कोलिन चार्टर से जलसंकट पर बातचीत

Submitted by admin on Mon, 06/29/2009 - 21:42
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merinews

“पानी”, जीवन की सबसे महत्वपूर्ण बात, जहाँ एक तरफ़ पानी धरती के प्राकृतिक संतुलन और सुरक्षा को बनाए रखने के लिये आवश्यक है, वहीं समूची जीव-जन्तु-मानव प्रजाति के लिये भोजन और कपड़े सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये भी जरूरी है। आज पूरे विश्व में जलवायु परिवर्तन के कारण जल स्रोतों पर नष्ट होते पर्यावरण की काली छाया गहराने लगी है। पत्रकार अशोक शर्मा ने इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (IWMI) के निदेशक कोलिन जे चार्टर्स से एक विशेष मुलाकात की और उनसे विश्व में पानी की उपलब्धता, उस पर मंडरा रहे गम्भीर खतरों तथा खाद्यान्न संकट से निपटने सम्बन्धी उपायों पर उनके विचार जाने। IWMI उन 15 चुनिंदा संस्थाओं में से एक है, जिन्हें इंटरनेशनल एग्रीकल्चर रिसर्च (CGIAR) हेतु कंसलटेंट नियुक्त किया गया है। पेश हैं उस इंटरव्यू के कुछ मुख्य अंश –

“पानी” की उपलब्धता दिनोंदिन पूरे विश्व में कम होती जा रही है, ऐसा कहा जा रहा है कि विभिन्न देश अगले कुछ वर्षों में पानी के लिये ही युद्ध लड़ेंगे, इस सम्बन्ध में आपका क्या विचार है?
मेरे विचार से स्थानीय स्तर पर एवं क्षेत्र विशेष में कुछ विवाद हो सकते हैं, लेकिन किसी बड़े युद्ध अथवा झगड़े की सम्भावना मैं नहीं देखता। इन विवादों को भी सावधानीपूर्वक योजनायें बनाकर, जल-प्रबन्धन तथा उसके उपयोग को प्रभावकारी बनाकर टाला जा सकता है। हमें खेती में कम पानी से अधिक फ़सल लेने की तकनीकें अपनानी होंगी, घर और उद्योगों में पानी के प्रभावी और कम उपयोग की आदत डालनी होगी, पानी की “रीसाइक्लिंग” भी करना होगी। साथ ही हमें उपलब्ध जलस्रोतों, तालाबों तथा भूजल को प्रदूषण से भी बचाना चाहिये और भूजल और धरती को “रीचार्ज” भी करना होगा। इसी प्रकार पानी के संग्रहण और उसे रोकने के लिये भी बड़े-छोटे और मझोले बाँध, तालाब और छोटे-छोटे कुण्ड आदि बनाने होंगे।

विश्व के तेजी से बदलते पर्यावरण के मद्देनज़र, पानी के स्रोतों पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ सकता है।
इस ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण प्रदूषण का सर्वाधिक असर विकासशील देशों पर ही पड़ेगा। ऊष्णकटिबंधीय इलाकों में स्थित विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था इसी पर आधारित है और इससे उन्हें सर्वाधिक तकलीफ़ होगी। कुछ इलाकों में मानसून की अवधि कम हो सकती है, जबकि कुछ इलाकों में भीषण तूफ़ान भी आ सकते हैं। कुछ क्षेत्रों में जलवायु में तेज बदलाव होंगे जबकि कुछ क्षेत्रों में सूखे की अवधि भी बढ़ सकती है। जो क्षेत्र पानी के लिये बर्फ़ पिघलने के भरोसे रहते हैं वहाँ आने वाले समय में पानी की किल्लत हो सकती है। ये सभी मुद्दे आपस में विचार-विमर्श करके एक विस्तृत नीति बनाकर उसपर काम करने से हल होंगे, जिसमें “मनुष्य की भोजन सुरक्षा” ही मुख्य मुद्दा होना चाहिये। IWMI ने इन चुनौतियों से निपटने के लिये 2009-2013 के कार्यकाल हेतु एक रणनीतिक योजना बनाई है।

भोजन की सुरक्षा को बनाये रखने के लिये क्या-क्या सम्भावनायें हो सकती हैं?
वैश्विक स्तर पर देखें तो सन् 2050 तक हम उम्मीद करते हैं कि जनसंख्या में ढाई अरब की बढ़ोतरी हो सकती है, इस हिसाब से हमें मनुष्यों और जानवरों हेतु खाद्यान्न का उत्पादन दोगुना करने की आवश्यकता है। इसके लिये हम आज जितना पानी उपयोग कर रहे हैं उसका दोगुना पानी खेती के लिये देना होगा। नीतियाँ बनाकर पानी के कम से कम उपयोग पर जनता को शिक्षित करना होगा। जो किसान कम पानी वाली फ़सलें लेंगे उन्हें प्रोत्साहित करना और सबसिडी देना भी एक उपाय है। उन क्षेत्रों में जहाँ बारिश अधिक होती है या होगी वहाँ गन्ना, चावल आदि की फ़सल ली जा सकती है। इन क्षेत्रों में उपलब्ध अतिरिक्त पानी को उन इलाकों में ले जाया जाना चाहिये, जहाँ वाकई पानी की कमी है। इसे हम “पानी का निर्यात” भी कह सकते हैं। सूखा प्रभावित अथवा अल्प-वर्षा वाले राज्यों की सरकारों को अधिक पानी वाली फ़सलें आयात करना चाहिये बजाय उन्हें अपने यहाँ उगाने के।

क्या आप नदियों को आपस में जोड़कर “पानी के निर्यात” की नीति का समर्थन करते हैं?
नदियों को आपस में जोड़ना सबसे आखिरी विकल्प होना चाहिये। हालांकि इस प्रकार की योजनायें इंजीनियरिंग की मेहनत और दृष्टि से सफ़ल भी हो सकती हैं, लेकिन इसमें जिन इलाकों से पानी जा रहा है वहाँ की, एवं जहाँ पानी मिल रहा है वहाँ की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था अथवा अव्यवस्था जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण पहलू भी जुड़े हैं। अतः यह एक गम्भीर मसला है और इसे सावधानी से हल किया जा सकता है।
 

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