पानी कैसे खो गया?

Submitted by admin on Tue, 02/24/2009 - 11:22
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जयेन्द्र शाह
घर की छत जगह-जगह से टपक रही थी। बारिश का पानी छत के कई बिंदुओं से बूंद-बूंद गिर रहा था। इसे रोकने का एक ही उपाय था, सिमेन्ट से छत की पूरी सतह को सख्त करना और छत में भरे हुए पानी को निकालने के लिए छत के किनारे की ओर दो-चार बड़े-बड़े छिद्र करना, जिससे पानी जल्द से नीचे उतर जाए।

घर की छत के लिए जो करना चाहिए वह हमने पूरे देश की पूरी भूमि के साथ कर दिया है, जो वास्तव में नहीं करना चाहिए था। भूमि की उपरी दस-बीस ईंच की परत की पूरी सतह को हमने कई तरीकों से अति सख्त और कठोर बना दिया।

पालतू जानवर घास चरने के लिए घूमते-फिरते हुए अपना मल-मूत्र धरती पर गिराते रहते थे। खेतों में इन पालतू जानवरों के मल-मूत्र की खाद प्रतिवर्ष डालते रहने से भूमि की उपरी दस-बीस ईंच की सतह हल्की और रिसावदार बनी रहती थी। साथ ही पालतू जानवरों की प्राकृतिक मृत्यु के बाद उनका चमड़ा निकाल कर शेष शरीर को खेतों में दफनाया जाता था। इससे बनी खाद से खेतों की भूमि हल्की और रिसावदार बनी रहती थी और इस कारण बरसात में जमीन के पचास-सौ फीट की गहराई तक पानी का संचय होता रहता था। परन्तु हमने बूचड़खानों को बनाकर पालतू जानवरों को इतनी बड़ी मात्रा में कत्ल करना आरंभ किया कि खेतों में उनके मृत शरीर से बनने वाली सेन्द्रीय खाद उपलब्ध ही नहीं है। जानवरों की संख्या कम होने से भूमि को मिलने वाले उनके मल-मूत्र रूपी खाद की भी कमी हो गई। परिणामस्वरूप भूमि के रिसावदार बने रहने की प्रक्रिया टूटने लगी।

एक और प्राकृतिक प्रक्रिया हमेशा चलती रहती थी। बरसात का पानी जंगलों में बहते हुए जंगलों में गिरे, सड़े, गले डालियों, फल-फूल और पत्तों के सेन्द्रिय अवशेषों को अपने साथ बहाकर मैदानी भूमि की सतह पर बिछाया करता था। बाद में जंगलों का काटा जाना शुरू हुआ जो आज भी चालू है। धरती को सख्त होने से बचाने की इस प्राकृतिक प्रक्रिया का कोई कृत्रिम विकल्प कभी हो ही नहीं सकता।

एक ओर धरती की उपरी सतह को हम या तो कृत्रिम तरीके से सख्त व कठोर बनाते गए और जानवरों तथा जंगलों को समाप्त कर धरती की उपरी सतह के हल्के और रिसावदार बने रहने की प्रक्रिया को तोड़ते गए। दूसरी ओर, ज्यादा गहराई के टयूबवेलों का काफी मात्रा में उपयोग करके हमने धरती में बड़े-बड़े छेद भी कर दिए।

भूमि की उपरी सतह सख्त होने से पानी का भूमि में रिसना कम या लगभग बंद हो गया। सारा पानी बहता हुआ नदियों के किनारों को तोड़कर, नदियों की गहराई को खत्म करता हुआ और नदियों की अधिक पानी जमा रखने की क्षमता को नष्ट करता हुआ समुद्रों में जाने लगा। परिणामस्वरूप कहीं तो बाढ़ आने लगी और कहीं सूखा पड़ने लगा।

पहले पानी भूमि में रिसता हुआ नीचे पचास-साठ फीट की गहराई में जमा होता रहता था किंतु अब यदि थोड़ा बहुत पानी रिस कर भूमि में उतरता भी है तो टयूबवेल के बड़े छेदों के सहारे सीधा 200-400 फीट से ज्यादा गहराई में चला जाता है। भूमि की पचास-सौ फीट की गहराई में पानी का जमा होना लगभग बंद हो गया। और अब टयूबवेलों (बोर) की भी गहराई धीरे-धीरे बढ़ानी पड़ रही है। इतनी गहराई में जमे पानी को निकालने पर उसके साथ हानिकारक क्षार भी बाहर आते हैं। ये क्षार स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। हमारी व्यथा यह है कि ऐसी गंभीर स्थिति होने पर भी विदेशी कंपनियों को प्रतिदिन पांच-दस लाख लीटर पानी निकालने की छूट मिली हुई है। उन पर यदि स्थानीय पंचायतें प्रतिबंध लगाती भी हैं तो हमारी अदालतें उन्हें इससे मुक्त कर देती हैं। कुछ लोगों की ‘बड़ी प्यास’ की पूर्ति के लिए पेप्सी-कोला आदि के उत्पादन को अनुमति देने से लाखों लोगों को पीने के पानी का भी अभाव हो जाता है। हमारी अदालतें ऐसी अनुमति देकर क्या हमारे देशवासियों के मानवाधिकारों का हनन नहीं कर रहीं?

