अनिल राणा पानी-पर्यावरण का अगुआ (स्मृति पत्र)

Submitted by admin on Sat, 09/12/2009 - 19:28
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के के राय, अधिवक्ता इलाहाबाद हाइकोर्ट / One man's Journey (Anil Rana)

मुझे पहली मुलाकात में ही दो तीन चीजें समझ में आयी। एक तो यह कि राणा साहब दोस्ती में पहले हाथ नहीं बढ़ाते और अगर दिल-दिमाग मिल गया तो साथ कभी नहीं छोड़ते। दूसरे, खामोश सा दिखने वाला यह शख्स दरअसल गुमसुम नहीं रहता है। जमीन पर पैर जमाकर वे आकाश पर एक ऐसा इन्द्रधनुष खींचना चाहते थे, जिसे दुनिया देखे और उन्होंने इसे सच कर के दिखा दिया।

दस साल से भी कम समय मे जनहित फाउंडेशन और अनिल राणा का नाम प्रदेश की सीमा से लाँघ कर देश के चारों तरफ फैला और फिर देश की सरहद को पार कर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जगमगाने लगा उनको जानने वाले जानते है कि इसको पाने के लिए कितनी कठोर साधना की थी उन्होंने। सब कुछ दांव पर लगा दिया। नौकरी छोड़ी और सड़क पर आ गये। कभी इतने पैसे भी नहीं रहते थे कि आटो कर लें। अखबारों में लेख लिखे और मनीआर्डर का इन्ताजार न कर उसके आफिस पहुंच गए पारिश्रमिक लेने। फोटो स्टेट की दुकान की बेंच को आफिस की तरह इस्तेमाल किया और जब कुछ नहीं दिखा तो पत्नी के गहने सुनार की दुकान पर बेच डाले। पत्नी को भी पूरा विश्वास था कि राणा साहब के सपने को हकीकत में बदलनें के लिए सब कुछ न्यौछावर किया जा सकता है।

सचमुच राणा साहब भगीरथ की तरह लक्ष्य की ओर झुकते थे। जरा सोचिए, हिण्डन नदी सहारनपुर के पुर का टांका गांव से निकलकर 6 जिलों से होती हुई नोएडा के दक्षिण में यमुना में गिरने के पहले 260 किमी. का सफर तय करती है। रास्ते में कितनी और काली नदी अपने जहरीले जल के साथ उसमें विलीन होती है। रास्ते भर में 32 पेपर मिल, कुछ 70 फैक्टरियां, बेखौफ अपना अपविष्ट इस पवित्र नदी में डाल रही हैं। इस दुर्गम रास्तों पर राणा साहब और जनहित की टीम महीनों चलते रहें हर गांव कस्बे शहर की पड़ताल करते हुए। इलाहाबाद जब भी आते, होटल में कभी नहीं रूके। प्रेम जी उन्हें स्टेशन पर रिसीव करते और फिर सीधे हमारे घर पर ऐसे ही एक दिन वे बताने लगे कि सबसे पहले सी.एस.ई. की सुनीता नारायण ने उन्हें पहला प्रोजेक्ट दिया। छोटा था लेकिन दिन रात लगाकर उन्होंने काम किया और फिर आगे का रास्ता बनता चला गया। उनकी और उनके साथियों की तपस्या मुझे तब समझ में आने लगी जब उनके द्वारा उठाए गये सवालों पर हमने इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिकाएं करनी शुरू की। मुझे याद है कि हिण्डन नदी को प्रदूषण मुक्त करने के सवाल पर दाखिल जनहित याचिका में जब चीफ जस्टिस ए.एन. राय ने हिण्डन पर छपी किताब कि पन्ने पलटने शुरू किए तो भरी कोर्ट में अपने को यह कहने से रोक नहीं पाए कि जिन लोगों ने यह काम किया है, वे सम्मान के योग्य हैं।

सचमुच राणा साहब भगीरथ की तरह लक्ष्य की ओर झुकते थे। जरा सोचिए, हिण्डन नदी सहारनपुर के पुर का टांका गांव से निकलकर 6 जिलों से होती हुई नोएडा के दक्षिण में यमुना में गिरने के पहले 260 किमी. का सफर तय करती है। रास्ते में कितनी और काली नदी अपने जहरीले जल के साथ उसमें विलीन होती है। रास्ते भर में 32 पेपर मिल, कुछ 70 फैक्टरियां, बेखौफ अपना अपविष्ट इस पवित्र नदी में डाल रही हैं। इस दुर्गम रास्तों पर राणा साहब और जनहित की टीम महीनों चलते रहें हर गांव कस्बे शहर की पड़ताल करते हुए।

