जलवायु परिवर्तन और मध्यप्रदेश

Submitted by admin on Sat, 07/04/2009 - 12:46
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सचिन कुमार जैन

क्या धरती बन रही है चिता?


मध्यप्रदेश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का सीधा असर देखा और महसूस किया जा सकता है। यह एक अहम अनाज उत्पादक इलाका रहा है पर यहां पिछले सात सालों में इसके चलते किसानों व पान उत्पादकों का जिंदगी बदल कर रख दी है। जलवायु परिवर्तन ने यहां कृषि आधारित आजीविका और खाद्यान्न उत्पादन पर खासा असर डाला है। मध्यप्रदेश के उत्तर-पूर्वी जिलों में पिछले 9 सालों में खाद्यान्न उत्पादन में 58 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। पिछले चार-पांच सालों में बेहद कम पानी बरसने या कई क्षेत्रों में सूखा पड़ने के चलते इस क्षेत्र के तकरीबन सभी कुएं सूख चुके हैं। निष्चित तौर पर यह कृषि आधारित समाज तथा उसकी आर्थिक स्थिति के लिए बेहद गंभीर बात है। मध्यप्रदेश में कृषि क्षेत्र में नाकामी अब एक चक्रीय परिघटना बन चुकी है, और जलवायु परिवर्तन इसका बड़ा कारण है।

मतलब क्या है?


हम बार-बार यह कह रहे हैं कि आने वाले 30 से 40 वर्षों में पृथ्वी के तापमान में 2 डिग्री और जिस वातावरण में हम रहते हैं, उसमें 3 से 4 डिग्री की बढ़ोत्तरी हो जायेगी यानी आज जो तापमान 44 से 45 डिग्री है वह 47 से 49 डिग्री तक पहुंच जायेगा। मध्यप्रदेष में विदिषा, बड़वानी और ग्वालियर ऐसे इलाके हैं जहां गर्मी के मौसम में तापमान 50 डिग्री तक पहुंच चुका है। जलवायु परिवर्तन का मतलब केवल यह नहीं है कि गर्मी बढ़ेगी, बल्कि इसका मतलब यह भी है कि जिस मौसम में जो होना चाहिये वह नहीं होगा।

शीत ऋतु में ठण्ड पड़ना चाहिये, हो सकता है कि ठण्ड न पड़े। दिसम्बर-जनवरी के दरम्यान हमारा किसान सोचता है कि मावठा गिरे, पर पिछले दिनों में मावठा गिरने की व्यवस्था में बड़े परिवर्तन देखे गये हैं, इस साल अप्रैल में तीन से पांच दिन तक मध्यप्रदेष में बारिष हुई और ओले गिरे, जिससे न केवल बीमारियों के मामले बढ़े बल्कि खलिहानों में कटकर रखी हुई फसलों को भारी नुकसान पहुंचा। शहर में रहने वाला मध्यमवर्गीय व्यक्ति ने तो सोचा कि चलो, गर्मी से थोड़ी राहत मिली पर उसने यह नहीं सोचा कि यह गर्मी बेतहाषा बढ़ क्यों रही है? मेरे घर के फ्रिज, ए.सी., चार पहिया वाहन, जंगलों की कटाई, भूमि का कांक्रीटीकरण, मिट्टी के बह जाने जैसी स्थितियों की इसमें क्या भूमिका है? इससे भी आगे बढ़कर हमारी सरकारें इतनी बेवकूफी भरी नीतियाँ बना रही हैं जिनसे जलवायु परिवर्तनको और प्रोत्साहन मिल रहा है। एक तरफ तो क्लाइमेट चेंज एक्षन प्लान बनाया जा रहा है तो वहीं दूसरी तरफ वनों के विनाष और प्राकृतिक सम्पदाओं को खत्म कर देने वाले उद्योगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन का मतलब है पर्यावरण के चक्र, उसकी व्यवस्था और हरकतों में अस्वाभाविक पारिवर्तन होना। प्रमाण बताते हैं कि जलवायु परिवर्तनकई सभ्यताओं के खतम हो जाने का बड़ा कारण रहा है। हड़प्पा, हितितीस और प्राचीन इजिप्ट की सभ्यताओं के खत्म होने का एक बड़ा कारण पर्यावर्णीय बदलाव था। अब एक बार फिर यह बदलाव मानव सभ्यता के लिये संकट बन कर उभर रहा है।

मौसम के चरित्र में परिवर्तन से मलेरिया, तपेदिक, कोलेरा और कैंसर के मामलों में खूब वृध्दि हुर्इ्र है। अब फाल्सीपेरम मलेरिया के सबसे ज्यादा प्रकरण मध्यप्रदेष मे दर्ज हो रहे हैं। राज्य की स्वास्थ्य कार्ययोजना एवं समीक्षा दस्तावेज के मुताबिक वर्ष 2004 में एक लाख की जनसंख्या पर 405 व्यक्ति अस्थमा से प्रभावित थे जो वर्ष 2015 में बढ़कर 596 होने का आकलन है। इसी तरह मधुमेह का प्रभाव 310 से बढ़कर 460 होने वाला है, और डायरिया 760 से आगे जाकर 880 व्यक्तियों को अपनी चपेट में ले लेगा। वर्ष 2004 कैंसर से 8.07 व्यक्ति प्रभावित थे, जो बढ़कर 9.99 होने का आकलन है....

