बढ़ता तापमान, डूबते द्वीप

Submitted by admin on Wed, 07/08/2009 - 21:01
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- प्रमोद भार्गव

बढ़ते तापमान ने अब तीव्रता से असर दिखाना शुरु कर दिया है। जिसके चलते समुद्र ने भारत के दो द्वीपों को लील लिया है।हिमालय के प्रमुख हिमनद २१ प्रतिशत से भी ज्यादा सिकुड़ गए हैं। यहां तक कि अब पक्षियों ने भी भूमण्डल में बढ़ते तापमान के खतरों को भांप कर संकेत देना शुरु कर दिए हैं। इधर इस साल मौसम में आए बदलाव ने भी बढ़ते तापमान के आसन्न संकट के संकेत दिए हैं। यदि मनुष्य अभी भी पर्यावरण के प्रति जागरुक न हुआ तो प्रलयंकारी खतरों से समूची मानव जाति को जूझना ही पड़ेगा।

भारत में ही नहीं पूरे भूमण्डल में तापमान तेज़ी से बढ़ रहा है। जिसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। भारत के सुंदरवन डेल्टा के करीब सौ द्वीपों में से दो द्वीपों को समुद्र ने हाल ही में निगल लिया हैऔर करीब एक दर्जन द्वीपों पर डूबने का खतरा मंडरा रहा है। इन द्वीपों पर करीब दस हजार आदिवासियों की आबादी है। यदि ये द्वीप डूबते हैं तो इस आबादी को भी बचाना असंभव हो जाएगा। जादवपुर विश्वविद्यायल में स्कूल ऑफ ओशिएनोग्राफिक स्टडीज़ के निदेशक सुगत हाजरा ने स्पष्ट किया है कि लौह छाड़ा समेत दो द्वीप समुद्र में डूब चुके हैं। ये द्वीप अब उपग्रह द्वारा लिए गए चित्रों में भी नज़र नहीं आ रहे हैं। हाजरा इसका कारण दुनिया में बढ़ते तापमान को बताते हैं।

दूसरी तरफ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के स्पेस एप्लीकेशन सेन्टर (एस.ए.सी.) के हिमनद विशेषज्ञ अनिल कुलकर्णी की टीम ने हिमालय के हिमनदों का ताज़ा सर्वे करने के बाद खुलासा किया है कि ये २१ फीसदी से भी ज्यादा सिकुड़ गए हैं। इस टीम ने ४६६ से भी ज्यादा हिमनदों का सर्वेक्षण करने के बाद उक्त नतीजे निकाले हैं।

जलवायु पर विनाशकारी असर डालने वाली यह ग्लोबल वार्मिंग (धरती गर्माना) आने वाले समय में भारत के लिए खाद्यान्न संकट भी उत्पन्न कर सकती है। तापमान वृद्धि से समुद्र तल तो ऊंचा उठेगा ही, तूफान की प्रहार क्षमता और गति भी २० प्रतिशत तक बढ़ जाएगी। इस तरह के तूफान दक्षिण भारतीय तटों के लिए विनाशकारी साबित होंगे।

ग्लोबल वार्मिंग का असर भारत के उत्तर पश्चिम क्षेत्र में देखने को मिलने लगा हैं। पिछले कुछ सालों से मानसून इस क्षेत्र में काफी नकारात्मक संकेत दिखा रहा है। केवल भारत ही नहीं इस तरह के संकेत नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका व बांग्लादेश में भी नज़र आ रहे हैं।

देश के पश्चिमी तट, जिनमें उत्तरी आंध्रप्रदेश का कुछ हिस्सा आता हैं, तथा उत्तर पश्चिम में मानसून की बारिश बढ़ रही है और पूर्वी मध्यप्रदेश, उड़ीसा व उत्तरपूर्वी भारत में यह कम होती जा रही है। पूरे देश में मानसून की वर्षा का संतुलन बिगड़ सकता है। ग्लोबल वार्मिंग के भारत पर असर की एक खास बात यह रहेगी कि तापमान सर्दियों के मौसम में ज्यादा बढ़ेगा। लिहाज़ा सर्दियां उतनी सर्द नहीं रहेंगी जबकि गर्मियों में मानसून के मौसम में ज्यादा बदलाव नहीं आएगा। मौसम छोटे होते जाएंगे जिसका सीधा असर वनस्पतियों पर पड़ेगा कम समय में होने वाली सब्जियों को तो पकने का भी पूरा समय नहीं मिल सकेगा।

