एक मोर्चा हारा है, पूरा संग्राम नहीं

Submitted by admin on Tue, 08/18/2009 - 08:06
Source
- दीवान सिंह (पर्यावरणविद्)

उच्चतम न्यायालय का यमुना खादर (फ्लड प्लेन) संबंधी निर्णय

नेशनल एन्वायर्नमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) के अचानक अपने रुख से पूरी तरह पलटने और भारत सरकार के वन और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अपने कदम ऐन मौके पर खींच लिये जाने की वजह से, राष्ट्रमण्डल खेलों हेतु यमुना की छाती पर निर्मित होने वाले "खेलगाँव" के मुद्दे पर फ़िलहाल "बिल्डर-कंस्ट्रक्शन लॉबी" की जीत हो गई है। हालांकि देखा जाये तो यमुना बचाओ आंदोलन के सत्याग्रहियों ने सब कुछ खो नहीं दिया है, बल्कि इस जागरण अभियान के कारण अन्य परियोजनाओं पर स्थगन हासिल करने में कामयाबी भी हासिल की है।
जब 29 जुलाई को उच्चतम न्यायालय की माननीय न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में तीन जजों की बेंच ने राष्ट्रमण्डल खेलों हेतु खेलगाँव के निर्माण की अनुमति पर 'क्लीन चिट' दी और इस विशाल परियोजना हेतु दिल्ली विकास प्राधिकरण व अन्य संस्थाओं को अपना पर्यावरण हेतु खतरनाक काम जारी रखने हेतु कहा, तब कई पर्यावरणविदों और सामाजिक संस्थाओं को एक झटका लगा और वे मायूस हुए। उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस निर्णय को उलट दिया जिसमें हाइकोर्ट ने सभी प्रकार के निर्माण कार्यों के परीक्षण और जाँच हेतु एक समिति बनाने का निर्देश दिया था। माननीय न्यायाधीशों ने यह देखने की भी ज़हमत नहीं उठाई कि खेलगाँव में बनने वाले सर्वसुविधायुक्त आलीशान फ़्लैट यमुना की छाती पर बनाये जा रहे हैं।

फ़िर भी पर्यावरणविदों ने कहा है कि हालांकि हमने एक लड़ाई हार दी है, लेकिन एक तरह से पूरा संग्राम हमने जीत लिया है। यमुना नदी के 30 हेक्टेयर के बाढ़जनित क्षेत्र को खेलगाँव के लिये भले ही खो दिया गया हो, लेकिन दूसरी अन्य 7000 हेक्टेयर ज़मीन पर स्थगन हासिल करने में कामयाबी मिली है। हम यमुना नदी विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष दिल्ली के लेफ़्टिनेंट गवर्नर का धन्यवाद अदा करना चाहते हैं जिन्होंने उन साक्ष्यों और सबूतों पर ध्यान से गौर किया, जिसके कारण यमुना के किनारे पर होने वाले निर्माण के कारण विनाश की पूरी सम्भावना है।

इस बड़े आन्दोलन की शुरुआत एक छोटे से स्तर पर हुई, जब यमुना नदी के किनारे छात्रों के एक समूह और एक NGO 'नेचुरल हेरिटेज फ़र्स्ट' ने अक्षरधाम मन्दिर के पास एक प्रदर्शन किया, जिसमें खेलगाँव के निर्माण के लिये यमुना नदी के इस जलजमाव क्षेत्र का चयन किया गया था। इसके बाद वहाँ के स्थानीय 'रेज़िडेण्ट वेलफ़ेयर असोसियेशन' के समूह 'ऊर्जा' द्वारा एक हवन का आयोजन किया गया। एक अगस्त को नागरिकों के एक समूह जिसमें राजेन्द्र सिंह, कुलदीप नैयर, विक्रम सोनी जैसे लोग भी शामिल थे, उन्होंने प्रस्तावित 'खेलगाँव निर्माण स्थल' पर पौधारोपण किया और इसे अन्यत्र स्थानान्तरित करने की मांग की।

