तुलनात्मक और प्रयोगशील दृष्टिकोण

Submitted by admin on Tue, 09/30/2008 - 09:26
Printer Friendly, PDF & Email
किसी भी वैज्ञानिक परिकल्पना की कई स्थितियों में जांच की ज़रूरत होती है। इस तरह की विभिन्नताएं मानवीय प्रबंधन से सृजित की जा सकती हैं जो प्रयोगशील तरीका है। या प्राकृतिक विभिन्नताओं का फायदा उठाया जाए जो तुलनात्मक विधि है। सामान्य प्रणालियों पर आधारित परिकल्पनाओं की जांच कई बार प्रयोगात्मक रूप से की जा सकती है। इस तरह की सामान्य परिकल्पनाएं किसी बड़ी खोज की ओर ले जा सकती हैं। किसी भी परिकल्पना की पुष्टि कई प्रयोगों से की जाती है। प्रयोगों के दौरान पूरी प्रक्रिया को बहुत गौर से देखा जाता है। भौतिक शास्त्र, रसायन विज्ञान और शरीर विज्ञान हुईं प्रगति में इसी तरह की प्रयोगात्मक विधियों का हाथ है। धातु विज्ञान, पारिस्थितिकी या विकासवादी जीवविज्ञान जैसी कहीं अधिक विषयों में बहुत सी दिलचस्प परिकल्पनाओं के प्रयोग के आधार पर पुष्टि नहीं हो पाती है। मसलन विकासवादी सिद्धांत के मुताबिक पुरुष और स्त्री में आकार और रूप में जिस स्तर तक एक दूसरे से अलग होते हैं, उसी अनुपात में साथी के लिए प्रतियोगिता बढ़ती जाती है। लेकिन इस परिकल्पना की पुष्टि जांच द्वारा नहीं हो पाती है। हालांकि जानवरों के कई समूह हैं जहां नर एक या अधिक मादाओं से जोड़े बनाता है। गौरैयों की कई प्रजातियों में एक नर एक समय में एक मादा से जोड़ा बनाता है। दूसरी ओर बया पक्षी एक ही मौसम में कई मादाओं से जोड़े बनाता है। ऐसे में कोई यह अनुमान लगा सकता है कि बया पक्षी, गौरेया पक्षी की तुलना में नर और मादा के बीच अधिक अंतर प्रदर्शित करता है। इस परिकल्पना की जांच नर और मादा बया तथा गौरेया पक्षी के रंग में चमक या फीकेपन की माप से की जा सकती है। यह प्राकृतिक प्रयोगों का लाभ लेकर निष्कर्ष पर पहुंचने का तुलनात्मक तरीका है।

फिलहाल पर्यावरणीय जागरुकता वाले पाठ्यक्रम के तहत जो परियोजनाएं ली जाती हैं उनकी प्रवृति वर्णनात्मक होती है। उदाहरण के तौर पर किसी क्षेत्र में चिड़ियों की प्रजातियों की सूची बनाना या किसी एक गांन में पीने का पानी जुटाने के तौर-तरीकों का की जानकारियां इकट्ठी करना। नियमबद्ध तरीके से सूचना जुटाना निश्चित रूप से उपयोगी होता है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम सूचनाओं के पार जाकर उन सूचनाओं को विभिन्न परिकल्पनाओं से जोड़ कर देखें। ऐसे करने पर हमें कई स्तरों पर समानताओं का एक क्रम नज़र आएगा। इस तरह की संभावित समानताओं के क्रम से छात्रों के भीतर प्रयोग करने के प्रति रुचि बढ़ेगी। विभिन्न परिकल्पनाओं को प्रस्तुत करते समय यह ज़रूरी है कि हर परिकल्पना के पीछे की वैज्ञानिक समझ को स्पष्ट किया जाए। इससे उनके अनुशासनात्मक ज्ञान को बढ़ाने में और मदद मिलेगी।

लैंगिक द्विरूपता नर और मादा पक्षी के बीच फर्क के उदाहरण को फिर लेते हुए एक खास परियोजना पर विचार किया जाए। उम्मीद की जाती है कि चिड़ियों में वैसी प्रजातियों में साथी के लिए प्रतियोगिता कम से कम हो जहां वे न केवल एक घोसला सत्र बल्कि पूरे जीवन के लिए एक साथी बनाते हों। इस तरह की प्रजातियों में उम्मीद की जाती है कि नर और मादा एक समान दिखते हों और उनमें एक साल में या गैर प्रजनन सत्र से प्रजनन सत्र के बीच कोई बदलाव न हो। इस तरह की प्रजातियों को एकरूपक कहा जाता है। ये रूप या आकार में एक एकल वयस्क दिखते हैं। ऐसे में कोई यह परिकल्पना कर सकता है कि एकरूपक जीवों में पूरे जीवन भर के लिए जोड़े बनाने की प्रवृत्ति गैर-एकरूपक पक्षियों की प्रजातियों के मुकाबले अधिक होती है। उदाहरण के तौर पर पुणे के आसपास आम एकरूपक प्रजातियां मसलन घरेलू कौआ, जंगली कौआ, मैना और बुलबुल है। दूसरी ओर आम गैर-एकरूपक प्रजातियों में बया, फुलसुंघनी, तोता और दंहगल आदि हैं।

