'नरेगा से पीछे हटना संभव नहीं'

Submitted by admin on Fri, 07/03/2009 - 20:24
Source
BBC Hindi

अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफ़ेसर ज़्यां द्रेज़ से बातचीत


काम का अधिकार अभियान से जुड़े ज़्यां द्रेज़ से बातचीत के औचित्य के पीछे उनका रोज़गार गारंटी के लिए चले काम का अधिकार अभियान के शुरुआती सिपाहियों में शामिल होना आता है. यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की विशेष सलाहकार समिति का वो हिस्सा भी रहे और फिलहाल देशभर में रोज़गार गारंटी क़ानून के क्रियान्वयन को पूरा वक़्त दे रहे हैं.
पढ़िए, कुछ अहम अंश-

राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून के लागू होने के बाद से लेकर अब तक की इसकी स्थिति को आप किस तरह से देख रहे हैं?

राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना (नरेगा) को जहां-जहां लागू करने में रूचि दिखाई गई वहां इसके अच्छे परिणाम आए हैं.
राजस्थान में क़ानून लागू होने के एक साल के अंदर ही काफ़ी ग्रामीणों को लगभग 70 दिन का रोज़गार मिलना शुरू हो गया. ये तभी संभव हुआ क्योंकि इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और संगठनों का दबाव दोनों थे.
इसी के साथ दूसरे प्रदेशों जैसे आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में काफ़ी परिवर्तन हो रहा है. वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार में अपेक्षाकृत कम रूचि देखने को मिली लेकिन अब वहां भी कुछ सुधार नज़र आने लगा है.
झारखंड के एक ज़िले में दो साल पहले एक सामाजिक सर्वेक्षण हुआ था तो तब लोगों को इस क़ानून के बारे में ज़्यादा नहीं पता था. लेकिन अब ऐसा देखा गया है कि इससे जुड़ी आम बातें, जैसे सौ दिन का रोज़गार मिलना और 15 दिनों के अंदर उसका भुगतान होना और न्यूनतम मज़दूरी पर लोगों की जागरूकता बढ़ी है.

राजस्थान में सफलतापूर्वक काम हुआ है?

लोगों की बढ़ती हुई जागरूकता से ऐसा संकेत आता है कि दबाव के साथ माँग बढ़ेगी और ये क़ानून और सटीक तरह से लागू किया जा सकेगा.
लोगो में जागरूकता आने से लोगों को अपने अधिकार जानने का मौक़ा मिलता है और लोगों के इसी दबाव से हमें उम्मीद है कि ये क़ानून बेहतर ढंग से लागू किया जा सकेगा.

आप इस क़ानून की सफलता को 10 में से कितने अंक देंगे?

देखिए ये एक मुश्किल बात है क्योंकि इसके परिणाम अलग-अलग जगहों पर भिन्न हैं. और ये इतना ज़रूरी भी नहीं है. सही ये होगा कि इसके विकास की रफ़्तार पर ज़्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए जो कि अभी सभी जगहों पर काफ़ी कम ही मिलेगा.
मुख्य बात ये है कि क़ानून लाने से पूरा माहौल बदल रहा है. उदाहरण के लिए न्यूनतम मज़दूरी की बात करें तो क़ानून आने से पहले ग्रामीण इलाक़ों में लोगों को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी. लेकिन अब धीरे-धीरे सब जान रहे हैं.
पहले उत्तर प्रदेश और झारखंड में नरेगा के तहत न्यून्तम मज़दूरी का भुगतान कम था लेकिन अब वहां भी ये व्यवहारिक होता जा रहा है. इस तरह का महत्वपूर्ण परिवर्तन हर जगह दिख रहा है.

आप नरेगा बनने से पहले की तैयारियों में शामिल रहे. इसका प्रारूप कैसा हो. क़ानून कैसा हो आदि. इसके लिए हस्ताक्षर अभियान भी चलाए गए. आप भारत में ग़रीब आदमी को रोज़गार दिलाने के लिए पहले से मौजूद क़ानून की तुलना में नरेगा को कैसे देखते हैं.

इसका एक फ़र्क तो ये है कि ये लोगों के संघर्ष से अमल में आया है. वहीं दूसरे क़ानून जो हैं वो ऊपर से बनाकर लाए गए. लेकिन नरेगा में जिस तरह लोगों का संघर्ष शामिल था उससे लोग सक्रिय और संगठित हो रहे हैं. इससे उम्मीद है कि ये बेहतर ढंग से लागू होगा न कि उन क़ानूनों की तरह जो कि लागू नहीं हो पाए.

आज जो नरेगा क़ानून है उसमें आपकी नज़र में क्या ख़ूबियां है? क्या सुझाव आप देना चाहेगें इसमें और सुधार लाने के लिए?

