जल के ज्यादा दोहन पर यूपी में मिलेगी जेल

Submitted by admin on Mon, 09/01/2008 - 20:50

फोटो साभार - भाष्करफोटो साभार - भाष्करसिध्दार्थ कलहंस / लखनऊ / बिजनेस स्टैंडर्ड: उत्तर प्रदेश में भूजल का अंधाधुंध दोहन लगता है कि अब बीते समय की बात हो जाएगी। सरकार ने दोहन पर अंकुश के लिए कानून बना दिया है, साथ ही जल प्रबंधन और नियामक आयोग के गठन को भी मंजूरी दे दी गई है। प्रांत में भूजल का दोहन करने वालों को नए कानून के तहत एक साल तक की कैद का प्रावधान है। इसके साथ ही जान-बूझकर भूजल का दोहन करने वालों पर प्रतिदिन 20,000 रुपये तक के दंड का प्रावधान किया गया है। इस विधयेक को सदन में पेश करते समय सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भूजल दोहन से संबंधित अपराध का मुकदमा कम से कम अपर न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में चलेगा।


अपराध की शिकायत जल प्रबंधन और नियामक आयोग के किसी सदस्य द्वारा ही की जा सकेगी। कानून में भूजल दोहन की लगातार शिकायत आने पर अधिकतम एक लाख रुपये का जुर्माना और कैद, दोनों का प्रावधान है। आयोग के गठन को सरकार की मंजूरी मिल जाने के बाद जल्द ही इसके अध्यक्ष और चार सदस्यों की नियुक्ति की जाएगी।
आयोग का अध्यक्ष उसी को बनाया जाएगा, जिसके पास कम से कम 25 साल का प्रशासनिक अनुभव हो या वह केंद्र सरकार में सचिव या राज्य सरकार में चीफ सेक्रेटरी के पद पर रह चुका हो। इसके साथ ही उसके पास जल संसाधन से संबधित विभागों का अनुभव होना चाहिए। सदस्यों के पास भी ऐसा अनुभव होना जरूरी है।


आयोग का कार्यक्षेत्र पूरा उत्तर प्रदेश होगा और इसके पास थोक जल हकदारी तय करने के साथ ही जल के उपयोग की श्रेणी तय करने का भी अधिकार होगा। आयोग का काम राज्य के भीतर जल संसाधन को विनियमित करना, पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए जल संसाधन का आवंटन करना और उपयोग को सुगम बनाना होगा। आयोग समय-समय पर शुल्क का निर्धारण और समीक्षा भी करेगा।


प्रदेश सरकार के भूगर्भ जल विभाग के निदेशक एम. एम. अंसारी ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि कोई कानून नहीं होने को चलते प्रदेश में भूजल का बड़े पैमाने पर दोहन किया जा रहा है, जिसे रोका जाना आवश्यक है। अंसारी ने बताया कि कानून बन जाने के बाद कोला और मिनरल वॉटर कंपनियों पर लगाम कसना आसान हो जाएगा।


निदेशक के मुताबिक, प्रदेश में कई जगह पर पेयजल दूषित है, कुछ स्थानों पर तो भूजल में खतरनाक आर्सेनिक भारी तादाद में पाया गया है। बलिया जिले में खतरनाक आर्सेनिक सबसे पहले पाया गया था, जो बाद में कई और शहरों में भी मिला। अंसारी के मुताबिक, प्रदेश में केवल गाजियाबाद ही ऐसा शहर है, जो आर्सेनिक से पूरी तरह से मुक्त है, लेकिन मिनरल वॉटर बना रही कंपनियां इन सबसे बेपरवाह हैं।


विश्व स्वास्थ संगठन के तय मानकों के मुताबिक, पानी में 0.001 मिलीग्राम तक आर्सेनिक की मात्रा चल सकती है। ऐसे मानक पर प्रदेश के नौ जिले ही खरे उतरते हैं। यहां तक की प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी आर्सेनिक की तय मानक मात्रा से ज्यादा है, जहां 52 कंपनियां मिनरल वॉटर बना रही हैं।


एक लाख रुपये का जुर्माना


उत्तर प्रदेश सरकार ने भूजल दोहन रोकने के लिए बनाया कानून जल प्रबंधन और नियामक आयोग के गठन को भी मिली मंजूरी दोहन करने पर एक लाख रुपये का जुर्माना और कैद, दोनों का है प्रावधान।

Disqus Comment