ग्लोबल वार्मिंग को रोकना ही होगा

Submitted by admin on Sun, 03/08/2009 - 16:33

डॉ आर डी सिंह
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॅजी रूड़की, हरिद्वार में स्थित है, यहां R & D के साथ- साथ विभिन्न राज्यों द्वारा सौंपे गए रिसर्च प्रोजेक्ट पर भी अध्ययन किया जाता है। जल विज्ञान भवन में स्थित इस इंस्टीट्यूट में जल वैज्ञानिक, जल के विभिन्न आयामों पर अध्ययन करने में अनथक परिश्रम करते हैं। इस इंस्टीट्यूट के निदेशक आरडी सिंह ने हिंदी वाटर पोर्टल टीम से साक्षात्कार करते हुए बताया, “ हमारे वैज्ञानिक इतने परिश्रम से रिसर्च करके नई जानकारियां खोज निकालते हैं लेकिन उनका यह ज्ञान यहां के रिसर्च प्रकाशनों में ही सिमटकर रह जाता है, देश की जनता तक नहीं पहुंच पाता, उनके इस ज्ञान और अनुभव को आम आदमी तक पोर्टल की मदद से पहुंचाया जा सकता है।“

बातचीत को आगे बढ़ाते हुए निदेशक ने इंडिया वाटर पोर्टल के मैनेजर विजय कृष्णा को बताया कि जल प्रदूषण की समस्या को पूरा देश झेल रहा है। राजस्थान, कर्नाटक, गुजरात में फ्लोराइड की समस्या है तो पश्चिम बंगाल, बिहार और दिल्ली के कुछ इलाकों में आर्सेनिक की समस्या है। जहां एक ओर कुछ इलाके पानी की कमीं की मार झेल रहे हैं वहीं दूसरी ओर कुछ इलाकों में पानी की मात्रा बढ़ रही है, लेकिन जहां पानी पर्याप्त मात्रा में है, वहां भी जरूरी नहीं है कि सब पीने लायक ही हो। यानी पीने लायक पानी के लिए क्वालिटी और क्वांटिटि दोनों ही जरुरी हैं।

सवाल- जल प्रदूषण की समस्या पैदा क्यों हुई?
निदेशक- वाटर क्वालिटी के प्रभावित होने के कईं कारण हैं। जैसे आज हमारा किसान वर्ग अनजाने में ही फर्टीलाइजर्स और पेस्टीसाइड का बहुत ज्यादा मात्रा मे उपयोग कर रहा है। दरअसल होता यह है कि उनको लगता है कि ज्यादा मात्रा में कीटनाशकों का इस्तेमाल करके वें अपनी फसलों को सुरक्षित कर रहे हैं, उंहें इस बात का पता ही नहीं है कि फर्टीलाइजर्स और पेस्टीसाइड का, किस फसल में कितना उपयोग करना चाहिए। जब बारिश होती है तब फसलों पर छिड़के गए ये कीटनाशक भी बारिश के पानी के साथ बह कर पानी में मिल जाते हैं। अगर कहीं ये भूमिगत जल में मिल गए तो फिर उसका कोई इलाज भी नहीं है। हमारे संस्थान में डॉ एन सी घोष आर्सेनिक की समस्या और उससे निपटने के लिए उपायों पर अध्ययन कर रहे हैं।

इसके अलावा एक अन्य कारण है म्युनिसिपल और औद्योगिक कचरा। यह कचरा भी सीधे ही हमारी नदियों में मिल रहा है, जो नदियों को प्रदूषित कर रहा है।

भूमिगत जल का जरूरत से ज्यादा दोहन भी अपने आप में समस्याएं खड़ी कर रहा है, इससे एक ओर पानी की कमीं, लवणता की स्थिति तो पैदा होती ही है साथ ही पानी के अत्यधिक दोहन से भूमिगत जल के नीचे स्थित चट्टानें धीरे धीरे खुली हवा में ऑक्सीजन के सम्पर्क में आने लगती हैं इस तरह चट्टानों के ऑक्सीडेशन की प्रक्रिया से पानी में आर्सेनिक की समस्या पैदा हो रही है।

