पानी उठाने के उपकरण

Submitted by admin on Tue, 09/23/2008 - 10:28
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जब पानी खेत से निचली जगह पर उपलब्ध होता है, तो उसे खेत के तल तक उठाने के लिए विभिन्न प्रकार के उपकरण प्रयुक्त किये जाते हैं। शक्ति स्रोत के आधार पर पानी उठाने वाले उपकरणों को मानव शक्ति चालित, पशु शक्ति चालित और यांत्रिक शक्ति चालित में विभाजित किया जा सकता है। नदी, भूजल और कुओं से पानी उठाने के लिये प्रयोग किये जाने वाले उपकरणो को विस्तार मे नीचे दिया गया है।
मानव शक्ति- चालित उपकरणः मानव शक्ति चालित पानी उठाने के प्रमुख उपकरण निम्नलिखित हैं:

बेडीः इस सिंचाई उपकरण में एक नावनुमा टोकरी में चार रस्सियॉ जुड़ी होती हैं। दो आदमी एक दूसरे के सामने खड़े होकर टोकरी को झुलाते हैं। टोकरी को पानी भरने के लिए लटकाया जाता है और उसको उठाकर नल या नाली या खेत में पानी डाल दिया जाता है। इस उपकरण द्वारा 0.9 से 1.2 मी0 की गहराई से 14000 से 19000 ली0 प्रति घंटे के हिसाब से पानी उठाया जा सकता है।

ढेकलीः ढेकली को पिकोट्टा भी कहा जाता है। इसका प्रयोग प्रायः उथले कुओं, जल-धाराओं तथा तालाबों से पानी उठाने के लिए किया जाता है। इसमें लकड़ी की एक लम्बी बल्ली होती है जो उत्तोलक की तरह किसी खड़ी छड़ या टेक पर लगी होती है। इस उत्तोलक के छोटे सिरे पर बोझ बंधा होता है। बोझ के लिए प्रायः किसी बड़े पत्थर, सूखी मिटटी के पिंड अथावा छोटे पत्थरों से भरी हुई टोकरी का प्रयोग किया जाता है। यह बोझ उत्तोलक के लंबे सिरे से लगी हुई छड़ या रस्सी से लटकी बाल्टी के लिए प्रतिभार का कार्य करता है। इस उपकरण को चलाने के लिए एक व्यक्ति रस्सी को नीचे की ओर छोडता है जिससे बाल्टी में पानी भर जाए। रस्सी को छोडने पर बल्ली में लगे बोझ के कारण बाल्टी अपने आप ऊपर आ जाती है। इसे अभीष्ट ऊँचाई पर उलटकर खाली कर दिया जाता है।

दोनः दोन भी ढेकली के प्रकार का एक जल उठाने का साधन है जिसका प्रयोग बंगाल तथा उसके आसपास के इलाकों में किया जाता है। इससे पानी 0.8 से 1.2 मीटर की ऊँचाई तक उठाया जा सकता है। इससे एक आदमी द्वारा एक घंटे मे औसतन 5000 से 13000 ली0 पानी उठाया जा सकता है।
आर्किमीडी पेंचः इस यंत्र में एक लकड़ी का ड्रम होता है जिसका भीतरी भाग पेंच या बरमें की शक्ल का होता है। इस भीतरी खंड को एक हत्थे की सहायता से घुमाया जाता है जो मध्यवर्ती धुरी मे लगा होता है। हत्थे घुमाने पर पानी ड्रम से ऊपर की ओर चढ़ता है और ड्रम के ऊपरी सिंरे से निकलकर खेत की नाली में गिरता है। यंत्र की धुरी ड्रम दोनों ओर निकली होती है और किनारों पर स्तंभों से टिकी होती है। आर्किमीडी पेंच को 300 से अधिक कोण पर नहीं रखा जाता है और इसकी अधिक क्षमता के लिए निचले सिरे का केवल आधा हिस्सा पानी में डूबा रहना चाहिए। कहीं कहीं इस यंत्र को बैलों द्वारा भी चलाया जाता है।

पैडलदार पहियाः केरल में पैडलदार पहिए को चक्रण भी कहा जाता है। इसमें एक आड़ी धुरी पर चारों ओर छोट पैडल होते हैं। इन पैडलों को इस तरह लगाया जाता है कि वे एक नॉंद से होकर ऊपर की ओर उठते हैं और उसके साथ साथ पानी को अपने आगे ठेलते जाते हैं। इस यंत्र का प्रवेशी सिरा पानी में डूबा रहता है और निकासी सिरा पानी दी जाने वाली भूमि के साथ समतल होता है। श्रमिक इन्हीं पैडलों को ढकेल कर पानी को ऊपर उठाते हैं। श्रमिकों की सुविधा के लिए पहिए के साथ एक स्टैंड लगा होता है जिसके सहारे वे पैडलों को चलाते हैं। ये पैडलदार पहिये विभिन्न आकारों के होते हैं।

