नरेगा: आंध्र प्रदेश ने रचा इतिहास

Submitted by admin on Thu, 04/02/2009 - 20:29
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मिहिर शाह व प्रमथेश अम्बस्ता
आंध्र प्रदेश में नरेगा के सोशल ऑंडिट की ताकत का अहसास इस बात से होता है कि नरेगा के तहत 120 लाख की आबादी का सफलतापूर्वक सोशल ऑंडिट किया गया है, यह नागरिक समाज का एक ऐतिहासिक उदाहरण है, जिसने मुख्यधारा की जन पक्षधर राजनीति को सशक्त बनाया है। 2004 में आशा के विपरीत यूनाईटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (यूपीए) को सत्ता में लाने वाला प्रमुख तत्व देश के ग्रामीण भारत में फैली घोर निराशा ही थी, जिसने राजग से छीनकर यूपीए को सत्ता में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा) यूपीए के घोषणा-पत्र 2004 का एक महत्वपूर्ण अंग था। किंतु नरेगा पर कार्यान्वयन का रिपोर्ट कार्ड आमतौर पर खराब ही रहा है। जहां कई राज्यों में बहुत अधिक फिजूल खर्च किए जाने की रिपोर्ट मिलती रही हैं, वहीं स्वतंत्र सोशल ऑंडिट से साफ हुआ है कि नरेगा का धन काफी मात्रा में गरीबों तक पहुंचा ही नहीं है। आंध्रप्रदेश में नरेगा के सोशल ऑंडिट ने इस दिशा में असाधारण नए उदाहरण का परिचय पेश किया है। पिछले दो सालों में इस राज्य में जो कुछ हुआ है वह स्वतंत्र भारत के इतिहास में अनूठा है किंतु आश्चर्य तो इस बात का है कि आत्मा को हिला देनी वाली ये घटनाएं लोगों का ध्यान बहुत कम खींच पायी हैं।

इसके विपरीत आंध्रप्रदेश ने जो कुछ उपलब्धि प्राप्त किया है वह राजनैतिक और नौकरशाही नेतृत्व के शीर्ष दिग्गजों का असाधारण सहयोग तो है ही। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ‘राजनैतिक और नौकरशाही नेतृत्व को तो भ्रष्टाचार की गंगा में हाथ धोने का मौका मिल गया है इसलिए नरेगा के उद्देश्यों को दरकिनार कर दिया गया है।‘ नरेगा भी भ्रष्टाचार के बादलों के साये में काफी फंस गयी है, इस अनिश्चितता के बादलों को नजरअंदाज करते हुए इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि न केवल आंध्रप्रदेश में बल्कि संपूर्ण भारत में पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए इस ग्रामीण बल में सत्ता का रूप परिवर्तन करने की क्षमता है। अब ऐसे करोड़ों गरीब लोगों का यही बात चिंता का विषय बन गया है जिन्होंने वर्ष 2004 में यूपीए को सत्ता में लाने के लिए वोट दिया था।

बेशक, किसी भी काम में राजनैतिक सहयोग अनिवार्य होता है लेकिन कोई जरूरी आखिरी शर्त नहीं। क्योंकि वर्तमान में दो नई क्रांतियों ने सारी स्थिति ही बदल दी हैं: एक सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग और दूसरी नागरिक समाज की भूमिका। नरेगा के कार्य के सभी चरणों को कम्प्यूटरीकृत कर दिया गया है जैसे श्रमिकों का पंजीकरण, जॉब कार्ड जारी करना, कार्य का इस्टीमेट, मस्टर रोल तथा कर्मचारियों को भुगतान आदि। सूचना प्रौद्योगिकी के दौर में सूचनाएं, राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र की बंदी नहीं रह गई है बल्कि इस प्रणाली में सभी सूचनाएं सभी को आसानी से मिल जाती हैं।

