उकाई: हम भी बह गए थे

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रमेश देसाई / गांधी मार्ग
न भाखड़ा बांध की तरह प्रसिद्ध, न नर्मदा बांध की तरह बदनाम-उकाई बांध तो गुमनामी में बना था। न किसी को उसको बनाने का समय याद, न यह कि उसने बनने के बाद कितने परिवारों, गांवों को मिटाया था। उकाई बांध कोई बहुत बड़ा नहीं था पर सन् 2006 में वह उसी शहर और उद्योग-नगरी को ले डुबा, जिसके कल्याण के लिए उसे सन् 1964 में बहुत उत्साह से बनाया गया था। लेकिन तब भी एक सज्जन अपनी पुरानी मोटर साइकिल पर इस पूरे इलाके में घूम रहे थे। उस दौर में तो बांधों को नया मंदिर माना जा रहा था। शुरू में तो वे भी इन नए मंदिरों के आगे नतमस्तक ही थे। पर धीरे-धीरे उन्होंने जो देखा और फिर लोगों के बीच उतर कर जो कुछ किया, उसकी उन्हें सबसे भारी कीमत भी चुकानी पड़ी- उन्हें एक सूनी सड़क पर एक ट्रक ने रौंद कर मार डाला था। उनका काम भी कभी सामने नहीं आया पर वह काम खाद बना और फिर उसी खाद से ऐसे विचारों को पोषण मिला। उनका नाम था श्री रमेश देसाई। उकाई नवनिर्माण समिति का भुला दिया गया यह किस्सा रमेश भाई ने अपनी हत्या से कुछ ही पहले सन् 1989 में लिखा था।  ताप्ती सतपुड़ा पर्वतमाला के मुलताई (मुलताई, ताई, मां का मूल स्थान) से प्रकट होकर मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में बहती हुई सूरत के निकट हजीरा नामक स्थान पर अरब सागर में विलीन हो जाती है। मुलताई और हजीरा के बीच यह लगभग एक हजार मील तक बहती है और अपने दोनों किनारों को उपजाउ बनाती हुई आगे बढ़ती है। अपने किनारों पर बसे गांवों और कस्बों को खुशहाल, सुखी और सम्पन्न बनाती रहती है।

ताप्ती के दोनों किनारे घने जंगलों से ढंके रहे हैं। इन जंगलों में बढ़िया सागवान के अलावा इमारती लकड़ी वाले दूसरे पेड़ भी बहुतायत से पाए जाते हैं। कोयले और चूने के बड़े-बड़े भंडारों के अलावा यहां बाघ, चीते और हिरण भी बड़ी संख्या में रहते हैं। नाना प्रकार के पक्षी हैं। तरह-तरह की औषधियां और वनस्पतियां भी हैं। ताप्ती के ये जंगल भगवान के बनाए बगीचे ही हैं। प्रकृति ने इन जंगलों को सदियों से पाला-पोसा है। अंग्रेजों से पहले तक यहां के राजा-महराजाओं ने भी अपने जमाने में इन जंगलों को बड़े प्यार और जतन से संभाला और संवारा था। इन घने जंगलों के कारण ताप्ती जिन तीन प्रदेशों की सीमा में बहती रही है, उन प्रदेशों में पर्यावरण की क्षति के कारण प्रदूषण का कोई प्रश्न कभी खड़ा हुआ ही नहीं था। बरसात के मौसम में भरपूर पानी बरसता रहा। बरसा हुआ पानी जंगलों की मदद से धरती के पेट में इकट्ठा होता रहा । भूजल की कोई समस्या कभी खड़ी ही नहीं हुई। ताप्ती के क्षेत्र में अवर्षा की और सूखे की स्थिति पहले कभी बनती ही नहीं थी। इस क्षेत्र के नदी-नाले बारह महिने अपनी कल-कल, छल-छल ध्वनि के साथ लगातार बहते रहते थे। कभी सुना और जाना नहीं था कि ताप्ती की धारा कहां टूटी है और उसका प्रवाह कहां रूका है।

