बांध और विस्थापन

Submitted by admin on Fri, 10/10/2008 - 19:47

भारी क्षति, कम लाभ
आंध्र प्रदेश की पोलावरम् परियोजना
पोलावरम् परियोजना का उद्देश्‍य आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों तथा शुष्‍क रायलसीमा क्षेत्र में अति बांछित सिंचाई के लिये पानी मुहैया कराने के लिये गोदावरी के पानी का दोहन करना है। बहरहाल यह परियोजना विवादों में घिर गयी है क्योंकि जलमग्न होने वाले क्षेत्र और परियोजना से प्रभावित लोगों के लिये पुनर्वास योजना के बारे में कोई समझौता नहीं हुआ है।

आर वी रमा मोहन
पश्चिम गोदावरी जिले के पोलावरम् मंडल के रमैयाहपेट गांव में गोदावरी नदी बन रही पोलावरम् परियोजना विशाल बहुउद्देश्‍यीय सिंचाई परियोजना है। इस योजना पर काफी समय से विचार चल रहा था और इस परियोजना का प्रस्तावित स्थल डावलेस्वरम् में मौजूदा सर आथर कॉटन बैराज की धारा के प्रतिकूल दिशा में करीब 42 किलो मीटर और राजामुंदरी से धारा की प्रतिकूल दिशा में 34 किलोमीटर की दूरी पर है। गोदावरी महाराष्‍ट के त्रियम्बकेशवर की सहयाद्री पहाड़ियों से निकलती है। प्रावरा, पूर्णा, मंजीरा, मानेरू, प्राणहिता, इंद्रावती और सबरी गोदावरी की मुख्य सहायक नदियां हैं। गोदावरी के प्रवाह में प्राणहिता, इंद्रावती तथा सबरी का 70 प्रतिशत योगदान है। खम्मन जिले में कुनावरम् में जब सबरी गोदावरी नदी में मिलती है तब यह पापी पहाडि.यों में 250 से 275 मीटर की चौडाई से गुजरते हुये राजामुंदरी में फैल कर साढ़े तीन किलोमीटर चौड़ी हो जाती है। पोचमपाडु में श्रीराम सागर परियोजना (एस आर एस पी) तथा डॉवलेशवमफ में कॉटन बैराज आंध्र प्रदेश में गोदावरी नदी पर बनने वाली दो बड़ी परियोजनायें हैं। पोलावरम् परियोजना नदी के 85,0000 घन मीटर (अतिरिक्त पानी सहित) के भरोसेमंद उत्पादन में से 8,5000 घन मीटर पानी का इस्तेमाल करती है। इसमें से आंध्र प्रदेश की हिस्सेदारी करीब 42,0000 घन मीटर है जिसमें से करीब 19,0000 घन मीटर को विभिन्न परियोजनाओं के लिये जबकि 23,0000 घन मीटर पानी को समुद्र के लिये छोड़ दिया जाता है। इस परियोजना का ``पूर्ण जलाशय स्तर´´ (एफ आर एल) 45.72 मीटर तथा पुश्‍ता स्तर के शीर्ष (टी बी एल) का 53.32 मीटर होगा। परियोजना के मुख्य कार्यों में मिट्टी और पत्थरों के 2.31 किलोमीटर लंबे बांध का निर्माण, बांयी ओर 960 मेगा वाट क्षमता के बिजली घर का निर्माण, बांयी तरफ 181.5 किलोमीटर लंबा मुख्य नहर तथा दांयी तरफ 174 किलोमीटर लंबे मुख्य नहर का निर्माण शामिल है।

मुख्य लाभ
(1) पूर्वी गोदावरी और विशाखापतनम् जिले के लिये बांये मुख्य नहर से 1.6 लाख हेक्टेयर के लिये तथा कृष्‍णा और पश्चिमी गोदावरी जिले में दायें मुख्य नहर से 1.28 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई के लिये जल।
(2) 969 मेगावाट पन बिजली का उत्पादन
(3) विजयवाडा के प्रकाशम बैराज पर कृष्‍णा नदी के लिये 2,2000 घन मी मी मीटर पानी भेजा जाना।
(4) विशाखापत्तनम् को औद्योगिक तथा घरेलू उपयोग के लिये 6530 घन मी मी पानी मुहैया होना।
(5) मुख्‍य नहरों के दायें और बायें तरफ स्थित गांवों के लिये पेय जल की आपूर्ति