हिण्डन नदी से किताब के प्रस्तावना में राणा साहब ने जिस तरह से हीथर लेविस, रमन त्यागी और साथियों को याद किया है, वह उनकी महानता का जीवंत दस्तावेज है। यह साबित करता है कि किसी ख्याति को सिर्फ अपनी झोली में डालने में उनका विश्वास नहीं रहा। वे अपनी टीम को भी आगे बढ़ाते रहे।

मेरठ में शिक्षक वीर सिंह, फाउंडेशन की सुरूचि, सोनाक्षी, संजीव जिस तरह से राणा जी को याद करते हैं, तो लगता है कि किसी व्यक्ति के न रहने पर जो मूल्यांकन होता है सत्य होता है। काली नदी के किनारे जन जागरण पदयात्रा करने के बाद आदरणीय सोमपाल शास्त्री जी ने मेरठ के एक सभा में कहा था कि मैं अपने माटी के ऋण से उऋण हो सकूं । शायद यही भाव अनिल जी में रहा होगा, जब आबूलेन में सड़क विस्तार के नाम पर हरे पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलने की नौबत आयी तो तुरंत इलाहाबाद आये और हाईकोर्ट से स्टे ले गये। जयभीमनगर की दलित-गरीब बस्ती के लोगों का मस्तक अफसरों के चौखट पर सर पटक-पटक कर लहुलूहान हो चुका था। मेडिकल कालेज की गंदगी ने उनके पीने के पानी में विष घोल दिया था। नल से पानी भरने के सवाल पर हत्याएं हो चुकी थी। प्रदूषण ने कई बशिन्दों को मौत की नींद सुला दिया था। जब राणा जी को प्रशासन और अधिकारियों की निष्क्रियता तथा गरीब लोगों की मुसीबत का पता चला तो उन्होंने उसे चुनौती के रूप में लिया, जनहित याचिका की, मेरठ लखनऊ और दिल्ली में दौड़ लगाते रहे और आज वहां हालात बदल रहे हैं। पीने के शुद्ध पानी की व्यवस्था हो रही है।

राणा साहब और जनहित फाउंडेशन का दौराला का प्रयोग भी उत्तर प्रदेश में अपने ढंग का अनूठा था। उन्होंने अपने कर्म से साबित कर दिया कि नदियों और जल-स्त्रोतों को बचाने की लड़ाई में निजी लोगों और बाहरी दबावों के आगे झुक नहीं सकते। उनके पहल कदमी पर जब दौराला उद्योग चलाने वालों ने खुद ही प्रस्ताव किया कि वे प्रदूषण से बर्बाद पर्यावरण को बचाने वालों में खुद का योगदान करना चाहते हैं तो राणा जी ने उसे स्वीकार कर लिया और फिर धीरे-धीरे प्रदूषण फैलाने वालों को उन्होंने प्रदूषण रोकने के काम में जमा किया। जिन लोगों ने दौराला की दूसरी रिपोर्ट देखी होगी, उन्हें आभास होगा कि कैसे जनहित फाउंडेशन तस्वीर और तकदीर दोनों बदलने में सक्षम है।

रेन वाटर हार्वेस्टिंग के जरिये जल एक जन जागृति फैला दी थी। एक अन्वेशक व मनीषी की तरह उन्होंने ऐतिहासिक तालाबों, तड़ागों एवम् जल स्त्रोतों की खोज में जुटे थे।

जब किसान जीएम सीड्स और बैंक कर्जों की चपेट में आकर आत्महत्या करने लगे तो राणा साहब ने ऑरगेनिक फार्मिंग का बिगुल बजाकर पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों में यह संदेश दिया कि विश्व बैंक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मकड़जाल को तोड़कर हमारे किसान अपने संसाधनों से इस देश के करोड़ो लोगों का पेट भर सकते है और अनाज का निर्यात कर सकते हैं।

हमें, बस इसका संतोष और गर्व है कि अनीता राणा जी ने उनके अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए पूरी ऊर्जा और संकल्प के साथ जनहित फाउंडेशन का परचम अपने हाथ में ले लिया है। मेरे जैसे हजारों शुभेच्छाओं, समर्थकों की शुभकामनाएं उनके साथ हैं। मै राणा जी से कभी मजाक में कहता था कि जब मै जनहित याचिका करना छोड़ दूंगा तो फिर आप का भी साथ छूट जाएगा। मुझे क्या पता कि राणा जी इसके पहले ही मेरे से हाथ छुड़ा कर चल देगें। कभी एकांत में बैठता हूं और नीले आकाश में टिमटिमाते, लाखों तारों के बीच उज्ज्वल ध्रुव तारे पर दृष्टि पड़ती है तो मन में एक अनुगूंज सूनाई पड़ती है कि उस चमकते ध्रुव तारे में से अनिल जी हमें देख रहे हैं।

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