जलवायु परिवर्तन पर शोध और सहयोग

Tue, 06/30/2009 - 11:51
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B. R. Neupane,
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1) भारत में उपलब्ध साफ़ पानी के स्रोतों और जलवायु परिवर्तन के बारे में वर्तमान में किस प्रकार का ज्ञान-कोष उपलब्ध है?
2) पर्यावरण बदलाव, उसके कारण पड़ने वाले प्रभावों और इसे जलवायु अनुकूल बनाने हेतु भारत के पास वर्तमान में किस प्रकार की क्षमता उपलब्ध है?
3) बिन्दु 1 व 2 के मद्देनज़र, कृपया जलवायु सम्बन्धी विशिष्ट शोध क्षेत्र और कार्यक्षमता बढ़ाने हेतु कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दें।
4) जलवायु परिवर्तन एक बड़ा विषय है, इसलिये क्षेत्रीय सहयोग और सामूहिक कार्ययोजना अति-आवश्यक है। इसलिये, भारत और दक्षिण एशिया में किस प्रकार की क्षेत्रीय जिम्मेदारियाँ दी जा सकती है, जिससे जलवायु परिवर्तन से लड़ने और इसे अनुकूल बनाने में मदद मिले?

मैं, नई दिल्ली स्थित “यूनेस्को” के समूह ऑफ़िस में “वाटर साइंसेस” हेतु साउथ एशिया रीजनल प्रोग्राम स्पेशलिस्ट के बतौर कार्यरत हूँ। हम लोग अगस्त 2009 में “पर्यावरण में बदलाव तथा विश्व के जल स्रोत” विषय पर एक तीन दिवसीय सेमिनार आयोजित करने जा रहे हैं। दिल्ली इंजीनियरिंग कॉलेज, कोलम्बिया विश्वविद्यालय, CIP ट्रस्ट तथा “वाटर कम्यूनिटी” चारों इस वर्कशॉप के प्रमोटर हैं। इस सेमिनार/वर्कशॉप का मुख्य उद्देश्य, वैश्विक स्तर पर होने वाले सभी छोटे और बड़े हाइड्रोलॉजिकल बदलावों और प्रभावों का मूल्यांकन करना है। इस सेमिनार में इस बात पर भी चर्चा होगी कि भारत और इस क्षेत्र की क्या-क्या आवश्यकतायें हैं।
पूरी दुनिया में इस समय साफ़ पानी के स्रोतों पर तेजी से बढ़ती बेकाबू जनसंख्या और प्रति व्यक्ति पानी के उपभोग में बढ़ोतरी के कारण बहुत अधिक दबाव है, और इसके मुख्य कारणों में है ऊर्जा की खपत में बढ़ोतरी, मानवकेन्द्रित जलवायु परिवर्तन और अन्य हाइड्रोलॉजिक बदलाव। कई प्रमुख नदियाँ, अब पूरे वर्ष तक समुद्र में पानी नहीं पहुँचाती हैं, बीच रास्ते में ही खत्म हो रही हैं, लगभग प्रत्येक क्षेत्र में भूजल का स्तर सैकड़ों मीटर नीचे जा रहा है, कई प्रमुख बड़े-बड़े और काफ़ी मात्रा में जल देने वाले “एक्विफ़र” भी धीरे-धीरे खतरे में पड़ते जा रहे हैं, विभिन्न जलचरों के निवास जल प्रदूषण के कारण समाप्ति की कगार पर पहुँच चुके हैं। जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण शोध हुए हैं (जैसे जलवायु परिवर्तन के कारण, प्रभावों का विश्लेषण, उनकी प्रवृत्ति आदि), “मिटिगेशन” (जैसे कार्बन विकेन्द्रीकरण, उर्जा के वैकल्पिक स्रोत तथा नीतियाँ) एवं अनुकूलता (जैसे बदलावों के प्रति जागरूकता, गर्म हवायें और लहरें, शहरी जीवन पद्धति, समुद्री जलस्तर में बढ़ोतरी आदि)। हालांकि फ़िर भी इसके महत्व की पहचान होने के बाद, यह हाइड्रोलॉजिक बदलावों सम्बन्धी एक विशाल शोध क्षेत्र का एक छोटा अंश भर है।
वैश्विक स्तर पर शुद्ध पेयजल स्रोतों का घटते जाना, एक बड़े संकट की आहट है। इसका मनुष्यों और प्रकृति पर पड़ने वाला प्रभाव “ग्रीनहाऊस गैसों” से उत्पन्न होने वाले खतरे से भी कहीं बड़ा है। सभी दूर बढ़ता हुआ शहरीकरण, नदी के किनारों को छोटा कर रहा है, वहीं निचले इलाकों के समुद्री किनारों को भी नुकसान पहुँचा रहा है। इसी प्रकार खेती का तीव्रकरण, जंगलों को नुकसान पहुँचा रहा है, जिस कारण रेगिस्तानों का जन्म हो रहा है। खेती और शहरीकरण के लिये पानी के अत्यधिक दोहन के कारण ही वातावरण में हाइड्रोलॉजिक बदलाव हो रहे हैं। यही बदलाव पानी की गुणवत्ता पर भी प्रभाव डाल रहे हैं। क्षेत्रीय और वैश्विक जलस्रोतों पर जलवायु परिवर्तन के कारण पड़ने वाले प्रभावों और दबावों को समझने, उसके बारे में अनुमान लगाने और उनका उचित प्रबन्धन करना अब महत्वपूर्ण हो गया है।
स्थानीय स्तर पर मनुष्य द्वारा पानी के उपयोग, भण्डारण और उसके असमान वितरण, भूमि में किये जा रहे बदलावों, और प्रदूषण के कारण हाइड्रोलॉजिक चक्र में जो परिवर्तन आ रहे हैं, वह स्थानीय तथा वैश्विक स्तर पर बढ़ते खतरे के उचित प्रबन्धन हेतु प्राथमिकता के स्तर पर हैं। जलवायु के परिवर्तन के कारण भविष्य में जल-संसाधनों और शुद्ध जल की उपलब्धता पर अनिश्चितता पैदा करते हैं।
यह कुछ महत्वपूर्ण लेकिन तीखे मुद्दे हैं जो स्थानीय और क्षेत्रीय हाइड्रोलॉजिकल चक्र में बदलावों के कारण गम्भीर हो चुके हैं। इसके प्रभाव नदी घाटी इलाके में और भी गहरे हैं। सूखे के कारण धरती से पानी उलीचने का सिलसिला और भी बढ़ जाता है, बड़े-बड़े पंपों द्वारा ज़मीन से पानी खींचना और धरती के सीने पर नये-नये छेद करने से दीर्घप्रभावी हाइड्रोलॉजिक बदलाव आ जाते हैं जिनकी भरपाई आसान नहीं है। जलवायु की अनिश्चितता के कारण शुद्ध जल के नये स्रोत खोजना भी क्षेत्रीय स्तर पर और मुश्किल होता जा रहा है। जबकि भीषण और लगातार आने वाली बाढ़ के कारण बायोलॉजिकल तथा रासायनिक प्रदूषण की वजह से नदियों में तलछट में भी महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे हैं। बाढ़ नियन्त्रण के लिये किये जा रहे उपायों से तलहटी के बहाव तथा पानी के ठहराव पर भी प्रभाव पड़ता है। स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर ताजे पानी के संसाधनों में आती जा रही कमी के तत्काल प्रभाव के आकलन के कारण वैश्विक स्तर पर बढ़ते जलसंकट के बारे में कम विचार किया जा रहा है।

