'घनन-घनन घन घिर आए बदरा'

Submitted by admin on Wed, 07/08/2009 - 10:39
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वेब/संगठन
Source
विमल श्रीवास्तव

आकाश में छाए काले बादलों को देखकर किसका दिल झूमने नहीं लगता, चाहे वह जंगलों में रहने वाले मयूर हों, कवि हों, किसान हों या गर्मी से तपते हुए नगरवासी ।

फिर ये बादल भी कैसे-कैसे हैं; कोई तो काजल जैसे काले, कोई धुएं जैसे भूरे, कोई रूई के ढेर जैसे सफेद, तो कोई झीने दुपट्टे जैसे सफेद । इन्हीं बादलों पर अनगिनत कविताएं लिखी जा चुकी हैं, सैकड़ों फिल्मी गीत बनाए गए हैं, महाकवि कालीदास ने तो मेघदूतम् जैसा अमर महाकाव्य भी लिख डाला है । लेकिन बादलों की सुन्दरता अपनी चरम सीमा पर तब पहुंचती है जब शाम को ढलते सूरज या भोर के उगते सूरज की किरणें आकाश के साथ-साथ बादलों को भी नारंगी, लाल, पीला जामा पहना देती हैं ।

किन्तु कवियों की भाषा से अलग हट कर क्या आपने कभी सोचा है कि आकाश में छाए ये बादल है क्या, कैसे बनते हैं, अलग-अलग प्रकार के कैसे होते हैं, उनकी क्या-क्या विशेषताएं है, इत्यादि, इत्यादि ? तो आइए, आज हम इन्हीं बादलों की सैर को चलते हैं ।क्या होते हैं बादल - सर्वप्रथम तो यही देखें कि बादल है क्या ? वास्तव में हम पानी की नन्हीं बंदों अथवा वाष्प की संघनित अवस्था को बादल के रूप में देखते हैं । अधिक ऊंचाई पर ये बर्फ के नन्हें कणों के रूप में भी हो सकते हैं। पानी की इन बूंदों का आकार लगभग ०.०१ मि.मी. होता है, अर्थात ये इतनी छोटी व हल्की होती हैं कि हवा में तैरती हैं । तब ये नन्हीं बूंदें एक दूसरे से मिल कर बड़े आकार की हो जाती हैं, तो अपने ही भार के कारण नीचे पृथ्वी की ओर गिरने लगती हैं जिन्हें हम वर्षा की बंूदें कहते हैं ।यानी बादल की उत्पत्ति वायुमण्डल में उपस्थित जल कणों से होती है । ये जल कण वाष्प के रूप में होते हैं, और इनका आकार इतना सूक्ष्म होता है कि सामान्यत: ये नज़र नहीं आते । जब हवा गर्म होकर ऊपर जाती है तो अपने साथ पानी को भी ऊपर ले जाती है । चूंकि ऊंचाई पर वायुमण्डल का तानमान कम होता है इसलिए ऊपर पहुंचकर ये कण संघनित हो जाते हैं । ऐसे असंख्य कण मिलकर एक बड़ा आकार ग्रहण कर लेते हैं, जिसे हम बादल कहते हैं ।बादल वैसे तो देखने में हल्के लगते हैं किन्तु इनमें उपस्थित पानी तथा बर्फ की मात्रा अधिक हो सकती है । जैसे किसी घनघोर वर्ष वाले विशाल आकार के क्यूमलोनिम्बस बादल में पानी की मात्रा कुछ करोड़ टन हो सकती हैं। इसी प्रकार ऐसे क्यूमलोनिम्बस या क्यूमलस बादल कई वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैले हो सकते हैं।आकाश में छाए बादलों की मात्रा का अनुमान लगाने के लिए मौसम विभाग `ऑक्टा' नाम इकाई का उपयोग करता है, जिसका अर्थ है एक का आठवां भाग। जैसे यदि सारा आकाश बादलों से घिरा है तो कहा जायेगा कि आकाश में आठ `ऑक्टा' बादल हैं । यदि आकाश में लगभग आधा भाग बादलों से घिरा है तो कहा जाएगा कि आकाश में चार `ऑक्टा' बादल हैं और यदि आकाश में केवल चौथाई भाग बादल है है तो उन्हें दो `ऑक्टा' बादल कहेंगे ।