ताप्ती के किनारों वाले तीनों प्रदेशों में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में सिर्फ लंगोटी पहनकर रहने वाले मेहनती, सीधे-सादे और भोले-भाले वनवासी समाज की बस्ती दूर-दूर तक फैली हुई है। इनकी अपनी जीवन-पद्धति बहुत सीधी-सादी और कम खर्च वाली है। इनका अपना जीवन ऋषि-मुनियों की तरह संस्कारी और अपरिग्रही रहा है। इनका बाहुबल, इनका आत्म-संतोष और इनकी आत्म-निर्भरता बहुत ही विरल और अद्भुत रही है। पहाड़ों और जंगलों में रहते हुए, खेती, किसानी और कड़ी मजदूरी के सहारे इन लोगों ने अपने को और दूसरों को भी समृद्ध बनाया है। फिर भी इन्होंने कभी किसी का अनादर नहीं किया। कभी किसी से भीख नहीं मांगी। इन्होंने तरह-तरह के अत्याचार सहे, पर अपनी तरफ से कभी किसी को सताया नहीं, दबाया नहीं। पसीना बहाकर इन्होंने पहाड़ों और जंगलों के बीच अपनी बस्तियां खड़ी कीं। दूर-दूर के जंगलों में रहने के कारण प्रकृति के साथ इनका बहुत ही गहरा, घना और निकट का संबंध बना रहा। इन्होंने प्रकृति के साथ घुल मिलकर जीना सीख लिया। यही कारण है कि गांवों और शहरों में रहने वाले लोग इनको बहुत ही कम जानते और पहचानते हैं।

उकाई बांध बनाने वालों का दावा था कि इस बांध के जरिए वे दक्षिण गुजरात की दस लाख एकड़ जमीन को मौसमी पानी देंगे और एक लाख एकड़ जमीन को बारहों महीनें सिंचाई सुविधा पहुंचाएगे। अकाल और बाढ़ आना बंद हो जाएगा। वे पूरे इलाके को 300 मेगावाट बिजली बराबर देते रहेंगे। टनों मछली पैदा करके वनवासियों के लिए रोजी-रोटी की व्यवस्था करेंगे। गुजरात के बड़े-बड़े सरकारी कारखाने मुफ्त में पानी पाकरअपनी मशीनों को ठंढा रख सकेंगे। इससे इन कारखानों में बनने वाला माल पहले से सस्ता हो जाएगा। मशीनों की उमर बढ़ेगी सो अलग! कारखानों का मुनाफा बढ़ेगा। इन लोगों के नाम पर, इनके विकास के लिए अब तक अनगिनत योजनाएं बनीं। करोड़ों नहीं, अरबों रूपए खर्च किए गए। लेकिन ये तो जैसे थे, वैसे ही बने रहे। इनको सदियों तक शिक्षा-दिक्षा से दूर रखा गया। अपने अनुभवों के सहारे जो ज्ञान इनको मिलता रहा, उसी के उजेले में ये अपना जीवन जीते रहे। इनसे जिन्होंने, जो भी मांगा, सो इन्होंने भरपूर दिया। वोट मांगे, तो खुले हाथों वोट भी दिए। इसके कारण इनके बारे में तरह-तरह की दन्तकथाएं प्रचलित हो गई हैं। समाज ने इनको अनपढ़, अनाड़ी अज्ञानी, गरीब, जंगली आदि अनेक उपाधियां दी। इनके अपमान की और इनकी अवहेलना की तो कोई हद नहीं रही। इनकी गिनती मनुष्यों में नहीं, पशुओं में होने लगी। देश की स्वतंत्रता के इन चालीस-इक्तालीस सालों में इनके कष्टों, दुखों, अभावों, अपमानों, मुसीबतों और संकटों की कोई सीमा नहीं रह गई है। आज इनके सामने अपने अस्तित्व को लेकर एक भारी चुनौती खड़ी हो गई है। देश भर में जगह-जगह नदियों पर बनने वाले बांधों ने इनको बुरी तरह विचलित कर दिया है। जो समाज कभी किसी के सामने हारा नहीं, बांधों ने उसको भीतर और बाहर से तोड़कर रख दिया है।