मध्यप्रदेष में विकास के नाम पर सड़कें बनाने और अधोसंरचनात्मक विस्तार का काम हो रहा है परंतु अस्थाई विकास की इस परिभाषा पर कोई बहस नहीं है। इस आधुनिक विकास का एक सूत्रीय फार्मूला है, आर्थिक विकास यानी लोगों की बस आय बढ़े, वे धन सम्पन्न हों। हम सब जानते है कि जिम्मेदार तरीके से तो रातों-रात धन सम्पन्न नहीं हुआ जा सकता है और यदि हमारे यहां का शेयर बाजार और 100 चुने हुये घराने 15 साल में खरबों की अकूत सम्पदा के मालिक बन गये हैं, तो इसका मतलब है कि उन्हाेंने अनैतिक और गैर-ईमानदार रास्ते अपनाये हैं। फिर जब इन्हें लगा कि अकेले आगे नहीं बढ़ा जा सकता है तो उन्होंने देष-समाज के एक खास वर्ग को इस आर्थिक विकास के सपने बेचे। भारत में आज लगभग एक करोड़ लोगों के डी-मेट एकाउण्ट है, यानी वह खाता जिससे शेयर बाजार का व्यापार किया जाता है। ये 100 खरबपति और उनकी 1 करोड़ लोगों की सेना विकास का ध्वज लेकर पर्यावरण मूल्य, व्यवस्था और परम्पराओं को रौंदती हुई अपने खतरनाक मंसूबों को लेकर इतनी आगे बढ़ चुकी है कि आर्थिक आय के ऊंचे लक्ष्य को हासिल करने के लिये वे कोई भी विनाष करने को तैयार है। सिध्दान्त सीधा है जब आय बढ़ेगी तो लोग खर्च करेंगे। वे खर्च कहां करेंगे ये विज्ञापन और बाजार के मनोविज्ञान के विषेषज्ञ मिलकर तय करते हैं। वे बताते हैं कि कौन से पेन से लिखेंगे, कौस सा दंत मंजन उपयोग में लायेंगे, कौन सा वातानुकूलन यंत्र और प्रशीतक यंत्र (फ्रिज) अपने घर में रखेंगे और फिर कौन सा चार पहिया वाहन उनकी शान का हिस्सा होगा। यह सब कुछ स्टेटस सिंबल है।

टाटा जी की दुकान तभी चलेगी जब लोग उनकी कार, नैनो कार खरीदेंगे। सपना दिखाया गया कि यह भारत के आम आदमी की कार है। एक लाख रूपये जैसी कम कीमत पर। जरा रूकें और सुने। किसी ने सोचा कि हर साल चार पहिया के काफिले में 10 लाख की वृध्दि होती जा रही है वे चलेंगी कहां? जवाब है - सड़कों पर, सड़क तो है नहीं? तो सड़के बनाओ, फिर चाहे खेती की जमीन पर बुल्डोजर चले, हरे पेड़ों पर इलेक्ट्रिक ट्री कटर (अब आरी तो चलती नहीं और कुल्हाड़ी भी देर करती है) चलाओ, पहाड़ काटो, जैसे इंदौर में पहाड़ काट दिये गये। कुछ भी करो पर कारों के लिये आठ लेन चौड़ी, चिकनी सड़कें बनाओ।

घातक होती वाहनों की भीड़!यातायात के साधनों में वृध्दि सुविधा की दृष्टि से निर्विवाद विषय है किन्तु जब कार्बन उत्सर्जन की बात करें तब जरा बहस करने की जरूरत नकारी नहीं जा सकती है। भारत सरकार ने आटोमोबाईल सेक्टर को उदारता के साथ कम्पनियों के लिये खोल दिया है, दुनिया के किसी भी कोने से आओ और वाहन बनाओ हम सब सुविधा देंगे। यही कारण है कि 1998-99 जहां भारत में 42 लाख वाहनों का उत्पादन होता था वह 2004 में बढ़कर 73 लाख हो गया। इतना ही नहीं 1998 में 3.9 लाख कारें बनती थी अब 10 लाख कारें बन रही हैं, दो पहिया वाहनों का निर्माण हर साल 33.74 लाख से बढ़कर अब 55 लाख तक पहुंच चुका है। इससे कार्बन उत्सर्जन में भारी बढ़ोत्तरी हुई है।

