कोसी के गुस्से का राज़ क्या है

Submitted by admin on Sun, 09/07/2008 - 17:34

नदी के मिज़ाज का खयाल रखना चाहिएनदी के मिज़ाज का खयाल रखना चाहिएअवधेश कुमार/ बिहार में कोसी नदी की धारा बदल जाने के कारण आए प्रलय के साथ ही जानकारों ने तटबंध और बैराजों को असली खलनायक साबित करना शुरू कर दिया है। सतही तौर पर विचार करने से ऐसा लगता है कि अगर हिमालय से निकलने वाली कोसी (जिसे नेपाल में सप्तकोसी कहा जाता है) के दोनों किनारों पर तटबंध नहीं बनाए जाते तो यह नौबत नहीं आती। पहले पानी इकट्ठा हुआ और फिर बाढ़ में बदल गया। कोसी ने अचानक धारा बदल ली और 120 किलोमीटर पूरब में फैल गई। नेपाल से निकलने वाली दूसरी नदियों- बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला, भुतही बलान आदि पर बनाए गए तटबंधों और बैराजों से भी समय-समय पर पानी बाढ़ की नौबत लाता है। देश के बाढ़ग्रस्त इलाके का साठ परसेंट हिस्सा बिहार में ही है। तो क्या अगर सिंचाई और बिजली के लिए तटबंधों और बैराजों का निर्माण न हो तो ऐसी स्थिति नहीं आएगी?

नदियों पर अध्ययन करने वालों का कहना है कि बाढ़ पहले भी आती थी, लेकिन तब ज़्यादातर जगहों पर इसे उत्सव की तरह मनाया जाता था। बाढ़ अपने साथ इतनी उपजाऊ मिट्टी लाती थी कि लोग उसका इंतज़ार करते थे। उसके जाने के बाद फसलें काफी अच्छी होती थीं। लोग पहले से उसकी तैयारी करके रखते थे, क्योंकि उसके आने का वक्त तय था। अब उसमें बदलाव आया है। अब बाढ़ ज़्यादा विकराल और विनाशकारी हो गई है, लेकिन इसकी वजह सिर्फ तटबंधों और बैराजों को नहीं माना जा सकता।

वैसे भी कोसी नदी की धारा बदलने का पुराना इतिहास है। जब तटबंध नहीं थे तब भी इसने धाराएं बदली थीं। लेकिन पहले नदियों को पवित्र माना जाता था, उनके साथ छेड़छाड़ नहीं की जाती थी। भारत निर्माण करने वाले नेताओं और इंजीनियरों ने नदी परियोजनाओं के ज़रिए देश की खुशहाली की योजना बनाई। तब बांध, तटबंध और बैराज बने। यह नदी से छेड़छाड़ थी, लेकिन इसके पीछे एक सपना था। वह सपना आज टूट रहा है और मानवीय निर्माण महज़ छेड़छाड़ साबित हो रहे हैं, क्योंकि हमने उसकी परवाह नहीं की।

कोसी तटबंध और बैराज की ही मिसाल लें तो उससे जो विनाशलीला मची है उसके पीछे असल वजह तटबंधों की समय पर मरम्मत न होना, नदी में जमा होते गाद को साफ न करना और नहरों तथा उपनहरों का अनुपयोगी हो जाना है। नेपाल से जुड़ी नदी परियोजनाओं को नज़दीक से देखने वाले जानते हैं कि उनकी मेंटनेंस का काम करप्शन और दोनों देशों के बीच बढ़ते अविश्वास की भेंट चढ़ गया है। तटबंधों और बैराज की दुर्दशा हर कोई देख सकता है। हर साल इसके लिए अलॉट होने वाले औसतन 300 करोड़ रुपये कहां जाते हैं, यह कोई रहस्य नहीं है। यही दशा बूढ़ी गंडक, कमला, बागमती आदि के तटबंधों और बैराजों की है।

