'तिब्बत की मां' नदी को बचाने हेतु - हरित रक्षा पंक्ति

Submitted by admin on Sun, 04/12/2009 - 21:58
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'यालुचाम्बू नदी' हिमालय पर्वत से उद्गम होकर पश्चिम से पूर्व की ओर तिब्बत के अधिकतर क्षेत्रों से गुजरती हुई बहती है और वह तिब्बत की मां नदी मानी जाती है। पर भौगोलिक स्थिति व जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के प्रभाव से यालुचाम्बू नदी के घाटी क्षेत्रों का रेगिस्तानीकरण हो रहा है। इधर दसेक सालों में तिब्बत ने विशाल वृक्षारोपण परियोजना के जरिये यालुचाम्बू नदी के दोनों किनारों पर तीस हजार हैक्टयर क्षेत्रफल भूमि पर बड़ी हरित रक्षा पंक्ति खड़ी कर रेतीलीकरण पर कारगर रुप से रोक लगायी है।

हर वर्ष के मार्च में तिब्बत के लोका क्षेत्र के तिब्बती लोग तेज हवाओं व रेतों की रोकथाम के लिये यालुचाम्बू नदी के दोनों किनारों पर वृक्ष लगाते हैं। लोका क्षेत्र यालुचाम्बू नदी के मध्यम घाटी क्षेत्र में स्थित है, अनेक सालों से यह क्षेत्र रेतीलीकरण से गम्भीर प्रभावित क्षेत्रों में से एक है। गांववासी हर वर्ष के मार्च में यहां आकर पेड़ लगा देते हैं।

गांववासीयों को पेड़ लगाने में उत्साहित करने के लिए राज्य नकद भत्ता भी देना शुरु किया है, मिसाल के लिये एक गड्ढा खोदने से डेढ़ य्वान का मुनाफा होता है। साथ ही ये पेड़ भी गांव के सामुहिक संपत्ति ही हैं, गांववासी इस से बेहद संतुष्ट हैं ।

तिब्बत स्वायत्त प्रदेश हर वर्ष यालुचाम्बू नदी के दोनों किनारों पर वृक्षारोपण के लिये कई करोड़ य्वान खर्च करता है, जिस का काफी अधिकांश भाग तिब्बती लोगों को पेड़ लगाने के पारिश्रमिक के रूप में वितरित किया जाता है। तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के अनुसार जिसने जो पेड़ लगाये हैं, वे पेड़ उन के ही होंगे। लोका क्षेत्र के जंगल विभाग के प्रधान सोनाम डोर्जी ने कहा गांववासियों को पेड़ लगाने से लाभ ही लाभ है। अब राज्य सरकार ने वृक्षारोपण को महत्व समझते हुए भत्ता भी बढ़ा दिया है, और तो और पेड़ गांववासियों के होंगे। इस तरह गांववासियों का पेड़ लगाने का उत्साह पहले से और अधिक बढ़ गया है।

रिपोर्ट के अनुसार पिछले दसेक सालों के प्रयासों के जरिये अब यालुचाम्बू नदी के मध्यम घाटी क्षेत्र में तीस हजार हैक्टर क्षेत्रफल वाली भूमि पर एक 160 किलोमीटर लम्बा हरित गलियारा खड़ा किया गया है । अनुमान है कि आगामी 2015 तक यालुचाम्बू नदी के मध्यम घाटी क्षेत्र में रेतीलीकरण के प्रक्रिया पर पूरी तरह रोक लगायी जा सकती है ।

यालुचाम्बू नदी के मध्यम घाटी क्षेत्र में विशाल वृक्षारोपण लगाने से स्थानीय पारिस्थितिकी पर्यावरण में बड़ा सुधार आया है। अतीत काल में तेज धूल भरी हवा चलने की वजह से लोका क्षेत्र स्थित गोंगकर एयरपोट पर विमान सिर्फ सुबह उड़ान भरने व उतरने में सुरक्षित थे, पर आज गोंगकर हवाई अड्डे पर दिन रात विमानों के उड़ान भरने व उतरने लायक है। एक स्थानीय महिला गांववासी कुन्ग ने हमारे संवाददाता को वृक्षारोपण से स्थानीय पारिस्थितिकी पर्यावरण में हुए परिवर्तनों से अवगत कराते हुए कहा बड़ों से सुना जाता है कि मेरे बचपन में धूल भरी हवा इतनी तेजी से चलती थी कि हर सुबह उठकर मकान में ढेर सारे रेत जमे हुए नजर आते थे।

दरअसल यालुचाम्बू नदी के मध्यम घाटी क्षेत्र में वृक्षारोपण परियोजना तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के पारिस्थितिकी वातावरण संरक्षण का एक निचोड़ है । गत 18 फरवरी को चीनी राज्य परिषद ने तिब्बती पारिस्थितिकी रक्षापंक्ति की रक्षा व निर्माण योजना पारित की है और इसी योजना से छिंगहाई तिब्बत पठार की पारिस्थितिकी रक्षा परियोजना का रुप दिया गया है। राज्य के इन कदमों से तिब्बत के पर्यावरण में अवश्य ही और भारी परिवर्तन होंगे।

साभार - चाइना रेडियो

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