सन् 2007 तक यमुना नदी के किनारे पर स्थित ज़मीन और जलजमाव क्षेत्र का 25 प्रतिशत हिस्सा विभिन्न निर्माण कार्यों, अतिक्रमणों, समाधियों और मन्दिरों की वजह से खत्म हो चुका था। समय आ चुका था कि अब नागरिकों को ही आगे आकर यमुना नदी के प्राकृतिक सौन्दर्य को खत्म करती और इस नदी को बेमौत मारती इस निर्माण होड़ को रोकने की पहल करना था। जल्दी ही यह मुहिम एक 'लुढ़कता हुआ बर्फ़ का गोला' बन गई, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के लोग तेजी से जुड़ने लगे और समूह तथा उसका विरोध बढ़ता गया। यात्रायें, 'लॉंग मार्च' करके, वीडियो निर्माण और प्रदर्शन तथा कई वैज्ञानिक तथ्यों को दर्शकों और अधिकारियों के सामने पेश किया गया व इस काम में स्कूल-कॉलेज के छात्रों की भी मदद ली गई। जल्दी ही 'यमुना सत्याग्रह' दिल्ली के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। सत्याग्रहियों ने, जिसमें कई वैज्ञानिक भी शामिल हैं, महसूस किया कि सिर्फ़ अनियमितताओं को चुनौती देना ही आवश्यक नहीं है, बल्कि इसके लिये कुछ और भी करना होगा। जो कुछ आज अनियमित है कल को वह कोर्ट के एक आदेश या स्थगन के जरिये नियमित और कानूनी बन सकता है। इसीलिये डॉ विक्रम सोनी द्वारा एक महत्वपूर्ण प्रश्न उछाला गया कि - 'यमुना नदी के जलजनित मैदानों की कीमत आखिर क्या है?' यदि दिल्ली के नागरिक होने की हैसियत से हमारे जीवन के लिये कोई बात यदि महत्वपूर्ण है तो यह कानून के मुताबिक भी सही होना चाहिये। यदि हम यमुना नदी के इस क्षेत्र की 'असली कीमत' साबित कर सकें तो कानून उसका पालन भी करेगा और रक्षा भी करेगा।

एक शोध अध्ययन क्या गया और पाया गया कि यमुना नदी के यह जलजनित विशाल क्षेत्र एक प्राकृतिक जल भण्डारण क्षेत्र हैं जो कि मानसूनी बारिश के अतिरिक्त जल को सीधे ज़मीन में उतारते हैं। यह समूचा क्षेत्र लाखों वर्षों में निर्मित 40 मीटर गहरे एक रेतीले गाद वाले इलाके में विकसित हो चुका है, यह 40 मीटर मोटी परत एक तरह से बाढ़ के पानी को स्पंज की तरह सोखने का काम करती है। इस क्षेत्र की जल भण्डारण क्षमता दिल्ली की पानी की वर्तमान आपूर्ति की लगभग आधी है। इसलिये इस इलाके के संरक्षण और जल के पुनः उपयोग के लिये एक वैकल्पिक योजना का सुझाव भी दिया गया। डॉ सोनी ने इस जलजमाव क्षेत्र को एक 'छिपा हुआ खजाना' बताया और इस अध्ययन की रिपोर्ट को दिल्ली के उपराज्यपाल के समक्ष पेश किया, जो कि प्रधानमंत्री द्वारा गठित यमुना नदी विकास प्राधिकरण (YRDA) के अध्यक्ष भी हैं। 22 नवम्बर 2007 को लगभग 30 विशेषज्ञों की उपस्थिति में उपराज्यपाल ने यमुना नदी के इन बाढ़ मैदानों पर किसी भी निर्माण कार्य पर एक अस्थाई रोक लगा दी। उन्होंने केन्द्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) को इस अध्ययन रिपोर्ट के आधार पर एक ब्लूप्रिण्ट बनाने का निर्देश दिया। 17 जून 2008 को राजभवन में YRDA की बैठक हुई जिसमें केन्द्रीय भूजल बोर्ड ने स्वीकार किया कि यमुना नदी का यह इलाका धरती के जल को रीचार्ज (पुनर्भरण) करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उपराज्यपाल महोदय ने तत्काल आदेश जारी करके भविष्य में इस क्षेत्र में होने वाले सभी प्रकार के निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी और इस भूमि को जल-पुनर्भरण (Water Recharge) तथा जैव विविधता के संरक्षण के रूप में विकसित करने हेतु कहा।

