क्यों बरसात होती है

Submitted by admin on Wed, 01/21/2009 - 20:05
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फोटो साभार - अमर उजालाफोटो साभार - अमर उजालावैसे तो हर बारिश में ही भीगने का मन होता है, पर मानसून की बात ही कुछ अलग है। मानसून तन को ही नहीं मन को भी भिगोता है - हर किसी के मन को। लोगों के तन मन ही को नहीं - नदी पहाड़, खेत खलिहान, हाट बाजार सभी के मन को। किसी को यह रोमांच देता है, किसी को खुशी, किसी को ताजगी तो किसी को नया जीवन। और यह सब करने वाला मानसून इस धरती का अपनी तरह का अकेला नाटकीय घटनाक्रम है। मानसूनी जलवायु काफी बड़े भूभाग को प्रभावित करती है।

 

 

मानसून का गणित!

 


मानसून शब्द की उत्पत्ति अरब शब्द मौसिन से हुई है। जिसका अर्थ होता है मौसम। सलाना आगमन के कारण ही इस खास जलवायु का नाम मानसून पड़ा। आइए अब जानते हैं कैसे होता है मानसून का आगमन:-

पृथ्वी द्वारा सूर्य का चक्कर लगाने के क्रम में पृथ्वी का कुछ भाग कुछ समय के लिए सूर्य से दूर चला जाता है। जिसे सूर्य का उत्तरायन और दक्षिणायन होना कहा जाता है। पृथ्वी पर स्थित दो काल्पनिक रेखाएं कर्क और मकर रेखा है। सूर्य उत्तरायन के समय कर्क रेखा पर और दक्षिणायन के समय मकर रेखा पर होता है। पृथ्वी पर इसी परिवर्तन के कारण ग्रीष्मकाल तथा शीतकाल का आगमन होता है। यहां पर मुख्यरूप से तीन मौसम होते हैं-ग्रीष्मकाल, वर्षाकाल तथा शीतकाल। ग्रीष्मकाल की अवधि मार्च से जून तक, वर्षाकाल की अवधि जुलाई से अक्टूबर और शीत काल की अवधि नवम्बर से फरवरी होती है।

मौसम में इसी परिवर्तन के साथ हवा की दिशा भी बदलती है। जहां ज्यादा गर्मी होती है वहां से हवा गर्म होकर ऊपर उठने लगती है और पूरे क्षेत्र में निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है। ऐसी स्थिति में हवा की रिक्तता को भरने के लिए ठंडे क्षेत्र से हवा गर्म प्रदेश की ओर बहने लगती है। शुष्क और वर्षा काल का बारी-बारी से आना मानसूनी जलवायु की मुख्य विशेषताएं हैं। ग्रीष्म काल में हवा समुद्र से स्थल की ओर चलती है जो कि वर्षा के अनुकूल होती है और शीत काल में हवा स्थल से समुद्र की ओर चलती है।

ग्रीष्म काल में 21 मार्च से सूर्य उत्तरायण होने लगता है तथा 21 जून को कर्क रेखा पर लंबवत चमकता है। इस कारण मध्य एशिया का भूभाग काफी गर्म हो जाता है। फलस्वरूप हवा गर्म होकर ऊपर उठ जाती है और निम्न दबाव का क्षेत्र बन जाता है। जबकि दक्षिणी गोलार्ध के महासागरीय भाग पर ठंड के कारण स्थित उच्च वायुदाब की ओर से हवा उत्तर में स्थित कम वायुदाब की ओर चलने लगती है।

इस क्रम में हवा विषवत रेखा को पार कर फेरेल के नियम के अनुसार अपने दाहिने ओर झुक जाती है। फेरेल के नियम के अनुसार पृथ्वी की गति के कारण हवा अपनी दाहिनी ओर झुक जाती है। यह हवा प्रायद्वीपीय भारत, बर्मा, तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया के अन्य स्थलीय भागों पर दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी हवा के रूप में समुद्र से स्थल की ओर बहने लगती है। इसे दक्षिणी-पश्चिमी मानसून कहते हैं। ये हवा समुद्र से चलती है इसलिए इसमें जलवाष्प भरपूर होती हैं। इसी कारण एशिया महाद्वीप के इन क्षेत्रों में भारी वर्षा होती है। यह मानसूनी जलवायु भारत, दक्षिण-पूर्वी एशिया, उत्तरी आस्ट्रेलिया, पश्चिमी अफ्रीका के गिनी समुद्रतट तथा कोलंबिया के प्रशांत समुद्रतटीय क्षेत्र में पाई जाती है।

