जल बजट (वाटर बजट)

Submitted by admin on Thu, 06/18/2009 - 14:42
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डाउन टू अर्थ (सीएससी का मासिक पत्रिका)

2002 से अब तक हर साल हिवरे बाजार अहमदनगर जिले के भूजल विभाग की सहायता से पानी का वार्षिक बजट बना रहा है. हर साल लोग गांव में उपलब्ध पानी की कुल मात्रा का अकलन करते हैं और इस बात का निर्धारण करते हैं कि इसे किस तरह खर्च किया जाए, साथ ही साथ पानी की उपलब्ध मात्रा को देखते हुए किस फसल की बुबाई की जाए.

पांच साल बाद गांव औसत जल की उपलब्धता की पहचान करने में सक्षम हो जाएगा. ऐसा लगता है कि 400 मिमी बारिश की स्थिति में हिवरे बाजार आत्मनिर्भर होगा. यहां 350 से 400 मिमी के बीच औसत वर्षा होती है, ऐसे में 50-80 मिलियन लीटर पानी की कमी का सामना करना पडता है. इन हालातों में ग्राम सभा ने बोरवेल को प्रतिबंधित कर दिया है.

पानी का लेखा परीक्षा छह कुओं और तीन वर्षा गेजों के अवलोकन के जरिए होता है. इससे भूजल स्तर और वर्षा से प्राप्त पानी की कुल मात्रा का पता चल जाता है.

फिर ग्राम सभा पानी का बजट बनाती है. मानव और पशुओं के पीने और अन्य दैनिक उपयोग को प्राथमिकता मिलती है. शेष पानी का सत्तर फीसदी सिंचाई के लिए सुरक्षित रखा जाता है. शेष पानी भूजल पुनर्भरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

2004-5 में हिवरे बाजार में महज 237 मिमी वार्षिक वर्षा हुई जिसके कारण 86.5 मिलियन लीटर पानी की कमी हो गई. इसके बाद अगले साल 2005-6 में 271 मिमी बारिश हुई और 47.7 मिलियन लीटर की कमी पड गई. ऐसे में गांव ने अपनी फसल पद्धति बदल दी और मूंग, बाजरा और चने जैसे फसलों की खेती की जिनमें कम पानी की आवश्यकता होती है. इससे वे 2004-5 के घाटे से तो उबर ही गए 2005-6 के घाटे का भी खास असर नहीं पडा.

2006 में गांव में 549 मिमी वर्षा हुई और उन्हे उनकी जरूरत से 1465 मिलियन लीटर अधिक पानी प्राप्त हुआ. जिससे प्रोत्साहित होकर उन्होंने 100 हेक्टेयर भूमि पर गेहूं और 210 हेक्टेयर पर जवारी की फसल उगाई. फिर 2007-8 में केवल 315 मिमी वर्षा हुई और 456.3 मिलियन लीटर की कमी पड गई. इस पर ग्राम सभा ने जवारी की फसल 2 हेक्टेयर और गेहूं 70 हेक्टेयर कम उगाने का फैसला किया. अतिरिक्त भूमि मूंग और बजरी के लिए आवंटित कर दी गई.

2003-4 के दौरान पूरे जिले में सूखा पड गया. ऐसे में हिवरे बाजार ही ऐसा इकलौता गांव था जिसे टैंकरों की ज़रूरत नहीं पडी. उस साल वहां गेहूं व बाजरा जैसी किसी प्रमुख फसल की खेती नहीं की गई और टमाटर व प्याज जैसी फसलों को प्राथमिकता दी गई और ड्रिप सिंचाई से काम चलाया गया.

साभार- डाउन टू अर्थInput format
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