बूढ़ी गंडक के वाल्मीकि नगर बैराज से गंडक नहर निकलती है। कमला के जयनगर बैराज से कमला नहर और कोसी के वीरपुर बैराज से कोसी नहर। ये नहरें न जाने कितने बरसों से सूखी पड़ी हैं। गंडक नहर के बेकार होने से पानी अटक जाता है, जिससे जगह-जगह पानी जमाव वाले खेतों का क्षेत्रफल बढ़ा है। इसे बिहार में चौड़ कहते हैं। दरभंगा के कुशेश्वर में, जहां कोसी, कमला और करेह मिलती हैं, एक लाख 24 हज़ार हेक्टेयर क्षेत्र में जल जमाव इतना हुआ कि उसे पक्षी विहार घोषित कर दिया गया है।

यह बाढ़ की विभीषिका से कम बड़ी त्रासदी नहीं है कि लाखों एकड़ ज़मीन और खरबों रुपये निगलने वाली नहरें बर्बाद हो रही हैं और यह पूरे प्रदेश में खेती लायक ज़मीन को तालाब में बदल रही हैं। सिर्फ एक द्रोण नहर चालू है। तटबंध तो बने थे नहरों में पानी देने के लिए और नहरों से उपनहरों में पानी जाना था। जब नहरों में पानी ही नहीं जाएगा और तटबंधों में बंधा रहेगा तो उसका नतीजा विनाशकारी ही हो सकता है। अगर नहरें ठीक होतीं, तो बारिश के मौसम में उनमें पानी छोड़कर बाढ़ की नौबत टाली जा सकती थी। बागमती पर तो ठीक से बांध ही नहीं बंधा और कागज़ों में काम पूरा हो गया।

तो वजह यहां है। हालांकि नदियां आज़ाद होकर अपने स्वभाव के मुताबिक बहें और उन्हें काबू करने की कोशिश न हो, इस आदर्श स्थिति से किसी का मतभेद नहीं हो सकता। किंतु नदी परियोजनाएं हमारे विकास के साथ जुड़ चुकी हैं। नदियों पर बांध अब बांधे ही नहीं जाएं ऐसे तर्क बेमानी हैं। तो रास्ता कहां है? रास्ता नदियों का स्वभाव, उससे जुड़ी परंपराओं, लोकोक्तियों, स्थानीय ज़रूरत और बहाव संबंधी संभावनाओं का वस्तुपरक आकलन कर उसके मुताबिक परियोजनाओं का ढांचा खड़ा करने और उनके रखरखाव का भरोसेमंद इंतज़ाम करने में है।

मिसाल के लिए, कोसी का चरित्र है कटाव और बहाव के साथ बहुत ज्यादा बालू, कंकड़, कीचड़ आदि लाना। ज़ाहिर है, इससे उसका तल भरता जाता है और उसे दिशा बदलने को मजबूर होना पड़ता है। यह डेल्टा का भी निर्माण करती है, जैसे सुपौल। हमारे प्राचीन जनजीवन में कोसी के स्वभाव को देखते हुए एक गीत और कथा प्रचलित थी- राखिए से ऐले रामू गौना करईले, कोहबर घर में सुतल निचिंत। जेकरी दुअरिया रे पानी कोसी बहे धारा, ऐसे में कैसे रहे निचिंत।

रामू नामक पात्र से कोसी का प्यार था। जब उसने किसी स्त्री से शादी कर ली, तो कोसी उसके दरवाज़े तक काटती हुई आई। रामू ने उससे वादा किया कि तुम जैसे-जैसे आगे बढ़ोगी, हम कुदाल से रास्ता बनाते जाएंगे। यानी कोसी पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सकती। उसे आप सीधा रास्ता नहीं देंगे तो वह रास्ता बदल देगी। यही नहीं, आप कोसी के समीप हैं तो आप बिल्कुल बेखबर नहीं रह सकते। आपको सतर्क और तैयार रहना चाहिए। आपका प्रेम कोसी से होना चाहिए।

ज़ाहिर है, कोसी जैसी नदी पर परियोजना बनाते वक्त ऐसी लोकोक्तियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। अगर कोसी पर तटबंध बनता है तो उसमें जमा होती गाद की सफाई कैसे हो, इसका पुख्ता इंतज़ाम होना चाहिए। बागमती का मामला भी ऐसा ही है। अगर इस तरह से ध्यान दिया जाए तो यह भी साफ हो जाएगा कि सभी नदियां सिंचाई और अन्य परियोजनाओं के लिए अनुकूल नहीं होतीं।

( लेखक बिहार की समस्याओं का गहरा अध्ययन करते रहे हैं)

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