कृषि जलप्रबंधन और वर्षाजल प्रबंधन क्यों

Submitted by admin on Wed, 09/03/2008 - 11:21
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चंडीगढ़ क्षेत्र में (1958-2001) औसत मासिक वर्षाचंडीगढ़ क्षेत्र में (1958-2001) औसत मासिक वर्षाभारतवर्ष के ज्यादातर हिस्सों में वार्षिक वर्षाजल (Annual Rainfall) का लगभग 70-80 प्रतिशत भाग मानसून के तीन महीनों में प्राप्त होता है तथा बाकी के नौ महीनों में सिर्फ लगभग 20-30 प्रतिशत ही वर्षा होती है। इस विषम वर्षाजल वितरण (Rainfall distribution) कि वजह से जहां मानसून में वर्षाजल का अधिकांश भाग अपवाह (Runoff) के रूप में नदी नालों में बहकर बेकार चला जाता है और मृदा अपरदन एवं बाढ़ जैसी समस्याओ को जन्म देता है, वही बाकी के नौ महीनों में ज्यादातर कृषियोग्य भूमि असिंचित रह जाती है। जहां सिंचाई का मुख्य साधन भूजल (Ground Water) है वहां भूजल के अनिंयत्रित दोहन से भूजल स्तर दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है।

यह समस्या देश के उत्तारी प्रदेशों में ज्यादा भयावाह रूप धारण कर चूकी है जहां भूजल स्तर का गिराव 1 मीटर से 4 मीटर प्रतिवर्ष है। फसल उत्पादन में देश के उत्तरी प्रदेशों मुख्यत: पंजाब एवं हरियाणा का विशेष योगदान रहता है तथा इन्हीं प्रदेशों में भूजल स्तर (Ground water level) का गिराव सबसे ज्यादा है जो एक चिंता का विषय है।

वर्षाऋतु में अनियंत्रित अपवाह अपने साथ-साथ उपजाऊ मिट्टी एंव पोषक तत्वों को भी बहाकर ले जाता है। पोषक तत्वों का लगातार क्षरण भूमि में सूक्ष्म एंव अतिसूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी अथवा असंतुलन पैदा कर देता है परिणाम स्वरूप सफल फसल उत्पादन के लिये पोषक तत्वों की अतिरिक्त मात्रा डालनी पड़ती है। इस प्रकार फसलोत्पादन (Crop Production) पर प्रति इकाई (Per unit) खर्च बढ़ जाता है तथा कृषक का लाभांश (Profit) घट जाता है। अगर समय पर वर्षाजल प्रबंधन (Rainwater Management) की तकनीकों का प्रयोग करके भूमि अपरदन को न रोका जाय तो कुछ ही वर्षो में हरी-भरी जमीन बंजर एंव अनुपजाऊ (unfertile) जमीन में परिवर्तित हो जाती है।

अनियंत्रित वर्षाजल अपवाह सिर्फ पहाड़ी क्षेत्रों में ही समस्या का कारण नही है, बल्कि यही अपरदित मृदा (Eroded Soil) से परिपूर्ण अपवाह (Runoff) मैदानी इलाकों की नदियों में गाद इकट्ठा करके उन्हें भी उथला बना देता है, जिससे नदियों में बाढ़ की समस्या को और बढ़ावा मिलता है। उपरोक्त वर्णित समस्याओं की बजह से भूमि एवं शुध्द जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता दिन प्रतिदिन घटती जा रही है जिसे सिर्फ समेकित एवं प्रभावी (Integrated and effective) वर्षाजल संरक्षण, प्रबंधन एवं संग्रहण (Rainwater conservation, management and harvesting) द्वारा दूर किया जा सकता है।
 

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