गुजरात में सूरत शहर के पास बना उकाई-बांध ऐसी ही एक करूण, भयंकर, विनाशक और विषैली सच्चाई का नमूना बनकर हमारे सामने खड़ा हो गया है।

कहा जाता है कि जिन लोगों ने अपने इस देश की आजादी के आंदोलनों में त्याग और बलिदान किया, उकाई-बांध उन्हीं लोगों के लिए बनाया गया है। ये वे लोग हैं, जिनके हर खेत में कुएं हैं, या कुएं खोदे जा सकते हैं। इन्हें औसतन 15 से 20 फुट की गहराई पर भरपूर मात्रा में भूजल हमेशा ही सुलभ रहा है। ऐसे हर गांव में एक से अधिक तालाब मौजूद हैं। समुद्र की निकटता के कारण यहां हर साल खूब बरसात होती है। हरे-भरे खेत-खलिहान यहां सदा सुलभ रहे हैं। मेहनती, जरूरतमंद और गरीब मजदूरों की सस्ती मजदूरी इन किसानों की अपनी मिल्कियत बनी रही है। इसी समाज के एक हिस्से ने अपने साहस और पुरूषार्थ से विदेशों में अरबों-खरबों की कमाई की है। इतना सब कुछ होते हुए भी इन्हीं लोगों ने नए विकास के नाम पर अपने ही स्वजनों की बलि चढ़ाना, उनको उखाड़कर फेंकना, उनको दर-दर का भिखारी बनाना, स्वाभाविक और जरूरी मान लिया। स्वजनों के समर्पण का मूल्य कुछ पैसों में या मुंह देखी सहानुभूति में चुका कर ये लोग मन-ही-मन संतोष और गर्व का अनुभव करते हैं। इस मूल्य के पूरे भूगतान में भी ये कंजूसी, शोषण, भ्रष्टाचार और षडयंत्र का सहारा लेने में चूके नहीं हैं।

ये लोग बड़े आराम के साथ, खुशी-खुशी, अमन-चैन का अनुभव करते हुए अपने इन स्वजनों को अपनी ही आंखों के सामने बरबाद होते हुए देख सकते हैं। ये इनकी यातनाओं की उपेक्षा भी सहज भाव से करते रहते हैं। ये मानते हैं कि दीन दुखी लोगों का तो भाग्य भी गरीब ही होना चाहिए।

उकाई बांध बनाने वालों का दावा था कि इस बांध के जरिए वे दक्षिण गुजरात की दस लाख एकड़ जमीन को मौसमी पानी देंगे और एक लाख एकड़ जमीन को बारहों महीनें सिंचाई सुविधा पहुंचाएगे। अकाल और बाढ़ आना बंद हो जाएगा। वे पूरे इलाके को 300 मेगावाट बिजली बराबर देते रहेंगे। टनों मछली पैदा करके वनवासियों के लिए रोजी-रोटी की व्यवस्था करेंगे। गुजरात के बड़े-बड़े सरकारी कारखाने मुफ्त में पानी पाकरअपनी मशीनों को ठंढा रख सकेंगे। इससे इन कारखानों में बनने वाला माल पहले से सस्ता हो जाएगा। मशीनों की उमर बढ़ेगी सो अलग! कारखानों का मुनाफा बढ़ेगा। पानी और बिजली से सरकार की आमदनी में बढ़ोतरी होगी। खेती की पैदावार, खासकर अनाज की पैदावार बढ़ जाएगी। किसान तीन-तीन फसलें ले सकेंगे। इससे देश को अनाज के मामले में स्वावलंबी बनाने में मदद मिलेगी। खेतीहर मजदूर बारहों महीने रोजी-रोटी पाकर खुशहाल बन सकेंगे।