बादल तरह-तरह के - बादलों का वर्गीकरण उनकी ऊंचाई तथा आकार के आधार पर किया जाता है । ऊंचाई के अनुसार उनके तीन वर्ग होते है; कम ऊंचाई के बादल, मध्यम ऊंचाई के बादल (आल्टो), तथा अधिक ऊंचाई के बादल (सिरों) । इसके अलावा बादलों का एक ऐसा वर्ग भी होता है जिसमें बादल कम ऊंचाई से आरम्भ होकर ऊर्ध्वाकार उनके आधार से नापी जाती है । इस प्रकार यदि कोई बादल भूमि से एक कि.मी. ऊपर से आरम्भ होकर चार कि.मी. की ऊंचाई तक फैला है तो उसकी ऊंचाई एक कि.मी. मानी जाती है ।

इसी प्रकार आकार के आधार पर भी उनके तीन वर्ग किए गए हैं। गोभी के फूल के आकार के अथवा धुनी रूई के ढेर जैसे बादल अर्थात कयूमलस, परतदार बादल अर्थात स्ट्रेटस, घुंघराले बालों के गुच्छों जैसे बादल अर्थात सिर्रस तथा वर्षा से भरे बादल अर्थात निम्बस । सारे बादलों का नामकरण इन्हीं दो विशेषताओं अर्थात ऊंचाई तथा आकार के आधार पर किया जाता है ।

सिर्रस बादल -

इसके अन्तर्गत सिर्रस, सिर्रोस्ट्रेटस तथा सिर्रोक्यूमलस बादल आते हैं । अत्यधिक ऊंचाई (६ से १० कि.मी.) पर स्थित ये बादल अत्यंत झीने होते हैं, जिनसे सूर्य का प्रकाश छन कर आता है । अधिक ऊंचाई पर स्थित होने के कारण ये बादल अधिकतर बर्फ के करणों के रूप में होते है, इसलिए इनका रंग सफेद होता है ।

सिर्रस बादल देखने में ऐसे लगते हैं जैसे किसी वृद्ध से सफेद घुंघराले बालों के गुच्छों को काट कर सारे आकाश में बिखेर दिया गया हो, या फिर किसी पक्षी के मुलायम सफेद पंख आकाश में उड़ गए हों । इतनी ऊंचाई पर बहुत तेज़ हवाएं चलती हैं, जिन्हें जेट स्ट्रीम कहते हैं (इनकी गति कभी-कभी १०० कि.मी. प्रति घण्टा से भी अधिक होती है) । इसलिए ये बादल बहुत तेज़ी से गतिमान रहते हैं ।

सिर्रोस्ट्रेटस बादल, जिनका आकार रूई की पतली परत जैसा होता है, किसी झीने सफेद दुपट्टे जैसे दिखते है तथा आकाश में इधर उधर छितराए से नज़र आते हैं । कभी-कभी तो ये पतले होते हैं कि इनमें से सूरज और चांद भी दिख जाते हैं ।

सिर्रोक्यूमलस बादल जिनका आकार रूई के ढेर जैसा होता है, देखने में ऐसे लगते हैं जैसे किसी ने ढेर सारी रूई धुनकर गगन में उलट दी हो । इन बादलों की आकृतियां कभी किसी पशु, किसी पक्षी या मछली या कभी किसी पर्वत के जैसी दिखती है, जो इनकी गति के कारण बदलती रहती है ।

मध्यम ऊंचाई के बादल -

मध्यम ऊंचाई (२ से ६ कि.मी.) पर स्थित होने के कारण ये बादल प्राय: जल (द्रव) के रूप में होते हैं । किन्तु यदि वायुमण्डल का तापमान काफी कम हो तो ये बर्फ के कणों के रूप में भी हो सकते हैं । इनका रंग भी प्राय: सफेद होता है । इनके अन्तर्गत आल्टोस्ट्रेटस बादल तथा आल्टोक्यूमलस बादल आते हैं, जो आकाश में किसी झीनी चादर की तरह या किसी मक्खन के ढेर की तरह दिखते हैं ।

कम ऊंचाई के बादल -

कम ऊंचाई (भूमिगत से ऊंचाई ० से २ कि.मी.) पर स्थित होने के कारण ये बादल प्राय: द्रव रूप में होते हैं, किन्तु तापमान यदि कम हो तो ये बर्फ के कणों के रूप में भी हो सकते हैं । कम ऊंचाई के बादलों में निम्बस, निम्बोस्ट्रेटस, तथा स्ट्रेटोक्यूमलस प्रमुख हैं । ये बादल मुख्यत: सफेद या हल्के भूरे रंग के होते हैं । इनके कारण हल्की या मध्यम वर्षा होती है ।