23 सितम्बर के बाद सूर्य की स्थिति दक्षिणायन होने लगती है, और वह 24 दिसम्बर को मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है, जिस कारण उत्तरी गोलार्ध के मानसूनी प्रदेशों (मध्य एशिया) के अत्यधिक ठंडा हो जाने के कारण वहां उच्च वायुदाब विकसित हो जाता है। ये हवाएं उत्तर-पूर्वी मानसूनी हवाएं कहलाती है। अब एशिया के इस आंतरिक भाग से ठंडी हवा समुद्रतटों की ओर चलने लगती है। हिमालय पर्वत श्रेणी के कारण ये ठंडी हवा भारत में प्रवेश नहीं कर पाती। उत्तर-पूर्व दिशा में बहती हुई यह हवा विशाल हिस्से को पार कर दक्षिण एशिया के देशों में पहुंचती है। स्थल से आने के कारण यह हवा शुष्क होती है, किन्तु बंगाल की खाड़ी पार करते समय आर्द्रता ग्रहण कर लेती है, और इसलिए प्रायद्वीपीय भारत के पूर्वी समुद्रतटीय भागों में, खासकर तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में, वर्षा होती है। इसे मानसून का लौटना कहते हैं।

मानसून के कारण वर्षा प्राय: तीन प्रकार की होती है-चक्रवातीय, पर्वतीय तथा संवहनीय। आर्द्र मानसून हवाएं जब पर्वत से टकराती है तो ऊपर उठ जाती हैं, परिणामस्वरूप पर्याप्त बारिश होती है। चूंकि हम जानते हैं कि ज्यों-ज्यों उंचाई बढ़ती है तापमान कम होने लगता है। 165 मीटर ऊपर जाने पर एक डिग्री सेंटीग्रेट तापमान कम हो जाता है। हवाएं जब ऊपर उठती हैं तो इसमें मौजूद वाष्पकण ठंडे होकर पानी की बूंदों में बदल जाते है। जब पानी की बूंद भारी होने लगती है तो यह धरती पर गिरती है। इसे हम बारिश कहते हैं। चूंकि मानसूनी हवा में वाष्पकण भरपूर मात्रा में होते हैं इसलिए बारिश भी जमकर होती है।

- कौशल कुमार `कमल´

साभार – अमर उजाला

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Comments

Submitted by Anonymous (not verified) on Sun, 12/18/2011 - 12:35

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धन्यवाद, आपने बहुत अच्छी जानकारी उपलब्ध की है।वर्षा की बूँदें कभी छोटी और कभी बडी होती है। इस पर कुछ बताइए

जब सूर्य 21 जून को सीधा कर्क रेखा पर लम्बवत चमकता है तो वह पर गर्मी पड़ती ह भैया अधिक गर्मी पड़ती है क्योंकि सूर्य का सीधा प्रकाश कर्क रेखा पर पड़ता है जिससे वहां अधिक गर्मी पड़ती है ।।

Submitted by Anarsingh kaushal (not verified) on Wed, 03/29/2017 - 11:51

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Submitted by javed (not verified) on Mon, 05/29/2017 - 12:25

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mere liye manna hai ki barsat jab hoti hai jav pani bhap bankar upar jata hai to baris hoti hai

Submitted by मिंकू मुकेश सिंह (not verified) on Tue, 03/27/2018 - 19:28

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आपका ये ब्लॉग हर वर्ग के लिए लाभकारी है खासकर युवा परीक्षार्थियों के लिए तो विशेष महत्व रखता है।बहुत बहुत आभार

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