जो उकाई बांध पहले से लगे कारखानों को इतनी सारी सुविधा देगा तो फिर उसका असर और नए कारखानों को खोलने पर भी पड़ेगा। इसके कारण रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। मजदूरों को पूरा काम मिलने लगेगा। पढ़े-लिखे युवकों और युवतियों को नौकरियां मिलने लगेगी। गुजरात के कुशल और निष्णात इंजीनियरों को अच्छे वेतनों के साथ उंचे-उंचे पद मिलेंगे और उनका मान-सम्मान भी बढ़ेगा। इन इंजीनियरों का साहस और इनकी कार्यक्षमता देश के और विशेषकर गुजरात के काम आने लगेगी। इतनी बड़ी योजना को साकार करके गुजरात अपनी प्रगति की सौ सीढ़ियां उपर चढ़ चुकेगा।

उकाई बांध के लाभों की सूची तो बहुत ही लंबी है। सरोवर के कारण यातायात की सुविधाएं बढ़ेगी। मछलियों की पैदावार बढ़ेगी और नए जंगल लगाए जा सकेंगे। भूजल की सतह उपर उठेगी। इससे गुजरात के पहाड़ी और पथरीले इलाके में, जहां आज पीने के पानी वाले कुएं नहीं हैं। वहां भी भरपूर पानी वाले कुएं हो सकेंगे। खेतों को भी पानी मिलता रहेगा। हरियाली बढ़ेगी। किसान मालामाल होंगे।

सपने की संपद जैसे इन क्षणभंगुर और असंभव-से उद्देश्यों को लेकर बिना सोचे-समझे कुल 32 करोड़ की लागत से बनने वाला यह उकाई बांध अंत में जब पूरा हुआ तो खर्चा बैठा 300 करोड़! किसी ने नहीं पूछा कि खर्च दस गुना ज्यादा कैसे हो गया। सारे एशिया में एक मिसाल-सा बना 13 हजार फुट लंबा, 355 फुट उंचा और 800 से 1100 फुट की चौड़ई वाला उकाई बांध। इस बांध को बनाने में विदेशों से आयात की गई तकनीक का उपयोग हुआ है। यहां एक पॉवर हाउस भी बनाया गया है। इस पावर हाउस में 75 मैगावाट बिजली पैदा करने की ताकत वाले चार जनरेटर लगाए गए हैं जो हमारे भेल कारखाने की उपज हैं। यह बात बाद की है कि ये जनरेटर बांध के लिए एक सिर-दर्द बन गए हैं।

सपने की संपद जैसे इन क्षणभंगुर और असंभव-से उद्देश्यों को लेकर बिना सोचे-समझे कुल 32 करोड़ की लागत से बनने वाला यह उकाई बांध अंत में जब पूरा हुआ तो खर्चा बैठा 300 करोड़! किसी ने नहीं पूछा कि खर्च दस गुना ज्यादा कैसे हो गया। बांध के निर्माण के साथ ही बांध क्षेत्र में विस्थापित हुए लोगों के पुनर्वास का काम भी शुरू किया गया। कानून-कायदे के हिसाब से लोगों के नाम नोटिस जारी किए गए। कहा जाता है कि हर गांव के सार्वजनिक स्थान पर ये नोटिस चिपकाए गए थे। गांवों में इन नोटिसों को पढ़ने और पढ़कर दूसरों को समझाने वाले लोग थे ही नहीं। फिर भला, गांव के लोग इन नोटिसों में लिखी बात को कैसे समझते? सरकार तो चाहती ही थी कि लोग इन नोटिसों में लिखी बात न समझें। इसलिए किसी को कानों कान खबर न होने दी गई।

कागजी कार्रवाई पूरी हुई। सरकार ने विस्थापितों की जमीन पर अपना कब्जा जमा लिया। एक कट्ठा या बिस्वा जमीन का मुआवजा तीन रूपए तय किया गया। इन तीन रूपयों में से सरकार ने नजराने का डेढ़ रूपये की मदद से वे अपने लिए कहीं और जमीन खरीद लें और अपना डेरा-तंबू वहां उठा ले जाएं। विस्थापितों को बसाने के लिए सरकार के पास जमीन नहीं है। विस्थापितों को बसाने के लिए जंगल कैसे काटे जाएं? बहुत-सा जंगल तो बांध में डूबने ही वाला था। तो फिर विस्थापितों के बसाने में जंगल और कटेगा तो पर्यावरण की हानि नहीं हांगी? लगभग 175 गांवों में फैले कोई एक लाख की जनसंख्या वाले इन 18,500 विस्थापित परिवारों को सरकार जंगल काटकर बसा नहीं सकती थी। इसलिए सरकार कहती है कि वे कहीं और जाकर बस जाएं।