एक ख़ूबी तो ये है कि दूर दराज के गांवों में भी लोगों को इसकी जानकारी हो रही है. इसमें ग्रमीण लोगों को रोज़गार देने के लिए जो प्रावधान हैं वो बहुत स्पष्ट हैं. मैं यहां झारखंड के एक दूरस्थ गांव में हूँ और काफ़ी लोगों को इसकी जानकारी है. ये इस क़ानून की मज़बूती है.
रोज़गार न मिलने की सूरत में कहां शिकायत की जाए इसका प्रावघान उतना सशक्त नहीं है. एक छोटे से सैक्शन 25 में एक बात ये कही गई है कि इस क़ानून को सही दिशा में क्रियान्वित न करने वाले अधिकरियों पर एक हज़ार रूपये का जुर्माना लगाया जाएगा. लेकिन इसका इस्तेमाल नहीं किया गया है. इसे इस्तेमाल किया जाए तो और बेहतर परिणाम सामने आएँगे।
जहां तक कमी की बात है तो रोज़गार न मिलने की सूरत में कहां शिकायत की जाए इसका प्रावघान उतना सशक्त नहीं है. एक छोटे से सैक्शन 25 में एक बात ये कही गई है कि इस क़ानून को सही दिशा में क्रियान्वित न करने वाले अधिकरियों पर एक हज़ार रूपये का जुर्माना लगाया जाएगा. लेकिन इसका इस्तेमाल नहीं किया गया है. इसे इस्तेमाल किया जाए तो और बेहतर परिणाम सामने आएँगे.
दूसरी बात ये है कि सौ दिन का रोज़गार प्रति परिवार से बदलकर प्रति व्यक्ति होना चाहिए. उससे एक फ़ायदा तो ये होगा कि परिवार के हर सदस्य को अपना अधिकार पाने की आज़ादी होगी जिसमें महिलाएँ भी शामिल हैं. इससे महिलाएँ कम वंचित रहेंगी.
दूसरे इससे आँकड़ों को संतुलित रखा जा सकेगा. अभी तक एक परिवार को एक जॉबकार्ड पर काम का मौका मिल रहा है लेकिन बैंक एकाउंट परिवार के एक व्यक्ति के नाम पर ही है. ऐसी कमियां हैं जिन्हें दूर किया जाना चाहिए.

आपके विचार से परिवार के हर व्यक्ति को सौ दिन का रोज़गार मिलना चाहिए. लेकिन इसके मौजूदा प्रारूप पर जितना ख़र्च हो रहा है उस पर कई अर्थशास्त्रियों का भी मानना है कि इस योजना पर ज़रूरत से ज़्यादा पैसा ख़र्च हुआ है. इस पैसे को दूसरे तरीक़ों से इस्तेमाल किया जाता तो ज़्यादा बेहतर होता.

ख़र्च से डरने की ज़रूरत नहीं है. अभी आप देखें तो भारत की आर्थिक विकास की दर पिछले सालों में बढ़ी है. मुश्किल ये है कि इसका फ़ायदा ग़रीब को न पहुंचकर संपन्न लोगों को होता है. इस समय भारतीय अर्थवयवस्था के लाभ का समान वितरण बहुत ज़रूरी है. समान वितरण मुझे नहीं दिखता है. इस ख़र्च से इसलिए डरना नहीं चाहिए क्योंकि ये पैसा सीधे ग़रीब लोगों तक पहुंचता है. और ये काफ़ी हद तक सतत भी है.
हाँ, सबसे ज़रूरी बात ये है कि ये पैसा अभी भी भ्रष्टाचार के चलते सभी ज़रूरतमंदो तक नहीं पहुँच रहा है. ये रुकना चाहिए और ग़रीब लोगों को इसका फ़ायदा मिलना चाहिए.
इसके लिए ज़रूरी है कि इस क़ानून में पारदर्शिता के जितने प्रावधान हैं उन्हें सख़्ती से लागू किया जाए. जिस तरह राजस्थान, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के प्रयास किए गए हैं, उस तरह से हर प्रदेश में किया जा सकता है.

इस क़ानून के पीछे देश में एक जनांदोलन खड़ा है, दूसरी ओर यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी की इसमें सीधे रुचि रही है. आप उनकी सलाहकार समिति में भी रहे हैं, आज जिस तरह की राजनीतिक परिस्थितियाँ और महात्वाकांक्षा पैदा हो रही हैं, उसमें आपको नरेगा का क्या भविष्य दिखता है?

जिस तरह लोगों में इसकी जागरूकता दिन ब दिन बढ़ रही है उससे राजनितिक दलों पर इसका दबाव हमेशा बना रहेगा. इसके क्रियान्वयन को और प्रभावशाली बनाने के लिए राजनितिक दलों को और गंभीर होना ही पड़ेगा.
मेरा सोचना ये है कि नरेगा अभी भी और आगे भी राजनीतिक पार्टियों के लिए महत्वपूर्ण बनता जाएगा क्योंकि ये आम आदमी से जुड़ा है. जिस तरह लोगों में इसकी जागरूकता दिन ब दिन बढ़ रही है उससे राजनितिक दलों पर इसका दबाव हमेशा बना रहेगा. इसके क्रियान्वयन को और प्रभावशाली बनाने के लिए राजनितिक दलों को और गंभीर होना ही पड़ेगा.
इस बार के लोक सभा चुनावों में भी हमने देखा कि जो दल पहले इस क़ानून के ख़िलाफ़ बोल रहे थे, चुनाव प्रचार में वो भी इसकी तरफ़ आते दिखे. क्योंकि लोग इससे लाभांवित हो रहे हैं तो राजनीतिक दल इसका विरोध कर ही नहीं सकते.
उदाहरण के लिए, पी चिदंबरम ने वित्तमंत्री रहते हुए इस क़ानून पर संशय ज़ाहिर किया था ओर इस क़ानून को एक तरह से उन्होंने कमज़ोर करने की कोशिश की थी. लेकिन अपने ही चुनाव क्षेत्र में उन्होंने इसके अच्छे नतीजे देखे तो वो अब भाजपा से पूछ रहे हैं कि वो इस क़ानून को बनाए रखेंगे या फिर वापस ले लेंगे.
मुझे उम्मीद है कि जैसे जैसे समय बीतेगा, नरेगा को मज़बूती मिलेगी और ये ग़रीब लोगों को रोज़गार देने का काम करता रहेगा. और इसको राजनीतिक मदद भी मिलती रहेगी.
 

Disqus Comment

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा