ग्लोबल वॉर्मिंग की गिरफ्त में समुद्र

Submitted by admin on Thu, 07/09/2009 - 07:03
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- सुश्री रेशमा भारती
पृथ्वी के अधिकतर भाग पर फैला समुद्र वायुमण्डल में गैसों के प्राकृतिक संतुलन, मौसम के संचालन और पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व में अहम भूमिका निभात आता है। ग्लोबल वॉर्मिंग के संदर्भ में समुद्र चर्चा में रहा है। समुद्री जल स्तर बढ़ने से तटीय क्षेत्रों के लिए उपस्थित खतरा, बढ़ते तापमान से उग्र होते समुद्री तूफान और बढ़ती गर्मी से समुद्री जीवन पर मंडराता संकट दुनियाभर के वैज्ञानिकों में चिंता का चर्चित विषय रहा है।

चूंकि समुद्र के बारे में मनुष्य की जानकारी व समझ काफी अपर्याप्त है; इसलिए निश्चित रुप से तो नहीं बताया जा सकता कि ग्लोबल वॉर्मिंग का समुद्र पर क्या व कितना असर पड़ेगा। पर अनेक वैज्ञानिकों द्वारा प्रकट विभिन्न आशंकाएं, वैज्ञानिक अनुसंधान, समुद्र की प्रकट अस्वाभाविक हलचलें और समुद्र किनारे रहने वालों के अनुभव यह संकेत दे रहे हैं कि बढ़ते तापमान से समुद्र और अंतत: पृथ्वी का प्राकृतिक संतुलन खतरे में है।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा गठित इंटरगर्वमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आई.पी.सी.सी.) की हाल की रिपोर्ट और उससे छिड़ी ग्लोबल वॉर्मिंग की चर्चा ने एक बार फिर मानव गतिविधियों से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में होती बढ़ोतरी और उससे पृथ्वी के बढ़ते तापमान की गंभीर चिंताजनक स्थिति को उजागर किया है। तापमान में होती बढ़ोतरी समुद्र पर कई किस्म के प्रतिकूल असर डाल सकती है।

विश्वभर के वैज्ञानिकों ने बढ़ते तापमान के फलस्वरुप आर्कटिक और अंटार्कटिका की ध्रुवीय समुद्री बर्फ और पहाड़ी हिम ग्लेशियरों के पिघलने की चिंताजनक स्थिति पर प्रकाश डाला है। अमरीका के नेशनल सेंटर फॉर एटमॉसफेरिक रिसर्च के एक अध्ययन के अनुसार ग्लोबल वॉर्मिंग यदि ऐसे ही जारी रही तो सन् २०४० की गर्मियों में उत्तर ध्रुवीय समुद्र में बर्फ के दर्शन दुर्लभ हो सकते हैं और यह खुला समुद्र होगा।

पिघलती बर्फ के चलते और गर्म होकर फैलने से समुद्री जल स्तर में चिंताजनक रुप से वृद्धि हो रही है। यद्यपि समुद्री जल स्तर के बढ़ने की दर या मात्रा के संदर्भ में वैज्ञानिकों में कुछ मतभेद रहे हैं; फिर भी प्राय: सभी यह स्वीकार करते हैं कि यह प्रक्रिया समुद्र तटीय क्षेत्रों, प्रायद्वपपीय देशों के अस्तित्व पर मंडराते गंभीर खतरे की सूचक है। चूंकि बर्फ की अपेक्षा खुला जल सूर्य की गर्मी अधिक सोखता है; अत: इससे पृथ्वी और अधिक गर्म हो सकती है।

आई.पी.सी.सी. की हाल की रिपोर्ट यह चेतावनी देती है कि इस सदी के दौरान समुद्री जल स्तर में वृद्धि से तटीय या निचले क्षेत्रों विशेषकर गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग अपने नष्ट हुए आवास क्षेत्रों को छोड़कर पलायन करने पर मजबूर होंगे। इससे प्रवासियों की कई लहरें जन्म लेंगी जिससे विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं में तनाव बढ़ सकते हैं।

बढ़ते समुद्री जल स्तर से दुनिया भर के अनेक द्वीपों का अस्तित्व संकट में पड़ गया हैं। भारत में विशेषकर बंगाल की खाड़ी से सटे सुदंरबन क्षेत्र के द्वीपों के समुद्र के आगोश में समाते जाने के खतरे के रुप में यह विकट स्थिति उपस्थित है। यहां हजारों की संख्या में लोगों के बेघर या विस्थापित होने की स्थिति पैदा हो रही है।

जल स्तर बढ़ने से जमीन के डूबते जाने का खतरा तो है ही, साथ ही इससे और बढ़ते हुए तूफानों से तटीय क्षेत्रों में खारापन बढ़ने की समस्या भी विकट हो रही है। बढ़ता खारापन तटीय भूमि, खेती, तटीय जैव सम्पदा और तटों के पारिस्थितिकी तंत्र को बिगाड़ रहा है।

तटीय खेतिहर भूमि को पहुँचता नुकसान, बड़े आर्थिक केन्द्र के रुप में स्थापित दुनिया के कई तटीय शहरों के अस्तित्व पर मंडराते खतरे व मजबूरन पलायन की स्थितियों के रुप में हम दुनिया की अर्थव्यवस्था पर मंडराते इस संकट को समझ सकते हैं।

तटीय मैनग्रोव जंगल अैर मूंगे की चट्टानें, जो समुद्री तूफानो से तटों की रक्षा, वायुमण्डल में गैसों के संतुलन और जल जीवों के लिए महत्त्वपूर्ण आवास व प्रजनन क्षेत्र उपलब्ध करते आए हैं; बढ़ते समुद्री जल स्तर, बढ़ते तापमान और बढ़ते खारेपन के चलते नष्ट हो रहे हैं। प्रदूषण और अंधाधुंध दोहन तो इन्हें बर्बाद करता ही आया है।

ध्रुवीय समुद्री क्षेत्रों में बर्फ पिघलने से यहां के पारिस्थितिकी तंत्र में कई बदलाव आ रहे हैं और सील, पेंग्विन, ध्रुवीय भालू जैसे जीव खतरे में हैं।

समुद्री जल के तापमान में आते परिवर्तनों से सामंजस्य न बैठा पाने वाले कई जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ा है; जबकि कई जीव तापमान में हुए बदलाव से सामजस्य बैठाने के लिए समुद्र में अपने स्वाभाविक आवास क्षेत्रों छोड़कर नए क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे हैं। बढ़ते प्रदूषण और कार्बन डायॉक्साइड जैसी गैसों के बढ़ते स्तर से समुद्री सतह पर अम्लीयता बढ़ रही है, जो समुद्री जीवों को नुकसान पहुँचा रही है। समुद्र की रासायनिक संरचना परिवर्तित होते जाने से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में कई नए, अनापेक्षित परिवर्तन आ रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग से समुद्र की प्राकृतिक संरचना में आते परिवर्तन समुद्र में जीवन शून्य क्षेत्र या डेड जोन की स्थिति पैदा करने में भी भूमिका निभा रहे हैं।

समुद्री धाराओं की स्वाभाविक गति समुद्री तल से पोषक तत्व ऊपरी सतह पर लाती रहती है। ये पोषक तत्व समुद्र के ऊपरी स्तरों व समुद्री सतह पर पाए जाने वाले जीवों जैसे सूक्ष्म समुद्री पौधों (फाइटोप्लेंक्टोन) के अस्तित्व के लिए जरुरी हैं। समुद्री धाराएं तल तक ऑक्सीजन व कार्बनडायॉक्साइड जैसी गैसें व अन्य तत्व भी ले जाती हैं, जो समुद्री तल के जीवन के लिए भी जरुरी हैं। समुद्री जल, ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते, जब अस्वाभाविक रुप से गर्म होता है; तो यह प्राकृतिक धारा प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है और समुद्री जीवन के लिए संकट उपस्थित होता है।