सरकार के निगाह में अपने इन जीते-जागते लोगों की कोई कीमत नहीं है। अगर वे लोग बांध बनाने में रूकावट डाल रहे हैं तो इनको उखाड़कर फेंक क्यों न दें? गुजरात की प्रगति की राह में इन गंवार और अनपढ़ वनवासियों का महत्व ही क्या है? सरकार के मुंह से यही भाषा निकलती थी। कहते थे, जो भी कोई विरोध करेगा, उसके सामने हम अपनी फौज खड़ी कर देंगे। एकाध गांव में फौज का उपयोग किया भी गया। तीन गांवों को इसी तरह जोर-जबरदस्ती के साथ उजाड़ा गया और उनको कहीं दूर ले जाकर छोड़ दिया गया।

सरकार को वहां अपनी कॉलोनी बनानी थी। बांध का काम शुरू करना था। सरकार उतावली में थी। लेकिन चौथा गांव थोड़ा बहादुर निकला। गांव ने कहा: कुछ भी हो जाए, हम अपने गांव से नहीं हटेंगे। इस पर सरकार का इशारा पाकर कुछ लोग यह कहकर कि हम बांध का बनाना रद्द करवा देंगे, गांव के तरफ से अदालत में पहुंच गए। वहां उन्होंने मुकदमा चलाने का दिखावा किया। उन्होंने इन गांवों से कोई अठारह हजार रूपयों का चंदा इकट्ठा किया। अदालत में लोगों की तरफ से समय-बीती अर्जियां पेश करके और उनको खारिज करवाकर वे लोग चंदे की रकम के साथ भाग खड़े हुए। लोग ठगे से रह गए।

बाद में वहां भी फौज आई। लगातार चार सालों तक वह गांव अपनी बात पर अड़ा रहा उसने अपना गांव नहीं छोड़ा। उधर सरकार का भी काफी पैसा खर्च हुआ। सरकार को बहुत गुस्सा भी आया। इस गांव के लोगों को नए गांव में खेती के लिए और घर बनाने के लिए जो जमीन कागज पर लिखकर दी थी, सरकार ने उसको भी जब्त कर लिया। गांव वालों को तरह-तरह की धमकियां दी गई। लेकिन गांव के लोग टस-से-मस नहीं हुए। सरकार के अत्याचार बढ़ते चले बए। सरकार के और गांव वालों के बीच चली इस लंबी खींचातानी के कारण बाकी के विस्थापितों पर बी उलटा असर हुआ। सरकार परेशान थी ही, लाचार बन चुकी थी। दुसरी तरफ बांध का निर्माण काम जोर-शोर के साथ बढ़ता चला। विस्थापितों को उनके गांव से हटाना जरूरी हो चुका था।

सरकार के एक सहृदय और सज्जन अधिकारी को लगा कि विस्थापितों को उनकी मूल जगह से हटाकर सरोवर की सीमा के बाहर कहीं ठीक से बसाने का काम सरकार के, उसके अधिकारियों के और कर्मचारियों के बस का है ही नहीं। उन्होंने सरकार को समझाया कि यह काम वह प्रदेश के रचनात्मक कार्यकर्ताओं को सौंपने की व्यवस्था कर दे। जनता की समस्या देखकर रचनात्मक कार्यकर्ताओं का एक दल विस्थापितों की सहायता करने के लिए आगे आया।

