उत्तर बिहार: बाढ़ का परिदृश्य

Submitted by admin on Tue, 12/09/2008 - 09:11

.बाढ़, जो पहले समाज का एक मुख्य पहलु था, आज इन्ही तटबंधों के कारण यह बाढ़ लोगों को संसाधनों से वन्चित, भय और अनिश्चितता से रुबरु कर दिया है

बाढ़ नियंत्रण रणनीति के तहत नदी के अतिरिक्त बहाव को रोकने के उद्देश्य से तटबंधों का निमार्ण किया गया। यद्यपि, इन तटबंधों ने पानी के अतिरिक्त बहाव को रोकने के साथ-साथ नदी में बाहर के पानी को प्रवेश करने से काफी हद तक रोका है। इससे एक भारी समस्या उत्पन्न हुई है। चूँकि पानी के बहाव को मुख्य नदी में मिलने से रोक दिया गया है जिसके फलस्वरूप आस-पास का इलाका जलमग्न हो जाता है। स्थिति और भी बदतर हो जाती है जब तटबंध से पानी का रिसाव होने लगता है। इसका परिणाम यह होता है कि बारिश के मौसम के बाद तटबंध का बाहरी भाग महीनों तक पानी से भरा रहता है, क्योंकि इससे मुख्य नदी तक जाने का मार्ग या स्त्रोत नहीं मिल पाता है। सैधान्तिक रूप से तटबंध में बनाये स्लुइस गेट के मदद से इस समस्या का हल निकाला जा सकता है। लेकिन वास्तव में यह गेट शीघ्र ही बेकार हो जाते हैं। मुख्य नदी का स्तर तटबंध के बाहरी इलाकों के जमीनी स्तर की तुलना में ऊपर आ गया है, जिससे कि यह गेट बाढ़ के पानी को नदी के अन्दर आने देने के बजाय पानी को बाहर ही रोक देता है।

इसलिए बाढ़, जो पहले लोगों के जीवन का एक मुख्य अंग था, आज इन्ही तटबंधों के कारण एक विनाशकारी रूप धारण कर लिया है। इस प्रक्रिया में इन तटबंधों ने पूरे इलाके को दो भाग में बांट दिया है - तटबंध के बाहर और तटबंध के बीच। इन दोनों क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के जल संबन्धित समस्याएं उत्पन्न हुई हैं।

 

तटबंध के बाहर का इलाका


उत्तर बिहार में लगभग 8 लाख 6 हजार हेक्टेयर क्षेत्र 12 महीने जलमग्न रहता है। यह एक अनुमान के अनुसार कुल क्षेत्र का 15 प्रतिशत हिस्सा है। यदि आबादी का इतना ही प्रतिशत इस भूमि पर निर्भर है तो इसका मतलब यह हुआ कि 60 से 70 लाख लोग इस मानवकृत आपदा से त्रस्त हैं। जल के बहाव में रुकावट इस समस्या का एक मुख्य कारण है। पहले खेतों का पानी, नहरों, छोटी धाराओं और सहायक नदियों के माध्यम से मुख्य नदी में जाकर मिल जाता था, लेकिन अब तटबंधों, सड़कों, रेलवे लाइन और नहरों के कारण पानी का बहाव रुक जाता है और नतीजन इस क्षेत्र का काफी भू-भाग जलमग्न रहता है। पानी एकत्रित होने के कारण खेती पर इसका काफी बुरा असर पड़ता है। इस क्षेत्र में जमीन खेती के लिए उपयुक्त नहीं रहती है।

तटबंधों के निमार्ण के बाद यह देखने में आया है कि खेतों में काफी मात्रा में घास व अन्य घासफूस उग आते हैं, जो पहले कभी नहीं होते थे। इसे भूमि की उपजाऊपन पर काफी बुरा असर पड़ता है और किसानों को और अधिक समय व पैसा लगाना पड़ता है।

 

तटबंध के बीच का क्षेत्र

 

यह सत्य है कि तटबंधों के बीच के गांवों को बिलकुल नजरअंदाज कर दिया जाता है। इन गावों में कमजोर व एनिमिया से ग्रस्त महिलाओं व कुपोषित बच्चों की संख्या काफी ज्यादा हैं। बिहार में आर्थिक विविधता के कमी व बाढ़ से अत्याधिक नुकसान पुरुष श्रमिक बल का भारी प्रतिशत प्रतिवर्ष पलायन कर जाता है। ऐसी स्थिति में घर की सारी जिम्मेदारी के साथ-साथ महिलाओं को खेती भी करनी पड़ती है। बाढ़ के कारण प्रतिवर्ष मिटटी के कटाव व अन्य कारणों से इन क्षेत्रों में खेती करना काफी महंगा पड़ता है। खेती के लिए प्रतिवर्ष बीज, उर्वरक, कीटनाशक, खेत जोतने के लिए ट्रैक्टर और निकॉनी के लिए मजदूरों की आवश्यकता पड़ती है। इतना कुछ निवेश करने के बावजूद भी किसानों में फसल नष्ट होने का एक भय बना रहता है। बाढ़ के दौरान तटबंधों के बीच फंसें लोगों की जिन्दगी संसाधनों से वन्चित, भय और अनिश्चितता से भरी होती है। ऐसे अभावग्रस्त माहौल में स्वच्छ पीने का पानी तथा व्यापक स्वास्थ्य व स्वच्छता के कमी में, स्थिति और भी बदतर हो जाती है।

 

बाढ़ से जुड़ी समस्याएं


बाढ़ के दौरान सुरक्षित स्थानों पर रह रहे लोगों को पीने के पानी रूपी गम्भीर समस्या का सामना करना पड़ता है। ज्यादातर चापाकल (हैण्डपम्प) या तो पानी में डुब जाते हैं या तो फिर गाद जमा हो जाने के कारण व बाढ़ के पानी से खराब हो जाते हैं।

पानी से चारों तरफ घिरे हुए तटबंधों पर या अन्य ऊँचे स्थानों पर फँसे लोगों को चापाकल से पानी प्राप्त करना और भी मुश्किल हो जाता है। इस त्रासदी में बाढ़ और नदी के पानी का उपयोग अलग-अलग कार्यों जैसे - शौच हेतु, पीने के लिए तथा मृत व्यक्तियों व जानवरों को विर्सजित करने के काम आता है। गंदा पानी पीने के साथ-साथ अस्वच्छ वातावरण में रहने से व पौष्टिक आहार की कमी के कारण डायरिया, बुखार, सर्दी, खाँसी, निमोनिया, चर्मरोग, नेत्ररोग, मलेरिया तथा कालाजार जैसे भयानक व जानलेवा बीमारियां फैलती है। बच्चे व महिलायें तथा वृध्दजन इस दयनीय स्थिति से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। ग्रामीणों के अनुसार उनके वार्षिक आय का अधिकतर हिस्सा बीमारियों के इलाज में खर्च हो जाता है। उनका मानना है कि इसका मुख्य कारण है अस्वच्छ व दूषित पेयजल।

 

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