पानी के नियमों की परवाह नहीं

Submitted by admin on Fri, 02/06/2009 - 19:38
भोपाल। जल संकट की आशंका.... गिरता जल स्तर फिर भी लापरवाही। यही हाल रहा तो भोपाल में गंभीर परिणाम सामने आएंगे। जरूरी है कि नगर निगम अभी से जल नीति और पानी कानून पर ध्यान दे। जलसंकट को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने एक पत्र भोपाल नगर निगम को लिखा औरएक बार फिर पानी कानून पर ध्यान देने को कहा है। पत्र का उद्देश्य अगले वर्ष गर्मी के दिनों की जल की समस्या से ननि को अवगत कराना और अभी से ही पानी नियम लागू करने की तरफ ध्यान दिलाना है। अब तक ये नियम गर्मी के दिनों में लागू होता था, लेकिन इस बार कम बारिश से और भूजल का दोहन होने से बोर्ड को ये कदम उठाना पडा है।

जल संकट की स्थिति


तेजी से गिरते भूजल स्तर वाले शहरों में शामिल भोपाल में पानी अब पाताल तक पहुंच गया है। गर्मी का दौर आते-आते भूजल स्तर के मामले में स्थिति बदतर हो जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने भोपाल को भूजल के अतिरिक्त दोहन क्षेत्र (ओवर एक्सप्लाइटेड कैटेगरी) में रखा है। इस साल तपन शुरू होने से पहले ही भूजल के दोहन के मामले में शहर को एक और चेतावनी जारी की है। भोपाल में भूजल दोहन का आंकडा 137 प्रतिशत हो चुका है। यह ताजा आंकडा बताता है कि भूजल संरक्षण के मामले में यहां चेतना नहीं है।

रिजर्व वाटर भी निकला


भूजल दोहन के आंकडे के 137 प्रतिशत के मायने समझाते हुए भूजल विद् बताते हैं कि प्राधिकरण घटते भूजल स्तर के लिहाज से तीन श्रणियों में शहरों को अधिसूचित करता है। सेमी क्रिटीकल, क्रिटीकल व ओवर एक्सप्लॉइटेड। क्षमता से अधिक दोहन वाले शहरों को ओवर एक्सप्लॉइटेड कैटेगरी में रखा जाता है और भोपाल इसी श्रेणी में है। यहां जितना पानी हर साल जमीन में पहुंचता है उसे निकालने के साथ भूगर्भ में मौजूद 37 प्रतिशत अतिरिक्त पानी भी निकाला गया।

पानी निकालें तो ये कानून मानें


भूजल दोहन पर केंद्रीय भूजल प्राधिकरण द्वारा जारी निर्देश और कानून लागू होते हैं। इसके मुताबिक भोपाल जैसे शहर में पीने और घरेलू उपयोग के लिए ही ट्यूबवेल से पानी निकालें। इनके अलावा सामुदायिक उपयोग के लिए नगर निगम और ऐसे ही सरकारी विभाग, अस्पताल, यूनिवार्सिटी आदि को भूजल के दोहन की अनुमति मिलनी चाहिए। औद्योगिक उपयोग के लिए भूजल दोहन की अनुमति विशेष स्थिति में ही दी जा सकती है। उद्योग के लिए जरूरी है कि वह उतना पानी फिर से जमीन में पहुंचाने का प्रबंध करे। इन क्षेत्रों में बोरिंग और ट्यूबवेल खोदने का काम भी सिर्फ प्राधिकरण के रजिस्टर्ड कॉन्ट्रेक्टर्स ही कर सकते हैं। बोरिंग के आकार और पानी खींचने वाला पंप की क्षमता भी तय है। बोरिंग के साथ रेन वॉटर हॉर्वेस्टिंग भी अनिवार्य किया गया है।

किसे परवाह कानून की


विशेषज्ञों के मुताबिक शहर में भूजल प्राधिकरण द्वारा बने कानून का पालन नहीं हो रहा है। एक भी ड्रिलिंग काट्रेंक्टर प्राधिकरण के पास रजिस्टर्ड नहीं है।

साभार – राज एक्सप्रेस

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