लेकिन इस परिकल्पना की जांच कैसे की जाए ? एकदम सही जांच के लिए तो ज़रूरी होगा कि उन पक्षियों को पिंजड़े में कैद पर उन पर सालों तक नज़र रखी जाए। यह एक छात्र परियोजना के लिए उपयुक्त नहीं है। इसके लिए कुछ सामान्य लेकिन अर्थपूर्ण जांच के तरीके निकालने की ज़रूरत है। जीवन भर एक जोड़े में रने वाले पक्षियों के बारे में एक साथ रहने और साथ-साथ आने-जाने की उम्मीद की जाती है। इसलिये जीवन भर के लिए जोड़ा बनाकर रहने वाले प्रजातियों से उम्मीद की जाती है कि उनमें कुछ सामाजिक इकाइयां होंगी। मसलन उनके साथ कुछ छोटे बिना जोड़े वाले पक्षी और विधवाएं होंगी। चिड़ियों की अधिकतर प्रजातियों में युवावस्था का चरण उनके पूरे जीवन के मुकाबले बहुत छोटी अवधि का होता है। इसलिए आजीवन जोड़े वाले पक्षियों में जोड़े एक बहुत ही प्रभावी सामाजिक इकाई के रूप में उभरते हैं। यही कारण है कि असमान संख्या 1,3,5 के मुकाबले ज्यादातर समय 2,4,6 के समान संख्या में दिखाई देने पर इन पक्षियों के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है कि वे पूरे जीवन के लिए जोड़े बनाने वाली प्रजातियों में हैं।

ऐसे में इस परियोजना की शुरूआत अपने अध्ययन क्षेत्र में आसानी से दिखने वाले पक्षियों की प्रजातियों की सूची बनाने से की जा सकती है। पर्यवेक्षण के साथ-साथ किताबों से भी उन पक्षियों को एक रूपक या गैर-एकरूपक श्रेणी मे बांटा जा सकता है। किताबों से मदद लेने की सलाह इसलिये भी दी जाती है क्योंकि कुछ गैर-एकरुपक पक्षियों में केवल प्रजनन सत्र के दौरान नर-मादा का अंतर दिखता है। गैर-प्रजनन सत्र के दौरान ये एकरुपक नज़र आ सकते हैं।

सामान्य और आसानी से पहचाने जा सकने वाले पक्षियों की प्रजातियों की पहचान और उनकी सूची बनाने के बाद हर प्रजाति के पक्षियों के रूप-रंग, आकार पर नज़र रखी जा सकती है। हर प्रजाति में २०० या उससे अधिक नमूने मिल सकते हैं। पर्याप्त मात्रा में नमूने इकट्ठे हो जाने के बाद हर झुंड में समानताओं और असमानताओं के विश्लेषण की ओर बढ़ा जा सकता है। इस प्रक्रिया में प्रजातियों की एक सूची तैयार होगी (क) एक ही आकार के पक्षियों की तादाद ज्यादा होगी जिनकी तुलना (ख) ऐसे पक्षियों से की जा सकेगी जो इस श्रेणी में नहीं आएंगे। हमारी परिकल्पना के लिए ज़रूरी है कि (क) श्रेणी में एकरुपक पक्षियों की संख्या काफी अधिक हो और (ख) श्रेणी में एकरूपक पक्षियों की संख्या बहुत कम हो। अगर दोनों स्थितियां बनती है तो परिकल्पना को स्वीकार किया जा सकता है वर्ना इसे खारिज़ कर देना चाहिए।

यह परियोजना प्रकृति के रहश्यों को की खोज में विज्ञान की ताकत की भूमिका पर रोशनी डालती है। हम यह नहीं जानते कि परिकल्पना बाद में जाकर वैध साबित होगी ही। दोनों ही स्थितियों में आगे की जांच के लिए दिलचस्प संभावनाएं ज़रूर बनती हैं। उदाहरण के लिए अगर परिकल्पना खारिज़ भी होती है तो संभव है कि वह सभी एकरूपक पक्षी प्रजातियों के लिए न सही, लेकिन उनके लिए अभी भी वैध हो पेड़ की कोटर जैसी छोटी जगह का इस्तेमाल करते हैं। दूसरी ओर अगर परिकल्पना बहुसंख्यक एकरूपक प्रजातियों के लिए स्वीकृत होती है तो भी यह कुछ खास एकरूपक प्रजातियों पर लागू नहीं भी हो सकती है। यह जानना बहुतक उपयोगी होगा कि क्या इस तरह की प्रजातियों में कुछ गुण मसलन छोटा आकार या जंगल में रहने के तौर तरीकों में एक जैसे हैं। निश्चित रूप से विज्ञान की परिकल्पना-निष्कर्ष विधि से प्रकृति को गहराई से जानने की अपार संभावनाएं खोलता है।

हम आगे जांच योग्य परिकल्पनाओं के रूप में 202 परियोजना सूत्रों की श्रृंखला पेश कर रहे हैं। इनमें से 94 पर हम वैधता की व्याख्या, कार्यप्रणाली पर एक टिप्पणी और बाद की कार्रवाई के लिए सलाह भी दे रहे हैं। पानी पर आधारित 31 परिकल्पनाओं को नीले रंग से रेखांकित किया गया है। इन्हें आखिरी हिस्से में अलग से भी सूचीबद्ध किया गया है।

Add new comment

This question is for testing whether or not you are a human visitor and to prevent automated spam submissions.

2 + 8 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

Latest