इस परियोजना के साथ इसके तट के अगले हिस्से ( foreshore) में 42,000 हेक्टेयर भूमि (37,743 हेक्टेयर आंध्र प्रदेश में, 1618 हेक्‍टेयर छत्तीसगढ़ में तथा 2,786 हेक्टेयर उड़ीसा) का जलमग्न होना तथा 1980 के दशक में बनाये गये प्रारूप के अनुसार 292 गांवों के 30,607 परिवारों (सन् 1991 की जनगणना के मुताबिक) का विस्थापन शामिल है। इस प्रारूप को बाद में संशोधित किया गया और सन् 2003 के प्रारूप के अनुसार जलमग्न होने वाले क्षेत्र का दायरा घट कर आंध्रप्रदेश के पूर्व तथा पश्चिम गोदावरी जिलों में से प्रत्येक में एक मंडल और खम्माम के सात मंडलों में 276 गांव (2001 की जनगणना के अनुसार एक लाख 17 हजार 034 लोग) रह गये। छत्तीसगढ़ तथा उड़ीसा में कोई भी क्षेत्र जलमग्न नहीं होगा। तालिका में आंध्र प्रदेश के जलमग्न होने वाले क्षेत्रों को वर्गीकृत किया गया है।

2 जलमग्नता
नहर निर्माण के लिये कुल 46,926 हेक्टेयर क्षेत्र का (जल क्षेत्र 11,782 हेक्टेयर, शुष्‍क क्षेत्र 32,667 हेक्टेयर तथा बगान क्षेत्र 2,48 हेक्टेयर) अधिग्रहण किया जाना है।

सन् 2001-02 की दरों के अनुसार परियोजना का वास्तविक लागत 12,234 करोड़ आंका गया था जबकि संशोधित प्रारूप के अनुसार सन् 2003-04 की दरों के अनुसार अनुमानित लागत 8,198 करोड़ रुपये आंका गया जिसमें परियोजना लाभ व्यय का अनुपात 2 : 4 : 1 है। संशोधित प्रारूप में अंतरराज्यीय जलमग्नता को कम करने के उद्देष्य से अधिक जल छोड़े जाने के लिये उत्पलव मार्ग के शीर्ष स्तर को कम कर दिया गया था। अगस्त 2004 में सरकार ने विजिंगराम तथा सितकाकुलम जिलों में 3.2 लाख हेक्टेयर के अतिरिक्त क्षेत्र में सिंचाई के लिए दायी नहर के 100 किलोमीटर के विस्तार की योजना बनायी।

3 मनहूस परियोजना
पोलावरम परियोजना की अवधारणा सन् 1940 में तैयार कर ली गयी थी। आरंभ में इस परियोजना को राम पाड़ा सागर परियोजना का नाम दिया गया तथा इसके मूल रूप से पापी पहाडि.यों के बीच संकीर्ण नदी क्षेत्र में इसका निर्माण करने का प्रस्ताव रखा गया। लेकिन बाद में इस परियोजना के विचार को त्याग दिया गया क्योंकि इस पर बहुत अधिक खर्च आने का अनुमान था। ऐसा इसलिये क्योंकि प्रस्तावित बांध स्थल पर उथले ठोस चट्टानों के नहीं होने के कारण वहां नींव डालने में बहुत अधिक लागत आता। 1977 में इस परियोजना की व्यावहारिकता के बारे में नये सिरे से जांच-पड़ताल आरंभ हुयी और 1980 में राज्यों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर हुये। सन् 1985 तक पोलावरम में बांध निर्माण के लिए सभी तरह के प्रस्ताव तैयार कर लिये गये। किंतु यह परियोजना कांग्रेस कार्यकारिणी तथा भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों से हरी झंडी नहीं मिलने के कारण क्रियान्वित नहीं हो पायी। सारिणी में इस परियोजना से संबंधित मुख्य घटनाओं के काल क्रम दर्शाये गये हैं।