खड़े बादल -

इन बादलों के आधार की ऊंचाई वैसे तो भूमि तल से दो कि.मी. अथवा कम से आरम्भ होती है किन्तु ये आकाश में बहुत अधिक ऊंचाई तक फैले रहते हैं (कभी-कभी तो १२ कि.मी. की ऊंचाई तक) । इनमें आते हैं क्यूमलस तथा क्यूमलोनिम्बस । मौसम संबंधी अधिकतर घटनाएं (जैसे घनघोर वर्षा, बादलों का गरजना, बिजली का चमकना आदि) मुख्यत रूप से इन्हीं बादलों के कारण होती हैं । और इनमें भी क्यूमलोनिम्बस (इन्हें संक्षिप्त् रूप में सीबी बादल कहते हैं) सबसे प्रमुख हैं ।

क्यूमलस बादलों का रंग सफेद तथा क्यूमलोनिम्बस का भूरा या काला होता है । यदि हवा में पर्याप्त् नमी हो तो ज़्यादातार मामलों में क्यूमलस बादल विकसित होकर क्यूमलोनिम्बस बादल बन जाते हैं । क्यूमलोनिम्बस बादलों के संबंध में ही कवि लोग `घुमड घुमड कर काले बदरा छाए' कहते हैं, इनसे ही घनघारे वर्षा है, तेज़ झोंकेदार हवाएं चलती हैं, बादल गड़गड़ाते हैं, बिजली चमकती है या बिजली गिरती हैं, ओले गिर सकते हैं या हिमपात भी हो सकता है ।क्यूमलोनिम्बस बादल विमानों के लिए संकट माने जाते हैं तथा विज्ञान चालक इनसे बहुत घबराते हैं । विमान चालकों का यह प्रयास रहता है कि विमान को इन बादलों से दूर ले जाया जाए । यदि विमान को तेज़ झटके लगते हैं । कभी-कभी तो विमान के ढांचे को भयंकर हानि भी पहुंचती है । दूसरी ओर इन्हीं बादलों के कारण खेतों में वर्षा होती है जिससे अनाज उत्पन्न होता है, इनसे ही झुलसाने वाली गर्मी से राहत मिलती है और अनेक नगरों को पेयजल मिलता है।

बादलों का रंग -

बादलों का रंग सामान्यत: सफेद होता है । इसका कारण यह है कि बादलों के स्थित जल या बर्फ कण सूर्य के अधिकतर प्रकाश को परावर्तित कर देते हैं । इस परावर्तित प्रकाश में सभी सात रंग होते हैं जो मिलकर सफेद रंग बन बनाते हैं ।यदि बादलों में उपस्थित जल कण अत्यंत सघन होते हैं, तो बादल सारे प्रकाश को परावर्तित नहीं कर पाता, बल्कि कुछ प्रकाश को रोक लेता है । इस कारण बादल का रंग भूरा या काला दिखता है। पानी बरस जाने के बाद जलकणों की सघनता कम हो जाती है, जिसके कारण बादल फिर से सफेद दिखने लगते हैं।

कभी-कभी शाम को ढलते सूरज या ऊषाकाल के समय उगते सूरज की किरणें आकाश में अत्यंत खूबसूरत इन्द्रधनुषी रंगों का जाल-सा फैला देती हैं। उस समय ऐसा लगता है, जैसे किसी चित्रकार ने अपने कैनवास पर लाल, नारंगी, पीले, हरे, नीले, आसमानी या बैंगनी रंग बिखेर दिए हों । ऐसा इसलिए होता है कि सूर्य के क्षितिज के निकट होने के कारण उसकी किरणें वायुमण्डल में उपस्थित वायुकणों से टकरा कर चारो ओर बिखर जाती हैं जिसके कारण इन किरणों का प्रकाश वर्णक्रम के विभिन्न रंगों में विभाजित हो जाता है । इसलिए ये बादल रंगीन दिखने लगते हैं । इसे प्रकीर्णन कहते हैं और यह प्रभाव सूर्य किरणों की कम तरंग लंबाई वाली किरणों को ज़्यादा बिखेरता है इसलिए अधिक तरंग लंबाई वाले लाल, नारंगी तथा पीले रंग अधिक प्रभावी नज़र आते हैं ।

तो इस प्रकार `मेघा छाए आधी रात, बैरन बन गई निंदिया' वाले बादलों की सैर करके हमें यह पता लग जाता हैं कि ये बादल बिजली की तलवार चलाएंगे या बुदों के बाण ।