विभिन्न अध्ययनों ने खुलासा किया है कि सन् २०५० तक भारत का धरातलीय तापमान ३ डिग्री सेल्यिसम से ज्यादा बढ़ चुका होगा। सर्दियों के दौरान यह उत्तरी व मध्य भारत में ३ डिग्री सेल्सियस तक बढ़ेगा तो दक्षिण भारत में केवल २ डिग्री तक। इससे हिमालय के शिखरों से बर्फ पिघलने की रफ्तार बढ़ेगी और वहां से निकलने वाली नदियों में जल प्रवाह तेज़ हो जाएगा।

इस सब का मानसून पर यह असर पड़ेगा कि मध्य भारत में सर्दियों के दौरान वर्षा में १० से २० फीसदी की कमी आ जाएगी और उत्तर-पश्चिमी भारत में ३० फीसदी तक। अध्ययन बताते हैं कि २१वीं सदी के अंत तक भारत में वर्षा ७ से १० फीसदी बढ़ेगी लेकिन सर्दियों में कम हो जाएगी। होगा यह कि मानसून के दौरान तो जमकर वर्षा होगी लेकिन बाकी माह सूखे निकल जाएंगे। पानी कुछ ही दिनों में इतना बरसेगा कि बाढ़ का खतरा आम हो जाएगा और दिसम्बर, जनवरी व फरवरी में वर्षा बेहद कम होगी, जैसा कि हम बीते मानसून में देख चुके हैं। हिमालय की करीब ५० जीवनदायिनी हिमनद झीलें अगले पांच वर्षो में अपने किनारे तोड़कर मैदानी इलाकों को जलमग्न कर सकती हैं, जिससे करोड़ो लोगो का जीवन खतरे में पड़ सकता हैं।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण (यूएनडीपी) के वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि बढ़ते तापमान के कारण हिमनदों के पिघलने से नेपाल की २० और भूटान की २४ हिम झीलों का पानी उफान पर है। अगले पांच वर्षो के दौरान इन ४४ हिम झीलों से निकला पानी नेपाल और भूटान के साथ-साथ भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्रों अैर अन्य पड़ोसी देशों में संकट पैदा कर सकता है।

अनिल कुलकर्णी और उनकी टीम ने उपग्रह चित्रों और ज़मीनी पड़ताल के ज़रिए हिमाचल प्रदेश के ४६६ हिमनदों के बारे में चौंकाने वाले नतीजे प्रस्तुत किए हैं। १९६२ के बाद से एक वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में आने वाले १६२ हिमनदों का आकार ३८ फीसदी कम हो गया है। बड़े हिमनदतो तेज़ी से खंडित हो रहे हैं। वे लगभग १२ प्रतिशत छोटे हो गए हैं। सर्वेक्षणों से पता चला है कि हिमाचल प्रदेश में हिमनदों का कुल क्षेत्रफल २०७७ वर्ग कि.मी. से घटकर १६२८ वर्ग कि.मी. रह गया है। बीते चार दशकों में हिमनदों का आकार २१ फीसदी घट गया हैऔर अध्ययनों से पता चला है कि हिमालय के ज्यादातर हिमनद अगले चार दशकों में किसी दुर्लभ प्राणी की तरह लुप्त हो जाएंगे। यदि ये हिमनद लुप्त होते हैं तो भारत की कई पनबिजली परियोजनाएं संकट से घिर जाएंगी, फसलों को पानी का जबर्दस्त संकट झेलना होगा और मौसम में स्थायी परिवर्तन आ जाएगा। ये परिवर्तन मानव एवं पृथ्वी पर जीवन के लिए अत्यंत खतरनाक हैं।

जलवायु में निंरतर हो रहे परिवर्तनों के चलते दुनिया भर में पक्षियों की ७२ फीसदी प्रजातियों पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। विश्व प्रकृति निधि की रिपोर्ट के अनुसार इन्हें बचाने के लिए अभी समय है। कीन्या में संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में जारी रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग जनित जलवायु परिवर्तनों से सबसे ज्यादा खतरा कीटभक्षी प्रवासी पक्षियों हनीक्रीपर्स और ठंडे पानी में रहने वाले पेंग्विन के लिए है। पक्षियों ने संकेत देना शुरु कर दिए हैं कि ग्लोबल वार्मिंग ने दुनिया भर के जीवों के प्राकृत वासों में सेंध लगा ली हैं।
 
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