फाइटोप्लेंक्टोन इस दृष्टि से बहुत अहम हैं कि एक तो यह समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार हैं (अर्थात् सारा समुद्री जीवन इन पर निर्भर है) और दूसरा ये समुद्री पौधे बड़ी मात्रा में कार्बन डायॉक्साइड ग्रहण करके व ऑक्सीजन छोड़कर वायुमण्डल का प्राकृतिक गैस संतुलन बनाए रखते हैं। यदि ये पौधे अपनी भूमिका सुचारु रूप से नहीं निभा पाएंगे तो न केवल सूचना समुद्री जीवन लड़खड़ा जएगा बल्कि प्राकृतिक गैस संतुलन बिगड़ने से धरती पर मानव का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा। समुद्रों के बढ़ते प्रदूषण, ओजोन परत के छिजने से अल्ट्रावॉयलेट बी रेडियेशन के होते सीधे संपर्क और समुद्री जल के बढ़ते तापमान का इन सूक्ष्म समुद्री पौधों के अस्तित्व पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

मानसून समेत समूचा मौसम तंत्र समुद्र की हलचलों से अभिन्न रूप से जुड़ा है। समुद्र में होती अस्वाभाविक हलचलें विभिन्न देशों की जलवायु व मानसून के तौर-तरीकों में भी अस्वाभाविक परिवर्तन ला सकती हैं। गर्म होते समुद्र में एल नीनो प्रभाव (प्रशांत महासागर के गर्म होकर फैलने वाली समुद्री धाराओं से विभिन्न क्षेत्रों के मौसम का संचालित होना) के अस्वाभाविक रूप से बढ़ जाने या पलट जाने के विभिन्न देशों के मौसम पर अस्वाभाविक व अतिवादी प्रतिकूल असर पड़ने की संभावना का जिक्र भी कुछ वैज्ञानिकों ने किया है, हालांकि यह विवादग्रस्त रहा है।

ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते समुद्री जल के तापमान में हुई बढ़ोतरी से समुद्र के अधिक ऊर्जा ग्रहण करने, समुद्री जलधाराओं के प्रवाह में आते परिवर्तनों और समुद्री जल स्तर के बढ़ने का संबंध दुनिया भर के कई वैज्ञानिक समुद्री तूफानों के बार-बार आने और अधिक उग्र, ताकतवर, तीव्र और अधिक विनाशक क्षमता वाले तूफान होने से जोड़ते हैं। बढ़ते प्रदूषण और अंधाधुंध दोहन से बिगड़ चुकी तटीय पारिस्थितिकी इन तूफानों को झेलने में और भी अक्षम साबित होती है। आई.पी.सी.सी. की हाल की चर्चित रिपोर्ट भी ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते विनाशकारी तूफानों, विशेषकर उष्णकटिबंधीय तूफानों के नाटकीय रुप से बढ़ने की संभावना प्रकट करती है।

इस दौर के तूफानों में अभी से ऊँची-उफनती लहरें और हवा व लहरों की असमान्य तीव्र गति अनुभव की जा रही है। भारत में बंगाल की खाड़ी के जल स्तर में वृद्धि और तटीय सुंदरबन क्षेत्र में समुद्री लहरों की ऊंचाई व तीव्रता में अस्वाभाविक बढ़ोतरी अनुभव की गई है।

हाल के कुछ समय में अंटलांटिक् महासागर और अमरीका के तटीय क्षेत्रों, बांग्लादेश, चीन, फिलीपीन्स व इंडोनेशिया जैसे कई देशों में आए अस्वाभाविक विकराल तूफानों और समुद्र की असहज हलचलों के संदर्भ में कई विशेषज्ञों ने ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन की भूमिका का संकेत दिया है।

मनुष्य द्वारा समुद्र तटों के बढ़ते प्रदूषण और अंधाधुंध दोहन ने समुद्र को ग्लोबल वॉर्मिंग को झेलने में और भी असमर्थ बना दिया है। मनुष्य की अनेक गतिविधियों ने समुद्र में प्रदूषक तत्व छोड़े हैं और समुद्री जीवों का मनुष्य ने अत्याधिक दोहन किया है। धरती पर मानव बस्तियों में चलते असंख्य वाहन व असीमित फैक्ट्रियां, अंधाधुंध बढ़ती मशीनें ग्लोबल वॉर्मिंग की स्थिति पैदा कर समुद्र से खिलवाड़ कर रही हैं। प्रतिक्रियास्वरुप समुद्री जीवन में मची अस्वाभाविक हलचलें और उफनता हुआ समुद्र स्वयं धरती पर बसे तमाम प्राणियों के अस्तित्व के लिए भी खतरा उपस्थित कर रहा है।

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