डूब एवं विस्थापन
इस बांध के साथ मुख्य समस्या बड़े पैमाने पर लोगों के विस्थापन तथा बड़े क्षेत्र के जलमग्न होने को लेकर है। यह परियोजना 276 गांवों के 1,17,034 लोग को विस्थापित करती है तथा 37,743 हेक्टेयर भूमि (कृषि योग्य भूमि, जंगल तथा जलीय क्षेत्र) को जलमग्न करती है। इस परियोजना के कारण कई जनजातीय तथा गरीब लोगों के जीवन एवं आवास खतरे में पड़ सकते हैं। इस परियोजना को लेकर मुख्य चिंता इस प्रकार हैं :

बांध निर्माण से भारी संख्या में लोगों का विस्थापन होगा तथा बहुत अधिक क्षेत्र के जलमग्न होने के कारण विस्थापित होने वाले लोगों के पुनर्वास का काम अत्यंत कठिन होगा।

इस परियोजना के कारण जलमग्न होने वाले वन एवं कृषि क्षेत्र, खर्च की तुलना में कम लाभ मिलने तथा जीवन यापन के साधनों की क्षति आदि को लेकर उत्पन्न विवादों के कारण इस परियोजना को कांग्रेस कार्यकारिणी, आदिवासी कल्याण मंत्रालय तथा योजना आयोग से मंजूरी मिलना अत्यंत कठिन है।

पर्यावरण विदों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं का राज्य सरकार पर भरोसा नहीं है। येलूरू, कोवाडा, सुरामपलेम, नागार्जुन सागर बांध और श्री राम सागर जैसी परियोजनाओं के पुनर्वास कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में राज्य सरकार का रेकार्ड खराब रहा है।

इस परियोजना के कारण जैव विविधता एवं वन्य जीवों की बड़े पैमाने पर हानि होगी तथा ग्रेफाइट की खानों के जलमग्न होने से जल प्रदूषण पैदा होगा और जल जीवों की हानि होगी। इससे हमारे प्राकृतिक संसाधन भी बर्बाद होंगे।

गोदावरी नदी के मुंहाने पर रेत और गाद का बहुत अधिक जमाव होगा। यदि गाद का जमाव इसी तरह से चलता रहा तो परियोजना कितने समय जारी रह पायेगी।

हालांकि आंध्रप्रदेश सरकार ने अप्रैल 2005 में पुनर्वास नीति बनायी लेकिन जलमग्न होने वाले क्षेत्र के लोगों के साथ कोई बातचीत नहीं की गयी। इस नीति को लेकर संहेह को इस बात से भी बल मिलता है कि 2004-05 में 300 करोड़ रुपये के वार्षिक बजट आबंटन का प्रावधान करने की बात कही गयी किन्तु इसमें पुनर्वास संबंधी गतिविधियों का स्‍पष्‍ट तौर पर जिक्र नहीं किया गया।

आंध्रप्रदेश बछावत आयोग की अनुशंसा के अनुसार पोलावरम् परियोजना से कृष्‍णा नदी को 2,267 घन मी मी पानी छोड़ने के बदले कर्नाटक एवं महाराष्‍ट के लिये 992 घन मिमी पानी देना है। इसकारण अंतर बेसिन स्थानांतरण के कारण कुल लाभ 1,275 घन मिमी का ही होता है।

ग्राम पंचायत तथा स्थानीय मंडल परिषदों को जलमग्नता के परिणाम तथा उनके लिये सरकार की ओर से बनायी गयी योजनाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं है। लोगों का मानना है कि जलमग्नता का यह स्तर 1986 की बाढ़ के समान होगा।