उदाहरण के लिए मजदूरी का भुगतान ही लें। भारत के हर कोने से नरेगा के तहत मजदूरी के भुगतान में देरी और भ्रश्टाचार ही प्रमुख शिकायत की जा रही है। जबकि आंध्रप्रदेश में मजदूरी का भुगतान पिछले सप्ताह के कार्य के पूरा होने के एक सप्ताह के अंदर कर दिया जाता है और इस कार्य में तेजी से वृद्धि हो रही है। यह सब कैसे हो पाता है? सप्ताह के अंतिम दिन यानी छठे दिन पूरे काम के मापन पत्रक और मस्टर सूची बंद कर दी जाती है और उन्हें मंडल (उप-खंड) कम्प्यूटर सेंटर में भेज दिया जाता है। अगले दिन मस्टर डाटा को कम्प्यूटर में डाल दिया जाता है। आठवें दिन कम्प्यूटर द्वारा पे आर्डर बनाकर चैक तैयार किए जाते हैं। दसवें दिन ये चैक डाकघरों में श्रमिकों के खातों में जमा कर दिए जाते हैं। अगले दिन डाकघर में नकदी भेज दी जाती है ताकि 12वें और 13 वें दिन कर्मचारी अपने-अपने खातों में मजदूरी की राशि देख सकें। श्रमिकों को इन्हीं खातों के माध्यम से भुगतान किया जाता है। इसके अतिरिक्त किसी प्रकार का कोई नकद भुगतान नहीं किया जाता है।

चूंकि कम्प्यूटर प्रणाली शुरु से आखिर तक पूरी तरह एकीकृत होती है इसलिए प्रणाली में सुरक्षित किया गया कोई भी कार्य बरक़रार रहता है और उसे देखा जा सकता है साथ ही कभी भी छानबीन भी की जा सकती है। इस प्रकार किसी भी चरण में होने वाले विलंब के कारण की तुरंत पहचान कर उसमें सुधार किया जा सकता है। जिस दिन वर्क-आईडी बनाई जाती है उसी दिन से कार्य की देखरेख कम्प्यूटर प्रणाली द्वारा शुरू हो जाती है और जैसे ही भुगतान में विलंब होने लगता है कम्प्यूटर उसे प्रदर्शित करने लगता है। चूंकि कम्प्यूटर नेटवर्क जमीनी स्तर से राज्य मुख्यालय के सभी स्तरों को एक सूत्र में पिरोए रखता है इसलिए आंकडों में भी पारदर्शिता लाते हुए यह उन्हें वेबसाइट पर तत्काल उपलब्ध कराता है, इसलिए किसी भी चरण में अगर देरी होती है तो वह मॉनीटरिंग प्रणाली की निगाह में आ जाता है। चूंकि वेबसाइट पर यह सब सूचना नि:शुल्क उपलब्ध होने से सार्वजनिक जांच (सोशल ऑंडिट) और भी आसान हो जाती है और इस प्रकार व्यापक पारदर्शिता आने लगती है जो अच्छी सोशल ऑंडिट का कारण बनती है।

दरअसल हमें यह जान लेना चाहिए कि सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली एक सहयोग मात्र है, केवल सतर्क जनता की उपस्थिति ही इसे महत्वपूर्ण और कामयाब बना सकती है। ऐसा आंध्रप्रदेश में देखा जा सकता है। आंध्रप्रदेश ने हमें नागरिक समाज का ऐसा उल्लेखनीय उदाहरण दिया है जिसने मुख्यधारा की राजनीति को सशक्त बनाया है। भारत में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ऐतिहासिक रूप से वॉचडॉग/खबरिये की भूमिका निभाई है जिसमें उन्होंने सर्वाधिक असहाय वर्ग व अंतिम आदमी से संबंधित सवालों को उठाया है। उनके इस कार्य ने आमतौर पर राज्य मशीनरी के साथ मतभेद भी पैदा कर दिए हैं। नरेगा की संकल्पना को रूप देने वाली अरूणा रॉय के नेतृत्व वाले मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) ने, लगभग दो दशक पहले सामाजिक लेखा परीक्षा (सोशल ऑंडिट) की अवधारणा को विकास प्रक्रिया में लागू करने की वकालत की थी। लेकिन राजस्थान में भी जहां एमकेएसएस ने अपना कार्य शुरु किया था, वहां भी सोशल ऑंडिट को मुख्यधारा में लाना अभी दूरगामी स्वपन बना हुआ है। निजी स्वार्थ के कारण प्राय: हिंसात्मक प्रतिक्रियायें क्षेलनी पड़ती हैं और राजकीय सहयोग मिलने की संभावना फिलहाल नजर नहीं आती।