विस्थापितों को फिर बसाने का काम करने के लिए एक समिति गठित कर दी। इस समिति में रचनात्मक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ कुछ अधिकारी भी रखे गए। जिले के प्रशासक इस समिति के अध्यक्ष बनाए गए। अपने अनुभव के आधार पर समिति ने अपन सारी व्यवस्था स्वतंत्र रूप से खड़ी की। सरकार की ओर से इस काम के लिए नियुक्त एक विशेष प्रशासक ने अपनी व्यवस्था के साथ विस्थापितों को बसाने का काम शुरू किया।

जून 1964 में रचनात्मक कार्यकर्ताओं ने अपना स्वतंत्र कार्यालय आरंभ किया। यहां यह बताना आवश्यक लगता है कि उन दिनों क्या तो कार्यकर्ता और क्या जनता, सभी सरकारी प्रचार से प्रभावित होकर बड़े बांध की योजना को विकास का एक भव्यतम साधन मानने लगे थे। वे बांध क्षेत्र की जनता को बरबाद करने की बांध की शक्ति से बिलकुल अपरिचित और अनजान थे। यदि कोई एकाध दूरदर्शी कार्यकर्ता बांध की गतिविधियों को समझाने वाला और उसकी तकनीक को जानने वाला रहा भी, तो उसकी बात को सुनने समझने के लिए उन दिनों कोई तैयार नहीं था। सरकारी क्षेत्र से और रचनात्मक क्षेत्र से आए हम सब कार्यकर्ता उन दिनों असल में नासमझ और अज्ञानी ही थे।

समिति के कार्यकर्ताओं ने विस्थापितों के साथ अपनी जान-पहचान बढ़ाई। वे उनकी बातों को सुनने-समझने लगे। उन्होंने उनकी समस्याओं को समझने का प्रयत्न शुरू किया। बाद मे उन्होंने सरकार को भी सारी बातें समझाई। पुनर्वास समिति ने विस्थापितों की समस्याओं का ठीक-ठीक आंकलन करके पुनर्वास संबंधी अपनी एक योजना सरकार के सामने रखी। समिति ने डूब में आने वाली गांव की खेती की जमीन के साथ ही विस्थपितों की दुसरी मिल्कियत का उचित मुआवजा भी एक सिलसिले के साथ तय किया, उस सबको सरकार के सामने रखा।

सरकार ने उचित मुआवजे की इस मांग को ठुकरा दिया। समिति ऐसे में क्या करती। कार्यकर्ताओं ने लोगों को समझाया कि वे अपनी बात अदालत के सामने रखें। बड़ी हड़बड़ी में लोगों की अर्जियां अदालत में पेश की गईं। अदालत ने मान लिया कि सरकार द्वारा दिया गया मुआवजा मुनासिब नहीं है। अदालत प्रति बिस्वा अठारह रूपए मुआवजा देने का फैसला दिया। बाद में कार्यकर्ताओं ने सरकार को विवश किया कि वह आपसी समझौते के लिए तैयार हो जाए। आखिर यह तय हुआ कि जमीन की किस्म को देखकर प्रति बिस्वा 16 से 24 रूपए तक मुआवजा दिया जाए, और नजराने के 50 प्रतिशत के बदले पांच प्रतिशत ही लिए जाएं। 16,18,21और 24 की दर से चार किस्तों में मुआवजे की रकमें चुकाई गईं। कोई 22 रूपए का औसत पड़ा।

नीचे की अदालत का फैसला बदलने के लिए सरकार ने उच्च न्यायालय में अपील की थी। सरकार ने जिला अदालत में और उच्च न्यायालय में लाखों रूपए खर्च किए। इसकी तुलना में विस्थापितों का काम तो मुफ्त में ही हुआ। कोई दो बरस से अधिक समय तक यह संघर्ष दिन रात चलता रहा। सरकार ने विस्थापितों को उनकी जगह से हटाने के लिए साम, दाम, दंड और भेद के सारे तरीके अपनाए। बड़ी देर के बाद सरकार को अक्ल आई। कार्यकर्ताओं द्वारा विस्थापितों के पुनर्वास की जो योजना सरकार के सामने रखी गई थी, उसमें थोड़ा हेर-फेर करके सरकार ने उसको स्वीकार कर लिया। इसमें भी सरकार ने कतर ब्योंत की नीति से काम किया। किंतु अंत में उसने विस्थापितों के हित में बनी सर्वोदय-योजना को लागू किया। हम कार्यकर्ताओं ने इस योजना को बड़ी लगन से और धूमधाम के साथ अमल में लाना शुरू किया।

