जल- वैदिक विज्ञान एवं समाधान

Submitted by admin on Sun, 06/28/2009 - 17:38
Printer Friendly, PDF & Email
Source
वेब दुनिया
शुद्ध जल एक वैश्विक समस्या
आज शुद्ध जल की उपलब्धता एक वैश्विक समस्या है और प्राकृतिक संसाधनों के निर्दयी दोहन एवं प्रदूषण से आने वाले समय में और भी हाहाकारी-विकराल रूप धारण कर ले तो इसमें किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए। जहाँ भारतीय सनातन संज्ञान में पंच तत्वों (आकाश, पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल) की महत्ता, प्रभु सत्ता, ईश्वरीय तत्व के अविनाशी रूप में स्वीकार्य है, वहाँ इतनी कठोर एवं निर्दयी घुसपैठ के नतीजे सामने आने लगे हैं।

इन पाँचों तत्वों का आपस में इतना गूढ़-बंधन है, प्राकृतिक संतुलन के लिए इतना जटिल संयोग है कि किसी एक के साथ छेड़छाड़ से दूसरे, तीसरे एवं इसी क्रम में पाँचों तत्वों का प्रभावित होना किसी एक के साथ छेड़छाड़ से दूसरे, तीसरे एवं इसी क्रम में पाँचों तत्वों का प्रभावित होना स्वाभाविक है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार मनुष्य शरीर में बीमारी का संक्रमण कहीं और होता है उसका प्रभाव शरीर के फ्ल्यूड- बैलेंस, सोडियम, पोटेशियम, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन से लेकर सभी जगह पड़ता है। स्वाभाविक है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार मनुष्य शरीर में बीमारी का संक्रमण कहीं और होता है उसका प्रभाव शरीर के फ्ल्यूड- बैलेंस, सोडियम, पोटेशियम, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन से लेकर सभी जगह पड़ता है। अब जल तत्व सबसे पहले प्रभावित क्यों हो रहा है? इसके लिए वैज्ञानिक तथ्यों के अलावा वैदिक विज्ञान से संबंधित तथ्यों को भी समझना होगा। पृथ्वी के लगभग 71 प्रतिशत भाग पर जल है।

* मनुष्य शरीर में जन्म के समय 90 प्रतिशत, सामान्य उम्र में 70 प्रतिशत एवं बढ़ती उम्र में लगभग 60 प्रतिशत जल का अनुपात होता है।

* मनुष्य शरीर में जल के अनुपात के अनुसार ही बाकी चारों तत्वों का भी निश्चित प्रतिशत होता है।

* यही अनुपात विभिन्न गैसों एवं बर्फ सहित ब्रह्मांड का होता है जिसका उल्लेख वेदों में 'यत्यिण्डे तत्‌ ब्रह्माणु' से है।

* चारों वेदों के 20।41 मंत्रों, ऋचाओं में 60 प्रतिशत के लगभग मंत्र, जल, वरुण, इन्द्र, समुद्र सहित जल तत्व की प्रधानता वाले देवों को समर्पित हैं।

* इसी क्रम में शेष चारों तत्वों के मंत्रों का प्रतिशत-अनुपात है।

* स्तुतिपरक, गद्यात्मक, मंत्र-ऊर्जा से परिपूर्ण यजुर्वेद में 50 से अधिक मंत्र जल तत्व से संबंधित देवों को समर्पित हैं। प्रभावकारी हैं।

* इस परम व्योम (आकाश) में ब्रह्मांड के श्रेष्ठ स्थान में वरुण को सर्वप्रथम उत्पन्न कहा है। प्रकृति रक्षण का आयनोस्फियर की रक्षा का संकेत है। (यजु. 13।50)

* सूर्य के बारह नामों में एक नाम वरुण कहा है, वरुण को सूर्य-पुत्र कहा है। (यजु. 12।12)

* जल तत्व के स्तुतिपरक मंत्र जिन पर मंत्र सृष्टा एवं मंत्र दृष्टा ऋषि-मुनियों ने अपनी प्रयोगशालाओं में उनकी निश्चित मंत्र ध्वनियों, उच्चारण के नियमों सहित उन पर कार्य किया।

* संपूर्ण वैदिक वाङमय स्तुतिपरक है जिसका अपना एक अनुशासन है, नियम, विधान है, विज्ञान है। वैदिक विषय-वस्तु का संदर्भ वैश्विक है, सारे विश्व के कल्याण से जुड़ा है जो इन मंत्रों से भी परिलक्षित होता है।

* भुरसि भूमिरस्य दितिरसि विश्वधाया विश्वस्य... (यजु. 13।18)

क्या मंत्र ध्वनियों, उनसे होने वाले कंपन-प्रभाव और मंत्रों के वैदिक-विज्ञान के अनुसंधान के लिए कोई प्रयोगशाला कोई सरकारी बजट नहीं होना चाहिए? उससे पहले कि जल तत्व, जिसका अनुपात और उपयोगिता हमारे जीवन में सबसे अधिक है वह नष्ट हो, हमसे नाराज हो।

क्योंकि आकाश से वायु, वायु से अग्नि और अग्नि से जल, जल से पृथ्वी और पृथ्वी से भोजन और भोजन से मनुष्य है। प्रतिदिन एक जल मंत्र से प्रार्थना कम से कम व्यक्तिगत स्तर का सार्थक प्रयास है। समाधान के लिए।

- पं. विजय रावल