पशु शक्ति चालित उपकरण

चरसाः भारत में सिंचाई हेतु गहरे कुंओं से पानी निकालने के लिए चरसे का प्रयोग सबसे अधिक किया जाता है। इसमें चमडे़ या जस्तेदार लोहे की चादर का बना हुआ एक थैला या बड़ा डोल होता है। इसी डोल को एक मजबूत तार के छल्ले द्वारा किसी लम्बी रस्सी के एक सिरे से बॉंध देते हैं। यह रस्सी कुएँ के सिरे पर लगी एक घिरनी के ऊपर से जाती है और उसका दूसरा सिरा एक जोड़ी बैलों के जुएँ से जुड़ा होता है। जब दोनों बैल ढालू भूमि पर नीचे की ओर जाते हैं तो डोल कुएँ में से पानी लेकर ऊपर की ओर उठता है।

स्वतः खाली होने वाला चरसाः इस चरसे में स्वतः खाली होने वाले डोल की व्यवस्था की जाती है। इसके निचले भाग में चमडे की नली या टोंटी लगी होती है। डोल का ऊपरी भाग एक भारी रस्सी से बंधा होता है जो घिरनी के ऊपर से जाती है और डोल की टोंटी के निचले सिरे पर एक हल्की रस्सी बंधी होती है। यह हल्की रस्सी नॉंद के सिरे पर लगे बेलन के ऊपर से गुजरती है। दोनों रस्सियों को एक साथ जोड़कर बैलों के जुएँ से बांध देते हैं। इन रस्सियों की लम्बाईयॉं इतनी रखी जाती है कि जब डोल कुएं में से बाहर आता है तो उसकी टोंटी मुड़कर दोहरी हो जाती है और पानी अपने आप ग्राही नांद में उलट जाता है। इसका उपयोग करने से श्रम की बचत हो जाती है।

चक्करदार मोटः इसमें डोलों का प्रयोग किया जाता है। जब एक डोल से पानी भर कर ऊपर आता है तो दूसरा डोल खाली होकर नीचे कुएं में जाता है। इसमें रस्सी तथा घिरनी व्यवस्था के साथ साथ केन्द्रीय घूमने वाला लीवर लगा होता है। इस व्यवस्था के कारण रस्सी आगे पीछे चलती है और बैल चक्राकार मार्ग में घूमते हैं। डोल की तली में वाल्व लगा होता है जिससे डोल स्वतः भर जाता है। जब डोल ऊपर को आता है, तो जल का भार वाल्व को बन्द रखता है। कुएं में दो लोहे की छड़े लगी होती हैं जो डोल को ऊपर-नीचे जाने में सहायता करती हैं। डोल स्वतः खाली होता है।

रहटः रहट में एक बडे ड्रम के दोनों ओर से होती हुई एक चेन या रस्सी कुएँ के अन्दर पानी तक जाती है जिसमें डोलचियॉं लगी होती हैं। ड्रम की धुरी के उर्ध्वाधर गियर तक एक क्षैतिज छड़ लगी होती है। इस उर्ध्वाधर गियर के दॉंते एक बड़े क्षैतिज पहिये के दॉंतो के साथ फॅंसे होते हैं। बडे़ पहिये की छड़ से एक लम्बी क्षैतिज बल्ली जुड़ी होती है जिससे पशु को बांध दिया जाता है।

रहट को चलाने पर ड्रम घूमता है जिससे चेन के निचले सिरे की डोलचियॉं पानी से भर कर ऊपर की ओर उठती हैं और पीछे वाली डोलचियॉं उनकी जगह लेती हैं। ड्रम के ऊपर से गुजरने पर डोलचियों का पानी एक नॉंद में गिरता है जहॉं से वह सिंचाई की नाली में चला जाता है। रहट में एक रैचेट लगा होता है जो भरी हुई डोलचियों की कतार के कारण पहिये और बल्ली का पीछे की ओर जाना रोकता है।

रहट की सहायता से लगभग 10 मीटर की ऊँचाई तक पानी उठाया जा सकता है, परन्तु पानी की गहराई 8 मीटर से अधिक होने पर रहट की कार्यक्षमता काफी घट जाती है। पानी उठाने की ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ पानी भरी डोलचियों की संख्या बढ़ जाती है जिसके फलस्वरूप पशुओं पर बहुत अधिक बोझ पड़ता है। रहट की डोलचियों की क्षमता प्रायः 8 से 15 लीटर तक होती है।

चेन पम्पः चेन पम्प एक दोहरी चेन होती है जिसमें लगभग 25 से0मी0 के अंतरालों पर चकतियॉं लगी होती हैं। कुएँ के ऊपर एक पहिया लगा होता है जिसके ऊपर से चेन जाती है। इस पहिये में इस प्रकार के खॉंचे बने होते हैं कि चेन में लगी हुई चकतियॉं ड्रम के संगत खॉंचों में फिट बैठती हैं जिससे सरककर चेन कुएँ से गुजरती है। नीचे पाइप लगा होता है जिसका व्यास लगभग 10 से0मी0 होता है और वह कुएँ में पानी की सतह से भीतर लगभग 0.6 से 0.9 मीटर तक जाता है। चेन में लगी चकतियों तथा पाइप के भीतरी भाग का व्यास एकसमान होता है जिसके फलस्वरूप् पहिये को घूमाने पर प्रत्येक चकती ऊपर की ओर पानी उठाती है। आधुनिक चेन पम्पों में चमडे़ या लोहे तथा चमडे़ के वाशर लगे होते हैं। चेन पम्प को भी रहट की तरह चलाया जाता है। पम्प को बैलों की जगह हाथ से चलाने के लिए क्रैंक और हत्थे की व्यवस्था की जाती है।
 

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