चूंकि उन दिनों बांध के इस काम को हम सबने भी राष्ट्रीय विकास का काम माना था, इसलिए यहां के वातावरण में आम भावना यह बनी थी कि अपने क्षेत्र के विकास कि लिए हमको अपना सब कुछ दे देना चाहिए। दूसरों के सुख के लिए हमको अपने हित की बलि देनी चाहिए। इसी कारण इस क्षेत्र के गरीब विस्थापितों ने भी अपनी तरफ से सराहनीय सहयोग दिया। सारा संघर्ष अहिंसक रीति से, सद्भावनापूर्ण वातावरण में चला। बीच-बीच में सरकार की अक्षमता के कारण, कर्मचारियों के असहयोग के कारण, उनके संकुचित और भेदभाव भरे बरताव के कारण और कानून की अपनी मर्यादा के कारण यह संघर्ष तीव्र भी होता रहा। फिर भी कहना होगा कि उच्चस्तर पर विस्थापितों के प्रति अनुकंपा की भावना बराबर बनी रही। भ्रष्टाचार भी कम से कम हो पाया अधिकतर हकदारों को उनके हिस्से की पूरी रकमें मिल सकीं। विस्थापितों को नई जगहों में अनेकानेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। कई तरह के कष्ट सहने पड़े। उनके साथ अन्याय भी हुआ।

पर हम निराश नहीं है। उकाई बांध के विस्थापितों के बीच काम करते-करते हमको प्रसाद के रूप में जो शिक्षा मिली, जो कड़वे अनुभव प्राप्त हुए उनको भी हम प्रेमपूर्वक आपकी सेवा में रख रहे है। इस आशा और श्रद्धा के साथ कि मंगलमय प्रभु हमें ऐसे कामों को उठा लेने और उनको पुरा करने की प्रेरणा और शक्ति दें। लेकिन विस्थापितों ने अपने व्यवहार से यह सिद्ध कर दिया कि उनकी उदात्त भावना और उदारता सरकार की उदात्त भावना और उदारता से कई गुना अधिक रही है। अपने व्यवहार में सरकार प्राय: हर जगह फुट फैलाने वाली,लुक-छिपकर काम करने वाली और निकम्मी साबित हुई। वह अपने दिए हुए वचनों को भी पुरा नहीं कर पाई। उसने उसके हिस्से के कई काम अधूरे छोड़ दिए। कई जरूरी प्रश्नों को तो उसने सुलझाया ही नहीं। सरकार हमारी हर बात में बस हां-हां करती रही, और समय बीतता रहा। बांध संबंधी मामलों में सरकार की कोई विस्वसनियता रही ही नहीं। हमारे भोलेपन का दुरुपयोग किया गया।

अन्यायों की सूची लंबी है। जिन विस्थापितों की जमीन डूब में नहीं गई, जी. आर. हो जाने के बाद भी इन बाईस सालों में उनको अपनी जमीन वापस नहीं मिली। क्षेत्र के हर गांव में पीने के पानी की कमी है। गांवों में जाने-आने के रास्ते सुधर नहीं सके हैं। खेतों में जाने के रास्ते दिए नहीं गए हैं। जमीन के रिकार्ड पूरी तरह तैयार नहीं हो पाए हैं। सालों से बंद पड़ी विकास-योजनाएं अब तक शुरू नहीं हो सकी हैं। विस्थापितों का अपना कोई विशेष अधिकार बनता नहीं है। जिन विस्थापितों का उनकी अपनी खेती की जमीन के बदले में बंजर जमीन दी गई है, उनको सुधारने की और उन तक सिंचाई का पानी पहुंचाने की कोई व्यवस्था आज तक हुई नहीं है।

