जल-संरक्षण के लिए समाज आगे आये

Submitted by admin on Tue, 09/16/2008 - 11:39
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सेव वाटर, सेव लाइफसेव वाटर, सेव लाइफजल संकट देश ही नहीं, समूचे विश्व की गंभीर समस्या है। दुनिया के विशेषज्ञों की राय है कि वर्षा जल संरक्षण को बढावा देकर गिरते भू-जल स्तर को रोका जा सकता है। टिकाऊ विकास का यही आधार हो सकता है। इसमे दो राय नहीं कि जल संकट ही आने वाले समय की सबसे बडी चुनौती है, जिस पर गौर करना आज की सबसे बडी जरूरत है। वरना, स्थिति इतनी भयावह होगी कि उसका मुकाबला कर पाना असंभव होगा। लिहाजा, जल-प्रबंधन पर ध्यान दिया जाना बेहद जरूरी है।

भू-जल पानी का महत्वपूर्ण स्रोत है और पृथ्वी पर होने वाली जलापूर्ति अधिकतर भू-जल पर ही निर्भर है, लेकिन आज इसका इतना दहन हुआ है कि पूछो मत। इसी का नतीजा आज हमारे सामने भू-जल के लगातार गिरते स्तर के रूप में हमारे सामने है। इसीलिए ही जल संकट की भीषण समस्या आ खडी हुई है और वातावरण के असंतुलन की भयावह स्थिति पैदा भी हो गयी है। हालात यहां तक खराब हो रहे हैं कि इससे देश में कहीं धरती फट रही है और कहीं जमीन अचानक तप रही है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड, अवध व ब्रजक्षेत्र के आगरा की घटनाएं इसका प्रमाण हैं। ये घटनाएं संकेत देती हैं कि भविष्य में स्थिति कितना विकराल रूप धारण कर सकती है।

वैज्ञानिकों व भूगर्भ विशेषज्ञों का मानना है कि बुंदेलखंड, अवध, कानपुर, हमीरपुर व इटावा की ये घटनाएं भू-जल के अत्याधिक दोहन का परिणाम हैं। यह भयावह खतरे का संकेत है, क्योंकि जब-जब पानी का अत्याधिक दोहन होता है, तब जमीन के अंदर के पानी का उत्प्लावन बल कम होने या खत्म होने पर जमीन धंस जाती है और उसमें दरारे पड जाती हैं। इसे उसी स्थिति में रोका जा सकता है, जब भू-जल के उत्प्लावन बल को बरकरार रखा जाये। पानी समुचित मात्रा में रिचार्ज होता रहे।यह तभी संभव है, जब ग्रामीण-शहरी दोनों जगह पानी का दोहन नियंत्रित हो। संरक्षण, भंडारण हो, ताकि वह जमीन के अंदर प्रवेश कर सके। जल के अत्याधिक दोहन के लिए कौन जिम्मेवार है? योजना आयोग के अनुसार भू-जल का 8॰ फीसदी उपयोग कृषि क्षेत्र द्वारा होता है। इसे बढाने के लिए सरकार द्वारा बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी जिम्मेदार है। आयोग की रिपोर्ट में सिफारिश की गयी है कि यह सब्सिडी कम की जाये। वह, इस रूप में दी जाये, ताकि किसान भू-जल का उचित उपयोग करें। सब्सिडी के बदले किसान को निश्चित धनराशि नकद दी जाये। इससे भूजल का संरक्षण होगा तथा विद्युत क्षेत्र पर भी आर्थिक बोझ कम होगा। विश्व बैंक की मानें तो भूजल का सर्वाधिक 92 फीसदी उपयोग और सतही जल का 89 फीसदी उपयोग कृषि में होता है। 5 फीसदी भूजल व 2 फीसदी सतही जल उद्योग में, 3 फीसदी भूजल व 9 फीसदी सतही जल घरेलू उपयोग में लाया जाता है।