लोग बांध का विरोध कर रहे हैं और वे जानना चाहते हैं कि तट पर बसे उन लोगों के लाभ के लिये जीवन यापन के अपने साधनों एवं जीवन की बलि क्यों दें जो आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में हैं।

जल्दीबाजी में शुरूआत
पोलावरम सुर्खियों में तब आया जब आंध्र प्रदेश सरकार ने 2004 के शुरू में इस परियोजना में दोबारा रुचि दिखानी शुरू की। केंद्र सरकार की एजेंसियों और मंत्रालयों से मंजूरी नहीं मिलने के वाबजूद मुख्य मंत्री ने 8 नवंबर 2004 को दायीं मुख्य नहर के निर्माण के लिये शिलान्यास कर दिया तथा इस परियोजना को नया इंदिरा सागर परियोजना नाम दिया। राज्य सरकार इस परियोजना के लिये वित्तीय सहायता के लिये आस्ट्रेलिया की सरकार के साथ समझौता कर रही है। पोलावरम परियोजना को मुख्य प्राथमिकताओं में शामिल किया गया। बजट आबंटनों के मामले में तेलुगू गंगा तथा देवादुला परियोजना के बाद इसके लिये सबसे अधिक बजट का प्रावधान किया गया। वर्ष 2004-05 के लिये इसके लिये 300 करोड़ रूपये रख दिये गये। जल मग्न होने वाले क्षेत्रों के लोग इन घटनाक्रमों से अत्यधिक व्यथित हैं किंतु ये लोग कभी भी न तो संगठित हुये ओर न ही विस्थापन के व्यापक परिणामों को समझ सके। उनकी केवल इतनी मांग है कि अगर उनका निवास जलमग्न हो जाये तो उनके लिये बेहतर पुनर्वास योजना बनायी जाये। जो कि मान्या प्रान्ता चेतन्या यात्रा 1991 से प्रेरित आपदा निवारण तैयारी नेटवर्क (27 स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों का समूह) अगस्त 2004 से खम्मम जिले के 7 मंडलों में परियोजना प्रभावित लोगों के लिए संघर्ष कर रहा है। इस नेटवर्क ने मंडल स्तर पर सर्वदलीय समितियां बनायी और जीवन और पर्यावरण पर पड़ने वाले परियोजना के परिणामों के बारे में लोगों को जागरूक बनाने के लिये कार्य योजनायें तैयार की है। इस नेटवर्क ने परियोजना के विरूद्ध प्रस्ताव पारित करने तथा तीन गांवों में परियोजना के कारण संसाधनों की बबार्दी ओर जीवन यापन के साधनों को होने वाले नुकसान के बारे में सर्वे करने के काम में खम्मम जिले के जलमग्न होने वाले सभी 9 मंडलों की पंचायतों की मदद भी की। यह नेटवर्क गांव वालों की तरफ से परियोजना का निर्माण कार्य शुरू होने से पहले कारगर पुनर्वास योजना बनाने के लिये सरकार के साथ बातचीत कर रहा है। विभिन्न तीर-तुक्के सरकार तथा तकनीकी विशेषज्ञों की निम्नलिखित दलीलें हैं :

1) गोदावरी नदी में प्रचूर मात्रा में पानी है जिसका विभिन्न निर्माणाधीन परियोजनाओं (जैसे- देवदुला, दुमुगुदेम तथा पोलावरम जैसी परियोजनाओं) के जरिये कारगर तरीके से दोहन किया जा सकता है जिससे सिंचाई की क्षमता बढ़ायी जा सकती है और राज्य के सूखा प्रभावित क्षेत्रों को लाभ पहुंचाया जा सकता है।
2) पोलावरम परियोजना से 2.88 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई के लिए ही नहीं बल्कि कई अन्य लाभ भी होंगे जिनमें बिजली उत्पादन, औद्योगिक तथा घरेलू कार्यों के लिए नहर पर बसे शहर तथा गांवों को प्रचूर मात्रा में पानी की आपूर्ति भी शामिल है।
3) प्रकाशम बैराज पर कृष्‍णा बेसिन को 2,267 घन मि मी पानी देने से सिरीसलेम तथा नागार्जुन सागर से सूखा ग्रस्त रयालसीमा क्षेत्र के लिये पानी भेजना संभव हो सकेगा। सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा जागरूक नागरिकों का मानना है कि :