ऊपरिलिखित कारणों की वजह से मैं इस कम्यूनिटी के सदस्यों से अनुरोध करता हूँ कि उपरोक्त प्रश्नों पर वे अपने अनुभव और सूचनायें आपस में शेयर करें –
सभी सदस्यों से अनुरोध है कि, उनकी सहायता और महत्वपूर्ण सुझावों से इस प्रस्तावित सेमिनार की कार्यसूची (एजेंडा) तय करने में मदद मिलेगी। सबसे उम्दा सुझावों और जवाब देने वाले दो सदस्यों को प्रायोजकों द्वारा इस वर्कशॉप में उपस्थित रहने और अपने विचार रखने का अवसर प्रदान किया जायेगा।

Dear members, I serve with the UNESCO’s Cluster Office at New Delhi as the South Asia’s Regional Programme Specialist for Water Sciences. We are organizing a 3-day workshop in August 2009 on Climate Change and Water Resources. The Delhi College of Engineering, Columbia University, CIP Trust in India and the Water Community are other promoters of this workshop. It will aim at assessing and adapting to the impacts of global hydrological change, both as a subset and principle indicator of global climate change. It will discuss what is needed for India and the region.
Fresh water resources are under stress around the world due to the exponential growth in population and per capita resource use, that are the drivers of energy consumption, anthropogenic climate and hydrologic change. Many major rivers no longer consistently make it to the ocean; hundreds of meters of decline in fossil groundwater sources are now endemic in some of the largest and most productive aquifers in the world; and pollution has impacted several prized aquatic habitats. Significant research has been done on climate change assessment (cause-effect, trend, impact analysis), mitigation (carbon sequestration, alternate energy strategies, policies) and adaptation (response to changes in extremes, heat waves, urban systems, sea level rise). However, there is only fragmentary research on global hydrologic change and data is limited, despite recognition of its importance.
This degradation of fresh water resources is a harbinger of a major crisis. Its impact on humans and the ecology may be at least as severe as that caused by greenhouse gasses. Increasing urbanization is altering areas near river courses and low lying coastal areas. Intensification of agriculture is contributing to deforestation and desertification. Increased water use for agriculture and urbanization is leading to hydrologic modifications. These have cumulative effects on water quality. It is important to understand, predict and manage the potential impacts of climate change on regional and global water resources. Local human modifications of the hydrologic cycle through direct use, storage and redistribution, changes in land cover and use, and pollution, is a primary concern for local and global risk management. A changing climate increases the uncertainty associated with the future availability and variability of fresh water sources.
These are exacerbating factors of human-induced changes in the local, terrestrial hydrologic cycle. The effects are more pronounced at the river basin level. Exigencies such as droughts can lead to increased groundwater pumping or investment in new surface storage, each of which has long term hydrologic effects. Increased uncertainty about climatic outcomes and hence, about the renewable fresh water supply, can change the investment and use of regional water resources. Increased magnitude and frequency of floods can affect sediment fluxes and the mobility of biological and chemical pollutants. Investments in flood control impact future sediment fluxes and water residence times. Since the immediate impacts of degradation of a freshwater resource are felt locally, assessment and recognition of the evolution of a global water crisis has been slow.
In view of the above, I request members of the community to provide experiences and information on the following:
What is the existing knowledge-base for climate change in the context of water resources in India?
What is the existing capacity in India to understand climate change, impact and adaptation issues?
In the context of (1) and (2) above, please suggest specific research areas and capacity building needs.
Climate change is a wider issue, thus regional cooperation and collective action are imperatives. Apropos, what should be the “regional responsibility” of India in South Asia (seso-stricto) to combat climate change and facilitate adaptation?
Your inputs will help us set the agenda for the workshop. The members with the two best responses will be sponsored to attend the workshop and share their experiences. Best Regards, B. R. Neupane,UNESCO,New Delhi.
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