जब पूरा गांव ही बन गया भगीरथ

Submitted by admin on Tue, 09/23/2008 - 16:54

बियाबान में फूलबियाबान में फूलसामूहिक प्रयास कैसे बियाबान में फूल खिला सकते हैं, यह देखना है तो आपको एक बार कन्नौज के उदैतापुर गांव जाना पड़ेगा। राजा भगीरथ गंगा को धरती पर लाए, तो उनका प्रयास मुहावरा बन गया। अब पूरे गांव ने मिलकर पानी का संकट दूर किया, टंकी खड़ी की और घरों तक पाइपलाइन डाल दी। वह भी सरकार से एक पैसा लिये बिना। छोटा-सा यह गांव उन लोगों को रोशनी दिखाता है, जो खुद कुछ करने के बजाय भगवान या सरकार भरोसे बैठे रहते हैं। उदैतापुर का भगीरथ प्रयास साबित करता है कि लोग चाह लें, तो सरकारी मदद के बिना भी गांव चमकने लगेंगे। अंधाधुंध जल-दोहन के चलते उदैतापुर एक दशक पहले प्यास से बेहाल था। जलस्तर गिरने से कुएं सूखने लगे थे और हैंडपंप बालू उगल रहे थे। मर्द, औरतें खेत-खलिहान छोड़कर बचे कुओं पर बाल्टी लेकर अपनी बारी का इंतजार करते। इन हालात में उदैतापुर ने अफसरों से गुहार लगायी, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। एक हैंडपंप लगाने में 20-25 हजार रुपये का खर्च बताया गया, लेकिन सभी परिवार यह खर्च बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थे। ग्राम पंचायत ज्यादा से ज्यादा तीन-चार हैंडपंप लगा सकती थी।

उम्मीद की डोर टूटने लगी थी, लेकिन कुछ लोगों ने हार नहीं मानी। पानी के इंतजाम में दिन खपाने के बाद रात को चौपाल लगाकर उपाय खोजे जाते। ऐसे लोगों में ग्राम प्रधान रत्नेश दुबे भी थीं। उन्होंने लोगों से श्रमदान के लिए अनुरोध किया। उनके साथ खड़े थे पति गिरीश दुबे। लोग पहले झिझके, लेकिन फिर तैयार हो गए। देखते-देखते गांव में दस हजार लीटर क्षमता की पानी की टंकी बन गई, सबमर्सिबल पंप की बोरिंग भी हो गई। इसके बाद लक्ष्य था घरों तक पानी पहुंचाने का। कमल किशोर दुबे, श्याम किशोर, छुन्नीलाल सविता, शिवकुमार, सरीफुद्दीन, अवधेश कुमार दुबे, सुरेंद्र सहित गांव के 30 परिवार आगे बढ़े। पैसा जमा हुआ और फिर घरों तक पाइप लाइन बिछाकर पानी की आपूर्ति शुरू करने में देर नहीं लगी। जो परिवार पाइप लाइन का खर्च नहीं उठा सकते थे, उनके लिए गांव के कुछ स्थानों पर सार्वजनिक नल लगाकर पानी का इंतजाम किया गया। टंकी की देखरेख, साफ-सफाई जैसे काम आज भी गांव वाले मिलजुल कर करते हैं। सामूहिक सहयोग की यह यात्रा आठ बरस पूरे कर चुकी है। सुबह-शाम सबमर्सिबल पंप चलाकर टंकी को भरा जाता है और 24 घंटे आपूर्ति जारी रहती है।

साभार - विवेक गुप्ता

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