गंगाजल अमृत नहीं अब आर्सेनिक

Submitted by admin on Sat, 01/17/2009 - 00:30
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मदन जैड़ा/ हिन्दुस्तान
नई दिल्ली, 15 जनवरी।
गंगा का पानी कभी सबसे स्वच्छ होता था इसलिए वेदों-पुराणों तक में कहा गया है-गंगा तेरा पानी अमृत। मान्यता थी कि इसे पीकर या इसमें डुबकी लगाकर बीमारियां दूर हो जाती हैं। लेकिन अब स्थिति उलट है। गंगा के इर्द-गिर्द बढ़ते शहरीकरण, उद्योग धंधों से निकलने वाले कचरे, प्रदूषणकारी तत्वों के बढ़ने के कारण गंगाजल में आर्सेनिक का जहर घुल गया है।

उत्तर प्रदेश, बिहार तथा पश्चिम बंगाल में गंगा के किनार बसने वाले लोगों में भारी संख्या में आर्सेनिक से जुड़ी बीमारियां हो रही हैं। डब्ल्यूएचओ ने अकेले पश्चिम बंगाल में ही 70 लाख लोगों आर्सेनिक जनित बीमारियों के चपेट में होने का आकलन किया है। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने राज्यों को जारी एडवाइजरी में कहा है कि गंगाजल को शुद्ध किए बगैर पीने के लिए उपयोग में नहीं लाया जाए।

केंद्रीय जल संसाधन राज्यमंत्री जयप्रकाश यादव ने बताया कि कानपुर से आगे बढ़ने पर गंगा में आर्सेनिक का जहर घुलना शुरू हो जाता है। कानपुर से लेकर बनारस, आरा, भोजपुर, पटना, मुंगेर, फर्रखा तथा पश्चिम बंगाल तक के कई शहरों में गंगा के दोनों तटों पर बसी आबादी में आर्सेनिक से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं।< br />
राज्य सरकार द्वारा हाल में कराए गए कई विशेष अध्ययनों में इन क्षेत्रों में गंगाजल में आर्सेनिक की मात्रा लिमिट से ज्यादा ज्यादा पायी गई है। डब्ल्यूएचओ के मानकों के अनुसार पानी में आर्सेनिक की मात्रा प्रति अरब 10 पार्ट से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। या प्रति लीटर में 0.05 माइक्रोग्राम से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। लेकिन शोध बताते हैं कि यह इन क्षेत्रों में 100-150 पार्ट प्रति बिलियन तक आर्सेनिक पानी में पहुंच चुका है।

यादव ने बताया कि इन क्षेत्रों में बसे लोग गंगा के पानी के सेव्ना से आर्सेनिक से जुड़ी बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। इनमें दांतों का पीला होना, दृष्टि कमजोर पड़ना, बाल जल्दी पकने लगना, कमर टेड़ी होना, त्व्चाा संबंधी बीमारियां प्रमुख हैं। कुछ अन्य शोधों से आर्सेनिक के चलते कैंसर, मधुमेह, लीवर को क्षति पहुंचने जैसी बीमारियां बढ़ने की भी खबर है।

यादव ने कहा कि केंद्र सरकार इस समस्या से निपटने के लिए आर्सेनिक बहुलता वाले स्थानों पर ट्रीटमेंट प्लांट लगा रही है। राज्यों को इसके लिए मदद दी जा रही है। राज्यों को कहा गया है कि आर्सेनिक बहुलता वाले स्थानों में गंगा के पानी के ट्रीटमेंट के बाद ही उसे स्थानीय लोगों को पीने के लिए सप्लाई किया जाए। असल में अभी ऐसे प्लांट कम हैं जिस कारण सीधे लोग इस पानी को गंगाजल समझकर पी रहे और बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।
 

चावल में भी पहुंचा आर्सेनिक का जहर


वैज्ञानिक एवं औद्यौगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने अपने एक शोध में दावा किया है कि पश्चिम बंगाल, बिहार तथा उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भूजल में आर्सेनिक की मात्रा ज्यादा होने से वहां पैदा होने वाले चावल में भी आर्सेनिक पहुंच रहा है। सीएसआईआर के महानिदेशक समीर. के. ब्रह्मचारी ने बताया कि राज्य में उगाई जाने वाली 90 में से सिर्फ एक दर्जन किस्में ही ऐसी पाई गई जिनमें आर्सेनिक की मात्रा प्रति क्रिगा 150 माइक्रोग्राम से कम थी।

कुछ किस्मों में यह 1250 माइक्रोग्राम प्रति किग्रा तक पाई गई है। यह अध्ययन वर्धमान में किए गए थे तथा कुछ अन्य स्थानों में अभी जारी हैं। शोध के अनुसार सिंचाई में इस्तेमाल होने वाले भूजल के जरिये आर्सेनिक चावल में पहुंच रहा है। पश्चिम बंगाल एक बड़ा चावल उत्पादन राज्य है। जहां से पूरे देश में चावल की आपूर्ति होती है।

साभार – हिन्दुस्तान
 

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