आजादी के समय देश में प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता पांच हजार क्यूबिक मीटर थी, जबकि उस समय आबादी चार सौ मिलियन थी। यह उपलब्धता कम होकर वर्ष 2॰॰॰ में दो हजार क्यूबिक मीटर रह गयी और आबादी एक हजार मिलियन पार कर गयी। 2॰25 में यह घटकर 15॰॰ क्यूबिक मीटर रह जायेगी, जबकि आबादी 139॰ मिलियन हो जायेगी। यह आंकडा 2॰5॰ तक 1॰॰॰ क्यूबिक मीटर ही रह जायेगा और आबादी 16॰॰ मिलियन को पार कर जायेगी।

योजना आयोग के मुताबिक देश का 29 फीसदी इलाका पानी की समस्या से जूझ रहा है। वह भले ही जल संकट की सारी जिम्मेदारी कृषि क्षेत्र पर डाले, लेकिन हकीकत यह है कि जल संकट गहराने में उद्योगों की अहम भूमिका है। असल में अधिकाधिक पानी फैक्ट्रियां ही पी रही हैं। विश्व बैंक का मानना है कि कई बार फैक्ट्रियां एक ही बार में उतना पानी जमीन से खींच लेती हैं, जितना एक गांव पूरे महीने में भी नहीं खींच पाता। ग्रामीण विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव ए. भट्टाचार्य कहते हैं कि कृषि जिस रफ्तार से जमीन से पानी लेती है, प्रकृति उसकी पूर्ति कर देती है। बहरहाल, पानी ही देश के उद्योगिक प्रतिष्ठानों की रीढ है। यदि यह खत्म हो गया, तो सारा विकास धरा का धरा रह जायेगा। सवाल यह उठता है कि जिस देश में भू-जल व सतही विभिन्न साधनों के माध्यम से पानी की उपलब्धता 23॰॰ अरब घनमीटर हो और जहां नदियों का जाल बिछा हो और सालाना औसत वर्षा सौ सेमी से भी अधिक होती है, वहां पानी का अकाल क्यों है? असलियत यह है कि वर्षा से मिलने वाले जल में से 47 फीसदी पानी नदियों में चला जाता है, जो भंडारण-संरक्षण के अभाव में समुद्र में जाकर बेकार हो जाता है। इसे बचाया जा सकता है।

इसके लिए वर्षा जल का संरक्षण और उसका उचित प्रबंधन ही एकमात्र रास्ता है। यह तभी संभव है, जब जोहडों, तालाबों के निर्माण की ओर विशेष ध्यान दिया जाये। पुराने तालाबों को पुनर्जीवित किया जाये। खेतों में सिंचाई हेतु पक्की नालियों का निर्माण किया जाये या पीवीसी पाइप का उपयोग किया जाये। बहाव क्षेत्र में बांध बनाकर पानी को इकट्ठा किया जाये, ताकि वह समुद्र में बेकार न जा सके। बोरिगं-ट्यूबवैल पर नियंत्रण लगाया जाये। उन पर भारी कर लगाया जाये, ताकि पानी की बर्बादी रोकी जा सके। जरूरी यह भी है कि पानी की उपलब्धता के गणित को शासन व समाज समझे। यह आमजन की जागरूकता-सहभागिता से ही संभव है, अन्यथा नहीं। भू-जल संरक्षण की खातिर देशव्यापी अभियान चलाया जाना अतिआवश्यक है, ताकि भूजल का समुचित नियमन हो सके। भू-जल के 8॰ फीसदी हिस्से का इस्तेमाल तो हम कर ही चुके हैं और इसके बाद भी उसके दहन का काम जारी है।

हम यह नहीं सोचते कि जब यह नहीं मिलेगा, तब क्या होगा? यह भी सच है कि इस चुनौती का सामना अकेले सरकार के बस की बात नहीं है। यह आम आदमी के सहयोग से ही होगा। भारतीय संस्कृति में जल को जीवन का आधार माना गया है और इसी दृष्टिकोण के तहत इसे हमेशा से सहेजने की परंपरा रही है। विडंबना यह है कि पानी के मामले में इतने भयावह हालात होने पर भी न हम और न हमारी सरकार स्थिति को गंभीरता से नहीं ले रही है। वह गेंद को राज्यों के पाले में फेंक कर अपना कर्तव्य निभा देती है, जबकि राज्यों की उदासीनता जग-जाहिर है। जल-संरक्षण के लिए समाज आगे आये।

ज्ञानेंद्र/राज एक्सप्रेस
 

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