सेंटर फॉर साईंस एण्ड एन्वायर्नमेंट ने आटोमोटिव रिसर्च एसोसियेषन ऑफ इण्डिया से सूचना के अधिकार के करते हैं? इसके जवाब में एसोसियेषन ने यह कहकर जानकारी देने से मना कर दिया कि यह सूचना देने से कम्पनी के व्यावसायिक हित प्रभावित होंगे। वे इस जानकारी को जनहित में नहीं मानते हैं। यही एसोसियेषन कम्पनियों को कार्बन उत्सर्जन और ईंधन उपभोग का प्रमाणपत्र देती है।

फिर केन्द्रीय सड़क परिवहन, जलयान और राजमार्ग मंत्रालयों ने जवाब दिया कि वे ऐसी कोई जानकारी रखते ही नहीं हैं। ऐसे में सीएमई ने अध्ययन करके पता लगाया कि वर्ष 2000 के बाद बनी हुई 1400 सीसी की कार हर एक किलोमीटर पर 143 ग्राम कार्बन उत्सर्जित कर रही है जबकि 2005 में निर्मित कार 173 ग्राम कार्बन पैदा कर रही है। इसी तरह डीजल ईंजन कार 129 से 149 ग्राम कार्बन प्रति किलोमीटर पैदा करती है। 3000 सीसी तक के बड़े वाहन 189 ग्राम प्रति किलोमीटर से 256 ग्राम प्रति किलोमीटर कार्बन का उत्पादन करते हैं। आष्चर्यजनक रूप से इस अध्ययन से पता चला कि वर्ष 2002 के बाद बने वाहन ज्यादा कार्बन डाईआक्साईड पैदा कर रहे हैं और ईंधन की ज्यादा खपत के कारण यह स्थिति पैदा हो रही है। क्या हम जीवन में थोड़ा संयम रख पायेंगे?

फिर शहरीकरण का मतलब है इमारतें बनाना; जिसके लिये सीमेंट-पत्थर चाहिये। रहने के लिये घर बनाना तो ठीक पर अम्बानी श्री का 27 मंजिला मकान कहते हैं कि 1500 करोड़ का बना है, उस पर हवाई जहाज उतर सकता है। इन सबके लिए सीमेंंट की खदानें चाहिये। मध्यप्रदेष में 10 जिलों में सीमेंट के उत्पादन के लिये 20 हजार हैक्टेयर जमीन को खदानों में बदल दिया गया। जंगल काटे गये अब तो नदियों-बांधों की धारायें कम्पनियों की सेवाओं में मोड़ी जा रही हैं ताकि उन्हें पानी मिल सके। सूचना प्रौद्योगिकी आधुनिक विकास की आत्मा में प्रवेश कर चुकी है, क्या आप जानते हैं कि एक कम्प्यूटर जितनी जहरीली गैसों का उत्सर्जन करता है, उसके लिये हर कम्प्यूटर के आसपास 10 बड़े पेड़ होना चाहिए, नहीं तो यही अकेला कम्प्यूटर आपके आसपास बीमारियों की खान तो खड़ी कर ही देता है साथ ही ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करके पर्यावरण के चक्र को बदल रहा है।

संसद भी मानती है संसद की जलवायु परिवर्तन पर 193वीं स्थाई समिति की रिपोर्ट ने उल्लेख किया है कि भारत की कृषि व्यवस्था पर पर्यावरण चक्र में बदलावों का गहरा प्रभाव पड़ेगा। ज्यादातर अनाजों की उत्पादकता तापमान में बढ़ोत्तरी और पानी की कमी के कारण नकारात्मक रूप से प्रभावित होगी। सूखे और बाढ़ के कारण उत्पापदन की प्रक्रिया पर गहरा असर पड़ेगा। इसका असर माइक्रोब्स, पैथोजन्स और कीटों पर भी पड़ेगा। यह समिति कहती है कि इन परिस्थितियों के कारण खाद्यान्न व्यापार में असंतुलन की स्थिति पैदा होगी। जिसका यूरोप और उत्तरी अमेरिका फायदा उठायेंगे पर संकटों का सामना हमें करना पड़ेगा। साथ ही बनाती है कि पर्यावर्णीय बदलाव का मानसून वर्षा पर क्षेत्रीय बदलाव साफ दिख रहा है। समिति ने पूर्वी मध्यप्रदेष में बारिष की निरंतर हो रही कमी को इससे जोड़कर देखा है।

दुनिया के विकसित देष चाहते हैं कि इन्हीं गैसों को जप्त (सोखने) के लिए भारत जैसे विकासषील देष खूब पेड़ लगायें परन्तु माइक्रोसाफ्ट इसके लिये जिम्मेदार नहीं बनाया जायेगा। अब तो एक विषेषज्ञ समिति ने इतना तक कह दिया है कि जिन देषों में पशुधन को बढ़ावा दिया जाता है, उन्हें पशुधन खत्म करना चाहिये, क्योंकि उनसे मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है, जो प्रदूषण का बड़ा कारण है। क्या बेतुकी बात है? वास्तव में जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं के लिये विकसित देष गरीब और विकासषील देषों को लपेटने के चक्कर में हैं। वे यह कहने लगे हैं कि जो कारें या उत्पाद भारत जैसे देषों में बनते है। वे पर्यावरण के मानकों के अनुरूप नहीं हैं। हमारी तकनीक और उत्पाद मानकों के अनुरूप हैं इसलिये आप (जैसे भारत) इनका उपयोग करे। देख लीजिये एम्बेसडर तो गायब हो ही गई है अब आधी देषी कार मारूती भी सड़क में आ चुकी है। विकसित तकनीकों के नाम पर भी स्थानीय तकनीकों और स्थानीय व्यवस्थाओं को निषाने पर लिया जा चुका है। ऐसा करते ही देष-दुनिया की चुनिंदा कम्पनियाँ बाजार और समाज को अपने कब्जे में ले लेती हैं। हमारी जिंदगी के तौर तरीके आज तात्कालिक मजा तो दे रहे हैं, परंतु वे आने वाले सालों में हर तरफ से गहरी पीड़ा देने वाले हैं।

यूं ही बेवफ़ा नही हुई खेती!

यह बहुत सीधा-साधा मसला है। अब तक अपनी सहूलियत और अनुभवों के आधार पर हम पढ़ते-पढ़ाते रहे हैं कि भारत में कृषि, मानसून का जुआ है। यदि मानसून अच्छा रहा तो खेती अच्छी होगी और यदि खेती अच्छी रही तो समाज और लोग स्वस्थ्य-प्रसन्न रहेंगे क्योंकि 100 में से 80 लोग खेती से कभी जुड़े रहे। अब इनमें से 17 लोग खेती से नाता तोड़ चुके हैं क्योंकि सरकार लगातार ऐसी नीतियाँ बना रही है जिससे गांव के व्यक्ति को महसूस होने लगे कि खेती से प्रेम करना ठीक नहीं है, खेती अब बेवफा हो चुकी है। अब सरकार भी यही कहती है, परन्तु इस संकट को खड़ा करने में सरकार की भूमिका खलनायक की रही है जिसने बाजार को संसाधनों पर कब्जा करने देने का माहौल और स्थान बनाया।

मध्यप्रदेष में वर्ष 1994 से वर्ष 2008-09 के बीच 14 से 39 जिले सूखाग्रस्त घोषित किये जाते रहे हैं। सूखा पहले भी पड़ता रहा है किन्तु अब यह जलवायु परिवर्तन की अनिष्चितता का परिणाम है कि मध्यप्रदेष में सूखा एक स्थाई परिघटना बनता जा रहा है। अब सूखे के बादलों ने मालवांचल का रूख किया है। पिछले साल मध्यप्रदेष के 21 जिलों में 20 से 59 प्रतिषत कम बारिष हुई है जिनमें से ज्यादातर मालवा के इलाके में है। बुदंलखण्ड पिछले कुछ सालों से राजनैतिक मंचों की बहस का मुद्दा बना रहा है। उपेक्षा की नीतियों, पर्यावरण चक्र में बदलाव के कारण पैदा हुये सूखे और प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करने वाली विकास नीतियों के कारण यहां विनाष की एक श्रृंखला शुरू होती दिख रही है। बारिश की मात्रा के लिहाज से बुंदेलखण्ड में वर्ष 2008 का मानसून अच्छा घोषित कर दिया गया परन्तु इस तथ्य पर सरकार के अफसरान का ध्यान नहीं गया कि वर्ष 1999-2000 तक इस इलाके में बारिष के दिनों की संख्या 52 हुआ करती थी, वह 2008 में लगातार घटते हुये 24 तक आ गई है। सामान्य कृषि का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति जानता है कि खेती के लिए बारिष के दिन, समय और मात्रा तीनों बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। अब सरकार के मुताबिक बुंदेलखण्ड सूखा प्रभावित नहीं है किन्तु बीते वर्ष मानसून बेहद अव्यवस्थित रहा। ज्यादातर बारिष जून के शुरूआती दिनों में ही हो गई जिससे लोग बुआई नहीं कर सके और फिर तीन-चार दिन इतनी बारिष हुई कि बाढ़ के हालात बन गये। तकनीकी रूप से पानी की मात्रा पर्याप्त रही परन्तु व्यवहारिक रूप से संकट कायम रहा।

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