गंगा, ब्रम्हपुत्र और सिन्धु के कछारी भूजल भण्डार काफी समृद्ध हैं। लोग यह भी मानते हैं कि उन पर भूजल के दोहन का कुप्रभाव नहीं पड़ता। मौजूदा परिदृश्य इंगित करता है कि यदि उन कछारों में भूजल के दोहन का नियमन नहीं किया गया तो उनमें भी गैर-मानसूनी प्रवाह की स्थिति खराब हो जाएगी।

केन्द्रीय भूजल परिषद ने नदियों, कुओं तथा नलकूपों के सूखने और अनुपयोगी होने की रोशनी में भूजल के दोहन की अधिकतम सीमा को निर्धारित नहीं किया है। उन्होंने भूजल दोहन के आधार पर केवल श्रेणियाँ ही तय की हैं। उनके संकेत तय नहीं किये हैं। इसके अतिरिक्त, देश में, भूजल के अतिदोहन को रोकने के लिये प्रभावी व्यवस्था और जागरुकता का अभाव है। भूजल के अतिदोहन के कारण, हर कछार में भूजल का स्तर घट रहा है। यह नदियों के अविरल प्रवाह पर धीरे-धीरे बढ़ता गम्भीर खतरा है।

केन्द्रीय जल आयोग की पाँचवीं लघु सिंचाई रिपोर्ट दर्शाती है कि सन 2006-07 से 2013-14 के बीच गहरे नलकूपों की संख्या में लगभग 11 लाख की वृद्धि हुई है। पहले यह संख्या 14 लाख 60 हजार थी जो बढ़कर 26 लाख हो गई है। उनसे लगभग एक करोड़ 26.8 लाख हेक्टेयर में सिंचाई होती है। वे पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, आन्ध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक और महाराष्ट्र में किसानों द्वारा खोदे गए हैं। उल्लेखनीय है कि उनमें से 40 प्रतिशत नलकूपों की गहराई 70 से 90 मीटर और 26 प्रतिशत नलकूपों की गहराई 90 से 110 मीटर है। इन गहरे नलकूपों ने उपरोक्त राज्यों की नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह को कम करने में निर्णायक भूमिका का निर्वाह किया है।

केन्द्रीय भूजल परिषद ने सन 2013 में भारत में भूजल के कृत्रिम पुनर्भरण पर मास्टर प्लान जारी किया था। इसमें कहा गया है कि देश के 9,41,541 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही कृत्रिम भूजल रीचार्ज की आवश्यकता है। केन्द्रीय भूजल परिषद के अनुसार इस इलाके को कृत्रिम भूजल रीचार्ज के लिये 85,565 मिलियन क्यूबिक मीटर वर्षाजल की आवश्यकता है। गौरतलब है कि देश के जिन इलाकों में भूजल का कुदरती पुनर्भरण सन्तोषजनक या पूरा है उन इलाकों की नदियाँ भी गैर-मानसूनी प्रवाह की कमी से जूझ रही हैं। उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय भूजल परिषद द्वारा जारी मास्टर प्लान का लक्ष्य भूजल रीचार्ज था। उसका लक्ष्य प्रवाह बहाली नहीं था।

देश में, नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह की बहाली हेतु मैन्युअल का अभाव है। इस काम को करने के लिये सरकारी नोडल विभाग या अर्ध-सरकारी एजेंसी भी निर्धारित नहीं है। अकादमिक या सामाजिक संगठन भी इस हेतु अधिकृत नहीं हैं। इस कारण, देश में नदियों के प्रवाह को बहाल करने या उन्हें सूखने से बचाने का काम मुख्य धारा में नहीं है।

जल उपलब्धता

भारत को बरसात के माध्यम से प्रतिवर्ष लगभग 4000 लाख हेक्टेयर मीटर जल प्राप्त होता है। उसमें से लगभग 2037 लाख हेक्टेयर मीटर पानी भाप बनकर उड़ता है तथा वनस्पतियों, मिट्टी और एक्वीफरों द्वारा उपयोग में लिया जाता है। भारतीय नदियों में रन-ऑफ के माध्यम से हर साल लगभग 1963 लाख हेक्टेयर मीटर पानी बहता है। अनुमान है कि उसमें से बाँधों में अधिकतम 69 लाख हेक्टेयर मीटर पानी ही जमा किया जा सकता है। इसके बाद बचा 1263 लाख हेक्टेयर मीटर पानी प्रवाह बहाली और नदियों की कुदरती जिम्मेदारी को पूरा करने के लिये पर्याप्त है।

 

 

 

 

 

 

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Submitted by GuestOvash (not verified) on Fri, 12/21/2018 - 11:44

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Submitted by GuestDaymn (not verified) on Sat, 12/22/2018 - 18:48

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Submitted by GuestSwava (not verified) on Mon, 12/24/2018 - 12:17

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.कृष्ण गोपाल व्यास जन्म – 1 मार्च 1940 होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)। शिक्षा – एम.एससी.

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