उकाई बांध के कारण आज हम अपने आपको अपराधी मानने लगे हैं। वहां हमारी भावनाओं का शोषण किया गया है। बांध से जो लाभ होने वाले थे, वे हो नहीं सके हैं। पिछले दस सालों में बारिश एकदम घटी है। सूरत के सेंटर फार सोशल स्टडीज के श्री कश्यप मंकोडी के अध्ययन के हिसाब से उकाई बांध के क्षेत्र में सिंचाई सिर्फ अठारह प्रतिशत हो सकी है और बिजली पच्चीस प्रतिशत से अधिक कभी और लगातार मिली नहीं हैं। कमांड एरिया में पानी की सतह अचानक उपर आ गई है। जमीन के दलदल में बदल जाने के कारण उसके बंजर बन जाने की आशंकाएं उत्पन्न हो गई हैं। अन्न-स्वावलंबन का दावा भी पूरा नहीं हो पाया है। खेती ने उद्योग का रूप ले लिया है और बेरोजगारी बराबर बढ़ रही है। शोषण बढ़ता जा रहा है।

अट्ठारह हजार पांच सौ परिवार उजड़ चुके है। वे सब लाचार, बेकार और बेघर बने हैं। अपनी रोजी-रोटी की खोज में उनको दर-दर भटकना पड़ रहा है। बांध के बन जाने से क्षेत्र का भौतिक विकास तो हुआ लेकिन समाज बिल्कुल जड़ और बेहाल बन गया। कुदरत बांझ बन गई। पर्यावरण प्रदूषित हुआ। 1,50,000 एकड़ जमीन में फैला जंगल और खेती की जमीन बरबाद हो गई। 80 मील के क्षेत्र में दिन-रात कल-कल, छल-छल नाद के साथ बहने वाली नदियां और नाले सब नष्ट हो गए।

जिस बांध ने यह सब नुकसान किया खुद उसी बांध का हाल भी कोई अच्छा नहीं है। बांध-क्षेत्र में गाद भयंकर गति से इक्ट्ठा होने लगी है। निकट भविष्य में ही बांध के निकम्मा होने की स्थिति बन सकती है। बांध क्षेत्र में चारों ओर नुकसान-ही-नुकसान नजर आ रहा है। बांध क्षेत्र की जनता पर नए-नए रोगों के, जंतुओं के और जहरों के हमले बढ़ते जा रहे हैं। लोगों में आपस की समानता घट रही है। उकाई बांध के बारे में जो सपने दिखाए गए थे, उनमें से एक भी सपना पूरी तरह साकार नहीं हो पाया है। बांध के कारण विस्थापित हुए लोगों के लिए सर्वोदय-योजना के कार्यकर्ताओं ने अठारह सालों तक जो काम किया, उस सर्वोदय-योजना को सरकार ने अचानक ही निरस्त कर दिया। विस्थापितों के लिए बनाई गई उद्वहन सिंचाई योजनाएं भी रद्द कर दी गई।

अपने देश की प्रगति के जो गुण गाए जाते है। उसका यह एक छोटा-सा लेखा-जोखा हमारे सामने है। हमने न सिर्फ अपने को, बल्कि अपने समूचे भविष्य को भारी खतरे में डाल दिया है। वोट की राजनीति ने हम सबको और हमारे समूचे देश को अनगिनत टुकड़ों में बांट दिया है। इस काले रंग के पैसे ने हमारी सारी कोमल और पवित्र भावनाओं पर पानी फेर दिया है। हमारी सारी क्षमताएं क्षीण हुई है। हमारे सारे संकल्प या तो अधूरे रहे हैं या विफल हुए है।

पर हम निराश नहीं है। उकाई बांध के विस्थापितों के बीच काम करते-करते हमको प्रसाद के रूप में जो शिक्षा मिली, जो कड़वे अनुभव प्राप्त हुए उनको भी हम प्रेमपूर्वक आपकी सेवा में रख रहे है। इस आशा और श्रद्धा के साथ कि मंगलमय प्रभु हमें ऐसे कामों को उठा लेने और उनको पुरा करने की प्रेरणा और शक्ति दें।

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