नई ऊंचाईयां


इसके विपरीत, आंध्रप्रदेश में पारस्परिक आक्रोश अथवा दुश्मनी की अपेक्षा एमकेएसएस और सरकार के बीच के प्रक्रियात्मक कमी को दूर करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। एमकेएसएस का प्रत्येक कार्यकर्ता नरेगा की सामाजिक लेखा परीक्षा के लिए सरकार के साथ परामर्शदाता तथा विशेषज्ञ के रूप में पूर्णकालिक कार्य करता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि एमकेएसएस ने बहुत सी विधियों से प्रक्रिया को नई ऊंचाईयों तक पहुंचाने में सहायता की है। इसके लिए नि:संदेह राज्य सरकार को श्रेय जाता है जिसने सोशल ऑंडिट हेतु अलग से एक इकाई की स्थापना की है और जिसे पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है। समर्पित लोगों की इस उल्लेखनीय इकाई के कार्य ने हाल ही में आंध्रप्रदेश सरकार द्वारा पारित ऐतिहासिक नियमों का सच्चे अर्थों में पालन किया है और सोशल ऑंडिट के कार्य को संस्थागत बनाने में इसे अभी लंबा सफर तय करना बाकी है। ये नियम पिछले दो सालों में राज्य सरकार के अनुभव के आधार पर बनाए गए हैं।

आंध्रप्रदेश में ‘‘सामाजिक लेखा परीक्षा प्रक्रिया’’ सरकार द्वारा नियुक्त जिला संसाधन पुरूष (डीआरपी) द्वारा सूचना के अधिकार के अधीन नरेगा अभिलेखों के लिए आवेदन भरने से प्रारंभ होती है। यह कार्य सोशल ऑंडिट आरंभ होने से कम से कम 15 दिन पहले होता है। आंध्रप्रदेश सरकार द्वारा पारित नियमों में निहित है कि, ‘‘संबंधित कर्मचारी आवदेन मिलने के सात दिन के अंदर विलंब किए बिना सूचना उपलब्ध कराएंगे’’। प्रत्येक गांव में डीआरपी कुछ ऐसे शिक्षित जोशीले नवयुवकों की पहचान करेंगे जो स्वयं नरेगा के श्रमिकों के परिवारों से ही संबंधित होंगे। सामाजिक लेखा परीक्षा की प्रक्रिया में प्रशिक्षित होने के बाद ये नवयुवक अपना एक दल बनाएंगे जो लोगों के घर-घर जाकर मस्टर सूची की प्रामाणिकता की जांच करेंगे, कार्यस्थली की जांच करेगे, श्रमिकों के लिखित बयानों को रिकार्ड करेंगे और प्रत्येक गांव में अनेक सभाएं आयोजित करेंगे।