1) जलप्लावन के कारण होने वाली भारी पर्यावरण एवं सामाजिक क्षति के मद्देनजर अन्य विकल्पों को ध्यान में रखना चाहिये।
2) सरकार को एक ऐसी योजना बनानी चाहिए थी जिसमें कि कम से कम जलप्लावन हो।
3) सरकार को बांध निर्माण शुरू करने से पहले एक कारगर पुनर्वास योजना बनानी चाहिए। पुनर्विचार की आवश्‍यकता गोदावरी के अतिरिक्त जल का समुचित उपयोग करने का राज्य सरकार का इरादा सराहनीय है। यह सही है कि समुचित सिंचाई परियोजनाओं के जरिये पानी का कारगर तरीके से दोहन किया जाना चाहिये। लेकिन साथ ही साथ इस बात का भी खंडन नहीं किया जा सकता कि‍ आज जिस स्थिति में पोलावरम् परियोजना है उसमें भारी पैमाने पर लोगों का विस्थापन होगा तथा पर्यावरण का विनाश होगा। इस परियोजना के कारण 9 मंडलों के 276 गांवों के लोग जलपलावन के कगार पर खड़े हैं जहां गरीब तथा उपेक्षित लोगों की ही अधिक आबादी है। इस सबका मतलब तो यह है कि इस परियोजना का लाभ आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों के अपेक्षाकृत धनी क्षेत्रों को पहुंचेगा जहां की 2.88 लाख हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई हो सकेगी। इस परियोजना से लाभ पाने वाले क्षेत्रों में एकमात्र पिछड़ा क्षेत्र रायलसीमा है जिसे कृश्णा बेसिन को 2,267 घन मी मी पानी छोड़े जाने के कारण (कुल लाभ 1,275 घन मिमी) लाभ मिलेगा। बहरहाल सरकार को चाहिए कि वह विकल्पों की छानबीन करे और ऐसे उपाय अपनाये जो पर्यावरण के साथ-साथ लोगों के लिये हितकारी हो। उदाहरण के लिए मध्य गोदावरी बेसिन जहां अच्छा पानी उपलब्ध है जो परियोजनाओं के अनुकूल है और इससे पिछड़े तेलंगाना क्षेत्र को भी लाभ मिलेगा। सरकार को अपने जेहन में निम्न दो बातों को ध्यान में रखना चाहिए।
1) कोई भी वैकल्पिक योजना ऐसी हो कि कम से कम क्षेत्र जलमग्न हो।
2) ऐसी परियोजना का लाभ गरीब लोगों तथा राज्य के पिछड़े इलाकों को मिले।

 

 

तालिका - आंध्र प्रदेश के जलमग्न क्षेत्र

जलीय क्षेत्र         

शुष्‍क            

प्रोराम्बोके

जंगल  

कुल

398 हेक्टेयर   

22,218 हेक्टेयर  

11,941 हेक्टेयर

3,18 हेक्टेयर   

37,743 हेक्टेयर

 

 


संदर्भ
वार्षिंक रिपोर्ट 2003 - 2004, इरीगेशन एंड सी ए डी डिपार्टमेंट, आंध्र प्रदेश
पोलोवरानिकी पुनाडी - गुजरात प्रांतनिकी जलसमाधि, शक्ति, हैदराबाद (अक्तूबर 2004)
पोलोवरम् - मंरिंथा विस्थारना - आंध्र भूमि, 24 अगस्त, 2004
हाइयर एलोकेशन फॉर इरीग्रेशन प्रोजेक्ट्स - हिन्दू, 20 फरवरी, 2005 में प्रकाशित आलेख

 

 

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