लेकिन सबसे अधिक आश्चर्य न्यायपालिका के रवैये को लेकर हुआ, वह न्यापालिका जिसे कि प्रत्येक नागरिक अपना संरक्षणकर्ता मानता है खासकर उस स्थिति में जब रास्ते बन्द हो चुके हों। पर्यावरण से जुड़े मसलों और बड़े निर्माण कार्यों के प्रभाव पर उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गये निर्णयों का इतिहास बड़ा ही निराशाजनक रहा है। यमुना नदी के इस क्षेत्र को बचाने के लिये कई लोग हाईकोर्ट गये और उन्होंने राष्ट्रमण्डल खेलों के लिये निर्मित होने वाले खेलगाँव पर रोक लगाने की मांग की। दो न्यायाधीशों ने विशेष रूप से यमुना के इन बाढ़ मैदानों का निरीक्षण भी किया, और इस सम्बन्ध में एक समिति गठित करने का आदेश दिया, लेकिन नतीजा शून्य। जब मामला उच्चतम न्यायालय में गया तब 30 जून को एक झटके में उच्चतम न्यायालय ने कह दिया कि 'यह क्षेत्र बाढ़जनित मैदान नहीं हैं…', अब, 40 मीटर गहराई वाला रेतीला किनारा जो कि नदी के प्राचीनतम इतिहास से मौजूद है, यदि वह जलभरण क्षेत्र नहीं है तो फ़िर क्या है?

अब देखिये कि सरकारी तकनीकी एजेंसियों, जिनसे यह उम्मीद की जाती थी कि वे सरकार को एक ठोस वैज्ञानिक सलाह देंगी, की इस झमेले में क्या भूमिका रही। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) द्वारा 1999 और 2005 में पेश रिपोर्ट में किसी भी नदी के खुले मैदानों पर स्थाई निर्माण कार्य करने को मना किया गया है। इस रिपोर्ट की काट करने के लिये दिल्ली विकास प्राधिकरण ने पुणे स्थित केन्द्रीय जल एवं विद्युत शोध केन्द्र से एक रिपोर्ट पे्श करने को कहा। इस संस्था द्वारा पेश रिपोर्ट में यमुना के इस क्षेत्र में निर्माण कार्य करने पर कोई आपत्ति नहीं होने की बात कही गई, लेकिन कई सवालों को अनुत्तरित छोड़ दिया गया। जब पर्यावरण और वन मंत्रालय ने इस पर गम्भीरता से विचार करने की शुरुआत की तब दिल्ली विकास प्राधिकरण ने इस कार्य के लिये समय सीमा तय करने की बात कह डाली। एक तरह से यह पर्यावरण मंत्रालय को 'आँखें तरेरकर धमकाने' जैसा ही था, और फ़िर अचानक इस मंत्रालय का रवैया इस योजना को लेकर बेहद लचीला बन गया। इसी बीच NEERI ने भी अपने पूर्व के रुख और विभिन्न रिपोर्टों को दरकिनार करते हुए पलटी खाई और कह दिया कि यह निर्माण क्षेत्र बाढ़जनित जलभरण क्षेत्र नहीं है।

लगता है कि वर्षों बाद जब 'यमुना के बचाव हेतु संघर्ष' का इतिहास लिखा जायेगा, तभी सच सबके सामने आ पायेगा।

लेखक - जाने-माने पर्यावरणविद् हैं
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