सवाल- क्या जल प्रदूषण की समस्या का कोई समाधान है?
निदेशक- जल प्रदूषण की समस्या इतनी भयानक हो गई है कि इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करने होंगे। यही एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें सबसे ज्यादा लोग पर्रभावित हैं। जरूरत है पहले तो किसानों को उन कारणों से अवगत कराया जाए जो जल प्रदूषण की समस्या पैदा कर रहे हैं। उन्हें प्रशिक्षण दिया जाए कि किस फसल के लिए कितने फर्टीलाइजर और पेस्टीसाइड की जरूरत है।

राष्ट्रीय स्तर पर वाटर क्वालिटी मॉनिटरिंग की जानी चाहिए।
जिन इलाकों में जल प्रदूषण की समस्या बहुत ज्यादा है वहां लोगों को पीने का पानी मुहैया कराया जाए।
प्रभावित इलाकों में समस्या के कारणों का पता लगाकर उचित उपाय किए जाने चाहिए, और ऐसे प्रयास करने चाहिए कि अन्य स्थान पर वैसी समस्या न हो।
औद्योगिक और म्युनिसिपल वेस्ट को नदियों में जाने से रोका जाना चाहिए।
बाढ़ और सुखाड़ आदि आपदाएं तो मौसमी हैं उसमें भी आपदा प्रबंधन प्रशासन के साथ जनता का सहयोग जरूरी है।
राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करके नदियों को प्रदूषण से रोका जाए ताकि उनका अस्तित्व बना रहे।

सवाल- यह जो आज हर जगह क्लाइमेट चेंज की बात हो रही है तो क्या आपको लगता है कि उससे हमारा जीवन भी प्रभावित होगा?
निदेशक-दरअसल यह ग्रीनहाउस इफेक्ट है, वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड की एक लेयर बन जाती है, जिससे तापमान बढ़ने लगता है। यह बढ़ा हुआ तापमान कईं तरह की समस्याएं पैदा कर रहा है। ग्लेशियरों के पिंघलने की गति तेज हो गई है अगर ऐसा ही चलता रहा तो जल के बड़े स्रोत ग्लेशियर खत्म हो जाएंगे।

तापमान में बढ़ोत्तरी से कईं तरह के मच्छर पनप रहे हैं जिनमें से कईं तो जानलेवा साबित हो रहे हैं।

खेती में भी मौसमी असंतुलन बढ़ रहा है। पहले फसलें मौसम के अनुसार बोई और काटी जाती थी क्योंकि हर मौसम का अपना एक तापमान था लेकिन अब पता नहीं कब क्या होगा। बारिश की पद्धति बदल रही है, पहले मानसून 4-5 महीने रहता था अब केवल 2-3 महीने तक ही सिमट कर रह गया है। ऐसे में कृत्रिम सिंचाई व्यवस्था प्रबंधन की जरूरत पड़ रही है। वर्षा काल घट गया है लेकिन घनत्व बढ़ गया है।

इस तरह से टाइम और स्पेस से हमारी जलीय ऊर्जा भी प्रभावित हो रही है। यानी कुल मिलाकर जलवायु परिवर्तन हमारे पूरे जीवन को प्रभावित कर रहा है।

सवाल- यदि ऐसा है तो इसके लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए?
निदेशक- ऐसे में प्रयास करने होंगे कि ग्लोबल वार्मिंग बढ़े नहीं। सरकारी स्तर पर भी प्रयास करने होंगे। ऐसे मुद्दों पर जन जागरूकता बहुत जरूरी है। जल उपलब्धता का प्रयास किया जाना चाहिए। जहां पानी अधिक मात्रा में है वहां अधिक पानी वाली फसलें लगाई जाएं और कम पानी वाली जगहों में कम पानी वाली फसलें लगाई जाएं।

ड्रेनेज सिस्टम ठीक न होने की वजह से डेंगू आदि खतरनाक मच्छर पैदा हो रहे हैं इसलिए गंदे पानी की निकासी के लिए प्रबंध भी किया जाना चाहिए। क्योंकि अगर ऐसे ही जलवायु परिवर्तन होता रहा तो नई नई प्रजातियां पैदा होती रहेंगी और खतरा मंडराता रहेगा, इस खतरे को टालने के लिए जीवन शैली में सुधार करना बहुत जरूरी है। सरकार ने भी समस्या से निपटने के लिए जलवायु परिवर्तन के लिए नेशनल एक्शन प्लान बनाया है।

For Contact - R.D. Singh, Director, National Institute of Hydrology
E-mail: rdsingh@nih.ernet.in

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