‘‘सोशल ऑंडिट प्रक्रिया’’ मंडल मुख्यालय में बड़ी जनसभा से साथ शुरु की जाती है जिसमें प्रत्येक गांव से आए हुए लोग, उनके चयनित प्रतिनिधि, मीडिया, नरेगा की कार्यकारिणी तथा वरिष्ठ सरकारी अधिकारी शामिल होते हैं। सभा में प्रत्येक गांव की सोशल ऑंडिट के परिणामों को पढ़ा जाता है, कर्मचारियों द्वारा जांच कराई जाती है और जिस कर्मचारी के खिलाफ़ शिकायत दर्ज की जाती है वह उसके जवाब में अपना स्पश्टीकरण देता है। अधिकारियों को यह भी बताना होता है कि वे किस तरह की सुधारात्मक कार्यवाही करेंगे और कितने समय में। वरिष्ठ अधिकारी जिम्मेदारी निर्धारित करते हैं और सभा के दौरान ही बहुत से सुधारात्मक अथवा अनुशासनिक कार्य संपन्न किए जाते हैं। सोशल ऑंडिट की नियमावली से स्पश्ट होता है कि ‘‘की गई कार्रवाई की रिपोर्ट, प्रोग्राम ऑंफिसर द्वारा आयोजित की जाने वाली सोशल ऑंडिट के एक महीने के अंदर प्रस्तुत की जाएगी और उसके बारे में ग्राम सभा को भी अवगत कराना होगा। इसके अतिरिक्त कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई भी करनी होगी जिसके अंतर्गत, मंडल स्तर पर सभा के आयोजन के 15 दिन बाद, सामाजिक लेखा परीक्षा दल को, यह सुनिश्चत करने के लिए अपने गांवों में वापस जाना होगा कि निर्णय वास्तव में लागू किए गए हैं या नहीं।’’ इस प्रक्रिया के एक चक्र में 35000 कुनबों को शामिल किया गया है जो ग्रामीण आंध्रप्रदेश की जनसंख्या का आधा भाग हैं। लगभग 30000 प्रशिक्षित ग्रामीण युवक सामाजिक लेखा परीक्षा का कार्य कर रहे हैं जिसमें अब तक 120 लाख लोगों की परीक्षा पूरी कर ली गई है। इसके अंतर्गत लगभग 1.25 करोड रू. की राशि का दुरूपयोग होने का पता लगाया गया है। कई बार बेईमान अधिकारियों ने ‘‘स्वेच्छापूर्वक’’ मंडलीय सभाओं में मजदूरों को राशि लौटाई है। 10-12 घंटो तक लगातार चलने वाले इस प्रयास का प्रभाव किसी जादू से कम नहीं लगता है। हजारों कर्मचारियों के खिलाफ़ कार्रवाई की गई है और बहुत से आपराधिक मुकदमे दर्ज किए गए हैं। सूचना के अधिकार के अंतर्गत नरेगा के चालीस लाख अभिलेखों की जांच की गई है।

स्वतंत्र अध्ययनों से पता चला है कि नरेगा के विस्तृत उपबंधों/कायदों के प्रति श्रमिकों में अभूतपूर्व जागरूकता दिखाई दी है। इन उपलब्धियों के बावजूद भी कई कमजोरियां यथावत् बनी हुई हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण सृजित संपित्तयों की गुणवत्ता है। सरकार ने जनता की योजना और कार्यों के कार्यान्वयन की प्रक्रिया के सशक्तीकरण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। इस प्रकार ग्रामीण आजीविका के दूरगामी महत्व को सुधारने में नरेगा की महत्वपूर्ण क्षमता को पूर्णतया नजरअंदाज कर दिया गया है। कुल मिलाकर सामाजिक लेखा परीक्षा असल में काम के बाद की जाने वाली कार्रवाई है। महत्वपूर्ण बात तो वह है जो काम शुरु करने से पहले ही निगरानी की जाए। यहां यह कहना भी जरूरी है कि सामाजिक लेखा परीक्षा सरकार की ऊपर से नीचे की ओर चलने वाली मुख्य प्रक्रिया है लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों आंध्रप्रदेश में नागरिक सामाजिक समूह, राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध सहयोगात्मक अनूठे अवसरों का लाभ उठाने के लिए आगे क्यों नहीं आ रहे हैं? बहरहाल, इन्हीं सब कारणों से राजस्थान और झारखंड जैसे राज्यों में यह सब देखने को नहीं मिल रहा है, जिसके परिणामस्वरूप नरेगा के कार्यकर्ता हिंसक आक्रमणों का शिकार हो रहे हैं।

आंध्रप्रदेश सरकार अनुमोदित अपने नए नियम ‘अतिरिक्त सामाजिक लेखा परीक्षा हेतु मजदूरी पाने वाले श्रमिकों के किसी भी स्वतंत्र प्रयास’ को अपना पूर्ण सहयोग देने का वायदा करती है। सामाजिक लेखा परीक्षा को संस्थागत बनाने की दिशा में यह एक ऐतिहासिक कदम है जिसके लिए नागरिक समाज को अवश्य आगे आना चाहिए। चौंकाने वाली अद्भुत बात यह है कि आंध्रप्रदेश में हुए इतने बड़े कार्य को, उम्मीदों को कांग्रेस पार्टी न तो सभी के सामने लाना चाहती है और न ही इस दिशा में दूसरे राज्यों को प्रेरित कर पा रही है।

लेखक - नरेगा पर नेशनल कंसोर्टियम आफ सिविल सोसायटी के सह संस्थापक हैं।

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