समाज के तथाकथित सभ्य लोग पानी के अपव्यय को रोकने के लिए प्रचार माध्यमों द्वारा काफी उपदेश देते रहते हैं। जैसे कि ‘नल टपकने न दें’, ‘नल बंद करें’, ‘पानी कम गिराएं,’ ‘पानी बूंद-बूंद बचाएं’ आदि। परन्तु उपदेश देने वाले यही लोग टायलेट में सबसे अधिक पानी बहाते हैं, घर में स्वीमिंग पुल बनाकर पानी का अत्यधिक व्यय करते हैं, केवल शोभा के लिए उगाए गए कांटोवाले पेड़-पौधे (कैक्टस) के पीछे पानी बर्बाद करते रहते हैं, फौव्वारों में स्नान करते हैं और अपने घर में केवल शोभा के लिए तरह-तरह के फौव्वारो में कई घंटों तक पानी बहाते रहते हैं। ये वही लोग हैं जो बड़े कारखानों को चलाने के लिए लाखों लीटर पानी भूमि से निकालते रहते हैं। पानी का उपयोग करने के बाद उसे प्रदूषित कर जलाशयों में वापस छोड़ देते हैं। इससे नदी, तालाब आदि पानी के स्रोत प्रदूषित हो जाते हैं।

इस स्थिति को कैसे बदला जाए, इस पर गहरा चिंतन आवश्यक है। भूमि के उपरी सतह से पानी रिसने और पानी का संचय बढ़ाने के लिए सबसे पहले सारे बूचड़खाने और जानवरों के मांस, खून, हड्डी तथा इनसे बनी चीजों के निर्यात हेतु हो रहे कत्ल को बंद किया जाए।

जंगल फिर से लगाए जाएं। इसके लिए भी जानवरों की रक्षा एवं वृद्धि अनिवार्य है। जंगलों की वृद्धि में जानवरों का सहयोग काफी महत्व रखता है।

नदी-तट से संबंधित पंचायतों के माध्यम से, छिछली बनी नदियों को खुदाई करके गहरी बनाना चाहिए और किनारों को बांध कर वहां घास उगाई जानी चाहिए। इससे जानवरों के लिए चारा प्राप्त होगा और किनारे भी मजबूत और सुरक्षित बनेंगे। नदियों पर कम-कम दूरी पर छोटे-छोटे बांध (चेक डैम) भी बना सकते हैं।गांधी शांति प्रतिष्ठान के अनुपम मिश्र की पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ और अलवर के राजेन्द्र सिंह की पुस्तक ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ में जल संरक्षण की जो तकनीक बताई गई है, उसके अनुसार देश के सभी तालाबों और सरोवरों का जीर्णोद्धार तथा नये तालाबों का निर्माण किया जाना चाहिए।

नदियों को जोड़ने की अरबों-खरबों रुपए की योजनाओं को छोड़कर कम खर्च में देश की जनता को पानी उपलब्ध कराने की योजनाओं के बारे में देश के नेतृत्व और शासन को सोचना चाहिए। धीरे-धीरे टयूबवेलों को बंद करने की प्रक्रिया कैसे शुरू की जाए, इस दिशा में गहराई से सोचना पड़ेगा।

यह सारा कार्य कुछेक लोगों का नहीं है। शासन भी अकेले यह काम नहीं कर सकता और न जनता ही इसे अकेली कर पाएगी। जल संरक्षण के इस महती काम को शासन जनता की सहायता से करे और जनता इस कार्य में सहयोग करने की तत्परता रखते हुए शासन पर दबाव बनाए, तभी कुछ हो सकता है। हम यह पहले खोजें कि पानी कैसे खो गया और जिस रास्ते पानी खो गया, उन्हीं रास्तों से पानी को हम वापस लाएं।

साभार - भारतीय पक्ष

भारतीय पक्ष भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका है। प्रिंट संस्करण के साथ-साथ इन्टरनेट पर भी आप इस पत्रिका को पढ़ सकते हैं। पत्रिका और वेबसाइट की ज्यादातर सामग्री ज्ञानपरक होती है। “भारतीय पक्ष” के दोनों संस्करणों के संपादक विमल कुमार सिंह हैं।

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